28/02/2021
प्रयागराज में छात्र छात्राओं के सुसाइड के मामले लगातार आ रहे हैं। पिछले 7 दिनों में 10 से ज्यादा और अकेले 22 फरवरी के दिन तीन सुसाइड हुए। अखबार और पत्रकारों की माने तो यह केवल सुसाइड है और इनकी संख्या पत्रकारिता की भाषा में दर्ज किया जाने वाला आंकड़ा मात्र है।
ऐसी खबरों को छापते हुए पत्रकार मनोचिकित्सकों की बातों को छाप रहे हैं और लिख रहे हैं उसमें कि यह उनके अकेलेपन की वजह से हो रहा है। इसमें घरवालों की जिम्मेदारी है वह उनसे बातचीत करते रहे हैं उनका ख्याल रखें और बीच-बीच में उनसे मिलने आ जाया करें। जीवन में सफलता और असफलता मिलती रहती है छात्रों को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए।
लेकिन क्या सच में इन पत्रकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
क्या सच में सपने दिखा कर सत्ता पर बैठने वाले लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
क्या सच में टैक्सपेयर से पैसों को बचाने वाली सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
क्या सच में सरकार द्वारा स्थापित तमाम आयोग की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
क्या सच में परीक्षा में देरी कर आने वाली परीक्षा एजेंसियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
क्या सच में भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने वाली अदालतों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
और फिर तो दुनिया में लोग पड़े ही हैं जो बड़ी आसानी से इन छात्रों को कायर कह देते हैं! इनके पास एक ही तर्क होता है कि लायक लोग कभी भूखे नहीं मरते। इनके पास कोई ऐसा ज्ञान ही नहीं है जिससे यह देख पाए दुनिया की हकीकत को कि इस व्यवस्था ने कितने लायक लोगों की जान ली है? आत्महत्या कभी कोई आसान फैसला नहीं होती, ब्लेड के खरोंच से भी इंसान डर जाता है तो मृत्यु को गले लगाने से पहले किस स्तर तक की निराशा उसके मन में गिर जाती है इसे सोच पाना भी बहुत मुश्किल है।
छात्रों की निराशा समाज के सवालों से नहीं है, असफलता के डर से नहीं है और न ही अगर बगल से मिलने वाले तानों से है! छात्रों में निराशा है अनियमित होती परीक्षाओं से, कोर्ट में लटकी हुई भर्तियों से, परीक्षा परिणाम प्राप्त करने के बाद भी लटकी हुई ट्रेनिंग का और कुछ में ट्रेनिंग पाने के बाद अब तक ना होने वाली जॉइनिंग का! मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले सभी छात्रों में निराशा है सरकार के कई फैसलों से, हर प्रकार के मुद्दे में जाति और धर्म को घुसा देने से, छात्रों में निराशा है प्रधानमंत्री की फालतू होने वाली मन की बात से और मुख्यमंत्री के असंवेदनशील फैसलों से।
मौके खत्म किए जा रहे हैं, उचित शिक्षा पर उचित कार्य भी नहीं मिल रहा है, उच्च शिक्षा व्यवस्था में फैले हुए भ्रष्टाचार ने छात्रों को ग्रेजुएशन के बाद ही पढ़ाई करने से इशारों में ही रुक जाने का इशारा कर देता है। ऑनलाइन होने के बाद तमाम रोजगार के मौके के ऊपर खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। कर्मचारी चयन आयोग की सीटें 7 सालों में 21 गुना घट गईं। सिपाही भर्ती परीक्षा के बाद केवल ट्रेनिंग करा दी गई है उसके बाद जॉइनिंग को लेकर इतनी देरी और लापरवाही अलग से हो रही है।
सरकार और उसकी इस लापरवाह व्यवस्था से छात्रों की जो लड़ाई है उसमें छात्र अकेले खड़े हैं। उनके साथ सिर्फ और सिर्फ उनके अध्यापक है जो तमाम जानकारियां लेते रहते हैं जिनका घर भी सरकार की तरफ से कराई जाने वाली परीक्षाओं की वजह से ही चलता है! देश के विपक्ष में बैठे हुए नेता केवल बेरोजगार शब्द का इस्तेमाल करते हैं जबकि कभी नियमित विरोध नहीं करते। वह सदन या सड़क पर बोलकर केवल औपचारिकता पूरी करते हैं जबकि उनकी चाहत यही है की समस्याएं बनी रहें।
पत्रकार तो इस मामले में तो क्या किसी भी मामले में वह देश की जनता के साथ नहीं है अधिकतर पत्रकार अपना अपना एजेंडा चला रहे हैं उनका उद्देश्य केवल एक दूसरे को नीचा दिखाना हो गया है। आने वाला समय चाहे जैसा भी हो लेकिन कठिन जरूर होगा। क्योंकि लाखों माता पिता के सपने जब उनकी आंखों के आंसुओं में बह रहे हैं, मन में हजारों सपने लिए छात्र फांसी के फंदे को चूम ले रहे हैं और फिर ऐसी भीड़ जो इन्हें कायर कह के भुला देना चाहती है यह सब चीजें कभी माफी योग्य नहीं होंगी!
सपने दिखाकर रुलाने वाले लोग तुम्हें इतिहास कभी माफ नहीं करेगा! ऐसे लिखते हुए मेरी आंखों में आंसू हैं!
- मंगलेश 'हर्ष' ✍️