31/05/2026
पापा के निधन के बाद जब उनके सारे कर्मकांड और अंतिम कार्य पूरे हुए, तब
मैं प्रयागराज से कोलकाता लौट रही थी। मन इतना भारी था कि किसी से बात
करने की भी इच्छा नहीं हो रही थी। रात लगभग 11 बजे की राजधानी एक्सप्रेस
थी और ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी, मैं
चुपचाप अपनी बोगी में जाकर बैठ गई। बस यही चाहती थी कि किसी तरह आंख लग
जाए और कुछ देर के लिए मन का शोर थम जाए।
मैंने अपनी सीट पर चादर बिछाई ही थी कि तभी मेरी नजर टीटीई के साथ खड़े
एक आदमी पर पड़ी। उतने में टीटीई मेरी टिकट चेक करने आ गए। मैंने टिकट
दिखा दी और फिर लेटने ही वाली थी कि कानों में उनकी बातचीत सुनाई दी।
वह आदमी बार-बार टीटीई से विनती कर रहा था
“सर, मेरी पत्नी की अभी-अभी डिलीवरी हुई है… वह ऊपर की सीट पर नहीं चढ़
पाएगी। अगर नीचे की सीट मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”
टीटीई भी लाचार थे। रात काफी हो चुकी थी और किसी यात्री को उठाकर सीट
बदलवाना आसान नहीं था।
उनकी बातें सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाई। मैं टीटीई के पास गई और बोली
“आप इन्हें मेरी सीट दे दीजिए, मेरी सीट नीचे की है। मैं ऊपर सो जाऊंगी।”
मेरी बात सुनते ही उस आदमी के चेहरे पर जैसे सुकून उतर आया। उसने हाथ
जोड़कर मुझे कई बार धन्यवाद कहा। उसकी आंखों में राहत साफ दिखाई दे रही
थी। उस पल पहली बार लगा कि शायद दूसरों के दर्द को समझना ही इंसानियत की
असली पहचान है।
कहते हैं ना, अगर आप किसी के लिए अच्छा करते हैं, तो ईश्वर उसका हिसाब
जरूर रखते हैं।
कुछ महीनों बाद मैं अपने छोटे बेटे वेदार्थ के साथ फ्लाइट से सफर कर रही
थी। उन दिनों मन हमेशा उलझा रहता था। इसी भागदौड़ और मानसिक तनाव में मैं
फ्लाइट की सीट बुक करना भूल गई। एयरपोर्ट पर भी ध्यान नहीं गया और सिस्टम
ने हमें अलग-अलग सीटें अलॉट कर दीं।
जब प्लेन में जाकर सीट देखी, तब अपनी गलती का एहसास हुआ। वेदार्थ बहुत
छोटा था, उसे अकेले कहीं और बैठाना संभव नहीं था। मैंने उसे अपने पास
बैठा लिया और घबराकर एयर होस्टेस से मदद मांगी।
उन्होंने कहा -
“मैम, अभी आप बैठ जाइए, मैं देखती हूं क्या हो सकता है।”
इतने में जिस यात्री की वह सीट थी, वह आ गए। उन्होंने मेरी परेशानी को एक
नजर में समझ लिया। बिना किसी नाराज़गी के उन्होंने मुझसे वेदार्थ की सीट
पूछी और खुद वहां जाकर बैठ गए।
उन्होंने अपनी वह विंडो सीट छोड़ दी, जिसके लिए शायद उन्होंने अतिरिक्त
पैसे दिए होंगे , सिर्फ एक मां की मजबूरी समझकर।
मैंने हाथ जोड़कर उन्हें कई बार धन्यवाद कहा। उस दिन दिल से यही महसूस
हुआ कि नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती। ईश्वर हर छोटे-बड़े कर्म का लेखा-जोखा
रखते हैं।
जो हम दुनिया में बोते हैं, वही किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे पास आता है।
दया लौटती है
सम्मान लौटता है
और सबसे बढ़कर, इंसानियत लौटती है।
शायद इसी का नाम जीवन है। 075430 48276