29/04/2023
बच्चों की शिक्षा में शिक्षक-अभिभावक सबंध की भूमिका: एक विश्लेषण-bachcho ki shiksha me shikshak abhibhavak sambandh ki bhumika: ek vishleshan Teacher, child education, education, ncert journal
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29/04/2023
बच्चों की शिक्षा में शिक्षक-अभिभावक सबंध की भूमिका: एक विश्लेषण-bachcho ki shiksha me shikshak abhibhavak sambandh ki bhumika: ek vishleshan Teacher, child education, education, ncert journal
https://www.educationforequity.co.in/2021/09/bhaasha-ke-roop-mein-hindee-shikshan-ke.html
20/09/2021
https://www.educationforequity.co.in/2021/07/social-miliue-of-disability.html
Social Miliue of Disability disability, social milieu, social inclusion, exclusion, sociaty and disabled
20/03/2020
चिड़िया
मानों सारा संसार, दिख जाता है
फुदक फुदक कर दाने चुगना
समुद्र की लहरों सा दिखता है
कितना खुबसूरत है ?
संसार तुम्हारा |
जब तुम आगन में
आ जाती हों
सूरज की किरणों के साथ
दिख जाती हों तुम
कितनी नटखट हों
शाम सबेरे चीची करना
तुम्हारा ....
मन को भाँ
जाता है
कितना खुबसूरत है ?
संसार तुम्हारा |
मै हूं गौरैया।
सीखना वृद्धिपरक होना है , वृद्धि ही जीवन का निकटतम पर्याय। पर सीखा कैसे जाए , यह चिन्तन का विषय है। ( सीखने का चिन्तन करने के बाद सीखे हुए का चिन्तन करने में आसानी हो जाती है। )
सुख्यात भौतिकशास्त्री रिचर्ड फेनमैन जितने अच्छे वैज्ञानिक थे , उतने ही अद्भुत अध्यापक। अध्यापन के लिए उनकी फेनमैन-तकनीक स्कूलों-कॉलेजों के गलियारों में आज भी जाने-अनजाने प्रयोग में लायी जाती है।
फेनमैन-तकनीक के चार चरण हैं :
1 . वह बात या कॉन्सेप्ट तय करिए जिसे आप सीखना चाहते हैं। 2 . उसे इस तरह समझने की कोशिश करिए , जैसे आपको उसे कक्षा छह के विद्यार्थी को समझाना है। 3 . समझाने के अपने अभ्यास में आपको कमियाँ मिलेंगी : शब्दों की कमियाँ , अर्थों की भी। उसे ठीक करिए। वापस बात या कॉन्सेप्ट को बेहतर समझिए। 4 . बेहतर समझ के बाद कक्षा छह के विद्यार्थी को उसे दुबारा समझाइए।
फेनमैन हमें ज्ञान के दो प्रकारों के बारे में बताते हैं। पहला प्रकार वह है , जिसमें हम किसी को जानते हैं। दूसरा वह जिसमें हम उसके नाम-भर से परिचित होते हैं। हममें से अधिकांश ज्ञान के ग़लत प्रकार पर आजीवन जुटे रहते हैं। हमारी ज़्यादातर ऊर्जा नामों के इर्दगिर्द घूमने में ख़र्च हो जाती है और हम कॉन्सेप्ट से वंचित ही जाते हैं।
दार्शनिक मॉर्टिमर एडलर का कथन है कि जो जानने वाला सोचता है कि वह जानता है पर उसे ठीक से समझा नहीं सकता , बहुधा जानता ही नहीं। इस समझने-समझाने की आजीवन परख को ही फेनमैन ज्ञान-अर्जन का नाम देते हैं। सीखने के लिए पात्रता आवश्यक है और वह बच्चों में मिलती है। एकदम छोटे बच्चों में नहीं, उनका पात्रत्व तो अभी गढ़ा जा रहा है। बल्कि बारह साल के आसपास के बच्चे , जिनके पास शब्द और समझ का एक पर्याप्त भाण्डार होता है।
वयस्कों को सिखा-समझाकर हमें अक्सर अपनी समझ का भ्रम हो जाता है। वयस्कता गढ़ी जा चुकी वय है , उसके पास खुले हुए प्रश्न बहुत कम हैं। कई बार उनके सामने समझाने वाला व्यक्ति अपनी भाषा और ज्ञान का वैभव दिखाता गुज़र जाता है और उनपर उसके ज्ञान का तनिक प्रभाव नहीं पड़ता। वे सोचते हैं कि वे उसे समझ रहे हैं , कई बार व्यक्त भी कर देते हैं कि उन्हें सब समझ में आ रहा है , लेकिन सब-कुछ या अधिकांश उनके ऊपर से गुज़र जाता है।
ज़्यादातर बातें ( कॉन्सेप्ट ) ऊबड़-खाबड़ होती हैं , समतल-स्निग्ध नहीं। ऐसे में कोई ज़रूरी नहीं कि समूची वे एकबार में समझी जाएँ। पर कक्षा छह ( अथवा लगभग बारह वर्ष ) के छात्र को केन्द्र में रखकर व्यक्त किया गया ज्ञान सर्वाधिक लोगों तक पहुँचता है , यह नोबल-पुरस्कार-विजेता फेनमैन का समीचीन मत है।
बचपन और यौवन की दहलीज़ पर खड़ा व्यक्ति सर्वाधिक सवालों से लैस होता है। अध्यापक की सबसे कड़ी परीक्षा वही लेता है।
--- स्कन्द।जी की वाल से
गड़बड़ कहाँ हुई
एक बहुत ब्रिलियंट लड़का था. सारी जिंदगी फर्स्ट आया. साइंस में हमेशा 100% स्कोर किया. अब ऐसे लड़के आम तौर पर इंजिनियर बनने चले जाते हैं, सो उसका भी सिलेक्शन IIT चेन्नई में हो गया. वहां से B Tech किया और वहां से आगे पढने अमेरिका चला गया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफ़ोर्निया से MBA किया.
अब इतना पढने के बाद तो वहां अच्छी नौकरी मिल ही जाती है. उसने वहां भी हमेशा टॉप ही किया. वहीं नौकरी करने लगा. 5 बेडरूम का घर उसके पास. शादी यहाँ चेन्नई की ही एक बेहद खूबसूरत लड़की से हुई .
एक आदमी और क्या मांग सकता है अपने जीवन में ? पढ़ लिख के इंजिनियर बन गए, अमेरिका में सेटल हो गए, मोटी तनख्वाह की नौकरी, बीवी बच्चे, सुख ही सुख।
लेकिन दुर्भाग्य वश आज से चार साल पहले उसने वहीं अमेरिका में, सपरिवार आत्महत्या कर ली. अपनी पत्नी और बच्चों को गोली मार कर खुद को भी गोली मार ली. What went wrong? आखिर ऐसा क्या हुआ, गड़बड़ कहाँ हुई.
ये कदम उठाने से पहले उसने बाकायदा अपनी wife से discuss किया, फिर एक लम्बा su***de नोट लिखा और उसमें बाकायदा अपने इस कदम को justify किया और यहाँ तक लिखा कि यही सबसे श्रेष्ठ रास्ता था इन परिस्थितयों में. उनके इस केस को और उस su***de नोट को California Institute of Clinical Psychology ने ‘What went wrong?‘ जानने के लिए study किया .
पहले कारण क्या था , su***de नोट से और मित्रों से पता किया। अमेरिका की आर्थिक मंदी में उसकी नौकरी चली गयी. बहुत दिन खाली बैठे रहे. नौकरियां ढूंढते रहे. फिर अपनी तनख्वाह कम करते गए और फिर भी जब नौकरी न मिली, मकान की किश्त जब टूट गयी, तो सड़क पर आने की नौबत आ गयी. कुछ दिन किसी पेट्रोल पम्प पर तेल भरा बताते हैं. साल भर ये सब बर्दाश्त किया और फिर पति पत्नी ने अंत में ख़ुदकुशी कर ली...
इस case study को ऐसे conclude किया है experts ने : This man was programmed for success but he was not trained,how to handle failure. यह व्यक्ति सफलता के लिए तो तैयार था, पर इसे जीवन में ये नहीं सिखाया गया कि असफलता का सामना कैसे किया जाए.
अब उसके जीवन पर शुरू से नज़र डालते हैं. पढने में बहुत तेज़ था, हमेशा फर्स्ट ही आया. ऐसे बहुत से Parents को मैं जानता हूँ जो यही चाहते हैं कि बस उनका बच्चा हमेशा फर्स्ट ही आये, कोई गलती न हो उस से. गलती करना तो यूँ मानो कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया और इसके लिए वो सब कुछ करते हैं, हमेशा फर्स्ट आने के लिए. फिर ऐसे बच्चे चूंकि पढ़ाकू कुछ ज्यादा होते हैं सो खेल कूद, घूमना फिरना, लड़ाई झगडा, मार पीट, ऐसे पंगों का मौका कम मिलता है बेचारों को,12 th कर के निकले तो इंजीनियरिंग कॉलेज का बोझ लद गया बेचारे पर, वहां से निकले तो MBA और अभी पढ़ ही रहे थे की मोटी तनख्वाह की नौकरी. अब मोटी तनख्वाह तो बड़ी जिम्मेवारी, यानी बड़े बड़े targets.
कमबख्त ये दुनिया , बड़ी कठोर है और ये ज़िदगी, अलग से इम्तहान लेती है. आपकी कॉलेज की डिग्री और मार्कशीट से कोई मतलब नहीं उसे. वहां कितने नंबर लिए कोई फर्क नहीं पड़ता. ये ज़िदगी अपना अलग question paper सेट करती है. और सवाल ,सब out ऑफ़ syllabus होते हैं, टेढ़े मेढ़े, ऊट पटाँग और रोज़ इम्तहान लेती है. कोई डेट sheet नहीं.
एक अंग्रेजी उपन्यास में एक किस्सा पढ़ा था. एक मेमना अपनी माँ से दूर निकल गया. आगे जा कर पहले तो भैंसों के झुण्ड से घिर गया. उनके पैरों तले कुचले जाने से बचा किसी तरह. अभी थोडा ही आगे बढ़ा था कि एक सियार उसकी तरफ झपटा. किसी तरह झाड़ियों में घुस के जान बचाई तो सामने से भेड़िये आते दिखे. बहुत देर वहीं झाड़ियों में दुबका रहा, किसी तरह माँ के पास वापस पहुंचा तो बोला, माँ, वहां तो बहुत खतरनाक जंगल है. Mom, there is a jungle out there.
*इस खतरनाक जंगल में जिंदा बचे रहने की ट्रेनिंग बच्चों को अवश्य दीजिये*.।
बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार भी देना जरूरी है ,हर परिस्थिति को ख़ुशी ख़ुशी धैर्य के साथ झेलने की क्षमता, और उससे उबरने का ज्ञान और विवेक बच्चों में होना ज़रूरी है।माता पिता सफल जीवन के लिए तितिक्षा की शिक्षा अवश्य दें ।
साभार फेसबुक
हर साल पुरे विश्व में आज के दिन यानी कि 8 सितंबर को 'विश्व साक्षरता दिवस' मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के 7वें महासचिव कोफ़ी अन्नान ने कभी कहा था, "हर किसी के लिए, हर कहीं, सामान्य रूप से शिक्षा के साथ साक्षरता होना मूल मानव अधिकार है।"
जी हाँ, यदि आप लिखना-पढ़ना जानते हैं तो आप स्वतंत्र हैं। इसलिए अपने आस-पास जिसे भी आप साक्षर बना सकते हैं, उसकी मदद करें। क्योंकि साक्षरता शिक्षित होने की तरफ पहला कदम है। और शिक्षा सभी के लिए है फिर धर्म, जाति, रंग, या लिंग चाहे जो भी हो।
आप सभी को विश्व साक्षरता दिवस की शुभकामनाएं!
#विश्व_साक्षरता_दिवस #शिक्षा #पढ़ेगा_भारत_तभी_बढ़ेगा_भारत
#विश्व_में_मजदूर_दिवस_की_उत्पत्ति –
1 मई 1986 में अमेरिका के सभी मजदूर संघ साथ मिलकर ये निश्चय करते है कि वे 8 घंटो से ज्यादा काम नहीं करेंगें, जिसके लिए वे हड़ताल कर लेते है. इस दौरान श्रमिक वर्ग से 10-16 घंटे काम करवाया जाता था, साथ ही उनकी सुरक्षा का भी ध्यान नहीं रखा जाता था. उस समय काम के दौरान मजदूर को कई चोटें भी आती थी, कई लोगों की तो मौत हो जाया करती थी. काम के दौरान बच्चे, महिलाएं व् पुरुष की मौत का अनुपात बढ़ता ही जा रहा था, जिस वजह से ये जरुरी हो गया था, कि सभी लोग अपने अधिकारों के हनन को रोकने के लिए सामने आयें और एक आवाज में विरोध प्रदर्शन करें.
इस हड़ताल के दौरान 4 मई को शिकागो के हेमार्केट में अचानक किसी आदमी के द्वारा बम ब्लास्ट कर दिया जाता है, जिसके बाद वहां मौजूद पुलिस अंधाधुंध गोली चलाने लगती है. जिससे बहुत से मजदूर व् आम आदमी की मौत हो जाती है. इसके साथ ही 100 से ज्यादा लोग घायल हो जाते है. इस विरोध का अमेरिका में तुरंत परिणाम नहीं मिला, लेकिन कर्मचारियों व् समाजसेवियों की मदद के फलस्वरूप कुछ समय बाद भारत व अन्य देशों में 8 घंटे वाली काम की पद्धति को अपनाया जाने लगा. तब से श्रमिक दिवस को पुरे विश्व में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाने लगा, इस दिन मजदूर वर्ग तरह तरह की रेलियां निकालते व् प्रदर्शन करते है.
नाविदा खान की इस पोस्ट को गंभीरता से पढ़ें। कहीं आप भी ऐसी गलती तो नहीं कर रहे हैं?
****************
कृति ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि :” मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वो चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें. ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं. पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं.’ कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई लेकिन खुद को नहीं रोक सकी. ‘बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की सुसाइड भी कर सकती है, लेकिन मैं आपलोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है|’
अपनी मां के लिए उसने लिखा- ‘आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं. मैं भी विज्ञान पढ़ती रहीं ताकि आपको खुश रख सकूं. मैं क्वांटम फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे विषयों को पसंद करने लगी और उसमें ही बीएससी करना चाहती थी लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं.’ कृति अपनी मां को चेतावनी देती है कि- ‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11 वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना. वो जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है जिससे वो प्यार करती है|’
केवलानंद सर की फेसबुक वाल से
शिक्षा की गुणवत्ता के लिए केवल शिक्षक ही जिम्मेदार नहीं है !
यूनेस्को (UNESCO) की वर्ष 2017 में प्रकशित ‘New Global Education Monitoring Report’ में इस तथ्य को गंभीरता से रेखांकित किया है की शिक्षा की गुणवत्ता के लिए अकेले अध्यापक जिम्मेदार नहीं है। यह बात आश्वस्ति कारक है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के मामले में निगरानी करने वाली संस्था ने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारको का वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने की कोशिश की है। वस्तुतः किसी भी लोकतान्त्रिक देश (या अन्य देशों में भी) अपने नौनिहालों की शिक्षा का योग क्षेम वहम करना राष्ट्र की अहम् जिम्मेदारी होती है/होनी चाहिए। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में अध्यापक के साथ-साथ एक बड़ा तंत्र भी लगा होता है । यह अलग बात है कि यह तंत्र प्रत्यक्ष रूप से सामने नजर नहीं आता है । इसी शिक्षा तंत्र का एक अहम् अंग अध्यापक है,जो एक सक्रीय एजेंसी के रूप में विद्यालय में बच्चों के साथ सीखने-सिखाने के काम में प्रत्यक्ष नजर आता है। शिक्षा की गुणवत्ता के प्रश्न पर अध्यापक एजेंसी को इस तरह से कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है कि आम जन को यह विश्वास (बहुत बार भ्रम भी) हो जाता है '''को यह विश्वास (बहुत बार भ्रम भी) दिलाया जाता है ‘शिक्षा में आयी किसी भी गिरावट के लिए,यह विश्वास (वस्तुतः भ्रम) करने लगता है कि शिक्षा में किसी गड़बड़ी/गिरावट के लिए एकमात्र जिम्मेदार व्यक्ति अध्यापक है और यह इतने नियोजित ढंग से होता है कि अध्यापक, समुदाय/समाज के सीधे निशाने पर होते हैं । शिक्षा की गुणवत्ता गुणवत्ता में गिरावट के लिए अध्यापक के विरुद्ध सामाजिक लामबंदी होने लगती है। ऐसा करना आसान भी है, अध्यापक शिक्षा तंत्र के अंतिम पायदान पर मौजूद वह व्यक्ति है जो शिक्षण कार्य के लिए प्रयास कर सकता है परन्तु शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले बहुत से कारकों पर उसका नियंत्रण नहीं होता है। वस्तुतः शिक्षा की गुणवत्ता एवं शिक्षक की गुणवत्ता में फरक है।
इसे एक उदाहरण से समझने में आसानी रहेगी। मान लीजिए (बहुधा यह यथार्थ ही है) किसी प्राथमिक विद्यालय में 5 कक्षाओं को पढ़ाने के लिए मात्र 2 अध्यापक हैं, बहुत ईमानदारी एवं मेहनत से काम करते हैं, बावजूद इसके विद्यालय के सभी बच्चे अपेक्षित स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं । शिक्षा की गुणवत्ता तो तभी कही जा सकती है, जब विद्यालय का प्रत्येक बच्चा अपनी गति एवं सामर्थ्य के अनुरूप सीखने में सफल हो जाए। विद्यालय के दोनों अध्यापकों ने तो अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। दोनों अध्यापक दो तरह से कक्षाओं का सञ्चालन कर रहे होंगे। पहला-प्रत्येक कक्षा को अलग-अलग संचालित करना, ऐसा करना से विद्यालय में किसी भी समय में कोई न कोई कक्षा अध्यापक विहीन जरुर रही होंगी। और दूसरा-दोंनो अध्यापकों ने कुछ कक्षाओं को साथ-साथ बिठाकर पढ़ाने-लिखाने का उपक्रम किया होगा, ऐसे में अनैच्छिक रूप से बहु-कक्षा और बहु-स्तरीय शिक्षण किया होगा। बहु-कक्षा और बहु-स्तरीय शिक्षण शिक्षण में प्रत्येक बच्चे की अधिगम जरूरतों को संबोधित में एक दूसरे तरह की चुनौती पेशतर जरूर आएँगी। प्रत्येक कक्षा एवं प्रत्येक विषय के विशेषज्ञ अध्यापक उपलब्ध होने पर शिक्षा की गुणवत्ता पर जरुर सकारात्मक असर पड़ता। विद्यालय में उपलब्ध भौतिक एवं अधिगम संसाधनों की दृष्टि से विचार किया जाए तो यह अंतर और अधिक दिखलायी देगा। इस प्रकार से शिक्षक की गुणवत्ता एवं शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकों को अलग-अलग देखने पर तस्वीर भी अधिक साफ़ नजर आने लगेगी। बच्चे जितनी भी अवधि के लिए विद्यालय में रहते हैं, इस अवधि में बहुत सारे संज्ञानात्मक एवं सह-संज्ञानात्मक अनुभवों से गुजरते हैं, उनको साफ़-सुथरा कक्षा-कक्ष उपलब्ध है, कमरे में पर्याप्त रौशनी है, वातानुकूलन है, समृद्ध पुस्तकालय है, स्वच्छ परिवेश है, स्वच्छ शौचालय हैं, खेलने के लिए खूबसूरत मैदान है आदि-आदि। ये सभी घटक विद्यालय में बच्चे के समय को आनंददायक बनाने के साथ-साथ अर्थपूर्ण बनाने में मददगार साबित होंगे और इन सभी का समग्र असर बच्चों के अधिगम पर जरूर पड़ेगा, इसमें संदेह का कोई कारण नजर नहीं आता।
अध्यापक के पढ़ाने-लिखाने के अतिरिक्त जिन सुविधाओं की बात पहले कही गयी है, यह उपलब्ध कराना किसकी जवाबदेही है ? निश्चित रूप से अध्यापक की तो नहीं ही है। फिर कैसे हम अध्यापक को उन सभी बातों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकते हैं ? जो अध्यापक के दायरे (Domain) में आती ही नहीं हैं परन्तु इसका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर जरुर पड़ता है। आश्चर्य करने वाली बात यह है कि ये मुद्दे समुदाय/समाज के विमर्श का हिस्सा भी नहीं बन सके हैं। शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में गहनता से विश्लेषण करें और हम इनको लेकर वास्तव में गंभीर भी हैं तो इसकी जांच-पड़ताल करना उपयोगी हो सकता है और जरूरी भी। इसके संदर्भगत कुछ मुद्दों को चिन्हित किया जा सकता है-
1. प्रत्येक विद्यालय में प्रत्येक कक्षा एवं विषय के अध्यापकों की उपलब्धतता। बच्चों का शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (1 अप्रैल 2010 से लागू) का सहारा लेकर देश के बहुत से राज्यों में 30 बच्चों पर एक अध्यापक और इसके इसी अनुपात के आधार पर बच्चों की संख्या के आधार पर शिक्षकों की व्यवस्था का आधार लेकर तर्क गढ़े जा रहे हैं कि शिक्षकों की संख्या इस अनुपात के आधार पर अधिक है। यह एक तरह से शिक्षकों के पदों को समय पर न भर सकने की नाकामी को छिपाना है। जहाँ तक शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को मैंने समझने की कोशिश की है, इससे यह समझ बनती है कि शिक्षक-छात्र अनुपात (पी0 टी0 आर0) एक न्यूनतम जरूरत को रेखांकित करता है, प्रत्येक कक्षा एवं प्रत्येक विषय के अध्यापक उपलब्ध कराने की राज्य की मनसा पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध इसमें नहीं है। सरकारी विद्यालयों से निजी स्कूलों में बच्चों के बढ़ते नामांकन के पीछे अन्य कारणों में से सबसे प्रमुख कारण सरकारी विद्यालयों में प्रत्येक कक्षा के लिए अध्यापकों की अनुपलब्धता है (अभिभावकों एवं समुदाय से बात-चीत में यह बात बार-बार उभरकर सामने आती है ‘ यदि इन सरकारी विद्यालयों में हरेक क्लास के लिए अध्यापक होते तो हम प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को क्यों ले जाते, प्राइवेट स्कूलों में कम से कम हरेक क्लास के लिए मास्टर तो है, इतना तो हम भी जानते हैं कि सरकारी विद्यालयों के अध्यापक ट्रेंड होते हैं, क्या करें? हमारी मजबूरी है).
2. बहु-कक्षा एवं बहु-स्तरीय शिक्षण एक अल्पकालिक अनैच्छिक उपाय तो हो सकता है परन्तु दीर्घकाल में शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका नकारात्मक असर ही पड़ेगा। ऐसा करने से शिक्षकों की कमी को कुछ समय के लिए छिपाया जा सकता है लेकिन इससे शिक्षण की गुणवत्ता में जो गिरावट आएगी, इसका शिक्षा की समग्र गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ना लाजिमी है। यह दो तरह से शिक्षकों की अस्मिता को प्रभावित कर रहा है, पहला-इससे शिक्षक एजेंसी की हैसियत को कमजोर किया जा रहा है और शिक्षणशास्त्र के सिद्धातों के विपरीत काम करने के लिए एक तरह से बाध्य किया जा रहा है। दूसरा-समुदाय एवं समाज में यह प्रस्थापित किया जा रहा है कि दरअसल कम बच्चों के लिए एक या दो अध्यापकों से अधिक की जरूरत ही नहीं है। इससे एक विचित्र किस्म का दुश्चक्र दिखलाई पड़ता है। बच्चों की संख्या घटने पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के 30:1 अनुपात का सहारा लेकर सरप्लस अध्यापकों को विद्यालय से हटा दो, अध्यापक कम होने से अगले वर्ष बच्चों के नामांकन में पुनः कमी आती है (कारण- पहले बिंदु में अभिभावकों एवं समुदाय के नजरिये पर चर्चा की गयी है) इस प्रकार घटते छात्र-कम अध्यापकों का क्रम चलता है और एक दिन वह विशेष विद्यालय बंद हो जाता है। उत्तराखंड राज्य में इस तरह से बंद हो जाने वाले विद्यालयों की संख्या (विशेषकर पर्वतीय एवं दुर्गम क्षेत्रों में बहुत अधिक है), ऐसा देश के दूसरे भागों में भी हो रहा होगा ( इसकी ठीक-ठीक जानकारी मुझे नहीं है, अलबत्ता कुछ राज्यों में पी0पी0पी0 मोड में विद्यालय संचालित करने के निर्णयों की जानकारी जरूर है).
3. विद्यालय में बच्चे कक्षा-कक्ष के अलावा भी बहुत सारे अनुभवों से गुजरते हैं/गुजरना चाहिए। उनको पुस्तकालय, वाचनालय (Reading Room), ICT, क्रीड़ा एवं खेल, संगीत-नाटक, कार्य-अनुभव आदि के माध्यम से विविध अनुभवों से गुजरने के अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए विद्यालय को अतिरिक्त संसाधनों की जरुरत होगी। यदि वास्तव में शिक्षा की गुणवत्ता को पाना चाहते हैं तो यह करना बहुत जरूरी होगा। आजादी के 70 वर्षों से भी अधिक बीत जाने पर भी शिक्षा के लिए संसाधनों की कमी का रोंना समझ से परे है, जबकि आज से 50 वर्ष पहले वर्ष 1966 में ही कोठारी कमीशन ने जी0डी0पी0 का 6 प्रतिशत शिक्षा के लिए व्यय करने की सिफारिश भी कर दी थी। प्रायः यह कहा जाता है कि इस दुनियां की अन्य सभी चीजें इन्तजार कर सकती हैं परन्तु नौनिहालों की शिक्षा नहीं।
4. अध्यापकों का प्रशिक्षण एवं शिक्षकों से अन्य कामों में संलग्न रखना न केवल शिक्षण की गुणवत्ता वरन अंततः शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डालता है, विशेषकर शिक्षक को ऐसे काम में जब-तब लगा देना जिसका उसके पठन-पाठन से कोई तारतम्य ही ना हो। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में स्पष्ट निर्देश है कि आपदा सम्बन्धी कार्य, जनगणना एवं निर्वाचन ड्यूटी के अतिरिक्त अध्यापकों को अन्य किसी कार्य में नियोजित नहीं किया जाएगा। बावजूद इसके आज भी देश के कई भागों में अध्यापक अपने पठन-पाठन सम्बन्धी समय एवं उर्जा का बहुत सारा हिस्सा उन कर्तव्यों के निर्वहन में लगा रहे हैं जिसका बच्चों की पढाई-लिखाई से कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरा मुद्दा अध्यापकों के प्रशिक्षण से जुदा है जिसमें अध्यापकों का शैक्षिक वर्ष के 10 महत्वपूर्ण दिन (पहले तो 20 थे) उस प्रक्षिक्षण पर खर्च हो जाते हैं जो उनकी अकादमिक जरूरतों को दरअसल संबोधित ही नहीं करते। प्रशिक्षण की जरूरतों को पहचाने बिना सभी शिक्षकों के लिए एक समान प्रशिक्षण कारगर हो जाएगा, यह बात समझ से परे है। यह तो निश्चित है कि प्रत्येक अध्यापक की अकादमिक जरूरतों में मूलभूत अंतर जरुर होगा। हर साल लगभग एक जैसी विषय-वस्तु, एक ही तरीके से दिया गया प्रशिक्षण अध्यापकों की बहुत मदद नहीं कर पा रहे है। शिक्षक प्रशिक्षणों की विषय-वस्तु, समयावधि, तौर-तरीकों में लचीलापन लाने की जरुरत है। यह भी संभव है कि किसी अध्यापक को वस्तुतः प्रशिक्षण की जरुरात ही ना हो, इसके बजाय उनको एक्सपोज़र, सेमिनार, नवाचारी और अपने क्षेत्र में बेहतर काम कर रहे अध्यापकों से अंतःक्रिया करके अधिक लाभ मिलें। अध्यापकों की अकादमिक जरूरतों को किस प्रकार से संबोधित किया जाए, यह अध्यापक की आवश्यकता विशेष पर निर्भर करेगा, सभी को एक सामान प्रशिक्षण अनुभव देने से बहुत लाभ नहीं मिला है, शिक्षक प्रशिक्षणों के अनुभव इस बात की तस्दीक करते हैं ।
उक्त विमर्श के आलोक में हम कह सकते हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता के लिए निम्नलिखित घटक बहुत जरुरी हैं-
• प्रत्येक विद्यालय में प्रत्येक कक्षा एवं विषय के अध्यापकों की उपलब्धतता।
• विद्यालय के लिए समुचित भौतिक एवं शैक्षिक संसाधनों की व्यवस्था।
• विद्यालय के लिए जरूरी वित्तीय संसाधनों की निरंतर आपूर्ति।
• अध्यापकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से इतर कार्यों में नियोजन पर रोक।
• अध्यापकों की अकादमिक जरूरतों को संबोधित करने के लिए प्रशिक्षण एवं क्षमता संवर्धन के लचीले (Flexible) प्रावधान।
• सीखने-सिखाने के दृष्टिगत अध्यापक को अकादमिक स्वायत्तता।
• उक्त सभी घटकों के पूर्ण हो जाने पर अध्यापक की जवाबदेही को सुनिश्चित करना।
शिक्षा की गुणवत्ता के लिए सिर्फ अध्यापक ही जिम्मेदार नहीं ठहराये जा सकते हैं। यह जरूर है कि शिक्षा की गुणवत्ता बहुत हद तक शिक्षण की गुणवत्ता पर निर्भर करती है, इसके लिए शिक्षक एजेंसी को मजबूत करने की जरुरत है। शिक्षा की गुणवत्ता के लिए एकमात्र अध्यापक को जिम्मेदार ठहराकर हम शिक्षक की हैसियत को एक तरह से कमजोर ही करेंगे और इससे गुणवत्तायुक्त शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे, इसमें उम्मीद की गुन्जाईस बहुत कम नजर आती है।
(1878 शब्द)