Baijnath Hanuman inter College, Haidarganj- Ghazipur

Baijnath Hanuman inter College, Haidarganj- Ghazipur

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विद्यालय में पुनः पठन पाठन 19 अक्टूबर स?

03/12/2025
12/02/2025

** * **महान संत रविदास जी को नमन*****
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संत रविदास जी प्रमुख संतों में से एक थे। वे समाज सुधारक, संत, कवि थे, जिन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक समानता का संदेश दिया। उनकी शिक्षाएँ समाज में फैले जातिवाद, छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ थीं। उनके दोहे और पद आज भी जनमानस में प्रचलित हैं।
संत रविदास जी का जन्म 1377 ई. (कुछ मान्यताओं के अनुसार 1398 ई.) में वाराणसी के पास सीरगोवर्धनपुर गाँव में हुआ था।
उनका परिवार चर्मकार (चमड़े का काम करने वाला) जाति से था, जो उस समय समाज में निम्न समझी जाती थी।
उनके पिता का नाम रघु और माता का नाम कर्मा देवी था।
बचपन से ही रविदासजी का मन आध्यात्म की ओर था।
उन्होंने संत रामानंद से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की।
गुरु नानक और अन्य संतों से संपर्क
ऐसा माना जाता है कि संत रविदास जी की मुलाकात गुरु नानक देव, कबीरदास, दादू दयाल और अन्य संतों से हुई थी।
उनकी शिक्षाएँ सिख धर्म पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं, इसलिए उनकी रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं।
संत रविदास ने जाति-पांति और भेदभाव का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि इंसान की पहचान जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है।
"जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।"
(अर्थ: समाज में इतनी जातियाँ हैं जितनी पत्तों में रेखाएँ, जब तक जात-पात खत्म नहीं होगा, मानवता एक नहीं होगी।)
उन्होंने "बेगमपुरा" नामक एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की, जहाँ कोई भेदभाव, दुख, गरीबी या अन्याय न हो।
बेगमपुरा का अर्थ है – "बेगम" (बिना ग़म के) और "पुरा" (नगर), यानी "दुख-रहित नगर"।
बेगमपुरा में सभी लोग समान होंगे, वहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं होगा
संत रविदास ने कर्मयोग पर बल दिया।
वे मानते थे कि मेहनत और ईमानदारी से किए गए कार्य से ही जीवन सार्थक बनता है।
वे मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते थे।
संत रविदास ने हिंदी और ब्रज भाषा में कई दोहे और पद लिखे, जिनमें आध्यात्मिकता और सामाजिक समानता का संदेश था।
"ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।"
(अर्थ: मैं ऐसा राज्य चाहता हूँ, जहाँ सबको समान रूप से भोजन मिले और सभी लोग खुशी से रहें।)
संत रविदास जी के 41 पद और दोहे सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित हैं।
इससे पता चलता है कि उनकी शिक्षाएँ सिख गुरुओं को भी प्रेरित करती थीं
संत रविदास की मृत्यु 1528 ई. में मानी जाती है।
ऐसा कहा जाता है कि वे ध्यान में लीन रहते हुए परमधाम को चले गए।
आज भी लाखों लोग संत रविदास के विचारों का अनुसरण करते हैं।
उनका जन्मोत्सव माघ पूर्णिमा के दिन हर साल धूमधाम से मनाया जाता है।
पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों में उनके मंदिर बने हुए हैं।
उनका सबसे प्रसिद्ध मंदिर श्री गुरु रविदास जन्मस्थली मंदिर (वाराणसी) है।
संत रविदास ने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी।
उन्होंने समाज के निचले तबके को आत्मसम्मान का मार्ग दिखाया।
उनके विचारों से ही रविदासिया धर्म की उत्पत्ति हुई, जिसे उनके अनुयायी मानते हैं।
संत रविदास केवल एक संत नहीं थे, बल्कि एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। उन्होंने समाज में फैले जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ आवाज भी उठाई। उनका "बेगमपुरा" का विचार आज भी समानता और मानवता के लिए एक प्रेरणा है। उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और हमें समाज में प्रेम, समानता ही मोक्ष का मार्ग है।। ऐसे महान संत को कोटि कोटि नमन।।
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**मनोज कुमार गुप्ता ( प्रधानाचार्य )**
*बैजनाथ हनुमान इंटर कॉलेज*
* हैदरगंज-गाजीपुर *

09/02/2024

***“मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..***
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एक था भिखारी ! रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा। भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो?”

भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ?”सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ।

तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।*
इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ।

किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा।बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा। लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है?

इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।

वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था।कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था।

जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा। एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी।वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला।

आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।सेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी। सेठ:- वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया। लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई।

वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है।
वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..

मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ! लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना?”

सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं।भिखारी:- सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।*
सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे?अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला: हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ।

नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था... जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था ।

और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ।भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा -सोऽहं शिवोहम !! समझ की ही तो बात है...भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा | उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया |

जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ...
अर्थात मैं भगवान का अंश हूॅ।
फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा ?🙏🙏

01/02/2024

******* #कहानी- संस्कारी बहू *****
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एक सेठ के सात बेटे थे. सभी का विवाह हो चुका था. छोटी बहू संस्कारी माता-पिता की बेटी थी. बचपन से ही अभिभावकों से अच्छे संस्कार मिलने के कारण उसके रोम-रोम में संस्कार बस गया था. ससुराल में घर का सारा काम तो नौकर-चाकर करते थे, जेठानियां केवल खाना बनाती थीं. उसमें भी खटपट होती रहती थी. छोटी बहू को संस्कार मिले थे कि अपना काम स्वयं करना चाहिए और प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए. अपना काम स्वयं करने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है.
उसने युक्ति खोज निकाली और सुबह जल्दी स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर पहले ही रसोई में जा बैठी. जेठानियों ने टोका, लेकिन उसने प्रेम से रसोई बनाई और सबको प्रेम से भोजन कराया. सभी ने बड़े प्रेम से भोजन किया और प्रसन्न हुए.
इसके बाद सास छोटी बहू के पास जाकर बोली, "बहू, तू सबसे छोटी है, तू रसोई क्यों बनाती है? तेरी छह जेठानियां हैं. वे खाना बनाएंगी."
बहू बोली, "मांजी, कोई भूखा अतिथि घर आता है, तो उसको आप भोजन क्यों कराती हैं?"
"बहू शास्त्रों में लिखा है कि अतिथि भगवान का रूप होता है. भोजन पाकर वह तृप्त होता है, तो भोजन करानेवाले को बड़ा पुण्य मिलता है."
"मांजी, अतिथि को भोजन कराने से पुण्य होता है, तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है? अतिथि भगवान का रूप है, तो घर के सभी लोग भी तो भगवान का रूप हैं, क्योंकि भगवान का निवास तो सभी में है.
अन्न आपका, बर्तन आपके, सब चीज़ें आपकी हैं, मैंने ज़रा-सी मेहनत करके सब में भगवदभाव रख कर रसोई बनाकर खिलाने की थोड़ी-सी सेवा कर ली, तो मुझे पुण्य मिलेगा कि नहीं? सब प्रेम से भोजन करके तृप्त और प्रसन्न होंगे, तो कितनी ख़ुशी होगी. इसलिए मांजी आप रसोई मुझे बनाने दें. कुछ मेहनत करूंगी, तो स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा."
सास ने सोचा कि बहू बात तो ठीक ही कहती है. हम इसे सबसे छोटी समझते हैं, पर इसकी बुद्धि सबसे अच्छी है और बहुत संस्कारी भी है.

अगले दिन सास सुबह जल्दी स्नान करके रसोई बनाने बैठ गई. बहुओं ने देखा, तो बोलीं, 'मांजी, आप क्यों कष्ट करती हैं?"
सास बोली, "तुम्हारी उम्र से मेरी उम्र ज़्यादा है. मैं जल्दी मर जाऊंगी. मैं अभी पुण्य नहीं करूंगी, तो फिर कब करूंगीं?"
बहुएं बोलीं, "मांजी, इसमें पुण्य की क्या बात है? यह तो घर का काम है."

सास बोली, "घर का काम करने से पाप होता है क्या? जब भूखे व्यक्तियों को, साधुओं को भोजन कराने से पुण्य मिलता है, तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप मिलेगा? सभी में ईश्वर का वास है."
सास की बातें सुनकर सभी बहुओं को लगा कि इस बारे में तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं. यह युक्ति बहुत बढ़िया है. अब जो बहू पहले जाग जाती, वही रसोई बनाने लगती.
पहले जो भाव था कि तू रसोई बना… बारी बंधी थी.. अब मैं बनाऊं, मैं बनाऊं… यह भाव पैदा हुआ, तो आठ बारी बध गई. दो और बढ़ गए सास और छोटी बहू.
काम करने में ʹतू कर, तू कर…ʹ इससे काम बढ़ जाता है और आदमी कम हो जाते हैं, पर ʹमैं करूं, मैं करूं…ʹ इससे काम हल्का हो जाता है और आदमी बढ़ जाते हैं.
छोटी बहू उत्साही थी. सोचा कि ʹअब तो रोटी बनाने में चौथे दिन बारी आती है, फिर क्या किया जाए?ʹ घर में गेहूं पीसने की चक्की थी. उसने उससे गेहूं पीसना शुरु कर दिया. मशीन की चक्की का आटा गर्म-गर्म बोरी में भर देने से जल जाता है. उसकी रोटी स्वादिष्ट नहीं होती. जबकि हाथ से पीसा गया आटा ठंडा और अधिक पौष्टिक होता है तथा उसकी रोटी भी स्वादिष्ट होती है. छोटी बहू ने गेहूं पीसकर उसकी रोटी बनाई, तो सब कहने लगे कि आज तो रोटी का ज़ायका बड़ा विलक्षण है.
सास बोली, "बहू, तू क्यों गेहूं पीसती है? अपने पास पैसों की कमी है क्या."
"मांजी, हाथ से गेहूं पीसने से व्यायाम हो जाता है और बीमारी भी नहीं होती. दूसरे रसोई बनाने से भी ज़्यादा पुण्य गेहूं पीसने से होता है."
सास और जेठानियों ने जब सुना, तो उन्हे लगा कि बहू ठीक ही कहती है. उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहा, "घर में चक्की ले आओ, हम सब गेहूं पीसेंगी."
रोज़ाना सभी जेठानियां चक्की में दो से ढाई सेर गेहूं पीसने लगीं.
इसके बाद छोटी बहू ने देखा कि घर में जूठे बर्तन मांजने के लिए नौकरानी आती है. अपने जूठे बर्तन ख़ुद साफ़ करने चाहिए, क्योंकि सब में ईश्वर का वास है, तो कोई दूसरा हमारा जूठा क्यों साफ़ करे!
अगले दिन उसने सब बर्तन मांज दिए. सास बोली, "बहू, ज़रा सोचो, बर्तन मांजने से तुम्हारे गहने घिस जाएंगें, कपड़े ख़राब हो जाएंगें."
"मांजी, काम जितना छोटा, उतना ही उसका माहात्म्य ज़्यादा. पांडवों के यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने का काम किया था."
अगले दिन सास बर्तन मांजने बैठ गई. उन्हें देख कर सभी बहुओं ने बर्तन मांजने शुरु कर दिए.
घर में झाड़ू लगाने के लिए नौकर आता था. एक दिन छोटी बहू ने सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगा दी. सास ने पूछा, "बहू झाड़ू तुमने लगाई है?"
"मांजी, आप मत पूछिए. आप से कुछ कहती हूं, तो मेरे हाथ से काम चला जाता है."
"झाड़ू लगाने का काम तो नौकर का है, तुम क्यों लगाती हो?"
"मांजी, ʹरामायणʹ में आता है कि वन में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते थे. भगवान उनकी कुटिया में न जा कर पहले शबरी की कुटिया में गए थे, क्योंकि शबरी रोज़ चुपके से झाड़ू लगाती थी, पम्पा सरोवर का रास्ता साफ़ करती थी कि कहीं आते-जाते ऋषि-मुनियों के पैरों में कंकड़ न चुभ जाएं."
सास ने देखा कि छोटी बहू, तो सब को लूट लेगी, क्योंकि यह सबका पुण्य अकेले ही ले लेती है. अब सास और सभी बहुओं ने मिलकर झाड़ू लगानी शुरू कर दी.
जिस घर में आपस में प्रेम होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है और जहां कलह होती है, वहां निर्धनता आती है.
सेठ का तो धन दिनोंदिन बढ़ने लगा. उसने घर की सब स्त्रियों के लिए गहने और कपड़े बनवा दिए. छोटी बहू ससुर से मिले गहने लेकर बड़ी जेठानी के पास जा कर बोली, "आपके बच्चे हैं, उनका विवाह करोगी, तो गहने बनवाने पड़ेंगे. मुझे तो अभी कोई बच्चा है नहीं. इसलिए इन गहनों को आप रख लीजिए."
गहने जेठानी को दे कर छोटी बहू ने कुछ पैसे और कपड़े नौकरों में बांट दिए. सास ने देखा तो बोली, "बहू, यह तुम क्या करती हो? तेरे ससुर ने सबको गहने बनवा कर दिए हैं और तुमने उन्हें जेठानी को दे दिए. पैसे और कपड़े नौकरों में बांट दिए."
"मांजी, मैं अकेले इतना संग्रह करके क्या करूंगी? अपनी चीज़ किसी ज़रूरतमंद के काम आ जाए, तो आत्मिक संतोष मिलता है और दान करने का तो अमिट पुण्य होता ही है."

सास को बहू की बात दिल को छू गई. वह सेठ के पास जाकर बोली, "मैं नौकरों में धोती-साड़ी बांटूगी और आसपास में जो ग़रीब परिवार रहते हैं, उनके बच्चों का फीस मैं स्वयं भरूंगी. अपने पास कितना धन है, अगर यह किसी के काम आ जाए, तो अच्छा है. न जाने कब मौत आ जाए. उसके बाद यह सब यहीं पड़ा रह जाएगा. जितना अपने हाथ से पुण्य कर्म हो जाए अच्छा है."
सेठ बहुत प्रसन्न हुआ. पहले वह नौकरों को कुछ देते थे, तो सेठानी लड़ पड़ती थी. अब कह रही है कि ʹमैं ख़ुद दूंगी.' सास दूसरों को वस्तुएं देने लगी, तो यह देखकर बहुएं भी देने लगीं. नौकर भी ख़ुश हो कर मन लगा कर काम करने लगे और आस-पड़ोस में भी ख़ुशहाली छा गई।
श्रेष्ठ मनुष्य जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य भी उसी के अनुसार आचरण करते हैं. छोटी बहू ने जो आचरण किया, उससे उसके घर का तो सुधार हुआ ही, साथ में पड़ोस पर भी अच्छा असर पड़ा. उनके घर भी सुधर गए. देने के भाव से आपस में प्रेम-भाईचारा बढ़ गया. इस तरह बहू को संस्कार से मिली सूझबूझ ने उसके घर के साथ-साथ अनेक घरों को ख़ुशहाल कर दिया.

19/01/2024

सभी फेसबुक मित्रों से आग्रह है कि मेरी फेसबुक आईडी कोई हैक करके 9883596302 नंबर से पैसे की डिमांड कर रहा है। कोई इस संदर्भ में मेरी सहायता कर सकता है क्या..

18/01/2024

******💕💕 अनमोल रिश्ते🙏 🌴********
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पिता के सामने उसके दोनों बेटे पिता की प्रॉपर्टी के लिए लड़ने लगे। देखते ही देखते झगड़ा बड़ा होता चला गया। लेकिन पिता उन दोनों को लड़ता हुआ देखकर जोर-जोर से हंसने लगा..

🌴पिता को इस प्रकार हंसता हुआ देखकर बेटों को लगा शायद सदमे में उनका पिता पागल हो गया है। दोनों बेटे : पिता के पास दौड़ कर आए। और पूछा, वह क्यों बेवजह हंस रहे हैं..🍂पिता बोला मैं इसलिए हस रहा हूं।

क्योंकि तुम दोनों बड़ी तुच्छ चीजों के लिए लड़ रहे हो। मेरे पास यहां से भी कई ज्यादा कीमती प्रॉपर्टी अपने गांव में है..🌴अगले दिन बाप और दोनों बेटे गांव के लिए निकल गए। गांव में पिता अपने दोनों बेटों को एक आलीशान हवेली की तरफ लेकर जाने लगा।

वे जैसे-जैसे हवेली के करीब पहुंचते गए..🍂तो उन्हें हवेली का असली रूप नजर आने लगा। जो अब खंडहर में बदल चुकी थी। हवेली के पास पहुंच कर बाप हवेली के बाहर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा...🍂पिता को रोता देख, बेटों ने उन्हे चुप कराने की कोशिश की। और पूछा, क्यों रो रहे हो?

तब पिता बोला, बरसों पहले मैंने इसी हवेली को पाने के लिए अपने भाई से झगडा किया था..
🌴भाई का दिल बड़ा था। तो उसने मुझे ये हवेली दे दी। लेकिन फिर वह मुझसे कभी नहीं मिला। अब वह विदेश में रहता है। आज तक उसने मुझसे कभी बात ही नहीं की......

🌴देखो जिस हवेली के लिए मैंने अपने भाई के अनमोल रिश्ते को खो दिया। वो हवेली आज किस हालत में है। तुम दोनों भी वही गलती करने जा रहे हो, जो मैंने वर्षों पहले की थी..🍂तुम दोनों भी उन्ही तुच्छ चीजों के लिए लड़ने जा रहे हो। जिनकी आगे चलकर रिश्तो के मुकाबले कीमत शून्य होगी.. 💕

12/01/2024

**********ए"सरप्राइज टेस्ट.....***************ए
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एक प्रोफ़ेसर अपनी क्लास में आते ही बोले -चलिए, आज आप सभी का सरप्राइज टेस्ट हो जाए....
ये सुनते ही विधार्थियों में घबराहट फैल गई.....
कुछ किताबों के पन्ने पलटने लगे तो कुछ सर के दिए नोट्स पढ़ने लगे.....

ये सब कुछ काम नहीं आएगा …प्रोफेसर साहब मुस्कुराते हुए बोले.....मे प्रश्न पत्र रख रहा हूं आपके सामने,
ध्यान रहे....जब सारे पेपर बट जाएं तभी आप उसे पलट कर देखें.....

सभी विधार्थियों को पेपर बाँट दिये गए....
ठीक है....अब आप पेपर देख सकते है ...अगले ही क्षण सभी प्रश्नपत्र को निहार रहे थे....

लेकिन ... यह क्या....
कोई प्रश्न था ही नहीं उस पेपर में.....था तो केवल सफेद पेपर पर बीचों बीच केवल एक काला धब्बा....


यह क्या सर.... इसमें तो ...प्रश्न पत्र है ही नही....
एक छात्र खड़ा होकर बोला.....

भाई.....जो भी है आपके सामने है.
आपको बस इसी को एक्सप्लेन करना है....
लेकिन ... ध्यान रहे.....
इसके लिए आपके पास केवल 10 मिनट ही हैं....
और आपका समय शुरू होता है.....
अब....चुटकी बजाते ...मुस्कुराते हुए बोले प्रोफेसर

कोई चारा न था ...उन हैरान विधार्थियों के पास....
सो वे जुट गए उस अजीब से प्रश्न का
उत्तर लिखने में.....

10 मिनट बीतते ही प्रोफेसर साहब ने
फिर से चुटकी बजाई
और....समय समाप्त......
और लगे ...उत्तर पुस्तिका एकत्रित करने.....
सभी विधार्थी अभी भी हैरान परेशान थे....

प्रोफेसर साहब ने सभी उत्तर पुस्तिका चैक करी
सभी ने ▪️काले धब्बे ▪️ को
अपनी तरह से समझाने की कोशिश की थी, लेकिन ...
किसी ने भी उस धब्बे के चारों ओर मौजूद
सफेद पेपर के बारे में लिखने की कोशिश ही नही की....

अब प्रोफ़ेसर साहब गंभीर होते हुए बोले
इस परीक्षा का आपके Academics से
कोई लेना-देना नहीं है... ना ही मैं ..इसके कोई मार्क्स देने वाला हूँ....इस टेस्ट के पीछे ...
मेरा एक ही मकसद है....
मैं आपको जीवन की एक अद्भुत सच्चाई
बताना चाहता हूँ....

देखिये ...
यह पेपर 99% सफेद' है.....
लेकिन आप में से किसी ने भी इसके बारे में नहीं लिखा, और अपना 100% उत्तर केवल उस एक चीज को बताने में लगा दिया जो मात्र 1% है....

यही बात हमारी जिंदगी में भी देखने को मिलती है.
समस्याएं हमारे जीवन का एक छोटा सा हिस्सा होती हैं
लेकिन ... हम अपना पूरा ध्यान इन्हीं पर लगा देते है....

कोई दिन-रात अपने लुक्स को लेकर
परेशान रहता है तो कोई अपने कैरियर को लेकर....चिंता में डूबा रहता है...,
तो कोई पैसों का रोना रोता रहता है....

कोई दूसरे की छोटी सी गलती कोअपने दिमाग में रखे रखता है...

क्या हम अपनी उपलब्धियों पर खुश नहीं हो सकते....

क्यों नहीं हम पेट भर खाने के लिए उस सर्व शक्तिवान प्रभु/खुदा/वाहेगुरु जिनेन्द्र को धन्यवाद कहते हैं...

क्यों नहीं हम अपनी प्यारी सी फैमिली के लिए शुक्रगुजार होते है....

क्यों नहीं हम जीवन की उन 99% चीजों की तरफ ध्यान देते, जो सचमुच हमारे जीवन को अच्छा बनाती है...

क्यों नहीं हम अपने मित्रों सम्बन्धियों की गलतियों को अनदेखा कर अपने रिश्तों को टूटने से बचाते हैं

सभी विधार्थी प्रोफेसर साहब द्वारा दी हुई इस सीख से गदगद थे.....

तो दोस्तो....आईये ... आज से ही हम अपने जीवन की समस्याओं को गम्भीरता से लेना छोड़कर
मित्रों-सम्बन्धियों की गलतियों को भूलकर
जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को इंजाय करना सीखें तभी हम जिंदगी को सही मायने में जी पायेंगे.....

सही है ना तो दीजिए ...
अपनी वही चिर परिचित मुस्कान.....
जी हां.... .. ऐसी ही....
आपकी आरोग्यता प्रसन्नता और मधुर सम्बन्धों की कामना के साथ....
..🙏🙏🙏

07/01/2024

.........विचारणीय विषय ...........
********************************************
*एक मुस्लिम लेखिका ने हिन्दू समाज के लोगों के गालों पर कैसा करारा थप्पड़ मारा है, जरा देखिए --*

{1} आपकी विवाहित महिलाओं ने माथे पर पल्लू तो छोड़िये, साड़ी पहनना तक छोड़ दिया ... दुपट्टा भी गायब ? किसने रोका है उन्हें ? हमने तो तुम्हारा अधोपतन नहीं किया .. हम मुसलमान तो इसके जिम्मेदार नहीं हैं ?

{2} तिलक बिंदी तो आपकी पहचान हुआ करती थी न.. तुम लोग कोरा मस्तक और सूने कपाल को तो अशुभ, अमंगल और शोकाकुल होने का चिह्न मानते थे न । आपने घर से निकलने से पहले तिलक लगाना तो छोड़ा ही, आपकी महिलाओं ने भी आधुनिकता और फैशन के चक्कर में और फॉरवर्ड दिखने की होड़ में माथे पर बिंदी लगाना तक छोड़ दिया, यहाँ मुसलमान कहाँ दोषी हैं ?

{3} आप लोग विवाह, सगाई जैसे संस्कारों में पारंपरिक परिधान छोड़कर....लज्जाविहीन प्री-वेडिंग जैसी फूहड़ रस्में करने लगे और जन्मदिवस, वर्षगांठ जैसे अवसरों को ईसाई बर्थ-डे और एनिवर्सरी में बदल दिया, तो क्या यह हमारी त्रुटि है ?

{4} हमारे यहां बच्चा जब चलना सीखता है तो बाप की उंगलियां पकड़ कर इबादत / नमाज के लिए मस्जिद जाता है और जीवन भर इबादत /नमाज को अपना फर्ज़ समझता है, आप लोगों ने तो स्वयं ही मंदिरों में जाना 🛕 छोड़ दिया । जाते भी हैं तो केवल ५ - १० मिनट के लिए तब, जब भगवान से कुछ मांगना हो अथवा किसी संकट से छुटकारा पाना हो । अब यदि आपके बच्चे ये सब नहीं जानते - करते कि मंदिर में क्यों जाना है ? वहाँ जाकर क्या करना है ? और ईश्वर की उपासना उनका कर्तव्य है .... तो क्या ये सब हमारा दोष है ❓

{5} आपके बच्चे कान्वेंट ✝️ से पढ़ने के बाद पोयम सुनाते हैं तो आपका सर गर्व से ऊंचा होता है ! होना तो यह चाहिये कि वे बच्चे नवकार मंत्र या कोई श्लोक याद कर सुनाते तो आपको गर्व होता !
.. इसके उलट, जब आज वे नहीं सुना पाते तो न तो आपके मन में इस बात की कोई ग्लानि है, और न ही इस बात पर आपको कोई खेद है !
हमारे घरों में किसी बाप का सिर तब शर्म से झुक जाता है जब उसका बच्चा रिश्तेदारों के सामने कोई दुआ नहीं सुना पाता ! हमारे घरों में बच्चा बोलना सीखता है तो हम सिखाते हैं कि सलाम करना सीखो बड़ों से, आप लोगों ने प्रणाम और नमस्कार को हैलो हाय से बदल दिया, तो इसके दोषी क्या हम हैं ?

{6} हमारे मजहब का लड़का कॉन्वेंट से आकर भी उर्दू अरबी सीख लेता है और हमारी धार्मिक पुस्तक पढ़ने बैठ जाता है, और आपका बच्चा न हिन्दू पाठशाला में पढ़ता है और संस्कृत तो छोड़िये, शुद्ध हिंदी भी उसे ठीक से नहीं आती, क्या यह भी हमारी त्रुटि है ?

{7} आपके पास तो सब कुछ था - संस्कृति, इतिहास, परंपराएं !
आपने उन सब को तथाकथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में त्याग दिया और हमने नहीं त्यागा बस इतना ही भेद है ! आप लोग ही तो पीछा छुड़ाएं बैठे हैं अपनी जड़ों से ! हमने अपनी जड़ें न तो कल छोड़ी थीं और न ही आज छोड़ने को राजी हैं !
{8} आप लोगों को तो स्वयं ही तिलक, शिखा आदि से और आपकी महिलाओं को भी माथे पर बिंदी, हाथ में चूड़ी और गले में मंगलसूत्र - इन्हें धारण करना अनावश्यक लगने लगा ?

{9} अपनी पहचान के संरक्षण हेतु जागृत रहने की भावना किसी भी सजीव समाज के लोगों के मन में स्वत:स्फूर्त होनी चाहिये, उसके लिये आपको अपने ही लोगों को कहना पड़ रहा है ।

{10} जरा विचार कीजिये कि यह कितनी बड़ी विडंबना है ! यह भी विचार कीजिये कि अपनी संस्कृति के लुप्त हो जाने का भय आता कहां से है और असुरक्षा की भावना का वास्तविक कारण क्या है? हम हैं क्या❓

{11} आपकी समस्या यह है कि आप अपने समाज को तो जागा हुआ देखना चाहते हैं, किंतु ऐसा चाहते समय आप स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने वाला आचरण नहीं करते ।
जैसे बन गए हैं वैसे ही बने रहते हैं ... आप स्वयं अपनी जड़ों से जुड़े हुए हो, ऐसा दूसरों को आप में दिखता नहीं है और इसीलिये आपके अपने समाज में तो छोड़िये, आपके परिवार में भी कोई आपकी धार्मिक बाते सुनता नहीं । ठीक इसी प्रकार आपके समाज में अन्य सब लोग भी ऐसा ही आपके जैसा डबल स्टैंडर्ड वाला हाइपोक्रिटिकल व्यवहार ( शाब्दिक पाखंड ) करते हैं । इसीलिये आपके समाज में कोई भी किसी की नहीं सुनता, क्या यह हमारी त्रुटि है ?

{12} आपने अपनी दिनचर्या बदली । एक समय था जब आपकी वेशभूषा से कोई भी बता देता था कि ये मारवाड़ी / वैश्य परिवार से है । आप लोगों ने अपनी वेशभूषा छोड़ी, आपने अपना खान-पान बदला, लहसुन प्याज आलू खाना आपके लिए आम बात हो गई, शराब व मांसाहार भी आदतें हो गईं ?

*कृपया इस बारे में जरा गहन चिंतन करें ।।

04/01/2024

एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?
सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!

उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?

लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।

थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया। फिर दोनों में झगड़ा हुआ।

एक दूसरे को लानतें भेजी। मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।

बिकास जी ने अपने जिगरी दोस्त पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?

मनोज जी- फला दुकान में।
बिकास जी - कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
मनोज जी-18 हजार।

बिकास जी-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?
मनोज जी- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।

मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद मनोज जी अब अपने काम से बेरूखा हो गया। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।

जिसे मालिक ने रद्द कर दिया। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।

एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही?

बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।

पहला आदमी बोला- वाह!!

यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है। तो यह ना मिलने का बहाना है

इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।

जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।

तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।
तुम उसे कैसे मान सकते हो।
वगैरा वगैरा।।

इस तरह के बेमतलबी फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं।

जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।

वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाले जुमले किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकते हैं।

ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।

12/12/2023

....====== कुछ अलग करें.........=====
*****************************************
एक आदमी को एक नाव पेंट करने के लिए कहा गया। वह अपना पेंट और ब्रश लाया और नाव को चमकीले लाल रंग से रंगना शुरू किया, जैसा कि मालिक ने उससे कहा था।

पेंटिंग करते समय, उसने एक छोटा सा छेद देखा और चुपचाप उसकी मरम्मत की।

जब उसने पेंटिंग पूरी की, तो उसने अपना पैसा लिया और चला गया।

अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के पास आया और उसे एक अच्छा चेक भेंट किया, जो पेंटिंग के भुगतान से कहीं अधिक था।

पेंटर को आश्चर्य हुआ और उसने कहा, "आपने मुझे नाव को पेंट करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया है सर!"

"लेकिन यह पेंट जॉब के लिए नहीं है। यह नाव में छेद की मरम्मत के लिए है।”

"आह! लेकिन यह इतनी छोटी सी सेवा थी... निश्चित रूप से यह मुझे इतनी छोटी सी चीज के लिए इतनी अधिक राशि देने के लायक नहीं है।"

“मेरे प्यारे दोस्त, तुम नहीं समझे। आपको बताते हैं क्या हुआ था:

“जब मैंने तुमसे नाव को पेंट करने के लिए कहा, तो मैं छेद का उल्लेख करना भूल गया।

“जब नाव सूख गई, तो मेरे बच्चे नाव ले गए और मछली पकड़ने की यात्रा पर निकल गए।

"वे नहीं जानते थे कि एक छेद था। मैं उस समय घर पर नहीं था।

"जब मैं वापस लौटा और देखा कि वे नाव ले गए हैं, तो मैं हताश हो गया क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में छेद था।

“मेरी राहत और खुशी की कल्पना कीजिए जब मैंने उन्हें मछली पकड़ने से लौटते देखा।

“फिर, मैंने नाव की जांच की और पाया कि आपने छेद की मरम्मत की थी!

"आप देखते हैं, अब, आपने क्या किया? आपने मेरे बच्चों की जान बचाई! मेरे पास आपके 'छोटे' अच्छे काम का भुगतान करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।

तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन, कब या कैसे, मदद करना जारी रखें, बनाए रखें, आँसू पोंछें, ध्यान से सुनें, और ध्यान से सभी 'लीक' की मरम्मत करें। आप कभी नहीं जानते कि कब किसी को हमारी आवश्यकता होती है, या कब परमेश्वर किसी के लिए सहायक और महत्वपूर्ण होने के लिए हमारे लिए एक सुखद आश्चर्य रखता है।

आपने कई लोगों के लिए कई 'नाव छेद' की मरम्मत की हो सकती है बिना यह जाने कि आपने कितने लोगों की जान बचाई है। ❤️

कुछ अलग करें... आप सबसे अच्छे बनें...

आपका दिन मंगलमय हो🌿

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