"मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्कं व वहतो पदं॥"
Hindi meaning:
"सभी मानसिक अवस्थाएँ मन से उत्पन्न होती हैं। मन ही उनका प्रधान है और वे मन से ही बनी हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने मन में बुरे विचार रखकर बोलता या कार्य करता है, तो दुःख उसका पीछा वैसे ही करता है, जैसे गाड़ी का पहिया खींचने वाले बैल के पैरों का पीछा करता है।"
Bhagwan Gautam Buddha ka Dhamma
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दो तीरों की कहानी
एक दिन एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया और बोला,
“भगवान, मुझे कभी-कभी बहुत दुख, क्रोध, चिंता और पीड़ा होती है। जीवन में इतना कष्ट क्यों है?”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले:
“कल्पना करो कोई व्यक्ति जंगल में जा रहा है। अचानक उसे एक तीर लगता है। उसे दर्द होता है।
यह है पहला तीर — वह पीड़ा जो जीवन में अपने-आप आती है: बीमारी, हानि, असफलता, बुढ़ापा।”
बुद्ध आगे बोले:
“अब वही व्यक्ति क्रोधित होकर सोचता है—
‘क्यों मेरे साथ ही होता है? मेरी जिंदगी खराब हो गई! मैं बहुत बदकिस्मत हूँ!’
और वह स्वयं को दूसरा तीर भी मार देता है — यह तीर उसके अपने विचारों से पैदा होता है।”
बुद्ध ने कहा:
“पहला तीर जीवन है।
दूसरा तीर हमारी प्रतिक्रिया है।”
Peace comes from within |
Do not seek it without ||
“Holding onto anger is like drinking poison and expecting the other person to die.”
"Namo Budhaye"
स्वयं पर विजय प्राप्त करना सबसे बड़ी जीत है
|| नमो बुद्धायै ||
इस जिंदगी में हमें अंततः बुद्ध ही निर्वाण दिला सकते है
|| नमो बुद्धायै ||
"हम जब भी क्रोधित होते हैं सच का मार्ग छोड़ देते हैं।"
नमो बुद्धाय
दशरथ जातक कथा
दशरथ जातक कथा (जातक संख्या 461) बौद्ध साहित्य की एक महत्वपूर्ण कहानी है, जो गौतम बुद्ध के पिछले जन्मों में से एक को दर्शाती है। यह कथा भगवान राम की प्रसिद्ध कहानी का एक बौद्ध संस्करण प्रस्तुत करती है, जिसमें कुछ दिलचस्प भिन्नताएँ हैं।
कथा:
प्राचीन काल में, वाराणसी के राजा दशरथ थे। उनकी पटरानी से तीन बच्चे थे: राम-पंडित (जो बोधिसत्व, यानी भविष्य के बुद्ध थे), लक्ष्मण और सीता। राजा की एक दूसरी रानी भी थी, जिससे उन्हें भरत नाम का एक पुत्र हुआ।
जब भरत सात वर्ष के हुए, तो दूसरी रानी ने राजा से अपने पुत्र को युवराज बनाने का आग्रह किया। राजा दशरथ को एक पुराना वचन याद आया जो उन्होंने रानी को दिया था। उन्हें चिंता हुई कि यदि वे मना करते हैं, तो रानी उनके बड़े बच्चों को नुकसान पहुँचा सकती है। अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए, राजा ने राम, लक्ष्मण और सीता को बुलाया। उन्होंने उन्हें स्थिति समझाई और उन्हें बारह वर्षों के लिए जंगल में एक आश्रम में रहने की सलाह दी। राजा का मानना था कि वे स्वयं लगभग बारह वर्ष और जीवित रहेंगे, जिसके बाद उनके बच्चे लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर सकते हैं।
अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, राम, लक्ष्मण और सीता हिमालय चले गए और एक तपस्वी जीवन व्यतीत करने लगे। नौ वर्ष बीतने के बाद, राजा दशरथ का निधन हो गया। भरत, जो अपने बड़े भाई-बहनों से बहुत प्रेम करते थे, उन्होंने सिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वे राज परिवार और एक बड़ी सेना के साथ राम को वापस राज्य में लाने के लिए जंगल गए।
भरत ने अपने भाई-बहनों को ढूँढ़ा और राम से अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक स्वीकार करने की विनती की। उन्होंने उन्हें अपने पिता के निधन की सूचना भी दी। हालाँकि, राम-पंडित अपने वचन पर अटल रहे। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पिता से बारह साल के वनवास का वचन दिया था, और वे इसे नहीं तोड़ेंगे, भले ही उनके पिता अब जीवित न हों। उन्होंने शोक संतप्त भीड़ को सभी चीजों की अनित्यता का उपदेश दिया।
इसके बाद, राम ने भरत को अपनी पादुकाएँ (खड़ाऊँ) दीं और उन्हें सिंहासन पर रखकर शेष तीन वर्षों के लिए एक रीजेंट (प्रतिनिधि) के रूप में शासन करने का निर्देश दिया। भरत वाराणसी लौट आए और सिंहासन पर पादुकाएँ रखकर राज्य का शासन चलाया, राजकीय मामलों में उनसे परामर्श लेते रहे।
जब बारह वर्ष का वनवास पूरा हो गया, तो राम, लक्ष्मण और सीता वाराणसी लौट आए। राम-पंडित ने सिंहासन ग्रहण किया और सोलह हजार वर्षों तक न्यायपूर्वक शासन किया। उनका शासन न्याय और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था।
वाल्मीकि रामायण से मुख्य अंतर:
* राम और सीता का संबंध: दशरथ जातक में राम और सीता भाई-बहन हैं, पति-पत्नी नहीं।
* वनवास की अवधि: वनवास की अवधि विशेष रूप से बारह वर्ष बताई गई है।
* भरत की भूमिका: भरत का राज्याभिषेक स्पष्ट रूप से राम के वनवास की शेष अवधि के लिए एक रीजेंट के रूप में होता है, और राम पूरे बारह वर्ष पूरे होने के बाद ही लौटते हैं।
* राजा दशरथ की मृत्यु: दशरथ की मृत्यु वनवास के दौरान होती है, लेकिन राम केवल अपनी प्रतिज्ञा की अवधि पूरी करने के बाद ही लौटते हैं।
* कथा का जोर: यह जातक कथा बोधिसत्व की सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता (शील और क्षान्ति पारमिताओं) पर जोर देती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी उनके गुणों की पूर्णता को दर्शाती है।
Buddhism is neither pessimistic nor optimistic. If anything at all, it is realistic.
"One physician may gravely exaggerate an illness and give up hope altogether. Another may ignorantly declare that there is no illness and that no treatment is necessary, thus deceiving the patient with a false consolation. You may call the first one pessimistic and the second optimistic. Both are equally dangerous."
"Gautam Buddha"
“इस पूरी दुनिया में इतना अंधकार नहीं है कि वो एक छोटी सी मोमबत्ती का प्रकाश बुझा सकें”
Lord Buddha
03/10/2022
तथागत बुद्ध को दुब्बा देवी समझकर पूजा जाता है | दुब्बा गड यहाँ प्राप्त हुवे शेकडो स्तूप और मुर्त तथागत बुद्ध को दुब्बा देवी समझकर पूजा जाता है | दुब्बा गड यहाँ प्राप्त हुवे शेकडो स्तूप और मुर्तिया https://www.youtube.com/channel/UCL6q1vE...
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