04/12/2025
चमकौर साहिब के युद्ध में युद्ध भूमि लाशों से पट गयी थी .......
बड़े साहिबजादे अजीत सिंह जी सिर्फ 18 साल की आयु में शहीद हुए और छोटे जुझार सिंह जी सिर्फ 14 साल की आयु में .....
बड़े साहिबजादे का शरीर युद्ध भूमि में देख एक सिख ने अपनी पगड़ी उतार के उससे ढक दिया ..... ये देख गुरु साहेब ने कहा कि या तो सबको कफन ओढाओ या इसे भी खुला छोड़ दो .........
कफन तक नसीब नही हुए थे साहिबज़ादों को .......
उसके बाद जब माता जी से पहली बार भेंट हुई तो उन्होंने पूछा ...... मेरे बेटे कहाँ हैं ??????
तब गुरु जी ने जवाब दिया था .......
इन पुतरन के सीस पर , वार दिये सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ , जब जीवत कई हज़ार .....
20 Dec से 26 Dec 1705 के बीच गुरु जी के चारों बेटे शहीद हो गए ....
सुल्तानपुर लोधी में ...... अभी यहां 556वां प्रकाश उत्सव मनाया गया गुरु नानक देव जी का ....... सिखों की पवित्र नगरी है सुल्तानपुर लोधी ...... यहां हमारे स्कूल में 700 बच्चे हैं । ज़्यादातर सिख हैं ...... इनमे से एक का भी नाम अजीत सिंह , जुझार सिंह , जोरावर सिंह या फतह सिंह नही है ........ इतनी जल्दी भुला दिया हमने गुरु जी की क़ुर्बानियों को ??????
पुराने ज़माने में पंजाब के लोग 20 दिसंबर से 26 दिसंबर के बीच शोक मनाते थे और एक हफ्ता ज़मीन पे सोते थे ....... क्योंकि जब छोटे साहिबज़ादों को सरहिन्द के किले में कैद कर लिया गया तो वो सर्द रातें उन्होंने उस ठंडे कैदखाने में ज़मीन पे सो के बिताई थीं ....... फिर उन्हें ज़िंदा दीवारों में चिनवा दिया गया ....... छोटा 7 साल का था और बड़ा 9 साल का ....... जब दीवार छोटे की नाक तक आ गयी तो बड़ा रोने लगा ....... छोटे ने पूछा रो क्यों रहा है ??????
बड़े ने जवाब दिया , तू छोटा है , पर कौम के लिए मुझसे पहले शहीद हो रहा है .........
इस शहादत को हमने सिर्फ 300 साल में ही भुला दिया ???????
जिस हफ्ते में हमको शोक सप्ताह मनाना चाहिए उसमे हम Parties करते हैं ?????? Celebrate करते हैं ????? शराब के गिलास सिर पे रख के नाचते हैं ??????
प्रण कीजिये कि इस साल 20 से 27 December के बीच भूमि शयन -- ज़मीन पे सो के शोक सप्ताह मना के चारों साहिबज़ादों को श्रद्धांजलि देंगे .......
22/02/2024
4 फरवरी, 1670 ई. को छत्रपति शिवाजी महाराज के आदेश से तानाजी मालुसरे को 300 सिपाहियों के साथ कोंडाना दुर्ग पर आक्रमण करने भेजा गया। कोंडाना पर मुगलों की तरफ से उदयभान तैनात था। तानाजी के नेतृत्व में सिपाहियों ने रस्सी की सीढ़ी के सहारे किले पर चढ़कर किले के एक हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया।
तानाजी मालुसरे वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनकी जगह फौरन उनके भाई सूर्याजी ने ली और दुर्ग के द्वार खोलने में सफल रहे। दुर्ग के अन्दर हुई लड़ाई में मुगल पक्ष की तरफ से उदयभान सहित 1200 सैनिक मारे गए।
राजगढ़ में बैठे शिवाजी महाराज को विजय की खबर मिली, तो उन्होंने कहा कि "इस विजय के लिए तानाजी मालुसरे के रुप में हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी"। शिवाजी महाराज ने तानाजी की याद में दुर्ग का नाम 'सिंहगढ़' रख दिया।
17/02/2024
बसंत पंचमी के दिन लाहौर में हुआ वीर हकीकत राय का बलिदान पहला बलिदान माना जाता है जो धर्म परिवर्तन के खिलाफ हुआ था. 14 साल के इस बच्चे ने निर्भीकता और निडरता की ऐसी मिसाल पेश कर दी थी कि हर भारतीय मां अपने बच्चे से कहने लगी कि बनना हो तो हकीकत जैसा वीर बन।
साल था 1734 सारे पंजाब में बसंत झूम कर तो आया था, लेकिन बहारों को न जाने क्या हुआ कि वह लाहौर जरा धीमे-धीमे पहुंची, लेकिन उनसे पहले लाहौर पहुंच गया एक 14 साल का बालक. जिसके हाथ बेड़ियों में जकड़े थे और कमर में जंजीरों से जकड़ कर भारी पत्थर लगाया गया था. लेकिन मजाल क्या कि उस बच्चे की जीभ ने उफ करना भी सीखा हो और पेशानियों ने बल पड़ना जाना हो. इतने में काजी की आवाज गूंजी, बोल ल़ड़के! तुझे इस्लाम राजी है या मौत?
बेड़ियां बंधे हाथ ऊपर उठाते हुए वह बालक गरजा. पहले ये बता, क्या मुसलमानों को मौत नहीं आती. क्या मुसलमान होकर मैं कभी नहीं मरूंगा?
काजी ने कहा- मजाक करता है क्या? इतना भी नहीं जानता हर किसी को एक दिन खाक होना है. तब उस लड़के ने फिर चीखते हुए कहा- तो जब ऐसा ही है और मौत तय है तो क्यों में अपना धर्म छोड़ दूं? मैं अभी मर जाऊं और तू कल? लेकिम मौत तो दोनों की ही होगी. मैं अपना धर्म नहीं बदलूंगा
एक बार फिर पूरे जोश में चीखते हुए उस लड़के ने कहा-मैं अपना धर्म नहीं बदलूंगा. किसी कीमत पर भी नहीं. इतना सुनना था कि काजी के आदेश पर भीड़ ने पत्थर बरसा-बरसा कर बेहोश कर दिया और बाद में सर कलम कर दिया गया।
भीड़ छंट गई तब वासंती हवा ने मैदान में गिरे उसे जिस्म को छुआ और दुनिया भर में इस शहादत का परचम लहरा दिया था, जिस पर लिखा था वीरगति को प्राप्त वीर हकीकत राय।
पंजाब के स्यालकोट में जन्म
हकीकत राय की कहानी शुरू होती है पंजाब के स्यालकोट से. साल 1719 में यहां के व्यापारी बागमल और उनकी पत्नी कौरां के घर एक सुंदर-मनोहर बालक ने जन्म लिया। नाम रखा गया हकीकत। मां उसे ऊपर वाले का आशीर्वाद बताती और अपना सारा प्यार लुटा देती।
धीर-धीरे हकीकत बड़ा होने लगा, लेकिन उसके साथ एक अजीब बात होने लगी कि नन्हा सा बालक गीता पढ़ने लगा और सनातन धर्म में रुचि बड़ने लगी। आश्चर्य कि इस चार साल के बच्चे ने तब तक का सारा इतिहास पढ़ डाला था।
इस्लामी शासकों के उस दौर में अफसरी और सरकारी कामकाज की भाषा फारसी थी. इसलिए समाज के साथ कदमताल करने के लिए हकीकत को मौलवी के पास भेजा गया. तालीम में अच्छे हकीकत ने सारे सबक जल्द ही सीख लिए. यह वह समय था जब हिंदुओं को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा.
मौलवी के यहां पढ़ने वाले अन्य लड़के सनातनी देवी-देवताओं का मजाक बनाया करता थे। एक दिन हकीकत की बहस कुछ मुस्लिम लड़कों से हो गई। उन्होंने सीता माता को अपमानित किया।
सनातन परंपरा का हो रहा था अपमान
इस पर हकीकत ने कहा कि मैं भी अगर आपके धर्म के लोगों पर ऐसी टिप्पणी करूं तो? हकीकत के इस सवाल ने माहौल में सन्नाटा भर दिया. आनन-फानन में हकीकत को बंदी बना लिया गया। मुस्लिम बच्चों ने शोर मचा दिया की इसने बीबी फातिमा को गालिया निकाल कर इस्लाम और मोहम्द का अपमान किया है.
इसके बाद हाकिम आदिल बेग के समक्ष हकीकत को पेश किया. आदिल समझ गया कि यह बच्चों का झगड़ा है, मगर मुस्लिम लोग उसे मृत्यु-दण्ड देने की मांग करने लगे.
माता-पिता ने भी हकीकत को समझाया
अपने बेटे को बचाने के लिए पिता बगमाल ने किसी तरह लाहौर में फरियाद करने की मोहलत मांगीं। दो दिन तक चलकर हकीकत और उनके माता-पिता पैदल चलकर लाहौर पहुंचे। पंजाब का नवाब ज़करिया खान था.
उसके सामने भी हकीकत को मृत्युदंड की मांग की गई और यही विकल्प रखा गया कि हकीकत माफी मांग कर इस्लाम कबूल कर ले। इसके लिए उसके माता-पिता और अन्य सभी ने समझाया लेकिन हकीकत नहीं माना।
2 दिन बैठक के बाद मुकर्रर हुई मौत
तब लाहौर के काजियों ने कहा कि यह इस्लाम का मुजरिम है. इसे आप हमे सौंप दे. हकीकत की सजा क्या हो यह तय करने के लिए दो दिन की बैठक हुई। तब तय किया गया 14 साल के बालक को पत्थर मार-मार कर मौत दी जाए। इसके लिए बकायदे मुनादी कराई गई ताकि लाहौर के लोग अधिक से अधिक पहुंच सकें।
अगले दिन हकीकत को कोतवाली के सामने आधा जमीन में गाड़ दिया गया और लोग उस पर पत्थर मारने लगे।
वासंती ऋतु में याद कीजिए हकीकत का बलिदान :-
इसी बीच जब हकीकत पत्थर खाते-खाते हकीकत बेहोश हो गए तो जल्लाद ने उनका सिर कलम कर दिया. धर्म परिवर्तन के लिए अपना बलिदान देने वाले हकीकत राय पहले वीर थे। 14 साल की उम्र में उन्होंने त्याग और बलिदानन का मर्म समझ लिया था। उनके बलिदान के बाद लाहौर में उनका समाधि स्थल बनाया गया।
वहीं स्यालकोट में भी उनका समाधि स्थल बना दिया गया था. जिसे बाद में तोड़ दिया गया था.
17/02/2024
18 साल की उम्र में लाहौर जितने वाले महाराजा रणजीत सिंह जी की कहानी-
जब भी देश के इतिहास में महान राजाओं के बारे में बात होगी तो शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का नाम इसमें जरूर आएगा।
महाराजा रणजीत सिंह ने 10 साल की उम्र में पहला युद्ध लड़ा था वहीं 18 साल की उम्र में लाहौर को जीत लिया था।
40 वर्षों तक के अपने शासन में उन्होंने अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के आसपास भी नहीं फटकने दिया, इसके बाद 1802 में उन्होंने अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया और 1807 में उन्होंने अफगानी शासक कुतुबुद्दीन को हराकर कसूर पर कब्जा किया
रणजीत सिंह ने अपनी सेना के साथ आक्रमण कर 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर पर कब्जा कर उसे भी सिख साम्राज्य का हिस्सा बन गया। महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर उन्हीं का अधिकार हो गया। यह पहला मौका था जब पश्तूनों पर किसी गैर-मुस्लिम ने राज किया। अफगानों और सिखों के बीच 1813 और 1837 के बीच कई युद्ध हुए। 1837 में जमरुद का युद्ध उनके बीच आखिरी भिड़ंत थी। इस भिड़ंत में रणजीत सिंह के एक बेहतरीन सिपाहसालार हरि सिंह नलवा मारे गए थे।
दशकों तक शासन के बाद रणजीत सिंह का 1839 को निधन हो गया, लेकिन उनकी वीर गाथाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।
दीपिका
14/02/2024
मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश का एक चहकता हुआ शहर, अपने इतिहास में प्राचीन काल की फुसफुसाहटों, मुगलकालीन वैभव और स्वतंत्रता संग्राम की गूंज को समेटे हुए है। इसकी व्यस्त गलियों में घूमते हुए, आप अतीत को जीवंत महसूस कर सकते हैं, दिलचस्प कहानियां जो सुनाई देने का इंतजार कर रही हैं।
शहर की जड़ें हजारों साल पीछे जाती हैं। काली नदी के किनारे मंडी गांव में पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि यहां एक संपन्न हड़प्पा समुदाय मौजूद था। सोचिए, सूरज की रोशनी में चमकते सोने के आभूषण और अनमोल पत्थर, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक बीते युग के अवशेष।
इतिहास के पन्नों को आगे बढ़ाए, तो 17वीं शताब्दी में हम खुद को मुगल शासन के अधीन मुजफ्फरनगर में पाते हैं। बादशाह शाहजहां ने सरवट परगना को सैयद मुजफ्फर खान को उपहार में दिया था, जिनके बेटे मुनावर लश्कर खान ने 1633 में इस शहर की स्थापना की थी। मुगल प्रभाव गढ़ी मुझेडा में सैयद महमूद अली खान के मकबरे की उत्तम शिल्पकारी में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो उनकी कलात्मक विरासत का प्रमाण है।
16 वी सदी में, विजयी शासक शेरशाह सूरी ने काली नदी पर बावन दर्रा पुल के निर्माण के साथ अपनी छाप छोड़ी। यह रणनीतिक मार्ग, जिसे बाद में ग्रैंड ट्रंक रोड में शामिल किया गया, व्यापार और सैन्य परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण धमनी के रूप में कार्य करता था, और आज भी अपनी स्थापत्य कला का लोहा मनवाता है।
मुजफ्फरनगर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1857 में, मोहर सिंह और थानाभवन के सैयदों और पठानों जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने थोड़े समय के लिए शामली तहसील को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त करा लिया था। यह शहर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रमुख नेताओं के मिलन स्थल के रूप में भी कार्य करता था, जो स्वतंत्रता की ज्वाला को हवा देते थे।
मुजफ्फरनगर का ऐतिहासिक ताना-बाना स्मारकों से परे फैला हुआ है। मुस्तफाबाद और पंचेंडा जैसे गांव महाभारत की किंवदंतियों की फुसफुसाहट रखते हैं, जबकि प्राचीन भैरों का मंदिर और देवी का स्थान गहरी आध्यात्मिक परंपराओं की बात करते हैं। ये छिपे हुए रत्न शहर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की झलक दिखाते हैं।
#इतिहास_की_एक_झलक
10/02/2024
ध्यान दें??
1 अरब ,97वे करोड़, 29 लाख ,49 हजार ,120 वर्ष पुरानी हम हिन्दुओं की गुरु परम्परा है।
इतनी ही पुरानी सृष्टि की आयु है और इतना ही पुराना वैदिक हिन्दू धर्म है।
भगवान् श्रीमन्नारायणसे पूज्य पुरी शंकराचार्य भगवान का स्थान 155 वां है और आदि शंकराचार्य भगवान से 145वां ।
यह हमारा सौभाग्य है कि हम विशुद्ध सनातनी गुरु परम्परा से जुड़े हैं। जहाॅं आज कलयुग में स्वयंभू बाबा और बाबुओं की भरमार है।
||हर हर महादेव||
16/06/2023
प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी।
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।
सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।
सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?
महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।
विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।
भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।
श्री कृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,
उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।
यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।
राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।
उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे
तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।
वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।
प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।
नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।
उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।
फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।
केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।
फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला।
अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।
अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।
मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।
यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।
मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।
1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।
अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।
इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।
योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।
इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं।
12/04/2023
कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे? यह आज हम आपको बताएंगे। वो वीर महाराणा_प्रताप जी का 'चेतक' सबको याद है, लेकिन 'शुभ्रक' नहीं! तो मित्रो आज सुनिए कहानी 'शुभ्रक' की।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और उदयपुर के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया। कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था, जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।
एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा।
कुतुबुद्दीन स्वंय कुँवर सा के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया। 'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे।
जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया। उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू वहीं उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए।
मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए। 'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा लगाते हुए लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!
राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था। उसमें प्राण नहीं बचे थे। सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया।
भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि वामपंथी और मुगल परस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं! जबकि फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।
नमन् स्वामी भक्त 'शुभ्रक' को
05/10/2022
आप को दशहरा के पावन पर्व की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आप व आपका परिवार सदैव सुख समृद्ध खुशहाल रहे!
सुख, शान्ति एवम समृध्दि की
मंगलमयी कामनाओं के साथ
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !! 🙏