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Photos from Ram Pratap Singh Chauhan's post 10/06/2023
04/08/2021

*नदी की चौड़ाई या गहराई क्या जरूरी?*

मेरे 'प्रश्न पत्र' संबंधित लेख पर ,कुछ मित्रों द्वारा प्रतिक्रिया स्वरूप ये बोला या लिखा गया कि '' जब सभी छात्रों को हल करने के लिए समान समय दिया जाता है ? तो एक स्पष्टीकरण की दरकार तो बनती ही है।
मुझे मालूम था इस तरह की टिप्पणियां या प्रश्न अवश्य आयेंगे मन में, इसी लिए मैंने बोला था आगे भी लिखूंगा और क्रमशः पर अंत किया था।

बिल्कुल ये बात शत प्रतिशत सच है कि समान समय (चाहें कितना भी कम हो) मिला सब छात्रों को और शिक्षक ने सही मूल्यांकन कर लिया सभी का......

परंतु छात्र कम से कम दो प्रकार के होते हैं -
1 - वो जो अपने मस्तिष्क में प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से याद कर लेते हैं।
2 - वो जिनको अपने ऊपर एक विश्वास होता है, कि मैंने conceptually सब कुछ समझा है, मैं तो उत्तर हल कर ही लूंगा।

(पहले प्रकार के छात्र यू पी एस सी से लेकर क्रेडिट कार्ड बेचने जैसा रोजगार पा जाते हैं,
दूसरी प्रकार के छात्र इसरो, डी आर डी ओ, नासा आदि में रिसर्च ,डेवलपमेंट, नवाचार आदि के लिए पहुंचते हैं)

कोष्ठक में लिखी बात को यदि दूसरे शब्दों में देखा जाए तो पहले प्रकार के छात्र समय का ध्यान ज्यादा रखते हैं और एफिशिएंट होते हैं,इस से इतर बिंदु 2 वाले छात्र समय सीमा को नही मानते परंतु केवल ज्ञान पाने के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करते हैं।

दोनो ही अपनी अपनी जगह पर सही हैं, समाज भी ये स्वीकार्यता देता है।(शायद पहले वाले को ज्यादा)।

परंतु दोनो के उद्देश्य बिल्कुल अलग होते हैं, होते ही होंगे!
जैसे एक तैराक बहुत ही कम समय में नदी की सतह पार कर लेता है, अच्छा तैराक कहलाता है। ओलंपिक का गोल्ड ला सकता है।
दूसरा व्यक्ति नदी में ज्यादा गहराई तक जाने की काबिलियत रखता है, वो अच्छा गोताखोर कहलाता है, शायद कभी उसे मोती या सचमुच का गोल्ड मिल जाए गहराई में।

अब आते हैं पिछले लेख पर,
तो मेरा ये मानना है कि इन दोनो तरह के छात्रों का ध्यान रखना एक शिक्षक का कर्तव्य है, उस को मध्यम मार्गीय होना पड़ेगा प्रश्नपत्र में दिए समय के संदर्भ में।
पुनः याद दिला रहा हूं "समय"
नदी वाले उदाहरण से डायग्नल तैराक को सोचना पड़ेगा,। (ना 1 घंटा ना 3 घंटे, 2 घंटे उचित होंगे: देखें पिछला लेख प्रश्नपत्र संबंधित)

जरूरत दोनो प्रकार के विद्यार्थी की है इस समय देश को!
चाहे वो कम समय में ज्यादा से ज्यादा पढ़ कर एक रोजगारपरक शिक्षा पाए , या समय की सीमा को तोड़ते हुए अपने विषय की गहराई में उतरने वाला हो।

अब शायद दूसरे वाले की ज्यादा है!

क्योंकि अपने देश में पिछली या उस से भी पिछली सदी में कोई वैज्ञानिक अविष्कार, अन्वेषण आदि नहीं हुआ।

न्यूटन के तीन नियमों का पूरा अध्ययन करके उन को इंप्लीमेंट करना एक उत्तम शिक्षा है, परंतु किसी छात्र को आप चौथे नियम को प्रतिपादित करने के लिए उत्साहित करें तभी सच में भारत वर्ष की उन्नति हो सकती है।

@रोहित

* यह लेख पूर्णतः भौतिक ज्ञान संबंधी है, कृपया इस को आध्यात्मिक ज्ञान से न जोड़ा जाए।

मुझे पता है शून्य का अविष्कार भारतवर्ष में लगभग 628 ईशवी में आर्यभट्ट काल में हुआ था।
और हम अध्यात्म में तो पूरे विश्व के विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया से गुजर ही रहे हैं।
लेकिन हम जिन सोशल साइट का प्रयोग कर रहे हैं (मैं स्वयं भी इन पर ही लिख रहा हूं) जैसे फेसबुक,ट्विटर,टेलीग्राम,इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप सबका अविष्कार विदेशी धरती पर ही हुआ है।🙏

04/08/2021

प्रश्नपत्र किसके लिए? ( अध्यापक हेतु या छात्र हेतु)

22 वर्षों के शिक्षण कार्य के उपरांत ऑब्जेक्टिव टाइप प्रश्न पत्र के इस जमाने में कुछ नए अनुभवों को साझा कर रहा हूं।

व्यवसायिक शिक्षण संस्थान में मुख्यतः 3 प्रकार के कार्य होते हैं -
1) शिक्षण (सैद्धांतिक एवं प्रयोगात्मक)
2) परीक्षा( उचित प्रश्नपत्र का निर्धारण)
3) मूल्यांकन ( पूर्वाग्रह रहित)

आज बिंदु 2 के महत्वपूर्ण कार्य उचित प्रश्नपत्र पर बात करते हैं -

विगत एक दो वर्षों से मैं देख रहा हूं कि अच्छे शिक्षण कार्य के बावजूद ,अध्यापक गण जब प्रश्नपत्र बनाते हैं (विशेषतः एम सी क्यू) तो एक बहुत ही प्रमुख बात का ध्यान शायद नहीं रख पा रहे हैं। प्रश्न को हल करने में लगा "समय"
जोर देना चाहूंगा "समय"

चूंकि अध्यापक जब भी प्रश्न पूछते हैं तो उसका उत्तर पहले से उन के दिमाग में होता है,अतः हमेशा उनको एक आभास(जो गलत ही होता है) रहता है कि ये प्रश्न तो एक या दो मिनट में ही सॉल्व हो जायेगा।

ऐसा क्यूं है आप के साथ?
क्योंकि आप उस विषय में पारंगत हैं, हो सकता है आपने एक विषय को 10, 20 या 40 साल पढ़ाया हो,
आप उत्तर पर पहले ही पहुंच चुके हैं,
जबकि छात्र के नजरिए से देखा जाए तो वह प्रश्न उसके सामने पहली बार आया है।(मैं उन छात्रों की बात नही कर रहा हूं जिन्होंने कुछ प्रश्न के उत्तर रट रखे हैं)

तो अब छात्र के साथ क्या होगा?

पहले तो छात्र उस प्रश्न को समझेगा (लगभग आधा से एक मिनट),
उसके बाद कुछ देर ये सोचेगा कि उत्तर की शुरुवात कैसे करनी है,फिर हल करेगा ,सही या गलत कुछ उत्तर आयेगा फिर वो बेस्ट पॉसिबल उत्तर को मार्क करेगा।

मैं दावे के साथ ये लिख रहा हूं, कि यदि प्रश्न बनाने वाला अध्यापक उस प्रश्न को एक मिनट में हल करता है, तो उसी विषय का दूसरा अध्यापक(जी सही सुना अध्यापक) उत्तर देने में कम से कम 2 मिनट का समय लगाता है।

तो फिर छात्र के लिए ये समय कम से कम 3 मिनट होना ही चाहिए,उसके सामने तो एक नया सा प्रश्न है।

निष्कर्ष: चूंकि प्रश्नपत्र बनाने वाला उत्तर से प्रश्न (रिवर्स इंजीनियरिंग) की और जाते हुए प्रश्न पत्र का निर्धारण करता है,जबकि छात्र प्रश्न से उत्तर की तरफ जाता है। अतः कभी कभी हम शिक्षकों को भी अपना छात्र जीवन याद कर के उनकी जगह अपने को रख कर देखना चाहिए।
जानता हूं अब नए जमाने में टाइम मैनेजमेंट पर ही सारी बातें हो रही हैं, तो भी क्यूं ना बीच का रास्ता अपनाया जाए।
अगर आप एक प्रश्नपत्र को 1 घंटे में हल कर लेते हैं, तो छात्र को उसके लिए कम से कम 2 घंटे अवश्य देने चाहिए।

आगे बहुत कुछ है लिखने के लिए:
क्रमशः

@रोहित (एक शिक्षक)

*मुख्यत: ये लेख एम सी क्यू (ऑब्जेक्टिव टाइप) सार्वजनिक परीक्षा के लिए है जिसमे 1 घंटे में लगभग 60 मैथ्स, फिजिक्स, इंजीनियरिंग आदि के प्रश्न हल करने को आते हैं।

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