04/08/2021
*नदी की चौड़ाई या गहराई क्या जरूरी?*
मेरे 'प्रश्न पत्र' संबंधित लेख पर ,कुछ मित्रों द्वारा प्रतिक्रिया स्वरूप ये बोला या लिखा गया कि '' जब सभी छात्रों को हल करने के लिए समान समय दिया जाता है ? तो एक स्पष्टीकरण की दरकार तो बनती ही है।
मुझे मालूम था इस तरह की टिप्पणियां या प्रश्न अवश्य आयेंगे मन में, इसी लिए मैंने बोला था आगे भी लिखूंगा और क्रमशः पर अंत किया था।
बिल्कुल ये बात शत प्रतिशत सच है कि समान समय (चाहें कितना भी कम हो) मिला सब छात्रों को और शिक्षक ने सही मूल्यांकन कर लिया सभी का......
परंतु छात्र कम से कम दो प्रकार के होते हैं -
1 - वो जो अपने मस्तिष्क में प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से याद कर लेते हैं।
2 - वो जिनको अपने ऊपर एक विश्वास होता है, कि मैंने conceptually सब कुछ समझा है, मैं तो उत्तर हल कर ही लूंगा।
(पहले प्रकार के छात्र यू पी एस सी से लेकर क्रेडिट कार्ड बेचने जैसा रोजगार पा जाते हैं,
दूसरी प्रकार के छात्र इसरो, डी आर डी ओ, नासा आदि में रिसर्च ,डेवलपमेंट, नवाचार आदि के लिए पहुंचते हैं)
कोष्ठक में लिखी बात को यदि दूसरे शब्दों में देखा जाए तो पहले प्रकार के छात्र समय का ध्यान ज्यादा रखते हैं और एफिशिएंट होते हैं,इस से इतर बिंदु 2 वाले छात्र समय सीमा को नही मानते परंतु केवल ज्ञान पाने के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करते हैं।
दोनो ही अपनी अपनी जगह पर सही हैं, समाज भी ये स्वीकार्यता देता है।(शायद पहले वाले को ज्यादा)।
परंतु दोनो के उद्देश्य बिल्कुल अलग होते हैं, होते ही होंगे!
जैसे एक तैराक बहुत ही कम समय में नदी की सतह पार कर लेता है, अच्छा तैराक कहलाता है। ओलंपिक का गोल्ड ला सकता है।
दूसरा व्यक्ति नदी में ज्यादा गहराई तक जाने की काबिलियत रखता है, वो अच्छा गोताखोर कहलाता है, शायद कभी उसे मोती या सचमुच का गोल्ड मिल जाए गहराई में।
अब आते हैं पिछले लेख पर,
तो मेरा ये मानना है कि इन दोनो तरह के छात्रों का ध्यान रखना एक शिक्षक का कर्तव्य है, उस को मध्यम मार्गीय होना पड़ेगा प्रश्नपत्र में दिए समय के संदर्भ में।
पुनः याद दिला रहा हूं "समय"
नदी वाले उदाहरण से डायग्नल तैराक को सोचना पड़ेगा,। (ना 1 घंटा ना 3 घंटे, 2 घंटे उचित होंगे: देखें पिछला लेख प्रश्नपत्र संबंधित)
जरूरत दोनो प्रकार के विद्यार्थी की है इस समय देश को!
चाहे वो कम समय में ज्यादा से ज्यादा पढ़ कर एक रोजगारपरक शिक्षा पाए , या समय की सीमा को तोड़ते हुए अपने विषय की गहराई में उतरने वाला हो।
अब शायद दूसरे वाले की ज्यादा है!
क्योंकि अपने देश में पिछली या उस से भी पिछली सदी में कोई वैज्ञानिक अविष्कार, अन्वेषण आदि नहीं हुआ।
न्यूटन के तीन नियमों का पूरा अध्ययन करके उन को इंप्लीमेंट करना एक उत्तम शिक्षा है, परंतु किसी छात्र को आप चौथे नियम को प्रतिपादित करने के लिए उत्साहित करें तभी सच में भारत वर्ष की उन्नति हो सकती है।
@रोहित
* यह लेख पूर्णतः भौतिक ज्ञान संबंधी है, कृपया इस को आध्यात्मिक ज्ञान से न जोड़ा जाए।
मुझे पता है शून्य का अविष्कार भारतवर्ष में लगभग 628 ईशवी में आर्यभट्ट काल में हुआ था।
और हम अध्यात्म में तो पूरे विश्व के विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया से गुजर ही रहे हैं।
लेकिन हम जिन सोशल साइट का प्रयोग कर रहे हैं (मैं स्वयं भी इन पर ही लिख रहा हूं) जैसे फेसबुक,ट्विटर,टेलीग्राम,इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप सबका अविष्कार विदेशी धरती पर ही हुआ है।🙏