डॉक्टर ज़ैदी ज़ुहैर अहमद यानि
रंजन ज़ैदी के कुछ अशआर
ऐ दोस्त पूछते हो के क्या हाल-चाल है
क्या-क्या गिनाऊँ अपने गुनाहों की ग़लतियाँ
वो कहते हैं भूल गया हूँ चेहरा भी तो याद नहीं
साल महीनों बाद मिले हैं शिकवे छोडो बात करो
इस मक़्तल में दम घुटता है सांसें भी ज़हरीली हैं
ज़िंदा रहना भी मुश्किल है तुम कहते हो सब्र करो
जब घड़ा टूटा तो हम पानी हुए और बह गए
अहले-खाना तू बता, हम सब जुदा कैसे हुए
ज़बां को चुप करा दूँ तो तुम्हें कैसे खबर होगी
के मुझमें दुःख, गिला, ग़ुस्सा, कहीं तक बेबसी भी है
ऐ दरवेश निकल जा अब तो यह जंगल भी सूख गया
क़द्रें भी सब बदल गईं हैं तेरी हिकायत अल्ला--हू
तुम आईनों में सफ़ीने समेट सकते हो
मिरी नज़र तो समंदर पे आंख रखती है
पिछली नस्लों ने जो बोया अब तक हैं उसके असरात
अब भी खेत में सर उगते हैं, किस किसको समझाऊँ मैं
Mob;+91 9354597215
Dayare URDU
'दयारे-उर्दू : Rekhta, तहज़ीब का फ़न'. Full of Knowledge, (Education)
डॉक्टर ज़ैदी ज़ुहैर अहमद यानि
रंजन ज़ैदी के कुछ अशआर
मेरे बारे मेंDr. Ranjan Zaidi
RANJAN ZAIDI
(Paternal- Name Name : Dr.Z.A.Zaidi)
Edu; MA,Ph-D;
Journalist &;Writer; b;Badi,Sitapur(UP); m;one-S; one;D; Educ; Rohelkhand U (Urdu) & AMU Aligarh; Ph-D (Hindi);
Editor; Samaj Kalyan(Hindi Monthly),Govt.of India; written 40 radeo plays & Participated in verious seminars & workshops;
Publsh; Part-dar-Part (1985), Roo-b-Roo(1986), Nasiruddine Takhtekhan(1987), Jaden tatha anya kahaniyan(1991), Ek hatheli aadhi dastak(2000), Ranjan Zaidi ki sreshthh Kahaniyaan, Khare Pani ki MachhliyaaN story collectons; Aur gidh ud gaya (1988), Begam Sahiba (1990), Hinsa-Ahinsa(1994), Itihas ke Jharokhe se (History), Akshar-Akshar Satya (Literary Criticism) Muslim Sahitykaron ka Hindi men Yogdan, (Edited), Stri Katha, Katha Ananta (Women’s Issue), Hashiye ka safar, Keel (Novels), Premchand....(Literary Study) Noor, Alla Bas-Baqi Hawas (Hindi Poetry collec.(2002,20);
ANANYA;Film & video song in 15 langs.for MWCD,Singars-Usha Utthup,Shriya Ghoshal etc; Geet-ab hamko aage badhna hai, Music-Adesh Srivastava; Ye daagh daagh ujala-radeo serial,Safar Ek Sankalp ka-documentary Film for CSWB Govt.of India & several papers/reviews/repotrs published in verious journals/magazines/news papers;
Awards;Sarika Kahani..(1985);Sahitya Kriti puraskar,Delhi Academy(1985-86), Mahaveer Prasad Dwivedi Patikarita puraskar(1991):
At Present; (Retired Joint Director CSWB, (2012), Ministrory of DWCD govt., New Delhi, Freelancing.
Address(res.) 94FF,Ashiana Greens, Ahinsa khand-II, Indirapuram, Ghaziabad-201014, Mobile; Mobl.9354597215;
ऐ दोस्त पूछते हो के क्या हाल-चाल है
क्या-क्या गिनाऊँ अपने गुनाहों की ग़लतियाँ
वो कहते हैं भूल गया हूँ चेहरा भी तो याद नहीं
साल महीनों बाद मिले हैं शिकवे छोडो बात करो
इस मक़्तल में दम घुटता है सांसें भी ज़हरीली हैं
ज़िंदा रहना भी मुश्किल है तुम कहते हो सब्र करो
जब घड़ा टूटा तो हम पानी हुए और बह गए
अहले-खाना तू बता, हम सब जुदा कैसे हुए
ज़बां को चुप करा दूँ तो तुम्हें कैसे खबर होगी
के मुझमें दुःख, गिला, ग़ुस्सा, कहीं तक बेबसी भी है
ऐ दरवेश निकल जा अब तो यह जंगल भी सूख गया
क़द्रें भी सब बदल गईं हैं तेरी हिकायत अल्ला--हू
तुम आईनों में सफ़ीने समेट सकते हो
मिरी नज़र तो समंदर पे आंख रखती है
पिछली नस्लों ने जो बोया अब तक हैं उसके असरात
अब भी खेत में सर उगते हैं, किस किसको समझाऊँ मैं
Mob;+91 9354597215
गर्द-आलूद है आईना, इधर कांच की दीवार भी है
कैसे बतलाऊँ कि चेहरे पे कोई दाग़ नहीं
रंजन ज़ैदी
18/09/2024
01/07/2024
Filmysapien - YouTube Filmysapien is dedicated to all those wonderful forgotten Actors of yesteryears who we have seen many times in many great movies and recognise them by their ...
हिन्दी उपन्यास
दिल , दरिया-दरिया
कथाकार ; डॉ० जेड० ए० जैदी
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(एक)
सिधौली, उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर की एक तहसील है. इसका छोटा सा रेलवे स्टेशन है लेकिन उसका फैलता हुआ शहर अब सबसे खुद को जोड़ रहा है क्योंकि इस छोटे से शहर के रास्ते 'मिश्रिख' को भी अब छूने लगे हैं और बाड़ी जैसे ऐतिहासिक क़स्बे के अतिरिक्त देश के क्रांतिकारियों की पहचान 'काकोरी' को भी दुनिया से जोड़ रहे हैं.
शराफत यार खां मूलतः कस्बा बाड़ी के पुराने जमीदारों के खानदान से संबंध रखते हैं। ज़मीदारी खत्म हो गई तो खानदान भी बिखर गए। नए आसमानों की तलाश में तप्ती हुई प्यासी संगलाख ज़मीनें लखौरी ईंटों के सपने नहीं दिखा सकीं और जो पीछे पुरानी इमारतों की बुनियादें बाकी बचीं, वे कमजोर होती चली गईं।
कहते हैं कि एक ईंट गिरती है तो तीन दूसरी अपने आप भुरभुरी होने लगती हैं। समय उन्हें भुरभुराकर लोनी में बदल देता है। जब समय साथ छोड़ता है तो इमारतों के भी अंग-प्रत्यंग गिरते हुए लावारिस बन जाते हैं और पुराना मुहावरा है कि लावारिस मकान हो या मुहल्ले की विधवा, उसपर हर कोई अपना दावा पेश करने लग जाता है।
बाड़ी की मस्जिद हो या कब्रिस्तान, कवि नरोत्तम दास का मंदिर हो या पुरातात्विक खंडहर, सबके दावेदार स्वतः ही मशरूम की तरह उग आए लोग, मकान, तिदरियाँ और हवेलियाँ सब अफ़साने बनकर खंडहरों में तब्दील होते चले गए। यहाँ भी बदलते वक्त के साथ लावारिस ज़मीनों पर कब्जों के करील उग-उग कर फैलते चले गए और खंडहरों पर पतावर के नए न सलीब पहचान की तरह पीढ़ियों के हस्ताक्षर बनते चले गए।
शराफत यार ख़ान का खानदान इसी बाड़ी के सैय्यदों की निशानी है। उनका ननिहाल लखनऊ में है, वहीं वह पढ़े-लिखे भी। खाला-बी बाड़ी के सय्यद-बाड़े में ब्याही जरूर थीं, किन्तु मन बड़ी बहन के आँगन में ही डोलता रहता था। 15 साल छोटी थीं तो खानदान भर में वह छोटी खाला, छोटी फुप्पो, छोटी मुमानी और बस ऐसे ही रिश्तों का छोटापन उनके बेटे असलम ख़ान तक जा पहुँचा था । शराफत यार ख़ान बड़े थे, रिश्ते में बड़ी खाला के होनहार बेटे थे और लखनऊ में ही रहते थे किन्तु पढ़ाई-लिखाई में मुनीरा बेगम अपने बेटे के लिए एएमयू से बेहतर दूसरी जगह के महत्व को नहीं स्वीकारती थीं, कारण थे शराफत के अब्बाजान स्वर्गीय मीर अमीर हसन एडवोकेट, जिन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय में न केवल वकालत पढ़ी थी, बल्कि वहाँ की कोर्ट के सदस्य भी रहे थे। आजादी के आंदोलन में उनकी भूमिका भी सराहनीय रही थी। आज अगर वह जीवित होते तो लिबरल मुसलमानों के एक बड़े नेता बनकर उनका प्रतिनिधित्व कर रहे होते। उनके बहुत से दोस्त पाकिस्तान चले गए किन्तु उन्होंने अपने ही मुल्क को अपना ‘देश’ समझा और यहीं की मिट्टी में वह अंततः दफ्न भी हो गए।
छोटी-बी बाड़ी में ही रहीं। कसबाई मानसिकता ने उन्हें कभी चौखट लांघने नहीं दी। तब भी नहीं जब उनके पति की सांप्रदायिक दंगा-ग्रस्त कस्बे से मेरठ जाते हुए रास्ते में उन सहित तीन अन्य व्यक्तियों की चाकुओं से हत्या कर गई थी। तब उनके इकलौते पुत्र असलम ख़ान पाँच वर्ष के थे। बड़ी बेगम श्रीमती मुनीरा बेगम ने असलम खान को लखनऊ में ही रखना चाहा लेकिन ज़रीना बेगम की तनहाई को देख कर बहन ने एक पढ़ी-लिखी ट्रेंड लेडी अटेंडेंट तम्बोरा देवी को बाड़ी में जरूर रख दिया ताकि असलम खान की सही निगरानी और बेहतर तालीम पर निगाह रखी जा सके।
तम्बोरा देवी कस्बा लहर पुर अर्थात लोहारी पुर से थीं। कहते हैं कि राजा चंद्र सेन गौड़ ने 1707 में मुस्लिम शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था । राजा टोडरमल इसी कस्बे के रहने वालों में थे। तम्बोरा देवी गौड़ के पूर्वजों मेँ कुछ लोग ग़ाज़ी ताहिर के नेतृत्व में पासियों के युद्ध के बाद 1707 में जब राजा चंद्र सेन गौड़ का शासन आया तो तम्बोरा देवी के पूर्वज अवध में जाकर बस गए थे क्योंकि तब तक अवध पर अकबर बादशाह का शासन कायम हो चुका था।
तंबोरा देवी एक संस्कारित महिला थीं । वह मुनीरा बेगम के साथ समाज कल्याण संबंधी कार्यों से भी जुड़ी रहती थीं। उसने गौड़ मुस्लिम युवक से कभी प्रेम-विवाह किया किन्तु उसने मुंबई जाकर किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इस घटना के बाद से उसने फिर कभी प्रेम विवाह को महत्व नहीं दिया। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्नातक थीं और बहुत ही सौम्य प्रकृति की गंभीर महिला भी। जब उसने समाज कल्याण स्वयंसेवी सामाजिक संस्था का बाड़ी में दफ्तर खोला तो उसने स्थानीय बच्चों की शिक्षा की ओर भी ध्यान दिया जिसमें इंग्लिश और मैथ्स को प्रथम प्राथमिकता दी गई थी। इससे स्थानीय बच्चे उसके ‘टिटोरियल क्लासेस’ में तेजी से आने लगे और सैय्यद बाड़ा का खंडहर फिर से आबाद होने लगा।
असलम खान को तंबोरा देवी ने मानो गोद ही ले लिया था। समय ने भी तो उसकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया था। उसने असलम खान को न केवल पढ़ाया-लिखाया, बल्कि बेटे की तरह पाल-पोस कर उन्हें संस्कार दिए। उसे बड़ा होते देख तंबोरा देवी फूली न समाती। उसे देखते ही उसके पेट में ऐंठन सी महसूस होने लग जाती थी। अजीब सा लगाव होता जा रहा था, जैसे वह उसकी ही माँ हो।
जब वह अलीगढ़ जाने वाला था और तम्बोरा देवी उसे सी-आफ करने सिधौली के स्टेशन पर गई हुई थीं तब वह बहुत भावुक होने लगी थीं। वह उसे अपलक देखती रहना चाहती थीं, लेकिन आँखें डबडबा जाती थीं। तभी वह समय भी आया जब अत्यंत भावुक होकर वह एकाएक असलम खान को सीने से लगाकर रो पड़ीं। असलम ख़ान ने उन्हें बहुत समझाया, परिपक्वता का प्रदर्शन कर उन्हें रोका नहीं, रोने दिया। हालांकि इस संवेदनशील वातावरण में वह स्वयं भी बहुत भावुक हो गया था।
उसने कहा, "माँ, बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा। यह न कहिएगा कि हम आईएएस बने,.आईपीएस बनें.और फिर बाद में फेल हो जाएं, जैसे भाई.....।” उसने हंसने का भी प्रयास किया ताकि मैडम का मन हल्का हो जाए लेकिन.... 'मम्मा! मैं जल्दी मिलने आऊँगा।”
“असलम, आपने अभी क्या कहा? फिर से कहिए.....!”
“कुछ ग़लत..... कह गया क्या मैं ?”
देवी भरभराकर रो पड़ी थीं,” आपने हमें माँ कहा, ममा कहा?”
“कह दीजिए कि नहीं हैं! जो हैं वही तो मुंह से निकला। अम्मी ने जन्म दिया ममा, लेकिन आपने तो पैरों पर खड़ा कर दिया, बोलना सिखा दिया, बता दिया कि दुनिया से कैसे टक्कर लें। आप माँ नहीं तो क्या हैं आप मेरी माँ ही रहेंगी। अम्मी अपनी जगह पर हैँ, आप अपनी जगह पर, अब जाएं?”
“कहिए जल्दी आएंगे!”
उस दिन असलम ने तंबोरा देवी की दोनों आँखों को चूमा था और अपनी भावुकता को काबू कर ट्रेन में बैठ गया था। लेकिन उसके जीवन के हर क्षण अविस्मरणीय थे। तंबोरा देवी ने तो देर तक आँखें ही नहीं खोलीं थीं कि कहीं असलम आँखों से ओझल न हो जाए लेकिन अंततः ट्रेन की सींटी ने तंबोरा देवी को आँखें खोलने पर मजबूर कर दिया था
[शेष, अगले एपिसोड में....-/2]
Dr. Z. A. Zaidi Ranjan Zaidi
सोम, 18 मार्च, 5:30 pm
THE
فیروز ظفر کی خوبصورت شاعری
ڈاکٹر رنجن زیدی
طالب علمی کے دور میں ھم نے کہیں پڑھا تھا کہ شاعری حیات سے پیدا ہوری ہے اور حیات کے لئے ہی زندہ رہتی ہے- یہ قول شاید میتھیو آرنلڈ کا رہا ہوگا-کیونکیہ اسی نے شاعری کے اصل اصول کو حیات کی ترجمانی میں تلاشہ تھا اور وضاحت میں بتایا گیا کہ اخلاق سے بغاوت در اصل حیات سے بغاوت ہے-جو شاعری اخلاق کو پیش نظر نہیں رکھتی اس میں حیات کا لحاظ بھی نہیں ہو سکتا-یہاں یہ سمجھنا ضروری ہے کہ واعظ اور شاعر میں اتنا ہی فرق ہے جتنا ایک ٹریں کی دو پٹریوں میں ہوتا ہے- اسکے باوجود دونوں کے بیچ اخلاق اورمنافا ت قایم رہتا ہے تبھی، ٹرین سمودلی پٹریوں پر دوڑتی رہتی ہے-
یہ ربط حسن و عشق تو دیکھو کہ رات بھر
وہ مجھ میں جاگتا رہا، میں اسمیں سو گیا
(فیروز ظفر)
یہاں یہ شعرمقففی انشا ہے-مین نے یہاں اس کا ذکر اسلئے کیا ہے کہ اس فن کا تصور ہمارے سامنے آے اورہم اسے سمجھ سکیں کہ یہ جو تعقل اور تخیل کی مدد سے انبساط کا پیوند صداقت کے ساتھ لگاتا ہے، جو ساینس کےمدد مقابل ہے اور اسکا راست مقسد ے انبساد -یہ نذریعہ میرا نہیں ڈاکٹر جانسن اورکللرج کا ہے-( بیوگریفیالٹریریا، باب ١٤)
بات بڑی لگ سکتی ہے لیکن طرز انداز یا رنگ و بو کے سفر میں جو خوشبو ہم میر کے اس شعرمیں محسوس کر سکتے ہیں وہ، حسرت یا مجروح میں نہیں-
دل وہ نگر نہیں کہ پھر آباد ہو سکے
پچھتاؤگےسنو ہو یہ-یہ بستی اجاڈ کے
(میر تقی میر)
'خوشبو سفر میں ہے' کا شاعرفیروز ظفر اپنی غزل (صفہ ٣٠ پر) میں لکہتا ہے ---
روشنی جب جب ہوئی کم میری دھرتی پر ظفر
میں نے آنکھوں سے لہو چھلکایا بھارت لکھ دیا
--------
پیار ھے دھوکا عشق بغاوت مہر و وفا سب دنیاداری
قد کے برابر آ گئے بچچے اب کہنے سے کیا ہوگا
(فیروز ظفر)
فیروز ظفر کا یہ پہلا شعری مجموعہ نہیں ہے -شاید، شہرگل انکا پہلا مجمع تھا-کانٹوں کی خوشبو، گل تہہ خاک، اور پھول تمہارے خار ہمارے (1955) کے بعد لکھنے کا تسلسل دھیما پڈ گیا، اپنے شعر میں انہوں نے اپنی جس خواہش کا اظہارکیا ہے وہ کچھ یوں ہے-
میرے بیٹے میری میراث سخن کے وارث
لو اٹھاو یہ میرے لوح و قلم رکھے ہیں
جدید انقلاب کے آغاز سے کچھ عرصۂ قبل جہاں شاہنامہ کا ترجمہ اردو میں کیا گیا وہیں اردو میں ہی 'مہابھارت' اور 'رام چرت مانس' کے ترجمے بھی کئیے گئے-لا حاصل یہ کہ کوئی بلند پہ کی تخلیق سامنے نہیں آ سکی -حالانکہ منشی جوالا پرساد برق کی نظم 'پدمنی کا جوہر' یا سرورکی نظم 'چتتوڑکی گزشتہ عظمت' کا ذکر بطور تمثیل کیا جا سکتا ہے-ڈاکٹر راہی معصوم رضا نے
'مہابھارت' کو سلولائیڈ پر بھی ابھارا اور١٨٥٧ کے انقلاب کو بھی اپنا منظوم موضوع چنا- فیروز فرشوری کہتے ہیں،
خون اپنا ہو یا پرایا ہو، خون کا رنگ لال ہوتا ہے
قتل مغرب میں ہو کہ مشرق میں طایردل حلال ہوتا ہے
(فیروز ظفر/٩٧)
'خوشبو سفر میں ہے'فیروز ظفر کا تازہ مجموعه کلام ہے-اردوکی تاریخ کے ہر دور میں ادب کی سرزمین بدایون میں عظیم موررخ ، دانشور، ناقدین ، ادیب محققق اور شاعر پیدہ ہوتے رہے ہیں-فیروز ظفر اسی کڈی کا ایک باشعورشیر ہے. جو کہتا ہے--
اک سڈک اک جسم بھیگی رات بجلی کی چمک
مین نے اس منظر کو دیکھا اور ضرورت لکھ دیا
(فیروز ظفر)
چونکہ فیروزغزل کا شاعر ہے اسلئے اسکی شاعری میں تعریف کے سوا حسن و عشق کا سمندربھی انگڑاییاں لیتا رہتا ہے- اسکی غزل کا معنوی امتیاز بھی حسن و عشق کے رزم میں تصوف، اخلاق اور حکمیان مضامین شامل نظر آتے ہیں- غور و فکر کی آنچ میں سلگتی رہنے والی ظفر کی شاعری اوڑھی ہوئی جدّت کا فن نہیں، صحتمند تشکیک مروجہ راستوں کی دیوار جیسی ہے جس سے سر ٹکرانا عمرعزیز کو رایگان کر دینے یا زخموں سے بھر دینے جیسا ہے- شاہد صددیقی نے کہا تھا، 'روشنی میں ڈھلتی ہے دل کے خون میں سرخی
تب کہیں سرے مژگاں اک چراغ جلتا ہے'
بقول صغیر احمد صددیقی کے کہ-'سچچی شاعری واقعی ایک نعمت ہے- بقول ماسٹررونق بدایونی کے (جو فیروز ظفرکے استاد بھی تھے) 'وقت قطروں کو سکھا دیتا ہے طوفان ہونا-'
--------------------------
٩٤ فرسٹ فلور، آشیانہ گرینس، آهنسہ کھنڈ-٢، اندراپرم، غازیآباد ٢٠١٠١٤ اتر پردیش ، بھارت
فیروز ظفر کی خوبصورت شاعری
ڈاکٹر رنجن زیدی
طالب علمی کے دور میں ھم نے کہیں پڑھا تھا کہ شاعری حیات سے پیدا ہوری ہے اور حیات کے لئے ہی زندہ رہتی ہے- یہ قول شاید میتھیو آرنلڈ کا رہا ہوگا-کیونکیہ اسی نے شاعری کے اصل اصول کو حیات کی ترجمانی میں تلاشہ تھا اور وضاحت میں بتایا گیا کہ اخلاق سے بغاوت در اصل حیات سے بغاوت ہے-جو شاعری اخلاق کو پیش نظر نہیں رکھتی اس میں حیات کا لحاظ بھی نہیں ہو سکتا-یہاں یہ سمجھنا ضروری ہے کہ واعظ اور شاعر میں اتنا ہی فرق ہے جتنا ایک ٹریں کی دو پٹریوں میں ہوتا ہے- اسکے باوجود دونوں کے بیچ اخلاق اورمنافا ت قایم رہتا ہے تبھی، ٹرین سمودلی پٹریوں پر دوڑتی رہتی ہے-
یہ ربط حسن و عشق تو دیکھو کہ رات بھر
وہ مجھ میں جاگتا رہا، میں اسمیں سو گیا
(فیروز ظفر)
یہاں یہ شعرمقففی انشا ہے-مین نے یہاں اس کا ذکر اسلئے کیا ہے کہ اس فن کا تصور ہمارے سامنے آے اورہم اسے سمجھ سکیں کہ یہ جو تعقل اور تخیل کی مدد سے انبساط کا پیوند صداقت کے ساتھ لگاتا ہے، جو ساینس کےمدد مقابل ہے اور اسکا راست مقسد ے انبساد -یہ نذریعہ میرا نہیں ڈاکٹر جانسن اورکللرج کا ہے-( بیوگریفیالٹریریا، باب ١٤)
بات بڑی لگ سکتی ہے لیکن طرز انداز یا رنگ و بو کے سفر میں جو خوشبو ہم میر کے اس شعرمیں محسوس کر سکتے ہیں وہ، حسرت یا مجروح میں نہیں-
دل وہ نگر نہیں کہ پھر آباد ہو سکے
پچھتاؤگےسنو ہو یہ-یہ بستی اجاڈ کے
(میر تقی میر)
'خوشبو سفر میں ہے' کا شاعرفیروز ظفر اپنی غزل (صفہ ٣٠ پر) میں لکہتا ہے ---
روشنی جب جب ہوئی کم میری دھرتی پر ظفر
میں نے آنکھوں سے لہو چھلکایا بھارت لکھ دیا
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پیار ھے دھوکا عشق بغاوت مہر و وفا سب دنیاداری
قد کے برابر آ گئے بچچے اب کہنے سے کیا ہوگا
(فیروز ظفر)
فیروز ظفر کا یہ پہلا شعری مجموعہ نہیں ہے -شاید، شہرگل انکا پہلا مجمع تھا-کانٹوں کی خوشبو، گل تہہ خاک، اور پھول تمہارے خار ہمارے (1955) کے بعد لکھنے کا تسلسل دھیما پڈ گیا، اپنے شعر میں انہوں نے اپنی جس خواہش کا اظہارکیا ہے وہ کچھ یوں ہے-
میرے بیٹے میری میراث سخن کے وارث
لو اٹھاو یہ میرے لوح و قلم رکھے ہیں
جدید انقلاب کے آغاز سے کچھ عرصۂ قبل جہاں شاہنامہ کا ترجمہ اردو میں کیا گیا وہیں اردو میں ہی 'مہابھارت' اور 'رام چرت مانس' کے ترجمے بھی کئیے گئے-لا حاصل یہ کہ کوئی بلند پہ کی تخلیق سامنے نہیں آ سکی -حالانکہ منشی جوالا پرساد برق کی نظم 'پدمنی کا جوہر' یا سرورکی نظم 'چتتوڑکی گزشتہ عظمت' کا ذکر بطور تمثیل کیا جا سکتا ہے-ڈاکٹر راہی معصوم رضا نے
'مہابھارت' کو سلولائیڈ پر بھی ابھارا اور١٨٥٧ کے انقلاب کو بھی اپنا منظوم موضوع چنا- فیروز فرشوری کہتے ہیں،
خون اپنا ہو یا پرایا ہو، خون کا رنگ لال ہوتا ہے
قتل مغرب میں ہو کہ مشرق میں طایردل حلال ہوتا ہے
(فیروز ظفر/٩٧)
'خوشبو سفر میں ہے'فیروز ظفر کا تازہ مجموعه کلام ہے-اردوکی تاریخ کے ہر دور میں ادب کی سرزمین بدایون میں عظیم موررخ ، دانشور، ناقدین ، ادیب محققق اور شاعر پیدہ ہوتے رہے ہیں-فیروز ظفر اسی کڈی کا ایک باشعورشیر ہے. جو کہتا ہے--
اک سڈک اک جسم بھیگی رات بجلی کی چمک
مین نے اس منظر کو دیکھا اور ضرورت لکھ دیا
(فیروز ظفر)
چونکہ فیروزغزل کا شاعر ہے اسلئے اسکی شاعری میں تعریف کے سوا حسن و عشق کا سمندربھی انگڑاییاں لیتا رہتا ہے- اسکی غزل کا معنوی امتیاز بھی حسن و عشق کے رزم میں تصوف، اخلاق اور حکمیان مضامین شامل نظر آتے ہیں- غور و فکر کی آنچ میں سلگتی رہنے والی ظفر کی شاعری اوڑھی ہوئی جدّت کا فن نہیں، صحتمند تشکیک مروجہ راستوں کی دیوار جیسی ہے جس سے سر ٹکرانا عمرعزیز کو رایگان کر دینے یا زخموں سے بھر دینے جیسا ہے- شاہد صددیقی نے کہا تھا، 'روشنی میں ڈھلتی ہے دل کے خون میں سرخی
تب کہیں سرے مژگاں اک چراغ جلتا ہے'
بقول صغیر احمد صددیقی کے کہ-'سچچی شاعری واقعی ایک نعمت ہے- بقول ماسٹررونق بدایونی کے (جو فیروز ظفرکے استاد بھی تھے) 'وقت قطروں کو سکھا دیتا ہے طوفان ہونا-'
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٩٤ فرسٹ فلور، آشیانہ گرینس، آهنسہ کھنڈ-٢، اندراپرم، غازیآباد ٢٠١٠١٤ اتر پردیش ، بھارت
25/03/2024
तवील अफ़साना
दिल दरिया-दरिया
डॉ रंजन जैदी
आज शराफत यार खान का दिन पुराने जमाने के कुछ पुराने मुहावरों की तरह बेहद मनहूस रहा था। देश भर में कोविड के लॉकडाउन की घोषणा की जा चुकी थी। नई खबर थी कि ट्रेनों का भी चक्का जाम होने वाला है। अब पता नहीं कि यह फैलाई गई अफवाह थी या सचमुच कोई सरकारी विज्ञप्ति थी। ऐसी खबरों के बीच शराफत यार ख़ान को अपनी माँ और मौसियों का खयाल आ गया। इस समय दोनों ही लखनऊ में रह रही थीं ।
इन्हीं उधेड़बुन में शराफत यार खान को अचानक उस एक अजनबी लड़की का भी खयाल आ गया जो पिछली दो रातों से पहले घर लौटते समय उनसे प्लेटफ़ॉर्म के बाहर मिली थी और बिना टिकेट के सफर करती रही थी। उन्होंने तुरंत माता माई को फोन किया, उसके आदमियों से भी संपर्क किया, बताया कि उन्होंने किसी लड़की को उसके पास भेजा था, लेकिन जवाब तो आश्चर्य-चकित कर देने वाला था। वह तो ढाबे तक पहुंची ही नहीं। कहाँ है वह?
शराफत यार खान के हाथों से तोते उड़ गए। वह हड़बड़ाकर इधर-उधर फोन खटखटाने लगे, घर के नौकर बंदे हसन को सब तरफ दौड़ा दिया, खुद भी प्लेटफ़ॉर्म के अंतिम सिरे तक जहां बेंच पर मुसाफिर आकार बैठते थे, देख आए। खुद खान ने रिटायरिंग-रूम में जाकर पता किया, अटेंडेंट ने जरूर बताया कि वह दो रातों तक तो यहां रुकी थी, फिर किसी वृद्ध महिला के साथ वह कहीं चली गई। खोजबीन की दृष्टि से अटेंडेंट ने रजिस्टर के पन्ने पलटकर उस अज्ञात महिला का नाम, पता और टिकट नंबर नोटकर ख़ान को दिए और ख़ान ने रेटायरिंग से बाहर निकलकर बंदे हसन को दिए और हिदायत दी कि बिना समय गँवाए वह तलाशकर उन्हें रिपोर्ट करे।
इस नए संपर्क-सूचना ने शराफत यार ख़ान को फिक्र में डाल दिया था। पता नहीं वह महिला कौन थी, ठीक भी थी या नहीं। जब तक पता नहीं चलेगा, फिक्र तो होगी ही। लड़की के पास टिकट भी नहीं था। मतलब साफ़ है कि उसके हालात सामान्य नहीं थे। वह कुछ बताना भी चाहती थी, लेकिन मैंने सुना ही नहीं, यह तो कोई बात नहीं हुई, मुझे सुनना चाहिए था। अम्मी जब यह सारी बातें सुनेंगीं तो कितनी डांट पड़ेगी। इस तकलीफ़ में भी ख़ान को फीकी सी हंसी आ गई।
इसलिए अजनबी लड़की का डर समझ में आता है। शायद उसकी मदद करते हुए लाइनमैन बहुआ बेहरा को भी डर लगा होगा। ज़माना भी तो बहुत खराब है । हालांकि लोगों की बातों से पता चलता है कि लाइनमैन से उसकी कुछ बातें हुई थीं, शायद वही कुछ बता सके लेकिन फिर वह भी तो दिखाई नहीं दे रहा है। तीन रातें हो रही हैं, तीन रातें...? कहाँ चली गई वह...? कितनी बड़ी ग़लती हो गई। वह कुछ खान से कहना चाह रही थी। उन्होंने क्यों उसकी बात नहीं सुनी, उफ़…कहीं ग़लत हाथों में न पड़ गई हो। वह रेलवे पुलिस से भी संपर्क नहीं कर सकते हैं। कहीं कोई मामला खुद उनके अपने गले न पड़ जाए। इस विषय पर बहुत सावधानी बरतनी होगी। शायद मैं कुछ ज़्यादा ही उत्सुकता दिखा रहा हूँ। मुझे अब अधिक खोजबीन में रुचि नहीं लेनी चाहिए
स्टेशन पर मारी-मारी जैसा हाल था। कोरोना के भय ने सबको डरा दिया था। ट्रेनें न केवल लेट थीं बल्कि बहुत सी कैंसिल भी होती जा रही थीं। यात्रियों का जमगठा बढ़ता जा रहा था। उधर, बंदे हसन खाली हाथ नहीं लौटा था। उसने जो खबर दी उससे शराफत यार ख़ान के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली थी। खबर के अनुसार ‘सहर’, यानि वह अजनबी लड़की जिसने शराफत यार खान की नींदें हराम कर दी थीं, वह इस समय सीतापुर के ही कस्बा मछरेठा में स्थित स्वर्गीय मौलवी अहमदुल्लाह शाह के टीले वाली हवेली में सकुशल मौजूद है और खुश है।
यूं तो यह हवेली इतिहास पुरुष एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने अपने जीवनकाल में बनवाई थी लेकिन उन्हें इसमें रहना कभी नसीब नहीं हुआ और वह 1857 के विप्लव के जमाने में ही 16 अप्रैल, 1857 को शहीद हो गए। स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक क्रांतिकारियों के साथ उनकी यह लड़ाई सिधौली, (सीतापुर) के कस्बा बाड़ी के करीब तत्कालीन ब्रिटिश हमलावर सेना की एक टुकड़ी के साथ हुई थी। तब घाघरा नदी तक सैनिक क्रांतिकारियों का पूरा कब्जा था। इस युद्ध में राजा लोन सिंह, फिरोज शाह और बख्शी हरी प्रसाद सिंह भी शहीद हुए थे।
यह युद्ध फैलते हुए खैराबाद तक जा पहुँचा था जहां अंग्रेज़ी सेना के ब्रिगेडियर जनरल बाकर के लिए नई कुमुक पहुंची तो देशी क्रांतिकारियों के हौसले पस्त होने लगे लेकिन फिर उन्हें भी राजा हरी प्रसाद सिंह, लोन सिंह और ख़ान बहादुर ख़ान के दस हजार घुड़-सवार, पैदल फौज और दस हजार पैदल सैनिकों की कुमुक मिल गई और जंग का नक्शा बदल गया लेकिन कुछ कायस्थ वारियरों और इलाकाई जमींदारों के धोखा देने के कारण राजा हरी प्रसाद के आदेश पर याक़ूब ख़ान, लक्कड़ शाह और घुममन सिंह के साथ खैराबाद में फिर युद्ध जीतने का प्रयास किया लेकिन मछरेठा में अंततः स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए। बिसवा में फिरोज शाह भी अपने 15 सैनिकों के साथ घाघरा पार करते हुए शहीद हो गये और राजा हरी प्रसाद बेगम हज़रत महल के साथ नेपाल की तरफ चला गया।
बिना समय गंवाए शराफ़त यार खान ने अलीगढ़ से अपने कज़िन (मौसेरे भाई) असलम ख़ान से वाट्सऐप पर बातें करते हुए सिधौली पहुँचने का तुरंत अनुरोध किया और तदुपरांत असलम ने भी इसे बड़े भाई का आदेश मानकर कुछ ही समय में अपना किट लेकर बाईक पर सवार हो गया, लेकिन रास्ते भर दिल में एक ही संदेह कुलबुलाता रहा कि शहरयार भाई को ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई...कि वाट्सऐप पर भी नहीं बताया, बस कह दिया, ‘आ जाओ!’ असलम ने भी चलने से पहले संदेश प्रेषित कर दिया…, ठीक है, आ रिया हूँ भाई......।’
सब तरफ अंधेरा था। पावर-स्टेशन का कोई बड़ा ब्रेक-थ्रो हो सकता है, लेकिन रेलवे कालोनी का तो अपना जेनरेटर भी है। शायद कोई और तकनीकी मामला हो सकता है। व्यवस्था के सौ लफड़े होते हैं। लाइट तो आ ही जाएगी। पहले वह आँगन में चहलकदमी करते रहे, घुप अंधेरा। बस, आकाश पर तारों का जाल फैला हुआ था। आँगन में अनार के दरख्त पर कोई परिंदा फड़फड़ा कर कानों के पास से गुजरकर अँधेरों में ग़ायब हो गया। एक बिल्ली की आंखेँ चमकीं फिर मियाऊँ की आवाज आई। वह कूदकर अमरूद के दरख्त पर पहुंची और सन्नाटे में किसी परिंदे की चीखें कानों के परदों को चीरने लगीं लेकिन फिर एकाएक सन्नाटा छा गया। शराफत यार ख़ान की घबराहट और बढ़ गई।
ग्राउन्ड-फ्लोर के अपने एल-शेप कुआर्टर के पीछे की खिड़की के उस पार से गुजरने वाला ट्रैफिक भी इस समय कुछ कम हो चुका था। गाड़ियों की रोशनियों से अंधेरे ह्यूले थरथराने लगे थे। शराफत यार ख़ान एमर्जेंसी लाइट ऑन कर सड़क से लगी खिड़की की ही तरफ आकर खड़े हो गए। सामने नौ फुट की चौड़ाई वाली सड़क पर अभी भी इक्का-दुक्का गाड़ियां आ जा रही थीं। उससे टिककर वह सामने देखने लगे लेकिन उनका ध्यान अपने भाई असलम की ही तरफ था कि अब असलम शाहजहांपुर से आगे बाईपास से निकल गया होगा। उसे बहुत तेज बाइक नहीं चलानी चाहिए। अल्लाह उसे साथ खैरियत के यहाँ तक ले आए।
इसी समय छज्जे से अंधेरे में ही नुमाइरा की आवाज़ सुनाई देती है।’ “भाई जान, खाला नहीं आईं?”
“क्यों? आने वाली हैं क्या?” शराफ़त यार ख़ान चौंक गए।
“आपकी नाक पर तो अंधेरे में भी मक्खी बैठी रहती है।’ नुमाइरा एकदम खिलखिलाकर हंस पड़ी,” इकदम बारिश के भीगे पौधे की तरह जड़ों से उखड़ जाते हैं भाईजान? एक बात बताएं, आप जब पैदा हुए थे तब आपने बिना सांस लिए दाई से कितने थप्पड़ खाए थे?”
“बदतमीज़! घर में कोई बड़ा नहीं है क्या?”
“छोटा भी नहीं है। रात भर लाइट नहीं आई तो मैं कैसे रहूंगी। अकेले में मुझे बहुत डर लगता है। आप भी वहीं आ जाइए, साथ ही खाना खाएंगे। मेरे घर के सब लोग तो चालीसवें में अलादातपुर फुप्पो के यहां गए हुए हैं। सुना है, कोई कह रहा था, असलम भाई ने एएमयू में दाखिला ले लिया है। यह खबर सुनकर मैं तो बहुत ही खुश हो गई हूँ।”
“क्यों, इस खुशी का मतलब...कोई नई रेटिंग है? ”
“हाय अल्लाह, आप कैसे हैं भाई जान, खाला आयेंगी तो पूछूँगी कि पहली पान की पीक आपके मुंह में किसने डाली थी, किसी शादीशुदा बाजी ने या कुँवारी बिब्बो ने? कसम से भाईजान, शुक्र मनाइए कि मैंने आपकी रैगिंग नहीं की, लेकिन असलम भाई की रैगिंग मैं जरूर करूंगी।”
इसी समय लाईट आ गई, इसका शोर भी सुनाई देने लगा, शराफ़त यार ख़ान ने निगाह ऊपर उठाई तो देखा, खिड़की की चौखट से चिपकी कौसर अंसारी कमर तक नीचे लटकी हुई थी। वह लगातार हँसे जा रही थी,”भाईजान, आज मैंने पाए बनाए थे। मैं पाए बहुत अच्छे बनाती हूँ, कसम से। लेकर आऊं?, दुत्कारेंगे तो नहीं?’
शराफत यार ख़ान कौसर अंसारी की शरारत पर हँसकर कमरे में लौट आए और मुसकुराते हुए एमर्जेंसी लाइट आफ़ कर दी। माँ के फोन का नंबर डायल किया और जब उन्होंने जवाब में अजनबी आवाजें सुनीं तो पूछा,’आप ...! लखनऊ में नहीं हैं क्या... ? कहाँ हैं?”
“नहीं! मैं मछरेठा में हूँ, आपकी चहीती खाला नवाबज़ादी बेगम शदाना की हवेली में। आज यहाँ ‘ब्लॉक वुमन-चेतना-मंच’ की तरफ से सीएए और एनआरसी को लेकर ब्लॉक-समिति की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी, उसमें शामिल होने के लिए लखनऊ से मैं भी आ गई हुई थी। एक राज़ की बात बताऊँ... बेटा? यहाँ मैंने आपके लिए एक खूबसूरत लड़की देखी है, सुभान अल्लाह! क्या हुस्न-ए-जमाल है, क्या शोला-बयानी। बस! अब आगे इंतजार नहीं। आपकी मुंह बोली खाला यानि हमारी बेगम शदाना बाजी को भी वह बहुत पसंद आई है। हमें अल्लाह पर भरोसा है, बेगम बाजी की पसंद आप दोनों भाइयों को भी पसंद आएगी, इंशाल्लाह!”
“आप...आप... आप क्या कह रही हैं मम्मी? हम नहीं समझे! हमें पता करना था कि एक लड़की, उसका नाम सहर आशोब है, वह खाला बेगम के घर पर ही है। आप जब आएं तो उसे अपने साथ जरूर लेते आइएगा। उसका यहाँ आना ज़रूरी ही नहीं, बहुत जरूरी है। वैसे भी आप लखनऊ तो जाएंगी नहीं, इधर ही आ जाइए। बंदे हसन, असलम के साथ गाड़ी लेकर सुबह यहाँ से रवाना हो जाएंगे। कोरोना का जोर बढ़ रहा है, बहुत केयर करने की जरूरत है। आप अपना ख्याल रखिएगा।”
घंटी बजी तो बंदे हसन ने जाकर बाहर पहले तो लड़की को ऊपर से नीचे तक देखा, सकुचाए, फिर पूछा, “घर में माँ जी नहीं हैं! कल-परसों आएंगी। साहब अपनी स्टडी में हैं। चाय के लिए दूध अगर खत्म हो गया हो तो बताएं बीबी, चाहिए क्या? आप यहीं रुकें, मैं लेकर आता हूँ।’ इसके साथ ही दरवाजे के दोनों पट खोल दिए गए। दरवाजे के बीचो-बीच कौसर अंसारी दोनों हाथों पर शीशे के मर्तबान में कुछ लिए हुए खड़ी दिखाई दी। उसने बड़बड़ाते हुए कहा,”इस घर का तो आवे का आवा ही बिगड़ा हुआ है। अजीब बत्त्तमीज़ लोग हैं।’
बंदे हसन की उपेक्षा करते हुए कौसर अंसारी ने रसोई में खुद जाकर मर्तबान रख दिया। जब वह जाने के लिए मुड़ी तो उसने हँसते हुए पूछा, ‘आप साहब को जाकर इत्तिला देंगे या मैं ही उनके कमरे में जाकर इत्तिला दूँ कि इस मर्तबान में लज़ीज़ पाए हैं।’ दांत पीसते हुए वह शहरयार ख़ान को नजर गड़ाकर देखने लगी। कुछ क्षणोपरांत शहरयार ने कहा, “पाए में लाल मिर्चें तो डाली ही होंगीं। फिर भी आपके बनाए हुए पाए हम जरूर खाएंगे और असलम मियां भी। हो सकता है, वह आने ही वाले हों। हाँ! बंदे हसन भाई, आप जाकर ढाबे से दस-15 रोटियाँ लेते आइए, हमें अब भूख लग रही है।”
” “पाए मेरे नहीं भाईजान, बकरे के हैं।” कौसर ने ग़लती सुधारते हुए जवाब दिया।
लेकिन ठीक इसी समय मालूम हुआ कि बाहर आड़ू के बाग में शोर मचाती हुई असलम की बाईक का शोर कुछ लम्हों तक गूंजते रहने के बाद धुआँ फैलाकर शांत हो जाता है लेकिन दीवानगी में “ सांलेकुम असलम भाई !” कहती हुई कौसर बग़ल की सीढ़ियों पर चढ़ती हुई खनखनाती हंसी के साथ एकाएक ग़ायब हो जाती है।
कौसर अंसारी के इस ‘सांलेकुम’ ने असलम को एक ही सांस में न केवल आश्चर्यचकित कर दिया था, बल्कि एक महीन मुस्कान से उनकी मुलाकात भी करा दी थी, ”मोटी!”
उस रात शायद कोई नहीं सोया था, न इधर शराफत यार ख़ान और न उधर असलम ख़ान। शराफत यार ख़ान ‘सहर’ को देखने के लिए लगातार बेचैन होते जा रहे थे और नींद कोसों दूर होती जा रही थी। उनकी ज़िंदगी में ऐसे लम्हे पहले काभी नहीं आए थे। कभी उन्हें किसी लड़की ने अपनी तरफ आकर्षित नहीं किया था। सब कहते थे, शराफ़त की ज़िंदगी में औरत है ही नहीं। शादी की लकीर पर सांप बैठ गया है। वह इंसान नहीं, एक देवमालाई महाकाती किताब है जिसमें देव हैं, दानव हैं, राक्षस हैं और बदसूरत कुटनियाँ हैं। परियाँ तो शाराफ़त यार ख़ान के पास से होकर गुजर जाती हैं, देखती ही नहीं।
एक बार स्टेशन पर एक लड़की ने पूछा, “मेरे साथ डेटिंग करेंगे?” चौंककर शराफत यार ख़ान ने झिझकते हुए पूछा, “क्यों?” लड़की ने जवाब दिया, “यूं ही, आप मुझे अच्छे लगे, मैं कर्नल मैक मोहन सरीन की बेटी हूँ। हॉर्स-राइडिंग मेरा पैशन है। नौजवान मेरे साथ डेटिंग के सपने देखते हैं लेकिन मैं आपको इनवाईट कर रही हूँ। यह मेरा पैशन है.... ”
यहाँ पर शराफ़त खान एकाएक सकपका गए। उन्होंने लड़की को तो जवाब नहीं दिया, उलटे टिकट जरूर मांग लिया। लड़की का चेहरा इतना सुनते ही लाल हो गया, उसने अपने बाडीगार्ड को आवाज दी, ’साहब को मेरा आईडी चेक करा दो ....” इतना कहकर वह तीर की तरह स्टेशन से बाहर निकल गई। उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा बल्कि एयर-फोर्स की सी ड्रेस पहने ड्राइवर के साथ एक बेशकीमती कार में जाकर बैठ गईऔरड्राइवरसेदहाड़करबोलीकहा,ब्लडी-बास्टर्ड.......।” ”” ?“ ”
असलम ने करवट लेकर भाई को देखा, वह जग रहे थे। माथा छुआ, तप रहा था। सोचा, कहीं कोविड का असर तो नहीं हो रहा है। भाई सोये भी नहीं हैं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा,“पानी दूँ भाई?” लेकिन भाई को शायद नींद आ गई थी। असलम ने अंगड़ाई ली और वरांडे में निकल आया। वरांडे में गमले फूलों से भरे हुए थे, आधी रात की महक रगों में बहने लगी थी। अनार के पेड़ पर कई अनार ग़िलाफ़ से ढके हुए थे। शायद पूर्णिमा के कारण चंद्रमा पूरे आकाश को अपने प्रकाश से दमका रहा था, खुशबू और रोशनी ने अजीब सी जादुई ठंडक उसके जिस्म की रगों में पहुँच दी थी। असलम अकारण आँगन में टहलने लगा, उसकी आँखों से नीद ग़ायब हो चुकी थी। रास्ते की थकन अभी भी जिस्म में बाकी थी। शायद वह सो भी जाता लेकिन कौसर की दिलफ़रेब मुस्कुराहट ने उसे अजाने में कहीं बेचैन कर दिया था। नल से टिककर आकाश को देखने लगा। इतनी रात आँगन में पूरे चाँद के नीचे उसकी दूधिया चाँदनी में वह रोमांच से भरता जा रहा था।
ढाई बज रहे थे, आँगन में खुलने वाली ऊपरी मंजिल की खिड़की से असलम को एक चेहरा झाँकता हुआ महसूस हुआ। उसके समूचे जिस्म में इस चेहरे से एकाएक सिहरन सी दौड़ जाती है। “भूत.. ”..! असलम डरकर भागने को हुआ कि कौसर खिड़की से आधी नीचे लटक सी जाती है। उसने फुसफुसाते हुए धीरे से कहा,“ज़ीने का दरवाजा मैंने खोल दिया है, आज मेरे यहाँ कोई नहीं है। आ जाओ......चुपचाप, बहुत सी बातें करेंगे!”
असलम का गला खुश्क हो गया था। उसे प्यास लग ने लगी थी लेकिन वह अपने पसीने को भी खुश्क नहीं कर पा रहा था । एकाएक एक द्वंद्व युद्ध छिड़ गया था। क्या करून भाई ? पता नहीं क्या हो गया है मुझे? कहीं कुछ ग़लत तो नही होने वाला है? शाहिद के साथ भी तो एक रात एक लड़की उसके कमरे में रुक गई थी, फिर वह आती रही, फिर उसने उससे शादी कर ली। लेकिन कौसर से वह शादी तक की बात नहीं सोच सकता। अभी तो वह खुद छोटा है।”
लेकिन कौसर ने दबे पांव नीचे उतरकर पूरी हिम्मत के साथ दरवाजे में ताला लगाया और असलम को लेकर ऊपर अपने घर आ गई और पूरी सतर्कता से ऊपर अपने कमरे के दरवाजे बंद कर लिए। बाहर सड़क के कुत्तों के भौंकने की शुरुआत हो गई थी। कहीं करीब से गार्ड की व्हिसिल भी सुनाई दी, शायद गार्ड को कुछ संदेह हुआ था, वह शहरयार के क्वार्टर के पास आकर ऊपर टार्च की रोशनी फेंकी लेकिन कहीं कुछ दिखाई नहीं दिया। अंततः कुत्तों का भौंकना भी बंद हो गया।
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(कहानी अब एक नए मोड़ पर पहुँचने वाली है। नागरिकता संशोधन कानून के लागू हो जाने के बाद देश की महिलाएं अपने अधिकार की लड़ाई किस तरह के आंदोलनों के माध्यम से लड़ना चाहती हैं,और लड़ेंगी; पढ़िए कहानी की अगली कड़ी में... )
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