Dr S.K Premi

Dr S.K Premi आचार्य को निष्पक्ष, निर्भय एवं निर्वैर होना चाहिए।

22/04/2026

महाप्रभु आदि शकराचार्य की जयन्ती पर -
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
अद्वैत वेदांत के सिद्धांत के माध्यम से पूरी दुनिया को 'एकात्म बोध' का मार्ग दिखाने वाले आदि शंकराचार्य भारतीय दर्शन और अध्यात्माकाश के एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल हिंदू धर्म को पुनर्जीवित किया, बल्कि सम्पूर्ण सनातन धर्म को तिरोहित होने से बचाया ।उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को मापने का कोई पैमाना नहीं है ।मात्र इतना ही कि दूसरा शंकर अभी तक पैदा नहीं हुआ ।ऐसे माहापुरुष विशेष कार्य के लिए ही अवतरित होते हैं ।इसीलिए इन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है । अल्पायु में ही असिमित ज्ञान, वैराग्य और सनातन के संचार प्रचारित बौद्ध धर्म की कमर तोड़ कर रख दी थी मात्र 8 वर्ष की आयु में हि चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर किया था ,बारह वर्ष में सभी शास्त्रों में पारंगत हो गए थे और सोलह वर्ष की आयु तक उन्होंने अपने प्रमुख भाष्यों की रचना कर इन्होने असाधारण प्रतिभा का परिचय दिथा था।
बहुत छोटी उम्र में ही गृहत्याग कर गुरु गोविंद भगवत्पाद जी महाराज से नर्मदा के तट पर दीक्षा लेकर संन्यास धारण कर लिया था ।उन्होंने सम्पूर्ण भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने हेतु भारत की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी
.शंकराचार्य का कार्य मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
. भाष्य
उन्होंने 'प्रस्थानत्रयी' (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) पर गहन भाष्य लिखे। इनका मुख्य उद्देश्य अद्वैतवाद को तार्किक रूप से स्थापित करना था।
ब्रह्मसूत्र भाष्य: यह उनका सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक कार्य माना जाता है।
अद्वैत वेदांत का सिद्धांत
- ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः"
(ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत मिथ्या/परिवर्तनशील है और जीव साक्षात् ब्रह्म ही है, उससे अलग नहीं।)
शंकराचार्य के दर्शन का सार एक वाक्य में समाहित है:
अद्वैत वेदांत के अनुसार, 'ब्रह्म' ही एकमात्र परम सत्य है। वह निर्गुण (बिना किसी गुण के), निराकार (बिना किसी आकार के) और सर्वव्यापी है। वह न जन्म लेता है और न ही उसका अंत होता है। वह 'सच्चिदानंद' है—अर्थात सत् (अविनाशी), चित् (चेतना) और आनंद (परम सुख)। है ।
इस दर्शन का सबसे क्रांतिकारी पक्ष यह है कि हमारी आत्मा (जीव) और परमात्मा (ब्रह्म) अलग-अलग नहीं हैं।
अज्ञानता के कारण हमें लगता है कि हम एक सीमित शरीर हैं।
जैसे ही ज्ञान प्राप्त होता है, यह बोध हो जाता है कि "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ही ब्रह्म है) और "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तुम ही हो)।
यहाँ प्रश्न उठता है कि
अगर केवल ब्रह्म सत्य है, तो यह संसार हमें इतना वास्तविक क्यों लगता है? आचार्य इसका उत्तर देते हैं - माया' ! माया वह शक्ति है जो सत्य पर पर्दा डाल देती है।
शंकराचार्य ने इसे 'रस्सी और साँप' के उदाहरण से समझाया है।अंधेरे में एक रस्सी साँप की तरह दिखाई देती है। जब प्रकाश (ज्ञान) आता है, तो साँप गायब हो जाता है और केवल रस्सी बचती है। ठीक वैसे ही अज्ञानता के कारण हमें ब्रह्म की जगह यह संसार दिखाई देता है।
यह अद्वैत वेदांत भारतीय दर्शन की सबसे प्रभावशाली और गहरी विचारधारा है। 'अद्वैत' ,यानी जो दो नहीं है" ।
इस अद्वैत के मुख्य सिद्धांतों को हम निम्नलिखित स्तंभों के माध्यम से समझ सकते हैं:
1.. सत्ता के तीन स्तर -
शंकराचार्य ने सत्य को समझने के लिए तीन श्रेणियां बताई हैं: ।.मोक्ष कर्म या केवल कर्मकांड से नहीं, बल्कि 'ज्ञान' से प्राप्त होता है। जब मनुष्य को यह अनुभव (साक्षात्कार) हो जाता है कि वह शरीर नहीं बल्कि अनंत चेतना है, तब वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यानी जीवित रहते हुए ही मोक्ष का अनुभव किया जा सकता है ।
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" सिद्यान्त के अनुसार, जगत 'मिथ्या' है, इसका अर्थ यह नहीं कि यह है ही नहीं; बल्कि इसका अर्थ यह है कि यह 'सदा' रहने वाला नहीं है और ब्रह्म पर आधारित है।
दार्शनिक होने के साथ-साथ वे एक उच्च कोटि के कवि भी थे। उन्होंने भक्ति मार्ग को सरल बनाने के लिए कई स्तोत्रों की रचना:की थी जिनमें प्रमुख हैं –
चर्पटपञ्जरिका ,सौंदर्य लहरी और शिवानंद लहरी: देवी शक्ति और भगवान शिव की स्तुति।
* निर्वाण षटकम ।
* भज गोविंदम भज गोविंदम भज गोविंदम मूढ़ मते " से मोह-माया से मुक्ति का संदेश दिया वहीं "चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं" के माध्यम से स्वयं के स्वरूप का बोध कराया ।
भारत की एकता के लिए उन्होंने चार दिशाओं में चार पीठ स्थापित किए -
क - उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ)
ख - दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठ (रामेश्वरम)
ग - पूरब में गोवर्धन मठ (पुरी)
घ - पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (द्वारका)
मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो कार्य किया, वह सदियों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। उन्होंने तर्क और शास्त्रार्थ के माध्यम से शून्यवादिता और रूढ़िवादिता को चुनौती दी और सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप को पुनः स्थापित किया ।
आज उनकी जयंती है । "जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़ई आकाश " ऩ्याय के माध्यम से "करन पुनीत हेतु निज वानी "कुछ निवेदन किया है ।परंतु दुखद तो यह है कि कहीं भी घनघोर रूप से उनकी जयन्ती नहीं मनाई गई ।और ऐसा इसलिए कि वे राजभोगी नहीं थै ,सत्ता की कामना नहीं थी ।बस इतना ही -
नाहं कामये राज्यं ना जन्मं ना पुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानां प्राणिनामार्त नाशनम् ॥
मेरा शत् सहस्राधिक शत् नमन ।

14/09/2025

आज हिंदी दिवस है , हिंदी के लिए हर्ष का दिन नहीं,विरोध का दिन!
हिंदी राष्ट्र की भाषा नहीं हो सकीं,राष्ट्रभाषा के
जश्न में राजभाषा का वरण हुआ!
इन दिनों बैंकों में हिंदी दिवस मनाया जाने लगा है ।आश्चर्य है ॰हिंदुस्तान में हिंदी दिवस !
३६५ दिन हिंदी में कार्य होने चाहिए ।
जयहिंद जयहिंदी

27/02/2025

नहीं बरात दुलह अनुरुपा
विवाह दो आत्माओं का मिलन है,दो अनजाने परिवारों का अन्योनाश्रय संबंध है ,समाज का उत्सव है ,जन्म -जन्मांतर से चली आ रही दो जीवात्माओं के एकिकृत भावना की पूजा है, प्रणय का आधार है,भावी जीवन का मंगल - व्यापार है, सृष्टि की अनचाहत पुकार है। भोगे हुए यथार्थ के शेष संसार का दर्पण होने से इसे जीवन का सबसे मंगल कार्य माना गया है। इसीलिए जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्यों में विवाह की गिनती होती है। शिवरात्रि भगवान शंकर और जगज्जननी अम्बा पार्वती के विवाह का मात्र महापर्व ही नहीं है,अपितु प्रकृति और पुरुष के संयोग का संसार का सबसे उत्तम समन्वय महपर्व है ।
इस महापर्व में मानव -पशु,यक्ष - किन्नर ,ऊंच - नीच,जाति - धर्म ,स्ती - पुरुष सबका परिमित घेरा ध्वस्त हो जाता है ।समाज के हर तबके के लोग पूजे
जाते हैं ।ढोल हो या चुल्हा,तेल बेचने वाले हों या पान बेचने वाले ,वेश्यालय में बेसाहा हुआ मौर दुल्हा अपने माथे पर धारण कर वादशाह बनता है- दुल्हाराजा ।इसलिए ही तो समन्वयकारी होने के साथ -साथ यह मंगलकारी भी है ।
विवाहादि प्रसंग सभी लोकों में मंगलकारक होता है, इसलिए देवता भी इससे बंचित नहीं रहे। यह विवाह उनके लिए भी मंगल कारक है ।सृष्टि में तैंतीस कोटि देवताओं में दो ही देवताओं को विवाह करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । त्रिदेवों में से एक -भगवान शंकर और दूसरे अवतारों में से एक श्री राम प्रभु।
भगवान शंकर का विवाह विवाहा होने के कारण विचित्र विवाह सा लगता है। जगज्जननी जगदंबा तपस्या करती हैं और उस तपस्या में भगवान शंकर के प्रति इतना अनुराग है कि जगज्जननी कहती हैं-
जनम-जनम की रगड़ हमारी।
बरऊँ शम्भू न त रहऊँ कुमारी॥
मन तप में रम गया।यह तपस्या भी लम्बी चली-
संबत सहस मूल फल खाए।
सागु खाई सत बरस गँबाए॥
कछु दिन भोजन बारि बतासा।
और आगे-
बेल पाति महि परइ सुखाई।
तिनि सहस सम्बत सोइ खाई ॥
ऊमहीं नाम तब भयऊ अपर्णा॥
भगवान शंकर उस अनुराग को और बढ़ाना चाहते हैं-
यह उत्सव देखिए भरि लोचन।
लेकिन यह प्रेम ,अनुराग, श्रद्धा एक जन्म का नहीं है। जगदंबा कहती हैं-
तुम्हरे जान काम अब जारा ।अब लगी शंभू रहे सविकारा ॥
हमारे जान सदा शिव जोगी ।अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥
इस विवाह में कितनी मंगल कामना है ! महर्षि नारद कुंडली देखते हैं और लगन स्पष्ट करते हैं ।ब्रह्मा लगन धरते हैं-
सादर मुनिबर लिए बुलाई ॥
सुदिन सुनखत सुघरी सोचाई ।
वेगि वेदबिधि लगन धराई ॥
पत्री सप्त ऋषिन्ह सो दिन्ही।
लग्न पत्री ब्रह्मा को दी गई ।विधिपूर्वक विवाह का मंगल कार्य आरंभ हुआ।सब जगह मंगल ही मंगल। देवता बहुत खुश,सुमनों की वर्षा हुई।
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे ।मंगल कलश दसहुँ दिसि साजे॥
भगवान शिव दूल्हा बने हैं।बारात जाने की तैयारी हो रही है। दशों दिशाओं में मंगल ही मंगल है। वे तो स्वयं ही महामंगल हैं। इस मंगल वेला में बारात जाने के पूर्व दूल्हे का श्रृंगार होता है।खूब सज- धज कर दूल्हा बारात जाता है ।क्योंकि, विवाह तो मंगल कार्य है और एक ही बार होता है ।दूल्हा अपने ससुराल में सब को आकर्षक दिखे, सब को दूल्हा के प्रति आकर्षण हो। इसके लिए तरह-तरह के सजने वाले आते हैं और दूल्हा का साज- शृंगार करते हैं ।यहां भगवान शंकर भी सजाए जा रहे हैं -
सिवहिं संभूगन करहीं सिंगारा ।
जटा मुकुट अहि मौर सँवारा ॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला ।
तन विभूति पट केहरी छाला ॥
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा ।
नयन तीनि उपबीत भुजंगा ॥
गरल कंठ उर नर -सिर माला ॥
असिव वेस शिवधाम कृपाला ॥
कर त्रिशूल अरु डमरू बिराजा ।
चले बसह चढ़ि बाजहिं बाजा ॥
शिवधाम भगवान सदाशिव विवाह करने जा रहे हैं ।दूल्हे का श्रृंगार किया गया है। माथे पर मौर के बदले में बड़ा सा जटा बना है, कान में कुंडल स्वर्ण का नहीं सर्प का पहनाया गया है। सारे शरीर में श्मशान की राख का उबटन लिपटा गया। बाघाम्बर दूल्हे का वस्त्र बना है।बाजा बजे और दूल्हा अपनी पसंदीदा सवारी पालकी नहीं बसहा बैल पर बारात चले। वे सबसे आगे चल रहे हैं और उनका मुख पीछे बारातियों की ओर है ,यानी बैल की पूंछ तरफ वे मूंह किए हुए हैं ।क्या सुंदर दृश्य था!
दूल्हे का यह रूप देवताओं को अच्छा नहीं लगा ।भगवान विष्णु के निर्देश पर सभी देवताओं की जमात अलग हो गई-
विलग विलग होइ चलहु सब सजि सजि अपन समाज।
बारात भगवान शंकर के ससुराल पहुंची ।उधर मैना अम्मा बारात की अगवानी और दूल्हे के परीक्षण के लिए निकलीं । देवताओं ने इनके स्वभाव से अपने को अलग करते हुए अपनी व्यवस्था पहले ही अलग कर ली थी । अलग -अलग तरीके से बारात पहुंची ।
बारात नगर भ्रमण के लिए निकली । मैना अम्मा आरती का थाल लिए परीक्षण हेतु बारात की अगवानी में खड़ी थी ।सबसे पहले ब्रह्मा की सवारी गुजरी। पके -पके बाल चतुर्मुख देखकर अम्मा ने पूछा- यह कौन हैं ।देवर्षि ने बताया- यह दूल्हे के बड़े भाई हैं ।समधी के रूप में बरात में उपस्थित हैं ।मैना अम्बा बहुत खुश हुईं ,जब समधी इतने सुन्दर हैं तो दूल्हा कितना सुन्दर होगा !उनकी सवारी आगे बढ़ी । कई देवताओं की सवारियों को देखकर अम्मा बहुत खुश हुईं ।
दूल्हे की बरात में इतने सुंदर देवगन आए हैं तो दूल्हा कैसा होगा !
हिय हरसे सुर सैन्य निहारी ।
हरिहि देखी अति भये सुखारी ॥
सबसे अंत में दूल्हे के पहले विष्णु की सवारी थी ।उनके सौंदर्य लावण्य पर खुश होते हुए अम्मा ने पूछा- यह कौन हैं ? यहीं वर हो सकते हैं ।देवर्षि ने बताया कि नहीं ,ये वर के भाई हैं। उनकी सवारी आगे बढ़ गई ।
सबसे पीछे भयरव के साथ भूत पिशाच मगन मतवारे की सवारी आई ।उनके बीच में भूत भावन भगवान सदाशिव नावते गाते आ रहे थे। मैना ने अपनी आंखें बंद कर लीं।सखियों ने कहा कि देखो- देखो! कैसा बैल पर चढ़ा हुआ एक राक्षस आ रहा है। मैना ने कहा- नहीं नहीं! अरे बहुत डर लग रहा है ।मैं आंखें नहीं खोलूँगी जब तक यह नहीं जाएगा ।देवर्षि ने उन्हें समझाया -अरे यही तो दूल्हा है ।
सिव समाज जब देखन लागे ।
बिडरी चले सब वाहन त्यागे ॥
अब क्या था -आरती का थाल हाथ से गिर गया और विलाप करती हुई चिल्लाने लगी ।
बच्चे डरकर भाग गए।परिवार के लोगों ने पूछा तो बताया-
कहिय काह कहि जाई न बाता ।
जमकर धार किन्हौं बरियाता ॥
मैना हरदय भयेउ दुख भारी ।
लिन्हि बोलि गिरिस कुमारी ॥
मैना ने अपना फैसला सुना दिया -
तुम सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि परौं।
घर जाउँ अपजस होउ जग जीवत बिवाह न हौं करौं ॥
चाहे जो भी हो ,मैं इस दूल्हे से अपनी लड़की का विवाह नहीं कर सकती।
अम्मा को बिकल देख उमा ने समझाया-
अस विचारि सोंचहिं मति माता।
सो न टरइ जो रचइ बिधाता ॥
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।
दुख सुख जो लिखा लिलार हमरे जाब जँह पाउब तहीं॥
मैना अम्मा मान गईं,बिबाह हो गया ।
इस विवाह में पूजा किसकी हुई-
मुनि अनुशासन गणपति ही पूजेउ शंभु वानी।
फिर लगे होन पुर मंगल गाना ।
कहीं से भी इस विवाह का भौतिक दृश्य मंगल का विधान करता नहीं दिखता ।परन्तु यही तो भूतभावन की मंगलभावना है,मंगलकामना है और यही शिवत्व है ।
अशिव वेस सिव धाम कृपाला -में मंगल कामना है।
जहाँ तक इस बाराता में बारातियों की स्थिति भी अजीव है ।बारात लोग शोभा देखने और सुन्दर भोजन के लिए जाते हैं।इसी व्यबस्था से प्रतिष्ठा प्रभावित होती है ।
सो जेवनार कि जाऐ बकानी।के अनुसार व्यबस्था बहुत ही अच्छी थी ,परंतु
कोउ मुखहीन विपुल मुख काहू -को खाने खिलाने में कितनी परेशानी हुई होगी !
लकिन गोस्वामी जी ने संवार किया है -
विविध पांति बैठी जेवनारा ।
और- लागे परुसन निपुन सुआरा ।
बाराता के बारातियों का स्वागत निपुण सुआरा के सहयोग से हो गया ।
आज शिवरात्रि है । इस अवसर पर मन कर्म वचन से भगवान शंकर के उस रूप को याद करें जिसके शिवत्व से यह संसार प्रकाशित एवं प्रभासित है । - डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी

11/08/2024

बंदऊँ तुलसीदास जी पद ,युगल कमल कर जोर।
जिन्ह बरने रघुवीर जस , भाषा निगम निचोर।।
जयंती पर शत-शत नमन

पता नहीं, कैसा बना है यह लघु ग्रंथ!
09/05/2024

पता नहीं, कैसा बना है यह लघु ग्रंथ!

09/05/2024
अपने मतदान किया, मैंने मतदान किया। अवश्य मतदान करें।
19/04/2024

अपने मतदान किया, मैंने मतदान किया। अवश्य मतदान करें।

I have reached 200 followers! Thank you for your continued support. I could not have done it without each of you. 🙏🤗🎉
10/01/2024

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इकट्ठे सात पुस्तकों का लोकार्पण परम विदुषी भारत साधु समाज की महामंत्री साध्वी प्रज्ञा भारती जी के कर कमलों द्वारा
28/10/2023

इकट्ठे सात पुस्तकों का लोकार्पण परम विदुषी भारत साधु समाज की महामंत्री साध्वी प्रज्ञा भारती जी के कर कमलों द्वारा

12/10/2023

अरुण जी की माता जी के साकेत वास का समाचार सुनकर दुखी हुआ । अरुण जी जैसा पुत्र भगवान सबको दे जो मातृ सेवा की साधना में सिद्ध हो गया हो ।
आपकी मातृ सेवा को नमन !
माता जी का साकेत वास नियति का निर्धारण है । सृष्टि का प्रपंच समझकर इसे स्वीकार करना पड़ता है ।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

30/09/2023

जीवन मरन सुख दुख तब भोगा।
हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा ।।
काल करमबस होंही गोसाईं।
बरबस रात दिवस की नाईं।।
यही होना था सो हुआ। जामता के नहीं रहने का दर्द नस नस में फैल गया ।मेरे तीसरे जामाता जो वाराणसी में स्थापित थे, चेन्नई के ली फोर्ड हॉस्पिटल में 27 जून से रोग मुक्ति की प्रत्याशा में ब्लड कैंसर से जूझ रहे थे, आज ब्रह्म में विलीन हो गए। ऐसी स्थिति में आत्मा की चिर शांति से ज्यादा चिंता बच्चे, उनके द्वारा छोड़े गए परिवार की होती है जो संसार सागर की अथाह गहराई में डूबता उतराता उसे पार करने का प्रयास करता है।
भगवान से प्रार्थना है कि उस आत्मा की चिर शांति हो एवं परिवार को यह असह्य पीड़ा सहन करने की शक्ति दें।

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