18/04/2025
मुद्रिका सिंह की 11वीं पुस्तक "परमेश्वरायण" के विमोचन समारोह.
बिहार राज्य के बहुत प्राचीन भाषा जे जर मगही बोले वालन बेसी,
फिर भी काहे उपेक्षित,
मगही के उ मान दिलावे,
ला करs सबके शिक्षित!,
18/04/2025
मुद्रिका सिंह की 11वीं पुस्तक "परमेश्वरायण" के विमोचन समारोह.
23/09/2024
25/07/2023
https://youtu.be/xoRJ9sFthYA
बांझपन की समस्या पर मन्नत आईवीएफ पटना की निदेशक डा. खुशबू से विशेष बातचीत।
'स्त्री बांझपन एवं पुरूष बांझपन' विषय पर मन्नत आईवीएफ पटना की निदेशक डा. खुशबू से विशेष बातचीत। स्त्री बांझपन और पुरूष बांझपन की समस्या से छुटकारा कैसे मिल सकता है?
24/05/2023
आप भी जानिए रफीगंज प्रखंड में स्थित पचार पहाड़ी के बारे में।
रफीगंज प्रखंड में स्थित पचार पहाड़ी की सैर #thecorner #rafiganj #bihartourism पचार पहाड़ी बिहार में औरंगाबाद जिले में रफीगंज प्रखंड में स्थित है।
11/02/2023
"गर्भवती महिलाओं की देखभाल कैसे करें" विषय पर डा. इंदिरा प्रियदर्शिनी के साथ खास बातचीत। "गर्भवती महिलाओं की देखभाल कैसे करें" विषय पर डा. इंदिरा प्रियदर्शिनी के साथ खास बातचीत। my videos- https://www.youtube.com/watch?v=M2NSQDfdo...
26/01/2023
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आज 26 जनवरी 2023 के अखबारों की सुर्खियां।
23/01/2023
आज के अखबारों की सुर्खियां।
22/01/2023
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शक की सूई
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गाँव पर मेरी माताजी प्रायः रहती हैं । शहरी जीवन उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं। हप्ते भर से अधिक दिनों तक गयाजी के अपने आवास पर नहीं टीक पाती। घर जाने की जिद्द करने लगती हैं और मजबुरन उन्हें गाँव पर छोड़ना पड़ता है। एक ओर गाँव का वातावरण शुद्ध है, तो दूसरी ओर गाँव के लोगो के विचारों में भी शुद्धता है। शहरी लोगों की तरह उनके विचार गन्दे नहीं होते। तभी तो मेरी माताजी को गाँव भाता है और शहर जैसे काटने को दौड़ता है।
दशहरा से ठीक पहले माताजी छोटे भाई के पास दिल्ली गई थी। अब दिल्ली तो दिल्ली ठहरी। वहाँ से माताजी हप्ते दिन में गाँव तो नहीं लौट सकती थी। सो लगातार तीन महीने हो गए, गाँव नहीं आई। गाँव वाले घर की पहरेदारी के नाम पर बस गेट-ग्रील से लेकर दरवाजों में ताले लटके थे। घर से आगे बारी में महताब नींबू लगभग तैयार होने को था। छठ पूजा में व्रतियों के घर माताजी एक-एक महताब नींबू बांटती थी। छठ व्रत क्या दिपावली से पूर्व माताजी ने गाँव आने की जिद्द कर दी। छठ व्रत से पूर्व रेल में बिहार आने वालों की भेड़िया धसान भीड़ जुटती है। रेल टिकट नहीं मिल पाया। सो हार-पार कर दिल्ली टू गयाजी प्लेन का टिकट बुक करना पड़ा।
आने से ठीक दो दिन पूर्व गाँव से बंटाईदार का फोन आया - " दादी घर में चोरी हो गई।" कानों पर विश्वास नहीं हुआ। सच जो था। आजकल तो लोग ऊपर से नीचे तक झूठ के आदि हो गए हैं। बात मुझ तक पहुँची। लगा हो क्या गया ? दादी कहती थी, उनकी याद में अबतक गाँव में चोरी-चमारी नहीं हुआ। और मेरे गाँव में शायद चोरी की यह पहली घटना थी। दिल्ली में छोटे भाई के परिवार के साथ माताजी और इधर मैं अपने परिवार के साथ अंधेरे में तीर बेबजह इधर-उधर मारने लगा।
शक की सूई सबसे पहले उन गरीब मेहनत कश मजदूरों के ऊपर गया, जिन्होंने पिछले महीने घर की रंगाई-पुताई की थी। मुझे लगा, मिहनत करने वाला भला चोरी क्यों करेगा ? नहीं, मेरे दिमाग में भला यह गन्दी बात आई कहाँ से ? बंटाईदार का पूरा परिवार मेरे घर का कोना-कोना झाँकता है, कहीं....? ओह! बेकार की बातें मैं भला सोच कैसे रहा हूँ ? तो ... कहीं गाँव के वे बच्चे तो नहीं जो हर साल महताब नींबू चोरी-चोरी तोड़ कर बर्बाद कर देते हैं। यह भी संभव नहीं है।
मुझे मेरे बचपन की याद आ गई। दूसरे के खेत की ईख की मिठास अपने खेत के ईख से अधिक होती थी। चोरी कर ईख चूसने का मजा कुछ और होता था। अपने खेत के चने की रखवाली और दूसरे के खेत से चना उखाड़ कर खाने का मजा कुछ और था। उनदिनों खेत में मचान गाड़ कर मकई की रखवाली की जाती थी। वहाँ भी दूसरे के खेत के भुट्टे का स्वाद अपने खेत के भुट्टे से अधिक लगता था। वह भी चोरी थी, लेकिन पकड़े जाने पर भी कोई किसी को चोर नहीं कहता था। वह बालपन की शरारतें थी। आज भी बच्चे स्वभाव से शरारती होते हैं।
माताजी दिल्ली से जिस दिन वापस लौटी, गाँव के लोगों की सलाह पर घर में चोरी की लिखित सूचना माताजी के साथ मैंने थाने को दी। इधर कुछ हफ़्तों से थाने के दूसरे अन्य गाँवों में भी चोरी की घटना घट रही थी। थानेदार के ऊपर पुलिस कप्तान का दबाब था कि चोरों की गिरफ्तारी हो। मैंने अपनी ओर से थानेदार के ऊपर कोई दबाब तो नहीं बनाया, पर इतना जरूर कहा- " गाँव की प्रतिष्ठा का सवाल है। हर हाल में चोर पकड़े जाए। वर्ना गाँव की मिट्टी पलीद हो जायेगी। "
थानेदार ने चौबीस घण्टे के अन्दर न केवल चोरों को गिरफ्तार किया, वरन चोरी का माल भी बरामद कर लिया। सबके सब निर्मोछिया चोर। एक जाति के नहीं थे, तीन चोर अलग-अलग जाति के। तब बात समझ में आई, चोरों की एक अपनी जाति होती है, जिसमें जाति और धर्म का बंधन नहीं होता है। चोरों की गिरफ्तारी के बाद गाँव के लोग भी अचंभित थे। लेकिन साँच को आँच क्या ? चोरों ने अपना जुल्म कबूल कर लिया। दूसरे दिन उन्हें बाल सुधार गृह में भेज दिया गया।
तब जाकर मेरे दिमाग से शक की सूई वर्षो से दीवार से टँगी पेंडुलम वाली घड़ी की सूई की तरह स्थिर हो गई। वर्ना ....???
सुमन्त
गयाजी