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21/07/2021
16/07/2021
04/09/2019

18 मई 1974 को उस दिन बुद्ध जयंती थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उस दिन एक फोन का इंतजार कर रही थीं. उनके पास एक वैज्ञानिक का फोन आता है और वह कहते हैं "बुद्ध मुस्कराए". इस संदेश का मतलब था कि भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर दिया है जो सफल रहा. इसके बाद दुनिया में भारत पहला ऐसा देश बन गया था जिसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य न होते हुए भी परमाणु परीक्षण करने का साहस किया है. यह वह दौर था जब भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी चरम पर थी.
70 के इसी दशक में भारत ने पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश बनाने में मदद की थी और अमेरिका का पलड़ा पाकिस्तान के लिए ज्यादा झुका रहता था. इसकी वजह यह भी थी कि अमेरिका सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान के एयरबेस का इस्तेमाल कर रहा था. दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत अब भी गुटनिरपेक्ष देश बना हुआ था. अमेरिका इससे भी नाराज था. वह चाहता था कि भारत उसका हर बात पर समर्थन करे.

इतना ही नहीं चीन भी उस समय भी पाकिस्तान के साथ ही था. यानी पाकिस्तान के समर्थन में उस समय दुनिया दो बड़े देश खड़े थे लेकिन भारत ने इन परिस्थितियों का बहादुरी सामना किया और सुरक्षा को लेकर देश के अंदर भी आवाज उठ रही थी.शक्ति संतुलन के लिए भारत को परमाणु क्षमता हासिल करना बेहद जरूरी हो गया था. लोगों का कहना था कि भारत के पास ये ताकत होगी तो वह दुनिया में सशक्त देशों के बीच आ जाएगा.

PTBT बना राह में रोड़ा
इससे परीक्षण से पहले राह में कई रोड़े आ गए. पहले तो IAEC के चेयरमैन और देश के सबसे बड़े वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का निधन हो गया. उनकी जगह होमी सेठना को लाया गया. लेकिन एक बाधा और आ गई. भारत ने PTBT नाम के एक समझौते पर हस्ताक्षर कर रखा था जिसके मुताबिक कोई भी देश इस समझौते के तहत वातावरण में परमाणु परीक्षण नहीं कर सकता था. समझौते में वातावरण का मतलब आसमान, पानी के अंदर, समुद्र शामिल था. तब भारत ने इस परीक्षण को जमीन के अंदर करने का निर्णय लिया.

किसी को नहीं थी कानों कान खबर
इस पूरे अभियान को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक राजा रमन्ना ने अपनी आत्मकथा 'इयर्स ऑफ पिलग्रिमिज' में लिखा है कि इस पूरे ऑपरेशन के बारे में पीएम इंदिरा गांधी के अलावा, मुख्य सचिव पीएन हक्सर, पीएन धर, वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. नाग चौधरी और एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन एच. एन. सेठना और खुद राजा रमन्ना को ही जानकारी थी. कुछ लोगों का दावा है कि रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम को भी ऑपरेशन सफल होने के बाद ही जानकारी हो पाई थी.

कैसा था बम और कब हुआ विस्फोट
परमाणु बम का व्यास 1.25 मीटर और वजन 1400 किलो था. सेना इसको बालू में छिपाकर लाई थी. सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर यह राजस्थान के पोखरण में विस्फोट किया था. बताया जाता है कि 8 से 10 किमी इलाके में धरती हिल गई

14/03/2019

इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसी लिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख (तथाकथित_सम्प्रदायों)धर्मों का प्रतीक है।अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चलही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वहपूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंनेअनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकरआजादी की लड़ाई में शमिल हो गए।उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलितनहीं हुए और देशकी आजादी तथा डायर को मारनेकी अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिएलगातार काम करते रहे ।

उधमसिंह 13 अप्रैल, 1919 को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे।राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गएलोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीरउधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बागकी मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओडायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा लेली।

अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंहने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी,ब्राजील औरअमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 मेंउधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डरस्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे।वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कारखरीदी और साथ में अपना मिशनपूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वरभी खरीद ली।

भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांडके 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियनसोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल मेंबैठक थी जहां माइकल ओ डायरभी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिनसमय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए।

अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताबमें छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब केपृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससेडायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके ।बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं।दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते।

उधम सिंह ने वहां से भागनेकी कोशिश नहीं की औरअपनी गिरफ्तारी दे दी।उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वहडायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिनउन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाबदिया कि वहां पर कई महिलाएंभी थीं और भारतीयसंस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।

4 जून, 1940को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी देदी गई। इस तरह यहक्रांतिकारी भारतीयस्वाधीनता संग्राम केइतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनका अस्थि कलश भारत को सौंप दिया।

25/10/2018

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