10/11/2021
छठ मूल रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का पर्व है। ये पूरा इलाका वहीं है, जहाँ गौतम बुद्ध घूमा करते थे।
छठ मूल रूप से मनौती का पर्व है। मनौती के लिए ही बौद्ध धर्म में मनौती स्तूप बनाए जाते थे। छठ घाट पर बनी छठ की वेदी मनौती स्तूप से मेल खाती है।
बिहार के सारण क्षेत्र में छठ - वेदी को सिरसौता कहा जाता है। इस सिरसौते का आकार - प्रकार ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि नालंदा, वैशाली समेत अनेक बौद्ध- स्थलों पर बने मनौती स्तूप का होता है।
आश्चर्यजनक रूप से छठ के प्रसाद के रूप में जो ठेकुए या अघरवटा बनाए जाते हैं, उस पर पीपल - पाँत और धम्म चक्र की छाप होती है।
छठ हर हाल में पुरोहित विहीन श्रमण पर्व है।
प्रथम तस्वीर सिरसौता की है और सिरसौते पर चढ़ाया गया चक्र छाप ठेकुए की है।
दूसरी तस्वीर मनौती स्तूप की है, जो सिरसौते से मेल खाती है।
तीसरी तस्वीर एक किताब के पन्ने की है, जिसमें सिरसौता और मनौती स्तूप की तुलना है।
आखिर में छठ का प्रसाद जिस पर पीपल - पाँत तथा चक्र की छाप है।
#त्रिपिटक
23/10/2021
ऑस्ट्रेलिया के एक बौद्ध भिक्षु का इंटरव्यू सुना, पत्रकार भिक्षु से पूछता है कि कोई अगर आपकी पवित्र धार्मिक पुस्तक #त्रिपिटक को फाड़कर शौचालय के कमोड में फेंक दे तब आप क्या करेंगे ?
बौद्ध भिक्षु ने उत्तर दिया कि मैं सबसे पहले प्लम्बर को फोन करूंगा ताकि नाली चोक न हो जाए। इस पर पत्रकार को हंसी आती है।
दूसरा प्रश्न पूछता है कि बामियान में तालिबान द्वारा बुद्ध प्रतिमाएं नष्ट कर दी गईं, इस पर आप क्या कहेंगे ?
बौद्ध भिक्षु ने कहा कि धम्म(धर्म) न तो मूर्तियों में है और न ही प्रेस पर छपी किताबों में है। धम्म हमारे दिलों में और उससे भी आगे हमारे व्यवहार में जब तक जिंदा है तब तक किताबों को फाड़ने से कुछ नहीं होता है,किताब हम दोबारा छपवा लेंगे, मूर्तियां नई बना ली जाएंगी लेकिन अगर हम अपने आचरण और अपने दिलों में धम्म को खो देते हैं और किताबों, मूर्तियों को बचा लेते हैं तो कोई फायदा नहीं है। तब केवल मूर्तियां और किताबें रह जाएंगी, धम्म खो चुका होगा, उसके प्राण खो चुके होंगे।
पूरा इंटरव्यू सुनने लायक है और बाकी के सभी धर्मों हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, यहूदी आदि को इसे समझने की जरूरत है। किसी को भी, किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए लेकिन अपमान यदि कोई करे तब उसे उस देश की कानून व्यवस्था के तहत सजा दिलाओ अन्यथा हमारी धार्मिक किताबों का अपमान हो गया? तो हम सब देश जला देंगे? शास्त्र तो हमें प्रेम और शांति का संदेश देता था? तब हम अपनी किताब की रक्षा के लिए प्रेम और शांति को नष्ट कर देते हैं? क्या आप शांति और प्रेम खोकर उस किताब को बचा लेते हैं, जिसमें प्रेम और शांति का संदेश लिखा था?
02/05/2021
केरल में लेफ्ट ने दर्ज किया ऐतिहासिक जीत
भारत का सबसे साक्षर राज्य केरल बना देश का पहला भाजपा मुक्त राज्य.
केरल ने स्टेचू के जगह अस्पताल को चुना
स्टेडियम के जगह स्कूल को चुना
मन्दिर मस्जिद के बजाय उन्होंने नौकरी देने वाला को चुना
हिन्दू - मुस्लिम तनाव के बजाय उन्होंने शांति को चुना.
केरल ने साबित किया कि जहां सच में जनतंत्र के प्रति साक्षरता हैं वहां ज़ीरो हीरो नहीं बन सकता वो ज़ीरो ही रहता हैं - भारत समेत विश्व को केरल का उपहार दाढ़ी वाला शून्य.
केरल को सलाम
केरल के कॉमरेड्स को सलाम✊
28/04/2021
#बहुत_सुंदर_कहानी_एक_बार_अवश्य_पढ़ें।
8 साल का एक बच्चा 1 रूपये का सिक्का मुट्ठी में लेकर एक दुकान पर जाकर पूछने लगा,
--क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?
दुकानदार ने यह बात सुनकर सिक्का नीचे फेंक दिया और बच्चे को निकाल दिया।
बच्चा पास की दुकान में जाकर 1 रूपये का सिक्का लेकर चुपचाप खड़ा रहा!
-- ए लड़के.. 1 रूपये में तुम क्या चाहते हो?
-- मुझे ईश्वर चाहिए। आपकी दुकान में है?
दूसरे दुकानदार ने भी भगा दिया।
लेकिन, उस अबोध बालक ने हार नहीं मानी। एक दुकान से दूसरी दुकान, दूसरी से तीसरी, ऐसा करते करते कुल चालीस दुकानों के चक्कर काटने के बाद एक बूढ़े दुकानदार के पास पहुंचा। उस बूढ़े दुकानदार ने पूछा,
-- तुम ईश्वर को क्यों खरीदना चाहते हो? क्या करोगे ईश्वर लेकर?
पहली बार एक दुकानदार के मुंह से यह प्रश्न सुनकर बच्चे के चेहरे पर आशा की किरणें लहराईं ৷ लगता है इसी दुकान पर ही ईश्वर मिलेंगे !
बच्चे ने बड़े उत्साह से उत्तर दिया,
----इस दुनिया में मां के अलावा मेरा और कोई नहीं है। मेरी मां दिनभर काम करके मेरे लिए खाना लाती है। मेरी मां अब अस्पताल में हैं। अगर मेरी मां मर गई तो मुझे कौन खिलाएगा ? डाक्टर ने कहा है कि अब सिर्फ ईश्वर ही तुम्हारी मां को बचा सकते हैं। क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?
-- हां, मिलेंगे...! कितने पैसे हैं तुम्हारे पास?
-- सिर्फ एक रूपए।
-- कोई दिक्कत नहीं है। एक रूपए में ही ईश्वर मिल सकते हैं।
दुकानदार बच्चे के हाथ से एक रूपए लेकर उसने पाया कि एक रूपए में एक गिलास पानी के अलावा बेचने के लिए और कुछ भी नहीं है। इसलिए उस बच्चे को फिल्टर से एक गिलास पानी भरकर दिया और कहा, यह पानी पिलाने से ही तुम्हारी मां ठीक हो जाएगी।
अगले दिन कुछ मेडिकल स्पेशलिस्ट उस अस्पताल में गए। बच्चे की मां का आप्रेशन हुआ और बहुत जल्दी ही वह स्वस्थ हो उठीं।
डिस्चार्ज के कागज़ पर अस्पताल का बिल देखकर उस महिला के होश उड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आश्वासन देकर कहा, "टेंशन की कोई बात नहीं है। एक वृद्ध सज्जन ने आपके सारे बिल चुका दिए हैं। साथ में एक चिट्ठी भी दी है"।
महिला चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी, उसमें लिखा था-
"मुझे धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपको तो स्वयं ईश्वर ने ही बचाया है ... मैं तो सिर्फ एक ज़रिया हूं। यदि आप धन्यवाद देना ही चाहती हैं तो अपने अबोध बच्चे को दीजिए जो सिर्फ एक रूपए लेकर नासमझों की तरह ईश्वर को ढूंढने निकल पड़ा। उसके मन में यह दृढ़ विश्वास था कि एकमात्र ईश्वर ही आपको बचा सकते है। विश्वास इसी को ही कहते हैं। ईश्वर को ढूंढने के लिए करोड़ों रुपए दान करने की ज़रूरत नहीं होती, यदि मन में अटूट विश्वास हो तो वे एक रूपए में भी मिल सकते हैं।"