30/05/2026
डॉ. बशीर बद्र से अर्शी शेखूपुरी का तअल्लुक
ज़िला बदायूँ का ऐतिहासिक कस्बा #शेखूपुर अपनी तहज़ीबी, रूहानी और अदबी विरासत के लिए एक खास पहचान रखता है। इस सरज़मीन की बरकत है कि यहाँ बाबा गंजशकर फ़रीद के चश्म-ओ-चिराग़ (वंशज) आज भी आबाद हैं। यही नहीं, मुमताज़ महल की सगी छोटी बहन बेगम परवर ख़ानम का ऐतिहासिक मक़बरा भी शेखूपुर की शान में इज़ाफ़ा करता है। नवाबों की सरज़मीन रहने के साथ-साथ यह कस्बा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की ससुराल भी है। इस कस्बे की मिट्टी ने ऐसे ज़हीन लोग पैदा किए जिन्होंने अपने इल्म और फ़न से बड़े-बड़े ओहदों पर अपनी क़ाबिलियत का लोहा मनवाया। शेखूपुर की इल्मी और अदबी रिवायत भी हमेशा से बेहद समृद्ध रही है। यहाँ के शायरों और अदीबों ने अदब की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
इन्हीं में एक अहम नाम अर्शी शेखूपुरी साहब का है, जिन्हें स्थानीय अदबी हल्कों में बड़े एहतराम से याद किया जाता है। भले ही उन्हें राष्ट्रीय या आलमी स्तर पर बहुत ज़्यादा शोहरत न मिली हो, लेकिन उनकी शायरी ने अपने दौर में गहरा असर छोड़ा। अर्शी साहब का यह शेर ख़ास तौर पर बहुत मक़बूल हुआ:
कफ़न दाबे बग़ल में इसलिए फिरता हूँ मैं अर्शी,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।
यह शेर इंसानी ज़िन्दगी की नापायेदारी और बेयक़ीनी को बेहद असरदार अंदाज़ में बयान करता है। इसके कुछ साल बाद मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का एक शेर ज़बरदस्त लोकप्रिय हुआ, जिसका दूसरा मिसरा हूबहू वही था:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।
चूँकि बशीर बद्र साहब मुल्क के बेहद मक़बूल और मारूफ़ शायर थे, इसलिए यह शेर दूर-दूर तक पहुँचा और लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया।
अदबी हल्कों में इस समानता को लेकर अलग-अलग राय पाई जाती हैं। कुछ अदीबों का मानना है कि बशीर बद्र साहब ने अर्शी शेखूपुरी साहब के मिसरे से इस्तिफ़ादा किया, जबकि कुछ इसे महज़ अदबी इत्तेफ़ाक़ यानी ‘तवाउद’ मानते हैं। उर्दू शायरी में एक ऐसा इत्तेफाक रहता है, जहाँ दो अलग-अलग शायरों के मिसरे एक-दूसरे से टकरा जाते हैं।
एक पहलू यह भी हो सकता है कि बशीर बद्र साहब ने अपने अपने सीनियर शायर के मिसरे को सनद मानकर उस पर गिरह लगाई हो। उर्दू अदब में यह एक पुरानी और क़बूलशुदा रिवायत रही है।
डॉ. बशीर बद्र साहब के इंतिक़ाल के बाद उनका यह मशहूर शेर और उससे जुड़ी शेखूपुर की यह अदबी दास्तान एक बार फिर शिद्दत के साथ याद की जा रही है। वजह जो भी रही हो, लेकिन यह बात तय है कि इस एक मिसरे ने शेखूपुर की अदबी पहचान को दूर तक पहुँचाने में अपनी एक खास भूमिका निभाई है।
Mister Ali