11/04/2026
निजी विद्यालयों पर अनावश्यक आरोप या शिक्षा व्यवस्था पर हमला? सच को समझने की जरूरत है।
आज के समय में कुछ तथाकथित समाजसुधारक, निजी विद्यालयों और उनसे जुड़े शिक्षकों व संचालकों के प्रति अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। यह न केवल अनुचित है, बल्कि हमारे शिक्षा तंत्र पर सीधा आघात भी है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी निजी विद्यालय ने अभिभावकों को मजबूर किया है कि वे अपने बच्चों का नामांकन वहीं कराएं? क्या किसी को डराकर या दबाव डालकर शिक्षा दिलाई जा रही है? नामांकन के समय क्या शुल्क और सुविधाओं की पूरी जानकारी नहीं दी जाती? यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर "नहीं" है, तो फिर यह अनावश्यक विरोध और अपमान क्यों?
निजी विद्यालय केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि अनुशासन, संस्कार और प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण भी प्रदान करते हैं। यदि किसी अभिभावक को शुल्क देने में कठिनाई होती है, तो सरकार द्वारा संचालित निःशुल्क एवं सुविधायुक्त विद्यालयों का विकल्प सदैव उपलब्ध है। वहाँ शिक्षा, भोजन, पुस्तकें और अन्य सुविधाएं भी निःशुल्क दी जाती हैं।
लेकिन जब कुछ अभिभावक पूरे सत्र की पढ़ाई के बाद भी शुल्क का भुगतान नहीं करते और शिक्षकों व विद्यालय प्रबंधन के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तब ये तथाकथित समाजसेवी मौन क्यों हो जाते हैं? यह दोहरी मानसिकता समाज के लिए घातक है।
इसके अतिरिक्त, जब सरकारी व्यवस्थाओं में कमियाँ उजागर होती हैं—चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या अन्य सेवाएं—तब ये आवाजें क्यों नहीं उठतीं? जब बाजार में पुस्तकों के मूल्य असामान्य रूप से बढ़ाए जाते हैं, तब इन मुद्दों पर चुप्पी क्यों साध ली जाती है?
वर्तमान स्थिति यह है कि विद्यालय प्रबंधन, जो सत्र की शुरुआत में बच्चों की शिक्षा और विकास पर ध्यान केंद्रित करता था, अब अपना बहुमूल्य समय भ्रांतियों को दूर करने में व्यतीत कर रहा है। इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों और अभिभावकों को हो रहा है।
यदि इन निरंतर आरोपों और अपमान से आहत होकर सभी निजी विद्यालय बंद करने का निर्णय ले लें, तो क्या ये तथाकथित समाजसुधारक उन हजारों बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठा पाएंगे? क्या प्रशासन इतनी बड़ी व्यवस्था को तुरंत संभाल पाएगा?
यह भी सत्य है कि निजी विद्यालयों के उत्कृष्ट परिणामों से न केवल अभिभावकों, बल्कि पूरे क्षेत्र और प्रशासन का नाम रोशन होता है। शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में उनका योगदान निस्संदेह महत्वपूर्ण है।
अतः सभी अभिभावकों से विनम्र अपील है कि वे किसी के बहकावे में आकर अपने बच्चों के भविष्य के साथ समझौता न करें। तथ्यों को समझें, विवेक से निर्णय लें और शिक्षा के वास्तविक हित में खड़े हों।
आइए, हम सब मिलकर एक सकारात्मक, सम्मानजनक और सशक्त शैक्षिक वातावरण का निर्माण करें।
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आलोक यादव
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