Suhel Akhter Zaidi

Suhel Akhter Zaidi

Share

Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Suhel Akhter Zaidi, Education, 97, bara kuwa, jahanpur, Fatehpur.

Photos 28/04/2017

INDIA & IRAN
ईरान और भारत का सहयोग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण।
ईरान के रक्षामंत्री ने कहा कि तेहरान और नई दिल्ली का सहयोग क्षेत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
ब्रिगेडियर जनरल हुसैन देहक़ान ने बुधवार को मास्को में भारतीय रक्षामंत्री के साथ भेंट में कहा कि ईरान और भारत के बीच कूटनीति, सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग, क्षेत्र के हित में है। उन्होने कहा कि दोनो पक्ष आतंकवाद और अतिवाद से संघर्ष तथा मादक पदार्थों की तस्करी की रोकथाम जैसे विषयों पर सहयोग बढ़ा सकते हैं। ईरान के रक्षामंत्री ने स्पष्ट किया कि रक्षा एवं सुरक्षा के क्षेत्र में दोनो देशों के बीच विस्तृत विस्तार की भूमिका प्रशस्त है।
इसी बीच भारत के रक्षामंत्री ने इस भेंटवार्ता में कहा कि ईरान और भारत की प्राचीन संस्कृति तथा संयुक्त सभ्यता ने दोनो देशों के बीच सहयोग में विस्तार की भूमिका प्रशस्त किया है। इस भेंटवार्ता में दोनो पक्षों के कई अन्य मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।
ज्ञात रहे कि ईरान के रक्षामंत्री ने रूस की राजधानी में, मास्को सुरक्षा कांफ़्रेस से इतर भारत के रक्षामंत्री से भेंटवार्ता की।

Photos from Suhel Akhter Zaidi's post 28/04/2017

तक़लीद के अहकाम

* ( म.न. 1- ) हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि वह ऊसूले दीन को अक़्ल के ज़रिये समझे क्योंकि ऊसूले दीन में किसी भी हालत में तक़लीद नही की जासकती यानी यह नही हो सकता कि कोई इंसान ऊसूले दीन में किसी की बात सिर्फ़ इस लिए माने कि वह ऊसूले दीन को जानता है। लेकिन अगर कोई इंसान इस्लाम के बुनियादी अक़ीदों पर यक़ीन रख़ता हो और उनको ज़ाहिर भी करता हो तो चाहे उसका यह इज़हार उसकी बसीरत की वजह से न हो तब भी वह मुसलमान और मोमिन है। लिहाज़ा इस मुसलमान पर इस्लाम और ईमान के तमाम अहकाम जारी होंगे। लेकिन “मुसल्लमाते दीन”[2] को छोड़ कर दीन के बाक़ी अहकाम में ज़रूरी है कि या तो इंसान ख़ुद मुजतहिद हो, (यानी अहकाम को दलील के ज़रिये ख़ुद हासिल करे) या किसी मुजतहिद की तक़लीद करे या फ़िर एहतियात के ज़रिये इस तरह अमल करे कि उसे यह यक़ीन हासिल हो जाये कि उसने अपनी शरई ज़िम्मेदारी को पूरा कर दिया है। मसलन अगर चन्द मुजतहिद किसी काम को हराम क़रार दें और चन्द दूसरे मुजतहिद कहें कि हराम नही है तो उस काम को अंजाम न दे, और अगर कुछ मुजतहिद किसी काम को वाजिब और कुछ मुसतहब माने तो उस काम को अंजाम दे। लिहाज़ा जो शख़्स न तो ख़ुद मुजतहिद हो और न ही एहतियात पर अमल कर सकता हो उस पर वाजिब है कि किसी मुजतहिद की तक़लीद करे।
(म.न. 2) दीनी अहकाम में तक़लीद का मतलब यह है कि किसी मुजतहिद के फ़तवे पर अमल किया जाये। और यह भी ज़रूरी है कि जिस मुजतहिद की तक़लीद की जाये वह मर्द, आक़िल, बालिग़, शिया इस्ना अशरी, हलाल ज़ादा, ज़िन्दा और आदिल हो। आदिल उस शख़्स को कहा जाता है जो तमाम वाजिब कामों अंजाम देता हो और तमाम हराम कामों को तर्क करता हो और आदिल होने की निशानी यह है कि वह ज़ाहेरन एक अच्छा शख़्स हो और अगर उसके महल्ले वालों या पड़ौसीयो या उसके साथ उठने बैठने वालों से उसके बारे में पूछा जाये तो वह उसकी अचछाई की तसदीक़ करें।
अगर इस बात का थोड़ा सा भी इल्म हो कि दर पेश मसाइल में मुजतहिदों के फ़तवे एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हैं तो ज़रूरी है कि उस मुजतहिद की तक़लीद की जाये जो “आलम” हो यानी अपने ज़माने के दूसरे मुजतहिदों के मुक़ाबले में अहकामें इलाही को समझने की ज़्यादा सलाहियत रख़ता हो। से
(म.न. 3)मुजतहिद और आलम की पहचान के तीन तरीक़े हैं।
क- इंसान ख़ुद साहिबे इल्म हो और मुजतहिद व आलम को पहचान ने की सलाहियत रखता हो।
ख- दो ऐसे शख़्स जो आलिम व आदिल हों और मुजतहिद व आलम के पहचान ने का मलका भी रख़ते हों अगर किसी के आलम व मुजतहिद होने की तस्दीक़ करें इस शर्त के साथ कि दूसरे दो आलिम व आदिल शख़्स उनकी बात की काट न करे। और किसी का आलम व मुजतहिद होना एक क़ाबिले एतेमाद शख़्स की गवाही से भी साबित हो जाता है।
ग- कुछ आलिम अफ़राद (अहले ख़ुबरा) जो मुजतहिद और आलम को पहचान ने की सलाहियत रखते हों, किसी के आलम व मुजतहिद होने की तसदीक़ करें और उनकी तसदीक़ से इंसान मुतमइन हो जाये।
* (म.न. 4) अगर दर पेश मसाइल में दो या दो से ज़्यादा मुजतहिदों के इख़्तलाफ़ी फ़तवे मुख़तसर तौर पर मालूम हों और बाज़ के मुक़ाबिल बाज़ का आलम होना भी इल्म में हो लेकिन अगर आलम की पहचान आसान न हो तो अहवत[3] यह है कि इंसान तमाम मसाइल में उनके फ़तवों जितना हो सके एहतियात करे। (यह मसला बहुत तफ़सीली है और यह इसके बयान का मक़ाम नही है।) और इस ऐसी सूरत में जबकि एहतियात मुमकिन न हो तो ज़रूरी है कि उस मुजतहिद के फ़तवे के मुताबिक़ अमल करे जिसके आलम होने का एहतेमाल दूसरे के मुक़ाबले में ज़्यादा हो। और अगर दोनों के आलम होने का एहतेमाल बराबर है तो फ़िर इख़्तियार है। (जिसके फ़तवे पर चाहे अमल करे।)
(म.न. 5) किसी मुजतहिद के फ़तवे को जान ने के चार तरीक़े हैं।
क- ख़ुद मुजतहिद से उनका फ़तवा सुने।
ख- दो ऐसे आदिल अशख़ास से सुनना जो मुजतहिद का फ़तवा बयान करें।
ग- मुजतहिद के फ़तवे को किसी ऐसे शख़्स से सुनना जिस की बात पर इतमिनान हो।
घ- मुजतहिद की किताब (मसलन तौज़ीहुल मसाइल) में पढ़ना एस शर्त के साथ कि उस किताब के सही होने के बारे में इतमिनान हो।
(म.न. 6) जब तक इंसान को मुजतहिद के फ़तवे के बदले जाने का यक़ीन न हो जाये किताब में लिखे फ़तवे पर अमल कर सकता है और अगर फ़तवे के बदले जाने का एहतेमाल पाया जाता हो तो छान बीन करना ज़रूरी नही है।
(म.न. 7) अगर मुजतहिदे आलम कोई फ़तवा दे तो उनका मुक़ल्लिद[4] इस मसले के बारे में किसी दूसरे मुजतहिद के फ़तवे पर अमल नही कर सकता। जब तक वह मुजतहिदेव आलम फ़तवा न दे बल्कि यह न कहे कि एहतियात इसमें है कि यूँ अमल किया जाये मसलन एहतियात[5] इसमें है कि नमाज़ की पहली और दूसरी रकअत में सूरए अलहम्द के बाद एक और पूरी सूरत पढ़े, तो मुक़ल्लिद को चाहिए कि या तो इस एहतियात पर जिसे एहतियाते वाजिब[6] कहते है अमल करे या किसी दूसरे ऐसे मुजतहिद के फ़तवे पर अमल करे जिसकी तक़लीद जायज़ हो। बस अगर वह (दूसरा मुजतहिद) फ़क़त सूरए अलहम्द को काफ़ी समझता है हो तो दूसरे सूरह को छोड़ सकता है। जब मुजतहिदे आलम किसी मसले के बारे में कहे कि महल्ले ताम्मुल[7] या महल्ले इशकाल[8] है तो उसका हुक्म भी यही है।
(म.न. 8) अगर मुजतहिदे आलम किसी मसले के बारे में फ़तवा देने के बाद या इस से पहले एहतियात लगाये मसलन यह कहे कि नजिस बरतन कुर पीनी में एक मर्तबा धोने से पाक हो जाता है अगरचे एहतियात यह है कि तीन बार धोया जाये तो मुक़ल्लिद ऐसी एहतियात को छोड़ सकता है। इस क़िस्म की एहतियात को एहतियाते मुस्तहब[9] कहते हैं।
* (म.न. 9)इंसान जिस मुजतहिद की तक़लीद करता है अगर वह मर जाये तो जो हुक्म उसकी ज़िन्दगी में था वही हुक्म उसके मरने के बाद भी है। इस बिना पर अगर मरहूम मुजतहिद, ज़िन्दा मुजतहिद के मुक़ाबिल में आलम था तो वह शख़्स जिसे दर पेश मसाइल में दोनों मुजतहिदों के दरमियान के इख़तलाफ़ का अगर इजमाली तौर पर भी इल्म हो तो उसके लिए ज़रूरी है कि मरहूम मुजतहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहे। और अगर ज़िन्दा मुजतहिद आलम हो तो फिर जिन्दा मुजतहिद की तरफ़ रुजूअ करना जरूरी है। इस मसले में तक़लीद से मुराद मुऐयन मुजतहिद के फ़तवे की पैरवी करने (क़स्दे रुजूअ) को सिर्फ़ अपने लिए लाज़िम क़रार देना है न कि उसके हुक्म के मुताबिक़ अमल करना।
(म.न. 10) अगर कोई शख़्स किसी मसले में एक मुजतहिद के फ़तवे पर अमल करे, फिर उस मुजतहिद के मर जाने के बाद वह उसी में ज़िन्दा मुजतहिद के फ़तवे पर अमल कर ले तो अब उसे इस बात की इजाज़त नही है कि वह दुबारा मरहूम मुजतहिद के फ़तवे पर अमल करे।
(म.न. 11) जो मसाइल इंसान को अक्सर पेश आते हैं उनको याद करना वाजिब है।
* (म.न. 12) अगर किसी शख़्स के सामने कोई ऐल़सा मसला पेश आजाये जिसका हुक्म उसे मालूम न हो तो उसके लिए लाज़िम है कि एहतियात करे या उन शर्तों के साथ तक़लीद करे जिन ज़िक्र ऊपर हो चुका है। लेकिन अगर उसे इस मसले में आलम के फ़तवे का इल्म न हो और आलम व ग़ैरे आलम की राय के मुख़्तलिफ़ होने का थोड़ा इल्म भी हो तो ग़ैरे आलम की तक़लीद जायज़ है।
*(म.न. 13) अगर कोई शख़्स किसी मुजतहिद का फ़तवा किसी दूसरे शख़्स को बताये और इसके बाद मुजतहिद अपने फ़तवे को बदल दे तो उसके लिए ज़रूरी नही है कि वह उस शख़्स को फ़तवे के बदले जाने के बारे में आगाह करे। लेकिन अगर फ़तवा बताने के बाद यह महसूस करे कि (शायद फ़तवा बताने में) ग़लती हो गई है और अगर इस बात का अंदेशा हो कि इस इत्तला की बिना पर वह शख़्स अपनी शरई ज़िम्मेदारी के ख़िलाफ़ अमल अंजाम देगा तो एहतियाते लाज़िम[10] की बिना पर जहाँ तक हो सके उस ग़लती को दूर करे। तो
(म.न. 14) अगर कोई मुकल्लफ़[11] एक मुद्दत तक किसी की तक़लीद किये बिना आमाल अंजाम देता रहे लेकिन बाद में किसी मुजतहिद की तक़लीद कर ले तो इस सूरत में अगर मुजतहिद उसके गुज़िश्ता आमाल के बारे में हुक्म लगाये कि वह सही है तो वह सही तसव्वुर किये जायेंगे वरना बातिल शुमार होंगे।
[1] किसी मुजतहिद के फ़तवे पर अमल करना।
[2] वह ज़रूरी और क़तई अमूर जो दीने इस्लाम के ऐसे जुज़ हैं जिनको अलग नही किया जाकता और जिन्हे तमाम मुसलमान दीन का लीज़मी जुज़ मानते हैं जैसे नमाज़, रोज़े का फ़र्ज़ और उनका वाजिब होना। इन अमूर को ज़रूरियाते दीन और क़तईयाते दीन भी कहते है। क्योंकि यह वह अमूर हैं जिनका तस्लीम करना दायर-ए- इस्लाम में रहने के लिए ज़रूरी है।

26/04/2017

SHIA in INDIA
हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की वफात (६३२ AD) के बाद मुसलमानों में खिलाफत या इमामत या लीडर कौन इस बात पे मतभेद हुआ और कुछ मुसलमानों ने तुरंत हजरत अबुबक्र (632-634 AD) को खलीफा बना के एलान कर दिया | इधर हजरत अली (अ.स०) जो हजरत मुहम्मद (स.व) को दफन करने में लगे थे उन्हें कुछ पता ही नहीं चला | हजरत अली (अ.स) का शुमार हजरत मुहम्मद (स.व) के घरवालों में हुआ करता था क्यूँ की वो हजरत मुहम्मद (स.व) के दमाद भी थे और रिश्तेदार भी |

मुसलमानों के एक हिस्से ने हजरत अबुबक्र की खिलाफत को नहीं माना क्यूंकि उनका कहना था की इन्तेकाल (June 8, 632 AD) के ७५ -90 दिन पहले हज से लौटते वक़्त ग़दीर (10 March 632 CE) के मैदान में हजरत मुहम्मद (स.व) ने हजरत अली के खलीफा होने का एलान अल्लाह की मर्जी के साथ कर दिया था जिसे उस समय सबने माना भी था |

और इसी के साथ मुसलमानों में खिलाफत के मसले में दो हिस्सा हो गया जबकि शरीयत एक ही रही और किताब एक ही रही | हजरत अली (अ.स).की खिलाफत जिन्होंने मानी उन्हें अली का शिया कहा गया | इसी प्रकार से तीन खलीफा हजरत अबुबक्र की खिलाफत को मानने वालों ने बनाए लेकिन अंत में दुनिया के सभी मुसलमानों को लगा की हजरत अली (अ .स) से बेहतर कोई खलीफा संभव नहीं और उन्हें खलीफा बना दिया |

यहाँ तक मुसलमानों में कोई टकराव नहीं था और अंत में हजरत अली के खलीफा (656-661 AD) बनते ही खिलाफत का मतभेद भी ख़त्म हो चुका था | चार साल की खिलाफत के दौरान हजरत अली (अ.स ) को मुआव्विया की बगावत को सहन करना पडा और मुआव्विया से जंग भी करनी पडी |

यहाँ इसी के दौरान मुआव्विया ने हजरत अली (अस) को साज़िश के साथ हटवा के खुद के खलीफा होने का एलान शाम से कर दिया जिसे मुसलमानो ने नहीं माना लेकिन सत्ता की ताक़त और मुआविया के खौफ से लोग चुप रहे |

हजरत अली (अ.स ) (January 27, 661 AD) की शहादत के बाद मुआव्विया आज़ाद हो गया और अली के चाहने वालों पे उसका ज़ुल्म बढ़ गया |

यह ६६१ AD का दौर था जहां से शियों पे ज़ुल्म खुल के होने लगा और शिया अन्य देशों की तरफ पलायन करने पे मजबूर होने लगे | यहाँ से मुसलमानों में टकराव शुरू हो गया और हजरत अली के चाहने वालों पे ज़ुल्म किया जाने लगा और यही वो दौर था (६६१-६८० AD ) का जब हजरत अली के चाहने वालों ने भारतवर्ष और अन्य देशों का रुख किया | लेकिन अभी भी यह तादात इतनी कम थी की इतिहासकारों ने इसे इतनी अहमियत नहीं दी |

यहाँ यह बता देना न्यायसंगत होगा की हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के समय से ही व्यापार करने मुसलमान भारत आया जाया करते थे और उनमे से कुछ ऐसे भी थे जो यहीं बस जाते थे इसलिए मुस्लिम का यहाँ आना हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के समय से ही था इसमें कोई शक नहीं | 694 AD में हज्जाज इब्ने युसूफ ने सिंध पे हमला किया |

यहाँ यह बताना आवश्यक इसलिए हुआ क्यूँ की भारत में मुसलमानों के आने का कारण यहाँ व्यापार के अच्छे अवसरों के कारण था जो हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के समय से ही चल रहा था और यह अक्सर समुद्री किनारों की तरफ हुआ करता था |

लेकिन शिया जो भारत आते थे यह अपनी पहचान छुपाते हुए वहाँ से भारत किसी महफूज़ जगह की तलाश में आया करते थे | जो अक्सर या तो उन शासकों के बीच अपनी पहचान छुपा के रह जाते या भारत में नए इलाके बसा लेते जहां उन्हें लगता की वो अपनी सही पहचान के साथ आजादी से रह सकते हैं |

मुआव्विया की खिलाफत में हजरत अली (अ.स) को नमाज़ की हालत में तलवार के वार से और उनके बेटे और हजरत मुहम्मद (स.अ.व. ) के नवासे इमाम हसन (अ.स). को ज़हर दे के मरवा दिया गया | मुआव्विया की म्रत्यु के दौरान उसके बेटे यजीद ने हजरत मुहम्मद (स.व) के नवासे और हजरत अली के बेटे इमाम हुसैन (अ.स ) को कर्बला में भूखा प्यासा शहीद किया और उनके भाई मुस्लिम को कूफा में शहीद कर दिया गया |

जिसके कारण वहाँ से शिया अन्य शहरों की तरफ जाने लगे और जहां भी जाते अपनी पहचान छुपाते थे की वो हजरत अली (अ .स ) के चाहने वाले हैं हजरत मुहम्मद (स.व) के चाहने वाले हैं |

शिया मुसलमानों का मानना है की जब इमाम हुसैन को कर्बला में (६८० AD ) परिवार के साथ घेर लिया गया तो इमाम ने कहा की लोगों मुझे हिन्दुस्तान जाने की इजाज़त दे दो क्यूँ की वहाँ इस्लाम के नाम पे ज़ुल्म करने वाले और इस्लाम को बदनाम करने वाले लोग नहीं मिलते लेकिन इंसान मिलते हैं | यही कारण है की आज भारतवर्ष में इरान के बाद विश्व के सबसे अधिक शिया पाय जाते हैं |

सातवीं सदी से मुसलमान दो हिस्से में बाँट गए | एक शिया (शिया-सुन्नी ) जो अह्लेबय्त के मानने वाले थे और दुसरे सुन्नी जो मुआविया से साथ थे और आठवी सदी सूफी के नाम रही |

इसी प्रकार शिया इराक से इरान , अफगानिस्तान और भारत की तरफ आने लगे लेकिन अधिकतर शिया वहीँ इराक इत्यादि शहरों में अपनी पहचान छुपाते रहते थे और शियों के छटे इमाम जाफ़र ऐ सादिक अ.स.( 765) का दौर आते आते शिया भी चार अलग अलग हिस्सों में बट गए लेकिन चारों हजरत अली और इमाम हुसैन के चाहने वाले थे | इन चारों में कुछ शिया जैदी कहलाये कुछ इमामी कुछ इस्मैली और कुछ इशना अशरी (१२ इमाम वाले ) कहलाये जिनमे से उस दौर में ( 893) जैदी शिया ताक़तवर हुए और यमन में सत्ता पे काबिज़ हो गए और उसके बाद इस्माइली ताक़त में आये जिन्होंने भारतवर्ष के समुंद्री किनारों की तरफ रुख किया और सिंध ,गुजरात के तरफ बस गए |

इस प्रकार शिया सबसे पहले भारत में सिंध ,गुजरात और दछिन की तरफ आये लेकिन यह शिया उन शियों से अलग थे जिन्हें हम आज शिया कहते हैं या जो आज संख्या में अधिक हैं | आज के शिया जो सबसे अधिक संख्या में हैं वो १२ इमाम (अ.स ) को मानने वाले हैं|

आज जो शिया है उनमे बड़ी जमात (इस्माइली ), छोटी जमात (शिया इशना अशरी ) जिन्हें खोजा कहते हैं और बोहरा शिया गुजरात और महारष्ट्र में बसे हैं और बाकी जो शिया है वो शिया इशना अशरी हैं जिनकी तादात कुछ साउथ, काश्मीर और सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में है |

११वीन सदी से पहले आये शिया काश्मीर, हैदराबाद, सिंध और गुजरात में बसे हैं क्यूँ की यही से इनका भारत में आना शुरू हुआ |

इसी के बाद ११वीन से १६वीन सदी के बीच हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घराने वाले जिन्हें सय्यद कहा जाता है अपने चाहने वालों के साथ साथ भारत का रुख तेज़ी से करने लगे और यहाँ के शांत स्वभाव के हिन्दुओं के बीच रहने लगे |

इस प्रकार देखा जाय तो धीरे धीरे ६८० AD से शिया मुसलमानो और सय्यद का आगमन सिंध ,दछिन भारत ,गुजरात और काश्मीर में पहले हुआ और उसके बाद उत्तर भारत में आने लगे | कुतुब्बुदीन हिंदल जो काश्मीर की सत्ता का चौथा वारिस था उसके समय में सूफी और सय्यद कश्मीर की तरफ अधिक संख्या में आये और धीरे धीरे ताक़तवर होने लगे|

1015 AD -1032 AD में सय्यद सलार दावूद गाजी और उनके भाई सय्यद सलार मसूद गाजी आये उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का रुख किया | बहराइच , बनारस ,गाजीपुर इत्यादि जगहों पे इनके साथ आये मुसलमान बस गए | यह बाराबंकी से जैदपुर और गाजीपुर के इलाकों तक आने जाने लगे | इस समय के बाद आने वाले मुसलमान केवल शिया नहीं थे बल्कि अन्य मुसलमान भी थे |

पूरी दुनिया में मुसलमानों का प्रतिशत उनके सेक्ट के अनुसार लगभग इस प्रकार है :-

हनफी सुन्नी मुस्लिम ३५%
शाफ़ई सुन्नी मुस्लिम २५%
शिया मुस्लिम २०%
मालिकी सुन्नी मुस्लिम १५%
हम्बली ४%

इस प्रकार से मुसलमानों के भारत आने का सिल सिला चलने लगा लेकिन अब तक शिया भी कुछ जगहों में ताक़तवर होने लगे थे | जहां शिया सत्ता में थे वहाँ वे अपनी पहचान को ज़ाहिर करने लगे और अधिक संख्या में वहाँ जा के रहने लगे |

कुछ जगहों में शिया सत्ता में काबिज़ रहे जिनमे से मुख्यतया यह नाम हैं |

*Bahmani Sultanate (1347–1527 AD)
*Sharqi Dynasty (1394 CE to 1479 CE)
*Berar Sultanate (1490-1572 AD)
*Bidar Sultanate (1489-1619 AD)
*Qutb Shahi dynasty (1518–1687 AD)
*Adil Shahi dynasty (1527–1686 AD)
*Nawab of Awadh (1722-1858 AD)
*Najafi Nawabs of Bengal (1757–1880)
*Nawab of Rampur
*Nizams of Hyderabad State(1724–1948 AD)

लेकिन अभी भी शिया मुगलों के बीच अपनी पहचान छुपा के रहते थे और अच्छी पदवी पे रहा करते थे जैसे अकबर के नव रत्न में से ४ शिया थे | मुमताज़ महल ने हमेशा शिया को सहयोग दिया लेकिन औरंगजेब का दौर आते आते जहां मुग़ल सत्ता में थे शिया क़त्ल किये गए जिनमे से काजी नूरुल्लाह शुस्त्री (१५४९ AD ) आगरा में और सय्यद राजू जावरा में मुख्या हैं | इतिहास की किताबों में शिया को क़त्ल किये जाने वाले वर्ष "ताराज ऐ शिया " के नाम से दस वर्ष दर्ज हैं जिनमे 1548, 1585, 1635, 1686, 1719, 1741, 1762, 1801, 1830, 1872 मुख्या है |

1030 AD में सय्यद सलार दावूद गाजी और उनके भाई सय्यद सलार मसूद गाजी आये जिन्होंने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ,बहराइच,जैदपुर से ले के बनारस तक अपना वजूद कायम रखा | इसी दौरान बहुत से शिया यहाँ से जायस, जैदपुर ,मोहान ,गाजीपुर और आस पास के इलाकों में फैलने लगे |

फिर धीरे धीरे शिया उत्तर भारत की तरफ उन शहरों की तरफ आने लगे जहां सत्ता में शिया समुदाय के लिए नरमी रखने वाले बादशाह थे या शिया और हिन्दू बादशाह थे | इनमे से अवध और शार्की राज्य मुख्य हैं | धीरे धीरे भारत में जैदी ,इस्माइली इत्यादि मुसलमान शिया इशना अशरी (१२ इमाम वाले ) होने लगे और इनकी पहचान अज़ादारी और हुसैन का ग़म मनाने वालों से होने लगी | मुहर्रम मनाने में हिन्दू राजाओं और जनता का सहयोग यहाँ बसे शियों को अधिक मिला क्यूँ की शिया समुदाय के लोग वर्षों से जालिमो के सताए हुए थे और अमन पसंद थे इसी लिए हिन्दुओं ने उन्हें गले लगाया और अज़ादारी हुसैन के के लिए सहयोग करने लगे | विजयनगर हो या झांसी की रानी हो सबने हजरत मुहम्मद s.अ.व. के नवासे हुसैन का ग़म मुहर्रम में मनाया और यही वो समय था जब शिया धीरे धीरे आज़ाद हो के अपनी पहचान को बताने लगे जिनमे से अधिक सूफी और सय्यद थे |

सबसे अधिक शिया या तो १०३० AD में सय्यद सलार मसूद गाजी के साथ या फिर १३९८ AD में तैमूर लंग के हमले के बाद इरान ,अफगानिस्तान होते हुए भारत आये | तैमूर लंग ने पहली बार ताजिया रखा जो इमाम हुसैन (अ.स ) के रौज़े की नकल था |

शार्की (१३९४ AD ) जो सबसे अधिक अमन पसंद थे और शिया थे उनका तरीका यह था की शिया हो या सुन्नी ज्ञानियों की इज्ज़त करते थे इसलिए शिया आस पास के इलाकों से शार्की राज्य में आ के बसने लगे |

चंगेज़ खान (1221 AD ) के भारत आने के समय उसके साथ बहुत से सय्यद शिया इरान से आये जो अक्सर सूफी और ज्ञानी हुआ करते थे और वे दिल्ली लाहौर से होते हुए बहराइच (जरवल) और बाराबंकी की तरफ बस गए |

इधर सय्यद और शिया अवध , शार्की राज्य और आस पास के इलाके में आजादी से रहने लगे थे तो उधर गुजरात में सुलतान महमूद बेघ्डा (1458 -1511) द्वारा सय्यदों को बुला के उन्हें उच्च पद और जागीर दे के बसाया जा रहा था | ये सय्यद अधिकतर अपने को शिराज़ी , बुखारी ,नकवी, जैदी,कादिरी ,चिस्ती इत्यादि लिखा करते थे

और जो अमन पसंद शिया तैमूर लंग के हमले से परेशान थे और उन्होंने शार्की की शोहरत सुनी तो शार्की राज्य में आ के बसने लगे |

जौनपुर में सय्यद ,सूफी शिया अधिक तादात में आये जिन्हें शार्की राज्य में काफी इज्ज़त भी मिली और जागीर भी मिली | 1394 -1479 तक शार्की राज्य में शिया बहुत सुख के साथ रहे और यदि गिनती की जाय तो यहाँ एक समय में १४०० से अधिक ज्ञानियों की पालकी निकला करती थी और इन्ही सूफियों की क़ब्रों के कारण जौनपुर शहर को अक्सर लोग क़ब्रों का शहर भी कह देते हैं | यह सूफी और सय्यद जौनपुर ,कन्नोज से लेके बिहार तक शार्की राज्य में फैले थे जिसमे से सबसे अधिक जौनपुर में बसे थे |

बहलोल लोधी ने जौनपुर को तहस नहस कर डाला और खंडहरों में बदल दिया और इसे बाद में सिकंदर लोधी ने दिल्ली में मिला लिया |

शिया समुदाय के लिए फिर से मुश्किल का समय आ गया था जब भारत में कहीं उन्हें इज्ज़त मिलती थी और कहीं मुगलों द्वारा उन्हें मारा जाता था | उसके बाद जब अँगरेज़ राज्य आया तो शिया समुदाय खुशहाल होना शुरू हो गया और वो आजादी के साथ मुहर्रम में हजरत मुहम्मद (स अव ) के नवासे इमाम हुसैन (अ.स ) का ग़म मना सकते थे और १० मुहर्रम को छुट्टी का दिन एलान होने लगा था जो आज तक है | भारत वर्ष के आज़ाद होने के बाद से तो भारतवर्ष पूरी दुनिया के मुकाबले वो देश है जहां शिया समुदाय सबसे अधिक आज़ाद है और अपने धर्म के अनुसार आजादी से जी सकता है | पूरी दुनिया के लोगों में शिया समुदाय १०-१३% है और पूरी दुनिया में सबसे अधिक शिया इरान में हैं और उसके बाद भारतवर्ष में है | यदि BBC का यकीन किया जाय तो कम से कम ४५ मिलियन शिया भारतवर्ष में आज रहते हैं जो भारत की जनसँख्या का ४-५% है | यदि मुस्लिम समुदाय की बात की जाय तो सारे मुसलमानों का २५ से ३१% (2005–2006) शिया हैं जिनमे से सय्यद केवल १०% ही रह गए हैं |

उत्तर प्रदेश में आज लखनऊ के बाद सबसे अधिक शिया जौनपुर में रहा करते हैं और शार्की समय में जैसा था की सारे शिया -सुन्नी मुसलमान और हिन्दू यहाँ आपस में मिल जुल के भाईचारे से रहते थे वैसे ही आज भी रहा करते हैं | ये दुःख की बात है की जब भारत में शिया के आगमन की बात होती है तो जौनपुर को लोग याद नहीं करते जबकि बिना जौनपुर और शार्की राज्य में शिया आबादी के ज़िक्र के यह इतिहास अधूरा ही नहीं ग़लत भी कहलायगा |

शिया समुदाय को हजरत अली (अ.स ) और हजरत मुहम्मद (स अ व ) को मानने उनके पदचिन्हों पे चलने और उनके रौज़े बनाने के कारण मुसलमानों के एक छोटे से हिस्से द्वारा हमेशा परेशान किया गया | शिया मुसलमान अमन पसंद होता है और अन्यधर्म के लोगों के साथ मिल जुल के चलने में विश्वास रखता है क्यूँ की शियों के इमाम हजरत अली (अ.s) का कहना था की दुनिया के सारे इंसान हमारे इंसानियत के रिश्ते से भाई हैं |

अधिकतर सुन्नी हमेशा से शियों के साथ मिल जुल के रहे और आज भी रहते हैं और संत ,सूफी ,इमाम के रौज़े में जाया करते हैं उर्स लगाते हैं लेकिन एक सेक्ट मुसलमानों में ऐसा है जो इस रौज़े बनाने के खिलाफ है और उनसे आज भी शिया समुदाय को खतरा बना रहता है |

शिया समुदाय का मानना है की दुनिया में जो भी नेक लोग आये ,जिन्होंने समाज के भले के लिए काम किया उनकी याद को हमेशा जीवित रखो इसीलिये शिया नेक लोगों के काम को जिंदा रखने के लिए उनकी म्रत्यु के बाद रौज़े और मजारें बना लेते हैं और उनपे अकीदत के फूल चढाने आया जाया करते हैं | शिया समुदाय के साथ साथ यही सोंच ९०% सुन्नी मुसलमानों में भी है इसीलिये यह आपस में मिल के रहते हैं और उनसे मतभेद रखते है जो मुसलमान रौज़े और मजारों के खिलाफ हैं | इसी लिए भारतवर्ष में सबसे अधिक इमामबाड़े ,रौज़े, मजारें उस समय बनी जब शिया आजादी से अपनी पहचान बताने लगे | सबसे अधिक इमाम बाड़े, रौज़े या तो नवाबों के समय में बने या शार्की राज्य में बने और बहुत से इमाम बाड़े तुगलक़ समय में बने हैं |

लेखक ..एस एम् मासूम

Photos 25/04/2017

इमामे ज़माना के तीसरे नायिब(प्रतिनिधि) हुसैन पुत्र रूह नोबख्ती के समय मे शेख सदूक़ के पिता अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी बग़दाद गये। क्योंकि उनके कोई संतान नही थी इस लिए उन्हेने इमाम को एक पत्र लिखा जिसमे मे पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। यह पत्र उन्होने हुसैन पुत्र रोह को दिया और कहा कि आप जब इमाम की सेवा मे जाना तो मेरा यह पत्र भी इमाम की सेवा मे प्रस्तुत कर देना। इसके बाद उनको इमाम का उत्तर प्राप्त हुआ कि हमने तुम्हारे लिए दुआ कर दी है अल्लाह शीघ्र ही तुमको दो पवित्र पुत्र प्रदान करेगा।
सन्311हिजरी क़मरी मे इमाम की दुआ के फल स्वरूप शेख सदूक़ का जन्म हुआ। शेख सदूक़ ने स्वयं अपनी किताब कमालुद्दीन मे इस बात का उल्लेख किया है।
शेख सदूक़ के व्यक्तित्व पर एक दृष्टि

शेख सदूक़ एक शिक्षित परिवार मे पैदा हुए थे।शेख सदूक़ के पिता क़ुम के उच्च कोटी के विद्वान थे। शेख सदूक़ के अनुसार उन्होने200से अधिक किताबे लिखीं। शेख सदूक़ ने प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद क़ुम के महान फ़कीहो व मुहद्दिसों से हदीस व फ़िक्ह का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होने इस ज्ञान की प्राप्ति हेहू अपने पिता अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी, मुहम्मद पुत्र हसन पुत्र वलीद, अहमद पुत्र अली पुत्र इब्राहीम क़ुम्मी,हुसैन पुत्र इदरीस क़ुम्मी व इत्यादि से ज्ञान लाभ प्राप्त किया।
बोया वंश के शासन काल मे उन्होने शिया बाहुल्य़ स्थानो का भ्रमन किया। शेख सदूक़347हिजरी क़मरी मे रै नामक स्थान पर अबुल हसन मुहम्मद पुत्र अहमद पुत्र अली असदी से जो इब्ने जुरादाह बरदई के नाम से प्रसिद्ध थे हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। 352हिजरी क़मरी मे उन्होने नेशापुर मे अबु अली हुसैन पुत्र अहमद बहीक़ी, अबदुर्रहमान मुहम्मद पुत्र अबदूस से भी हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। इसी प्रकार उन्होने मरू नामक स्थान पर अबुल हसन मुहम्मद पुत्र अली पुत्र फ़कीह,अबू यूसुफ़ राफ़े पुत्र अब्दुल्लाह,से भी हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। अबु यूसुफ़ राफ़े वह महान व्यक्ति हैं जिन्होने कूफ़ा,मक्का,बग़दाद,बलख व सरखस मे हदीसो को सुना था। ज्ञानीयो के लिए भ्रमन एक साधारण कार्य है। शेख सदूक़ के समय मे शिया एक सीमा तक स्वतन्त्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे। इसी कारण उन्होने ने सुन्नी बाहुल्य स्थानो की भी यात्राऐं की तथा शिया सम्प्रदाय को बातिल मानने वालों के सम्मुख शिया सम्प्रदाय की वास्तविक्ता को उजागर किया। उन्होने शिया सम्प्रदाय के ज्ञान, फ़िक्ह, हदीस,को प्रकाशित किया। तथा इस प्रकार शिया सम्प्रदाय के उत्थान व विकास मे महत्वपूर्ण योगदान किया।
उनका ज्ञान व अध्यात्म के क्षेत्र मे इतना उच्चय स्थान था कि फ़कीहे अज़ीमुश्शानी, व बहरूल उलूम जैसे शिया विद्वानो व फ़कीहो ने रईसुल मुहद्देसीन जैसी उपाधी के साथ उनका वर्णन किया है।
शेख सदूक़ शिया विद्वानो की दृष्टि मे

1- शेख तूसी उनके सम्बन्ध मे कहते हैं कि शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा एक उच्चय कोटी के विद्वान, व हाफ़िज़े हदीस थे। उन्होने लगभग 300 किताबें लिखी। ज्ञान व हिफ़ज़े हदीस के क्षेत्र मे पूरे क़ुम मे कोई उन से बढ़ कर न था।
2- मुहम्मद पुत्र इदरीस हिल्ली उनके सम्बन्ध मे लिखते हैं कि शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा एक विशवसनीय विद्वान, अखबार ( रिवायात)के विशेषज्ञ, इल्मे रिजाल के महान ज्ञानी व हदीस के हाफ़िज़ थे।
3-अल्लामा बहरूल उलूम उनके सम्बन्ध मे लिखते हैं कि अबूजाफ़र मुहम्मद पुत्र अली पुत्र हुसैन पुत्र मूसा पुत्र बाबवे क़ुम्मी शियों के पेशवाओं मे से एक पेशवा व शरीअत के सतूनो मे से एक सतून(स्तंभ) हैं।वह मुहद्देसीन के सरदार हैं ।व जो कथन उन्होने आइम्मा ए सादेक़ीन से हमारी ओर परिवर्तित किये हैं वह उन मे सच्चे हैं। वह इमामे ज़माना की दुआ से पैदा हुए थे। इस प्रकार उनको यह श्रेष्ठता प्राप्त हुई।
शेख सदूक़ के असातेज़ा (गुरूजन)

मरहूम शेख अब्दुर्ऱहीम रब्बानी शीराज़ी ने शेख सदूक़ के जिन गुरूओं का वर्णन किया है उनमे से मुख्य इस प्रकार हैँ।
1-अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी
2-मुहम्मद पुत्र हसन वलीद क़ुम्मी
3-अहमद पुत्र अली पुत्र इब्राहीम
4-अली पुत्र मुहम्मद क़ज़वीनी
5-जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र शाज़ान
6-जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र क़लवीय क़ुम्मी
7-अली पुत्र अहमद पुत्र मेहरयार
8-अबुल हसन खयूती
9-अबू जाफ़र मुहम्मद पुत्र अली पुत्र असवद
10-अबू जाफ़र मुहम्मद पुत्र याक़ूब कुलैनी
11अहमद पुत्र ज़ियाद पुत्र जाफ़र हमदानी
12-अली पुत्र अहमद पुत्र अब्दुल्लाह क़रकी
13-मुहम्मद पुत्र इब्राहीम लीसी
14-इब्राहीम पुत्र इस्हाक़ तालक़ानी
15-मुहम्मद पुत्र क़ासिम जुरजानी
16-हुसैन पुत्र इब्राहीम मकतबी
शेख सदूक़ के शिष्यगण

1-शेख मुफ़ीद
2-मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र नोमान
3-हुसैन पुत्र अब्दुल्लाह
4-हारून पुत्र मूसा तलाकिबरी
5-हुसैन पुत्र अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी( भाई)
6-हसन पुत्र हुसैन पुत्र बाबवे क़ुम्मी( भतीजा)
7-हसन पुत्र मुहम्मद क़ुम्मी
8-अली पुत्र अहमद पुत्र अब्बास नजाशी
9-इल्मुल हुदा सैय्यिद मुर्तज़ा
10-सैय्य़िद अबुल बरकात अली पुत्र हुसैन जूज़ी
11-अबुल क़ासिम अली खिज़ाज़
12-मुहम्मद पुत्र सुलेमान हिमरानी
शेख सदूक़ की रचनाऐं

शेख तूसी ने वर्णन किया है कि शेख सदूक़ ने 300 किताबे लिखी हैं। तथा शेख तूसी ने अपनी किताब फ़हरिस्त मे उनकी 40 किताबो के नाम लिखे हैं। तथा शेख नजाशी ने अपनी किताब मे उनकी 189 किताबो का उल्लेख किया है।उनकी मुख्य किताबो के नाम इस प्रकार हैं।
1-मन ला यहज़रूल फ़क़ीह
2-कमालुद्दीन व इतमामुन् नेअमत
3-किताब आमाली
4-किताब सिफ़ाते शिया
5-किताब अयूनुल अखबार इमाम रिज़ा अलैहिस्सलाम
6-किताब मसादेक़हुल अखबार
7-किताब खिसाल
8- किताब ऐलालुश शराए
9-किताब तौहीद
10-किताब इसबाते विलायत अली
11-किताब मारफ़त
12-किताब मदीनःतुल इल्म
13-किताब मक़ना
14-किताब मुआनीयुल अखबार
15-किताब मशीखातहुल फ़कीह
“मन ला यहज़रुल फ़कीह” शेख सदूक़ की विश्व प्रसिद्ध किताब है। यह किताब अनेको बार प्रकाशित हो चुकी है। शेख सदूक़ ने इस किताब को बलख क्षेत्र के इलाक़ नामक एक गाँव मे बैठकर लिखा था। इस किताब की अनेको विद्वानो ने व्याख्या की है तथा कुछ ने इस पर नोट्स लिखे हैं।
शेख सदूक़ इस किताब की प्रस्तावना मे लिखते हैं कि जब तक़दीर मुझे खैंच कर इस गाँव मे लाई तो यहां पर मेरी भेंट सैय्यिद अबू अब्दुल्लाह (जो नेअमत के नाम से प्रसिद्धि रखते हैं।) से हुई। मैं उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ । उन्होने कहा कि मुहम्मद बिन ज़करिया राज़ी ने तिब मे (चिकित्सा ज्ञान) एक किताब लिखी थी और उसका नाम मन ला यहज़रूत तबीब रखा था। तथा इस किताब मे तिब (चिकित्साज्ञान) से सम्बन्धित सब बातों को लिखा था। जहां पर कोई तबीब (चिकित्सक) नही होता था वहां पर इस किताब की महत्ता बहुत अधिक थी। उन्होने मुझ से कहा कि आप फ़िक्ह, हलाल, हराम व दीनी अहकाम पर एक किताब लिखे जिसमे सब मसाइल मौजूद हो और उस किताब का नाम ला यहज़रूल फ़कीह रखें। ताकि जो जिस हुक्म को चाहे उसमे देखे और उस पर विश्वास करे। मैने उनकी इस बात को स्वीकार किया तथा यह किताब मन ला यहज़रूल फ़कीह लिखी।
इस किताब की महत्ता इस बात से प्रकट होती है कि शिया सम्प्रदाय की चार मुख्य किताबो मे यह किताब दूसरे स्थान पर है। इस किताब के चार भाग हैं जिनको विभिन्न 544 खण्ड़ो पर विभाजित किया गया है। तथा इस किताब मे 5963 हदीसो का उल्लेख किया गया है। जिनमे से 3913 हदीसों का मुस्नद रूप से उल्लेख किया गया है, तथा शेष 2050 हदीसों का मुरसल रूप मे उल्लेख किया गया है।
स्वर्गवास

शेख सदूक़ मुहम्मद पुत्र बाबवे क़ुम्मी सत्तर वर्ष से अधिक जीवित रहे। तथा उन्होंने 300 से अधिक किताबे लिखी। वह सन् 381 हिजरी क़मरी मे रै नामक शहर (यह शहर वर्तमान मे ईरान की राजधानी तेहरान के पास स्थित है) मे स्वर्गवासी हुए तथा वहीं पर उनकी समाधि बनायी गई।

Photos 24/04/2017

Imam Baqir [a] said

"Try to learn knowledge because learning it is a good action and study is itself a worship."

Photos 20/04/2017

Midnight Prayers

Imam Muhammad-ibn-Ali, Jawad-ul-'A'immah, [a] said

"He who has confidence in Allah, sees joy; and he who trusts on Him, He will suffice his affairs."

Bihar-ul-Anwar, vol. 78, p. 79

16/04/2017

हजरत अली (अ.स) का इन्साफ और उनके मशहूर फैसले|
...........................

रसूल(स.) के बाद धर्म के सर्वोच्च अधिकारी का पद अल्लाह ने अहलेबैत को ही दिया। इतिहास का कोई पन्ना अहलेबैत में से किसी को कोई ग़लत क़दम उठाते हुए नहीं दिखाता जो कि धर्म के सर्वोच्च अधिकारी की पहचान है। यहाँ तक कि जो राशिदून खलीफा हुए हैं उन्होंने भी धर्म से सम्बंधित मामलों में अहलेबैत व खासतौर से हज़रत अली(अ.) से ही मदद ली।
अगर ग़ौर करें रसूल(स.) के बाद हज़रत अली की जिंदगी पर तो उसके दो हिस्से हमारे सामने ज़ाहिर होते हैं। पहला हिस्सा, जबकि वे शासक नहीं थे, और दूसरा हिस्सा जबकि वे शासक बन चुके थे। दोनों ही हिस्सों में हमें उनकी जिंदगी नमूनये अमल नज़र आती है। बहादुरी व ज्ञान में वे सर्वश्रेष्ठ थे, सच्चे व न्यायप्रिय थे, कभी कोई गुनाह उनसे सरज़द नहीं हुआ और कुरआन की इस आयत पर पूरी तरह खरे उतरते थे :
(2 : 247) और उनके नबी ने उनसे कहा कि बेशक अल्लाह ने तुम्हारी दरख्वास्त के (मुताबिक़) तालूत को तुम्हारा बादशाह मुक़र्रर किया (तब) कहने लगे उस की हुकूमत हम पर क्यों कर हो सकती है हालांकि सल्तनत के हक़दार उससे ज़यादा तो हम हैं क्योंकि उसे तो माल के एतबार से भी खुशहाली तक नसीब नहीं (नबी ने) कहा अल्लाह ने उसे तुम पर फज़ीलत दी है और माल में न सही मगर इल्म और जिस्म की ताक़त तो उस को अल्लाह ने ज़यादा अता की है.
जहाँ तक बहादुरी की बात है तो हज़रत अली(अ.) ने रसूल(स.) के समय में तमाम इस्लामी जंगों में आगे बढ़कर शुजाअत के जौहर दिखाये। खैबर की जंग में किले का दरवाज़ा एक हाथ से उखाड़ने का वर्णन मशहूर खोजकर्ता रिप्ले ने अपनी किताब 'बिलीव इट आर नाट' में किया है। वह कभी गुस्से व तैश में कोई निर्णय नहीं लेते थे। न पीछे से वार करते थे और न कभी भागते हुए दुश्मन का पीछा करते थे। यहाँ तक कि जब उनकी शहादत हुई तो भी अपनी वसीयत में अपने मुजरिम के लिये उन्होंने कहा कि उसे उतनी ही सज़ा दी जाये जितना कि उसका जुर्म है।
17 मार्च 600 ई. (13 रजब 24 हि.पू.) को अली(अ.) का जन्म मुसलमानों के तीर्थ स्थल काबे के अन्दर हुआ. ऐतिहासिक दृष्टि से हज़रत अली(अ.) एकमात्र व्यक्ति हैं जिनका जन्म काबे के अन्दर हुआ. जब पैगम्बर मुहम्मद (स.) ने इस्लाम का सन्देश दिया तो लब्बैक कहने वाले अली(अ.) पहले व्यक्ति थे.
हज़रत अली(अ.) में न्याय करने की क्षमता गज़ब की थी।
उनका एक मशहूर फैसला ये है जब दो औरतें एक बच्चे को लिये हुए आयीं। दोनों दावा कर रही थीं कि वह बच्चा उसका है। हज़रत अली(अ.) ने अपने नौकर को हुक्म दिया कि बच्चे के दो टुकड़े करके दोनों को आधा आधा दे दिया जाये। ये सुनकर उनमें से एक रोने लगी और कहने लगी कि बच्चा दूसरी को सौंप दिया जाये। हज़रत अली ने फैसला दिया कि असली माँ वही है क्योंकि वह अपने बच्चे को मरते हुए नहीं देख सकती।
एक अन्य मशहूर फैसले में एक लड़का हज़रत अली(अ.) के पास आया जिसका बाप दो दोस्तों के साथ बिज़नेस के सिलसिले में गया था। वे दोनों जब लौटे तो उसका बाप साथ में नहीं था। उन्होंने बताया कि वह रास्ते में बीमार होकर खत्म हो गया है और उन्होंने उसे दफ्न कर दिया है। जब उस लड़के ने अपने बाप के माल के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि व्यापार में घाटे की वजह से कोई माल भी नहीं बचा। उस लड़के को यकीन था कि वो लोग झूठ बोल रहे हैं लेकिन उसके पास अपनी बात को साबित करने के लिये कोई सुबूत नहीं था। हज़रत अली(अ.) ने दोनों आदमियों को बुलवाया और उन्हें मस्जिद के अलग अलग खंभों से दूर दूर बंधवा दिया। फिर उन्होंने मजमे को इकटठा किया और कहा अगर मैं नारे तक़बीर कहूं तो तुम लोग भी दोहराना। फिर वे मजमे के साथ पहले व्यक्ति के पास पहुंचे और कहा कि तुम मुझे बताओ कि उस लड़के का बाप कहां पर और किस बीमारी में मरा। उसे दवा कौन सी दी गयी। मरने के बाद उसे किसने गुस्ल व कफन दिया और कब्र में किसने उतारा।
उस व्यक्ति ने जब वह सारी बातें बतायीं तो हज़रत अली ने ज़ोर से नारे तकबीर लगाया। पूरे मजमे ने उनका अनुसरण किया। फिर हज़रत अली दूसरे व्यक्ति के पास पहुंचे तो उसने नारे की आवाज़ सुनकर समझा कि पहले व्यक्ति ने सच उगल दिया है। नतीजे में उसने रोते गिड़गिड़ाते सच उगल दिया कि दोनों ने मिलकर उस लड़के के बाप का क़त्ल कर दिया है और सारा माल हड़प लिया है। हज़रत अली(अ.) ने माल बरामद कराया और उन्हें सज़ा सुनाई ।
इस तरह के बेशुमार फैसले हज़रत अली(अ.) ने किये और पीडि़तों को न्याय दिया।
हज़रत अली(अ.) मुफ्तखोरी व आलस्य से सख्त नफरत करते थे। उन्होंने अपने बेटे इमाम हसन (अ.) से फरमाया, 'रोजी कमाने में दौड़ धूप करो और दूसरों के खजांची न बनो।'
मज़दूरों से कैसा सुलूक करना चाहिए इसके लिये हज़रत अली (अ.) का मशहूर जुमला है, 'मज़दूरों का पसीना सूखने से पहले उनकी मज़दूरी दे दो।'
हज़रत अली(अ.) ने जब मालिके अश्तर को मिस्र का गवर्नर बनाया तो उन्हें इस तरंह के आदेश दिये 'लगान (टैक्स) के मामले में लगान अदा करने वालों का फायदा नजर में रखना क्योंकि बाज और बाजगुजारों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) की बदौलत ही दूसरों के हालात दुरुस्त किये जा सकते हैं। सब इसी खिराज और खिराज देने वालों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) के सहारे पर जीते हैं। और खिराज को जमा करने से ज्यादा जमीन की आबादी का ख्याल रखना क्योंकि खिराज भी जमीन की आबादी ही से हासिल हो सकता है और जो आबाद किये बिना खिराज (रिवार्ड) चाहता है वह मुल्क की बरबादी और बंदगाने खुदा की तबाही का सामान करता है। और उस की हुकूमत थोड़े दिनों से ज्यादा नहीं रह सकती।
मुसीबत में लगान की कमी या माफी, व्यापारियों और उधोगपतियों का ख्याल व उनके साथ अच्छा बर्ताव, लेकिन जमाखोरों और मुनाफाखोरों के साथ सख्त कारवाई की बात इस खत में मौजूद है। यह लम्बा खत इस्लामी संविधान का पूरा नमूना पेश करता है। और किताब नहजुल बलागाह में खत नं - 53 के रूप में मौजूद है। यू.एन. सेक्रेटरी कोफी अन्नान के सुझाव पर इस खत को यू.एन. के वैशिवक संविधान में सन्दर्भ के तौर पर शामिल किया गया है।
हजरत अली (अ.) का शौक था बाग़ों को लगाना व कुएं खोदना। यहाँ तक कि जब उन्होंने इस्लामी खलीफा का ओहदा संभाला तो बागों व खेतों में मजदूरी करने का उनका अमल जारी रहा। उन्होंने अपने दम पर अनेक रेगिस्तानी इलाकों को नखिलस्तान में बदल दिया था। मदीने के आसपास उनके लगाये गये बाग़ात आज भी देखे जा सकते हैं।
तमाम अंबिया की तरह हज़रत अली ने मोजिज़ात भी दिखाये हैं। सूरज को पलटाना, मुर्दे को जिंदा करना, जन्मजात अंधे को दृष्टि देना वगैरा उनके मशहूर मोजिज़ात हैं।
ज्ञान के क्षेत्र में भी हज़रत अली सर्वश्रेष्ठ थे ।
यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि हज़रत अली(अ.) एक महान वैज्ञानिक भी थे और एक तरीके से उन्हें पहला मुस्लिम वैज्ञानिक कहा जा सकता है.
हज़रत अली(अ.) ने वैज्ञानिक जानकारियों को बहुत ही रोचक ढंग से आम आदमी तक पहुँचाया. एक प्रश्नकर्ता ने उनसे सूर्य की पृथ्वी से दूरी पूछी तो जवाब में बताया कि एक अरबी घोड़ा पांच सौ सालों में जितनी दूरी तय करेगा वही सूर्य की पृथ्वी से दूरी है. उनके इस कथन के चौदह सौ सालों बाद वैज्ञानिकों ने जब यह दूरी नापी तो 149600000 किलोमीटर पाई गई. अरबी घोडे की औसत चाल 35 किमी/घंटा होती है और इससे यही दूरी निकलती है. इसी तरह एक बार अंडे देने वाले और बच्चे देने वाले जानवरों में फर्क इस तरह बताया कि जिनके कान बाहर की तरफ होते हैं वे बच्चे देते हैं और जिनके कान अन्दर की तरफ होते हैं वे अंडे देते हैं.
अली(अ.) ने इस्लामिक थियोलोजी को तार्किक आधार दिया। कुरान को सबसे पहले कलमबद्ध करने वाले भी अली ही हैं. बहुत सी किताबों के लेखक हज़रत अली(अ.) हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं
1. किताबे अली - इसमें कुरआन के साठ उलूम का जि़क्र है।
2. जफ्रो जामा (इस्लामिक न्यूमरोलोजी पर आधारित)- इसके बारे में कहा जाता है कि इसमें गणितीय फार्मूलों के द्वारा कुरान मजीद का असली मतलब बताया गया है. तथा क़यामत तक की समस्त घटनाओं की भविष्यवाणी की गई है. यह किताब अब अप्राप्य है.
3. किताब फी अब्वाबुल फिक़ा
4. किताब फी ज़कातुल्नाम
5. सहीफे अलफरायज़
6. सहीफे उलूविया
इसके अलावा हज़रत अली(अ.) के खुत्बों (भाषणों) के दो मशहूर संग्रह भी उपलब्ध हैं। उनमें से एक का नाम नहजुल बलाग़ा व दूसरे का नाम नहजुल असरार है। इन खुत्बों में भी बहुत से वैज्ञानिक तथ्यों का वर्णन है.
माना जाता है की जीवों में कोशिका (cell) की खोज 17 वीं शताब्दी में लीवेन हुक ने की. लेकिन नहजुल बलाग का निम्न कथन ज़ाहिर करता है कि अली(अ.) को कोशिका की जानकारी थी. ''जिस्म के हर हिस्से में बहुत से अंग होते हैं. जिनकी रचना उपयुक्त और उपयोगी है. सभी को ज़रूरतें पूरी करने वाले शरीर दिए गए हैं. सभी को रूहानी ताक़त हासिल करने के लिये दिल दिये गये हैं. सभी को काम सौंपे गए हैं और उनको एक छोटी सी उम्र दी गई है. ये अंग पैदा होते हैं और अपनी उम्र पूरी करने के बाद मर जाते हैं. (खुत्बा-81) स्पष्ट है कि 'अंग से अली का मतलब कोशिका ही था.'
हज़रत अली सितारों द्वारा भविष्य जानने के खिलाफ थे, लेकिन खगोलशास्त्र सीखने के हामी थे, उनके शब्दों में ''ज्योतिष सीखने से परहेज़ करो, हाँ इतना ज़रूर सीखो कि ज़मीन और समुद्र में रास्ते मालूम कर सको. (77वाँ खुत्बा - नहजुल बलागा)
इसी किताब में दूसरी जगह पर यह कथन काफी कुछ आइन्स्टीन के सापेक्षकता सिद्धांत से मेल खाता है, ''उसने मख्लूकों को बनाया और उन्हें उनके वक़्त के हवाले किया. (खुत्बा - 01)
चिकित्सा का बुनियादी उसूल बताते हुए कहा, ''बीमारी में जब तक हिम्मत साथ दे, चलते फिरते रहो."
ज्ञान प्राप्त करने के लिए अली ने अत्यधिक जोर दिया, उनके शब्दों में, ''ज्ञान की तरफ बढ़ो, इससे पहले कि उसका हरा भरा मैदान खुश्क हो जाए." इमाम अली(अ.) दुनिया के एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने दावा किया, "मुझ से जो कुछ पूछना है पूछ लो." और वे अपने इस दावे में कभी गलत सिद्ध नहीं हुए.
इस तरह निर्विवाद रूप से हम पैगम्बर मोहम्मद(स.) के बाद हज़रत अली(अ.) को इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी कह सकते हैं।

Want your school to be the top-listed School/college in Fatehpur?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Category

Telephone

Website

Address


97, Bara Kuwa, Jahanpur
Fatehpur
212601