05/09/2024
Teachers Day
बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। हर व्यक्ति जब पीछे मुड़ के देखता है तो वह जानता है कि कई चीजें वह बेहतर तरीक़े से कर सकता था। जब सिर्फ़ जोश होता है, अक्ल नहीं होती, अनुभव नहीं होता, समझ नहीं होती। सोचने बैठता हूँ तो याद आता है अगर बोल दिया होता तो शायद वह रुक जाता, चुप रह लिया होता तो एक दोस्त बचा लेता। वो फब्तियाँ कसना, वह चिढ़ाना, वह बेमतलब का झगड़ा ना किया होता तो? काश! काश!
ऐसे ही कई काश हमारे अंदर बचे रहते हैं। कहीं पढ़ा था कि जब तक ये समझ पाते हैं कि पिछली पीढ़ी जिसे हम मूर्ख समझते थे वह कितनी समझदार थी, नई पीढ़ी हमें मूर्ख समझने लगती है।
ना जाने क्यों? मुझे आज भी अगर सपने आते हैं तो ज़्यादातर स्कूल के आते हैं, कॉलेज में भी 4 साल हॉस्टल में रहा पर वे सपने कभी नहीं आते। आज भी सपनों में स्कूल में एग्जाम छूट रहा होता है, पीटी टीचर की सीटी सुनाई पड़ जाती है, या दोस्तों के साथ बाउंड्री पार जाने या छुप के मंडी जाने पे पकड़ा जाता हूँ।
शिक्षक का तो मुझे पता था, अभिभावक वाला कॉन्सेप्ट स्कूल आके ही समझ आया। घर से दूर शिक्षक, क्लास टीचर, हाउस मास्टर सिर्फ़ अध्यापक नहीं थे, अभिभावक भी थे। हमें बुरा लगता था जब टीचर हमें डाँटते थे (अगर हम पकड़े जाते थे तो)। मन ही मन उन्हें गरियाते थे। खाना ना फेंकना, सुबह जल्दी उठ के व्यायाम करना, शाम को गेम्स पीरियड में बाहर खेलना, समय का पाबंद होना, पढ़ाई करना, SUPW (जिसे हम some useful Period Wasted कहते थे) में सोशल वर्क करना, जिनसे उस वक़्त चिढ़ हुआ करती थे, वे सारे काम जो आज हम ख़ुद बच्चों को सिखाते थे। उस नज़रिए से सोचें तो, क्या हम अपने ख़ुद के दस बारह साल के बच्चे को अकेले मोहम्मदाबाद, फ़र्रुख़ाबाद, ट्रेन, मंडी जाने देंगे, वो सब करने देंगे जिनसे रोकने के लिए हम टीचर्स से चिढ़ते थे।
जब मैं कॉलेज में था, जब मैं जॉब में रहा, नई जगह, नये शहरों में, तब जान पाया कि ऐसा कितना सारा है जो हमें नवोदय ने दिया है जो हमें बाक़ी सब से अलग करता है। ऐसी कितनी सारी चीजें हैं जो हमें सिखाई गईं और जिसके लिए लोग-बाग अलग से क्लास, ट्रेनिंग, कैम्प, सेमिनार, वेबिनार अटेंड करते घूमते हैं।
हम आज एक इंसान के रूप में जो भी हैं जैसे भी हैं, अपनी चॉइसेज़, उन स्कूली दिनों और उन शिक्षकों की वजह से ही हैं। अब सोचता हूँ तो लगता है कि कई शिक्षक हैं जिन्हें थैंक यू बोलना चाहिए था, कइयों को सॉरी बोलना रह गया। वह छूट गया उसकी गिल्ट रह गई, एक काश रह गया।
15 सितंबर ऐल्यूमिनी मीट में कई पूर्व शिक्षकों ने भी आने की सहमति दर्ज की है। और हम अपने इन अध्यापकों, अभिभावकों जिन्होंने हमारे जीवन की दशा दिशा तय बनाई, उनका स्नेह, आशीर्वाद और सानिध्य फिर से प्राप्त कर सकते हैं और इस 'काश' को हमेशा के लिए पीछे छोड़ सकते हैं। ✍🏻 ऋषि कटियार '03 बैच