05/03/2026
तख्त श्री हजूर साहिब, जिसे 'सचखंड' (सत्य का क्षेत्र) भी कहा जाता है, सिख धर्म के पाँच तख्तों में से एक है। यह महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। इसका इतिहास सिख धर्म के दसवें गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी के अंतिम दिनों और उनकी शिक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यहाँ श्री हजूर साहिब का संपूर्ण इतिहास विस्तार से दिया गया है:
1. गुरु गोविंद सिंह जी का नांदेड़ आगमन
सन् 1708 में, गुरु गोविंद सिंह जी दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान नांदेड़ पहुँचे थे। उनके साथ उनके कुछ अनुयायी और मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम भी थे। गुरु जी को यह स्थान बहुत प्रिय लगा और उन्होंने यहीं अपना डेरा जमाने का निर्णय लिया।
2. माधो दास (बंदा सिंह बहादुर) से मिलन
नांदेड़ में ही गुरु जी की मुलाकात एक बैरागी साधु माधो दास से हुई। गुरु जी के व्यक्तित्व और उपदेशों से प्रभावित होकर माधो दास उनका शिष्य बन गया। गुरु जी ने उसे 'अमृत' चखाकर उसका नाम बंदा सिंह बहादुर रखा और उसे पंजाब में जुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा।
3. गुरु गद्दी का निर्णय (गुरु ग्रंथ साहिब)
हजूर साहिब वह पवित्र स्थान है जहाँ गुरु गोविंद सिंह जी ने देहधारी गुरु की परंपरा को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। 7 अक्टूबर 1708 को, ज्योति जोत समाने से पहले, उन्होंने सिखों को आदेश दिया:
"सब सिखन को हुकम है, गुरु मान्यो ग्रंथ।"
उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों के शाश्वत और जीवित गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। तब से, सिख धर्म में कोई अन्य देहधारी गुरु नहीं हुआ।
4. ज्योति जोत समाना
अक्टूबर 1708 में, दो पठानों ने गुरु जी पर धोखे से खंजर से हमला किया था। हालांकि गुरु जी ने पलटवार कर हमलावर को मार गिराया, लेकिन घाव गहरा था। कुछ दिनों बाद, इसी स्थान पर गुरु जी ज्योति जोत समा गए (परलोक सिधार गए)। जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ आज मुख्य गुरुद्वारा साहिब सुशोभित है।
5. गुरुद्वारा साहिब का निर्माण
वर्तमान गुरुद्वारा परिसर का निर्माण महाराजा रणजीत सिंह ने 1832 से 1837 के बीच करवाया था। उन्होंने ही गुरुद्वारे के गुंबद पर सोने की परत चढ़वाई और यहाँ की व्यवस्था के लिए धन और संसाधन उपलब्ध कराए।
मुख्य आकर्षण और परंपराएँ
अंगीठा साहिब: गुरुद्वारा साहिब के भीतर वह स्थान जहाँ गुरु जी का अंतिम संस्कार हुआ था, उसे 'अंगीठा साहिब' कहा जाता है।
शस्त्र दर्शन: यहाँ गुरु गोविंद सिंह जी के वास्तविक शस्त्र (तलवार, तीर, ढाल आदि) आज भी सुरक्षित रखे गए हैं, जिन्हें प्रतिदिन संगतों को दिखाया जाता है।
निशान साहिब: यहाँ दो ऊँचे निशान साहिब हैं, जिन्हें सोने की चादरों से ढका गया है।
ऐतिहासिक महत्व
श्री हजूर साहिब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह वह स्थान है जहाँ सिख धर्म को उसकी अंतिम और पूर्ण पहचान मिली। यह स्थान त्याग, वीरता और गुरु की अटूट शिक्षाओं का प्रतीक है।