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1895 में भूमिहार ब्राह्मण महासभा की बैठक काशी नरेश की अध्यक्षता में वनारस में हुई। इस बैठक को बुलबाया गया पण्डित मदन मोह...
19/06/2023

1895 में भूमिहार ब्राह्मण महासभा की बैठक काशी नरेश की अध्यक्षता में वनारस में हुई। इस बैठक को बुलबाया गया पण्डित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में।
एक बड़े हॉल के कुर्शियों पर बड़े बड़े विभूषित बैठे हुए थे,काशी नरेश की अध्यक्षता में हुई इस महासभा में तमकुही नरेश, दरभंगा महाराज, हथुआ महाराज, टेकारी महाराज,माझा स्टेट सहित सभी #भूमिहार जमींदार सम्मलित हुए थे।

भुमिहार ब्राह्मण की कोई भी सभा शिक्षा स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगदान के लिए ही होता था। महासभा में ध्वनि मत से काशी हिंदू विश्व विद्यालय खोलने की मांग उठी। ऐसे विषय मे इक्षा शक्ति क्या होती है समझिए। तुरन्त काशी नरेश ने जमीन देने की सहमति दर्ज की। सहयोग वनारस के बहुत से जमींदारों का भी मिला। विश्विद्यालय को चन्दा देने की बात हुई तो वहाँ उपस्थित बड़े बड़े स्टेट ने तत्क्षण चन्दा दिया।
तभी दूर बैठे एक व्यक्ति ने जिनका एक पैर कटा हुआ था ,हाथ उठाया और कहा कि "मैं भी योगदान कड़ना चाहता हूँ। " वहां पर बैठे लोगों ने सोचा कि कोई गरीब आदमी है, 2-5 रुपया देगा। एक व्यक्ति पास आया और उसने पूछा "कितना चन्दा दीजियेगा दे दीजिए"
उस व्यक्ति को देख कर् पण्डित मालवीय मुस्कुराए।

उस व्यक्ति ने कहा "जी कुछ लाए हैं ,गिन लीजिए"
जब चन्दा गिना जाने लगा तो चन्दा की रकम कुल एक लाख रुपया जो आजके 10 करोड़ के बराबर होगी निकला। सारे स्टेट ने मिलकर उतना चन्दा नही दिया था।

पण्डित मदन मोहन मालवीय ने उनका परिचय महासभा से करबाया। वो थे "बाबू लंगट सिंह" । वैशाली धरहरा के निवासी बाबू लंगट सिंह । उन्होंने महासभा से गुजारिस की हम मुज्जफपुर में भी महासभा के एक आयोजन चाहते हैं। 1899 को महासभा की दूसरी बैठक मुज्जफरपुर में हुई।जिसमे वनारस महराज सहित बहुत से गणमान्य उपस्थित हुए। वहां भूमिहार ब्राह्मण कॉलेजिएट हाय स्कूल सह कॉलेज खोलने की बात सर्वसम्मति से पारित हुई। उस समय मुज्जफरपुर शहर में जो हाय स्कूल था उसमे गरीब के बच्चे नही पढ़ पाते थे, इसलिए एक स्कूल की स्थापना जरूरी थी जिसमे गरीब वंचित के बच्चे पढ़ सकें।

हथुआ नरेश और दरभंगा महराज ने उस कॉलेज में चन्दा देने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने कहा कि हम खुद दरभंगा और छपडा में कॉलेज खोलना चाहते हैं। बाबू लंगट सिंह ने मुज्जफरपुर के जमींदारों की एक सभा बुलाई और सहयोग से कॉलेज खुला। उसमे कॉलेज के रख रखाव के लिए 22 सदस्यी कमिटि की स्थापना की गई।जिसमेबाबू लंगट सिंह के अलावे शिवहर नरेश शिवराज नन्दन सिंह,हरदी के जमींदार बाबु कृष्ण नारायण सिंह,जैतपुर स्टेट के रघुनाथ दास,,यदुनन्दन शाही,महंथ प्रमेश्वरनारायन,म्हंथद्वारिक नाथ, योगेंद्रनारायन सिंह थे।

इस कॉलेज की मान्यता में अंग्रेज के एक अधिकारी ग्रीयर साहब का भी योगदान रहा इसलिए शुरुआत में इस कॉलेज का नाम ग्रीयर भुमिहार ब्राह्मण हाय स्कूल सह कॉलेज रखा गया।
1909 में कोलकत्ता विश्विद्यालय के अंग्रेज प्रतिनिधि कॉलेज देखने आए कहा जाता है कि उन्होंने घुस की पेशकश की , और भवन इमारत पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे। बाबू लंगट सिंह ने पूछा कि भवन इमारत कैसा चाहिए। तो जरूरत से बड़ा भवन इमारत बनाने की बात की गई और नही बनने पर मान्यता रद्द करने की बात की गई। साथ ही कहा कुछ घुस दे दीजिए तो मैनेज हो जाएगा।

बाबू लंगट सिंह ने अपने बेटे आनन्दा बाबू ,से बात की और दोनों ने तय किया कि घुस देने के जगह भवन निर्माण ही होगा। भवन निर्माण के दौरान 15 अप्रैल 1912 को महामानव बाबू लंगट सिंह का निधन हो गया। लोगों को लगा कि कॉलेज अब खत्म हो जाएगा। लेकिन उनके पुत्र आनंद बाबू ने एक रिहायशी जमीन बेचकर इस कॉलेज का भवन निर्माण समय पर पूरा करबाया और उस कॉलेज का नाम बाबू लंगट सिंह कॉलेज पड़ा।

काशी हिंदू विश्विद्यालय के छात्र बाबू जगजीवन राम हुए और लंगट सिंह कॉलेज के भी छात्र मोहम्मद यसुफ़ हुए।

बाबू लंगट सिंह खानदानी जमींदार नही थे, समस्तीपुर में उन्होंने रेलवे लाइन मेन का काम किया, कुशलता देख कर् उन्हें सुपरवाइजर बनाया गया। बाद में उन्होंने रेलवे की ठीकेदारी ली। और एक सामान्य परिवार से आगे का सफर तय किया। रेलवे के ठीका के क्रम में ही उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि वो खुद ज्यादा पढ़े लिखे नही थे ,लेकिन अपने निजी कमाई से उन्होंने बिहार के बड़े कॉलेजों में से एक बाबू लंगट सिंह कॉलेज का निर्माण करबाया। जिसमे हर तबके के छात्र को पढ़ने की स्वतंत्रता थी।
✍️ Rajnikant Pandey jee के वाल से

17/06/2023
 #भारत की वो  #एकलौती ऐसी घटना जब , अंग्रेज़ों ने एक साथ 52 क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ पर लटका दिया था, पर वामपंथियों...
17/06/2023

#भारत की वो #एकलौती ऐसी घटना जब , अंग्रेज़ों ने एक साथ 52 क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ पर लटका दिया था, पर वामपंथियों ने इतिहास की इतनी बड़ी घटना को आज तक गुमनामी के अंधेरों में ढके रखा।

#उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित बावनी इमली एक प्रसिद्ध इमली का पेड़ है, जो भारत में एक शहीद स्मारक भी है। इसी इमली के पेड़ पर 28 अप्रैल 1858 को गौतम क्षत्रिय, जोधा सिंह अटैया और उनके इक्यावन साथी फांसी पर झूले थे। यह स्मारक उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बिन्दकी उपखण्ड में खजुआ कस्बे के निकट बिन्दकी तहसील मुख्यालय से तीन किलोमीटर पश्चिम में मुगल रोड पर स्थित है।

यह स्मारक स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किये गये बलिदानों का प्रतीक है। 28 अप्रैल 1858 को ब्रिटिश सेना द्वारा बावन स्वतंत्रता सेनानियों को एक इमली के पेड़ पर फाँसी दी गयी थी। ये इमली का पेड़ अभी भी मौजूद है। लोगों का विश्वास है कि उस नरसंहार के बाद उस पेड़ का विकास बन्द हो गया है।

10 मई, 1857 को जब बैरकपुर छावनी में आजादी का शंखनाद किया गया, तो 10 जून,1857 को फतेहपुर में क्रान्तिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिया जिनका नेतृत्व कर रहे थे जोधासिंह अटैया। फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खाँ भी इनके सहयोगी थे। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी एवं कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया। जोधासिंह अटैया के मन में स्वतन्त्रता की आग बहुत समय से लगी थी। उनका सम्बन्ध तात्या टोपे से बना हुआ था। मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए इन दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से पांडु नदी के तट पर टक्कर ली। आमने-सामने के संग्राम के बाद अंग्रेजी सेना मैदान छोड़कर भाग गयी ! इन वीरों ने कानपुर में अपना झंडा गाड़ दिया।

जोधासिंह के मन की ज्वाला इतने पर भी शान्त नहीं हुई। उन्होंने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गाँव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को उस समय जलाकर मार दिया, जब वे एक घर में ठहरे हुए थे। सात दिसम्बर, 1857 को इन्होंने गंगापार रानीपुर पुलिस चैकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया। जोधासिंह ने अवध एवं बुन्देलखंड के क्रान्तिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया।

आवागमन की सुविधा को देखते हुए क्रान्तिकारियों ने खजुहा को अपना केन्द्र बनाया। किसी देशद्रोही मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने इस स्थान पर एकत्रित क्रान्ति सेना पर हमला कर दिया। कर्नल पावेल उनके इस गढ़ को तोड़ना चाहता था, परन्तु जोधासिंह की योजना अचूक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सहारा लिया, जिससे कर्नल पावेल मारा गया। अब अंग्रेजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की नयी खेप भेज दी। इससे क्रान्तिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी। लेकिन इसके बाद भी जोधासिंह का मनोबल कम नहीं हुआ। उन्होंने नये सिरे से सेना के संगठन, शस्त्र संग्रह और धन एकत्रीकरण की योजना बनायी। इसके लिए उन्होंने छद्म वेष में प्रवास प्रारम्भ कर दिया, पर देश का यह दुर्भाग्य रहा कि वीरों के साथ-साथ यहाँ देशद्रोही भी पनपते रहे हैं। जब जोधासिंह अटैया अरगल नरेश से संघर्ष हेतु विचार-विमर्श कर खजुहा लौट रहे थे, तो किसी मुखबिर की सूचना पर ग्राम घोरहा के पास अंग्रेजों की घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया। थोड़ी देर के संघर्ष के बाद ही जोधासिंह अपने 51 क्रान्तिकारी साथियों के साथ बन्दी बना लिये गये।

28 अप्रैल, 1858 को मुगल रोड पर स्थित इमली के पेड़ पर उन्हें अपने 51 साथियों के साथ फाँसी दे दी गयी। लेकिन अंग्रेजो की बर्बरता यहीं नहीं रुकी । अंग्रेजों ने सभी जगह मुनादी करा दिया कि जो कोई भी शव को पेड़ से उतारेगा उसे भी उस पेड़ से लटका दिया जाएगा । जिसके बाद कितने दिनों तक शव पेड़ों से लटकते रहे और चील गिद्ध खाते रहे । अंततः महाराजा भवानी सिंह अपने साथियों के साथ 4 जून को जाकर शवों को पेड़ से नीचे उतारा और अंतिम संस्कार किया गया । बिन्दकी और खजुहा के बीच स्थित वह इमली का पेड़ (बावनी इमली) आज शहीद स्मारक के रूप में स्मरण किया जाता है।

कमर दर्द , सर्वाइकल और चारपाई.....हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे।सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पू...
03/06/2023

कमर दर्द , सर्वाइकल और चारपाई.....
हमारे पूर्वज वैज्ञानिक थे।
सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है , लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।
जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।
दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें , सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था , लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नही होता है। दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है।
डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है , उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं , वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं।
अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है ।
गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।
बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता है ।
गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनद ही और है। ताज़ी हवा , बदलता मोसम , तारों की छाव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।
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