19/06/2023
1895 में भूमिहार ब्राह्मण महासभा की बैठक काशी नरेश की अध्यक्षता में वनारस में हुई। इस बैठक को बुलबाया गया पण्डित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में।
एक बड़े हॉल के कुर्शियों पर बड़े बड़े विभूषित बैठे हुए थे,काशी नरेश की अध्यक्षता में हुई इस महासभा में तमकुही नरेश, दरभंगा महाराज, हथुआ महाराज, टेकारी महाराज,माझा स्टेट सहित सभी #भूमिहार जमींदार सम्मलित हुए थे।
भुमिहार ब्राह्मण की कोई भी सभा शिक्षा स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगदान के लिए ही होता था। महासभा में ध्वनि मत से काशी हिंदू विश्व विद्यालय खोलने की मांग उठी। ऐसे विषय मे इक्षा शक्ति क्या होती है समझिए। तुरन्त काशी नरेश ने जमीन देने की सहमति दर्ज की। सहयोग वनारस के बहुत से जमींदारों का भी मिला। विश्विद्यालय को चन्दा देने की बात हुई तो वहाँ उपस्थित बड़े बड़े स्टेट ने तत्क्षण चन्दा दिया।
तभी दूर बैठे एक व्यक्ति ने जिनका एक पैर कटा हुआ था ,हाथ उठाया और कहा कि "मैं भी योगदान कड़ना चाहता हूँ। " वहां पर बैठे लोगों ने सोचा कि कोई गरीब आदमी है, 2-5 रुपया देगा। एक व्यक्ति पास आया और उसने पूछा "कितना चन्दा दीजियेगा दे दीजिए"
उस व्यक्ति को देख कर् पण्डित मालवीय मुस्कुराए।
उस व्यक्ति ने कहा "जी कुछ लाए हैं ,गिन लीजिए"
जब चन्दा गिना जाने लगा तो चन्दा की रकम कुल एक लाख रुपया जो आजके 10 करोड़ के बराबर होगी निकला। सारे स्टेट ने मिलकर उतना चन्दा नही दिया था।
पण्डित मदन मोहन मालवीय ने उनका परिचय महासभा से करबाया। वो थे "बाबू लंगट सिंह" । वैशाली धरहरा के निवासी बाबू लंगट सिंह । उन्होंने महासभा से गुजारिस की हम मुज्जफपुर में भी महासभा के एक आयोजन चाहते हैं। 1899 को महासभा की दूसरी बैठक मुज्जफरपुर में हुई।जिसमे वनारस महराज सहित बहुत से गणमान्य उपस्थित हुए। वहां भूमिहार ब्राह्मण कॉलेजिएट हाय स्कूल सह कॉलेज खोलने की बात सर्वसम्मति से पारित हुई। उस समय मुज्जफरपुर शहर में जो हाय स्कूल था उसमे गरीब के बच्चे नही पढ़ पाते थे, इसलिए एक स्कूल की स्थापना जरूरी थी जिसमे गरीब वंचित के बच्चे पढ़ सकें।
हथुआ नरेश और दरभंगा महराज ने उस कॉलेज में चन्दा देने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने कहा कि हम खुद दरभंगा और छपडा में कॉलेज खोलना चाहते हैं। बाबू लंगट सिंह ने मुज्जफरपुर के जमींदारों की एक सभा बुलाई और सहयोग से कॉलेज खुला। उसमे कॉलेज के रख रखाव के लिए 22 सदस्यी कमिटि की स्थापना की गई।जिसमेबाबू लंगट सिंह के अलावे शिवहर नरेश शिवराज नन्दन सिंह,हरदी के जमींदार बाबु कृष्ण नारायण सिंह,जैतपुर स्टेट के रघुनाथ दास,,यदुनन्दन शाही,महंथ प्रमेश्वरनारायन,म्हंथद्वारिक नाथ, योगेंद्रनारायन सिंह थे।
इस कॉलेज की मान्यता में अंग्रेज के एक अधिकारी ग्रीयर साहब का भी योगदान रहा इसलिए शुरुआत में इस कॉलेज का नाम ग्रीयर भुमिहार ब्राह्मण हाय स्कूल सह कॉलेज रखा गया।
1909 में कोलकत्ता विश्विद्यालय के अंग्रेज प्रतिनिधि कॉलेज देखने आए कहा जाता है कि उन्होंने घुस की पेशकश की , और भवन इमारत पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे। बाबू लंगट सिंह ने पूछा कि भवन इमारत कैसा चाहिए। तो जरूरत से बड़ा भवन इमारत बनाने की बात की गई और नही बनने पर मान्यता रद्द करने की बात की गई। साथ ही कहा कुछ घुस दे दीजिए तो मैनेज हो जाएगा।
बाबू लंगट सिंह ने अपने बेटे आनन्दा बाबू ,से बात की और दोनों ने तय किया कि घुस देने के जगह भवन निर्माण ही होगा। भवन निर्माण के दौरान 15 अप्रैल 1912 को महामानव बाबू लंगट सिंह का निधन हो गया। लोगों को लगा कि कॉलेज अब खत्म हो जाएगा। लेकिन उनके पुत्र आनंद बाबू ने एक रिहायशी जमीन बेचकर इस कॉलेज का भवन निर्माण समय पर पूरा करबाया और उस कॉलेज का नाम बाबू लंगट सिंह कॉलेज पड़ा।
काशी हिंदू विश्विद्यालय के छात्र बाबू जगजीवन राम हुए और लंगट सिंह कॉलेज के भी छात्र मोहम्मद यसुफ़ हुए।
बाबू लंगट सिंह खानदानी जमींदार नही थे, समस्तीपुर में उन्होंने रेलवे लाइन मेन का काम किया, कुशलता देख कर् उन्हें सुपरवाइजर बनाया गया। बाद में उन्होंने रेलवे की ठीकेदारी ली। और एक सामान्य परिवार से आगे का सफर तय किया। रेलवे के ठीका के क्रम में ही उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि वो खुद ज्यादा पढ़े लिखे नही थे ,लेकिन अपने निजी कमाई से उन्होंने बिहार के बड़े कॉलेजों में से एक बाबू लंगट सिंह कॉलेज का निर्माण करबाया। जिसमे हर तबके के छात्र को पढ़ने की स्वतंत्रता थी।
✍️ Rajnikant Pandey jee के वाल से