18/07/2025
जब हमारे पास क्षमता है, तो परनिर्भरता क्यों?
भारत एक ऐसा देश है जिसकी वैज्ञानिक क्षमता, प्रतिभा और संसाधनों की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। हमारे पास अंतरिक्ष से लेकर समुद्र तक, कृषि से लेकर चिकित्सा तक, विज्ञान के हर क्षेत्र में विशेषज्ञता है। फिर भी यह एक गहरा और विचारणीय प्रश्न है कि जब हमारे वैज्ञानिक विश्वस्तरीय तकनीकों को विकसित करने में पूरी तरह सक्षम हैं, हमारे संस्थानों में नवीनतम उपकरण और अनुसंधान की सुविधाएँ मौजूद हैं, तो हमें तकनीकी मामलों में विदेशी देशों पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है?
यह एक विडंबना है कि हम अपने वैज्ञानिकों को सम्मान तो देते हैं, लेकिन उनकी खोजों को व्यवहार में लाने के लिए आवश्यक ढांचा और समर्थन अक्सर नहीं मिल पाता। हमारे संस्थान जैसे ISRO, DRDO, CSIR, ICAR, और IISc अपने क्षेत्रों में विश्व स्तरीय कार्य कर रहे हैं। ISRO ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतार कर पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत सीमित संसाधनों में भी चमत्कार कर सकता है। भारत बायोटेक ने Covaxin जैसे स्वदेशी टीके का निर्माण कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की। DRDO और HAL जैसे संस्थानों ने लड़ाकू विमान तेजस, ब्रह्मोस मिसाइल, और अर्जुन टैंक जैसे अत्याधुनिक रक्षा उपकरण तैयार किए हैं।
फिर भी कई बार देखा जाता है कि कृषि में बीज, रक्षा क्षेत्र में तकनीकी उपकरण, चिकित्सा क्षेत्र में मशीनें या जैव प्रौद्योगिकी के उत्पाद हम विदेशी कंपनियों से खरीदते हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि हमारे अनुसंधान और उद्योग के बीच समन्वय की कमी है। शोध तो होता है, लेकिन वह प्रयोगशाला से बाहर निकलकर आम लोगों तक नहीं पहुँच पाता। परिणामस्वरूप जब किसी नई तकनीक की आवश्यकता होती है, तो नीति-निर्माताओं के पास विदेशी विकल्प अधिक भरोसेमंद और त्वरित दिखाई देते हैं। यह प्रवृत्ति हमारे घरेलू नवाचारों को पीछे धकेल देती है और हमें तकनीकी रूप से परनिर्भर बना देती है।
यह भी सच है कि हमारे देश में अनुसंधान पर होने वाला खर्च अब भी सीमित है। भारत में R&D पर GDP का केवल 0.7% ही खर्च होता है, जबकि चीन और अमेरिका जैसे देश इस क्षेत्र में 2.5% से अधिक निवेश करते हैं। ऐसे में हमारे वैज्ञानिकों के पास प्रतिभा तो होती है, लेकिन ज़रूरी संसाधन और प्रोत्साहन की कमी के कारण वे या तो विदेश चले जाते हैं या उनके शोध पत्र तक ही सीमित रह जाते हैं।
आज समय की माँग यह है कि न केवल सरकार, बल्कि कॉर्पोरेट सेक्टर, उद्योग जगत और समाज भी अनुसंधान को समर्थन देने के लिए सामने आए। जब तक भारत में कॉर्पोरेट–इंडस्ट्री–रिसर्च सहयोग (Corporate-Industry-Research Collaboration) नहीं बनेगा, तब तक हम नवाचार को तकनीकी उत्पादों में बदलने और उन्हें व्यावसायिक स्तर पर सफल बनाने में पिछड़े रहेंगे। अब समय आ गया है कि निजी उद्योग केवल विदेशी लाइसेंस खरीदने की प्रवृत्ति से बाहर निकलें और देश में तैयार हो रही तकनीकों को बाज़ार तक पहुँचाने में भूमिका निभाएँ। इसके लिए CSR फंडिंग, संयुक्त स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्लेटफॉर्म और विश्वविद्यालय उद्योग साझेदारी को बढ़ावा देना होगा।
हमारे निजी उद्योग कई बार विदेशी तकनीकों को खरीदना अधिक लाभकारी समझते हैं क्योंकि उसमें समय की बचत और बाजार की जल्दी पकड़ संभव होती है। लेकिन यह सोच दीर्घकाल में देश को कमजोर करती है। यदि हम ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘डिज़ाइन्ड एंड डेवेलप्ड इन इंडिया’ की ओर नहीं बढ़े, तो हम कभी भी तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाएंगे।
अब समय आ गया है कि हम अपने संस्थानों और वैज्ञानिकों पर न केवल विश्वास करें, बल्कि उनके कार्यों को नीति, उद्योग और समाज से जोड़ें। विश्वविद्यालयों को स्टार्टअप्स और उद्योगों के साथ जोड़ा जाए ताकि शोध को वास्तविक उत्पाद में बदला जा सके। सरकार को चाहिए कि वह अनुसंधान को केवल प्रयोगशाला तक सीमित न रखे, बल्कि व्यावसायिक स्तर तक पहुँचाने के लिए अनुदान और सुविधाएँ दे। जब हमारे युवा वैज्ञानिक और इंजीनियर विदेशों में जाकर Google, NASA, और Microsoft जैसे संस्थानों का नेतृत्व कर सकते हैं, तो वे अपने देश में क्यों नहीं कर सकते?
हमें आत्मनिरीक्षण करना होगा कि क्या हम तकनीकी आत्मनिर्भरता को केवल नारे तक सीमित रखना चाहते हैं, या इसे वास्तविकता में बदलना चाहते हैं। जब तक हम अपने वैज्ञानिक नवाचारों को सम्मान नहीं देंगे, उन्हें नीति और बाजार का हिस्सा नहीं बनाएँगे, तब तक हम "विकासशील" से "विकसित" बनने की यात्रा पूरी नहीं कर पाएंगे।
अतः यह आवश्यक है कि हम अपने विज्ञान, वैज्ञानिकों और संस्थानों पर गर्व करते हुए उन्हें हर स्तर पर समर्थन दें l ताकि भारत न केवल एक बड़ा बाज़ार बने, बल्कि एक बड़ा आविष्कारक, उत्पादक और तकनीकी नेतृत्वकर्ता भी बन सके l
Dr sandeep kumar
DDUC University of Delhi