15/08/2023
आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा के लिए, उन्हें उजाड़ना कोई नई बात नहीं है। यह आजादी के बाद ही शुरू हो गया था। छत्तीसगढ़ के बस्तर के इलाके में इसका सबसे पहले विरोध आदिवासियों के राजा प्रवीर चंद भंजदेव के किया। उन्हें उनकी साथियों सहित भून दिया गया। उनके बारे में बता रहे हैं, जनार्दन गोंड :ऐसा नहीं है कि आदिवासियों द्वारा मुख्यधारा में शामिल होने का प्रयास कभी हुआ ही नही।
संविधान निर्माण सभा में डॉ. जयपाल सिंह मुंडा शामिल थे। भारतीय राजनीति में डॉ. जयपाल सिंह से लेकर कार्तिक उरांव, करिया मुंडा, शिबू सोरेन से होते हुए हीरासिंह मरकाम तक, यह कोशिश जारी थी। आदिवासी नेताओं और आदिवासियों के रहनुमाओं की ओर से जब–जब इस दिशा में यह कोशिश की गई, तब-तब उनके साथ विश्वासघात किया गया अथवा जान से मार दिया गया। आदिवासियों द्वारा न्याय पाने के लिए संघर्ष का इतिहास शुरू से ही रक्त-रंजित रहा है।
आजादी के समय लगभग 565 रियासत थीं, जिनके शासक नवाब या राजा कहलाते थे। आजाद भारत की कई प्रमुख समस्याओं में एक समस्या इन रियासतों के विलय की भी थी। ऐसे कई राजा या नवाब थे जो आजादी और विलय को देशहित में मानते थे। इसीलिए कुछ रियासतों को छोड़ कर अधिकांश रियासतों ने स्वेच्छा से भारत के संघीय ढांचे का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया।
नए रंग और देश की आजादी व रियासतों के विलय से बस्तर नरेश और काकतीय वंश के अंतिम राजा प्रवीर चंद भंजदेव बहुत आशान्वित थे। उन्होंने ही बस्तर रियासत के विलयपत्र पर दस्तखत किए थे और राष्ट्रीय राजनीति में भाग लेने के लिए कांग्रेस में शामिल हुए। बस्तर के आदिवासी दंतेश्वरी देवी और राजा प्रवीर चंद भंजदेव में असीम आस्था रखते हैं। बस्तर के आदिवासियों में राजा प्रवीर चंद भंजदेव के प्रति लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी तस्वीर बस्तर के सभी आदिवासियों के घरों में देखने को मिल जाएगी। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशरा, जो विश्व का सबसे अधिक दिनों का पर्व कहा जाता है, के मेले में प्रवीर चंद भंजदेव के फोटो की अप्रत्याशित बिक्री होती है। बस्तर के आदिवासी इनकी पूजा करते हैं।
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banswara