02/02/2017
बक्सर का युद्ध अक्टूबर 1764 में बक्सर नगर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगल नबाबों के बीच लड़ा गया था।
बंगाल के नबाब मीर कासिम, अवध के नबाब शुजाउद्दौला, तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना अंग्रेज कंपनी से लड़ रही थी। लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई और इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बांग्लादेश का दीवानी और राजस्व अधिकार अंग्रेज कंपनी के हाथ चला गया।
पृष्ठभूमि:-
प्लासी के युद्ध के बाद सतारुढ़ हुआ मीर जाफ़र अपनी रक्षा तथा पद हेतु ईस्ट इंडिया कंपनी पर निर्भर था। जब तक वो कम्पनी का लोभ पूरा करता रहा तब तक पद पर भी बना रहा। उसने खुले हाथो से धन लुटाया, किंतु प्रशाशन सम्भाल नही सका, सेना के खर्च, जमींदारों की बगावातो से स्थिति बिगड़ रही थी, लगान वसूली मे गिरावट आ गई थी, कम्पनी के कर्मचारी दस्तक का जम कर दुरूपयोग करने लगे थे वो इसे कुछ रुपयों के लिए बेच देते थे इस से चुंगी बिक्री कर की आमद जाती रही थी बंगाल का खजाना खाली होता जा रहा था।
हाल्वेल ने माना की सारी समस्या की जड़ मीर जाफ़र है। उसी काल में जाफर का बेटा मीरन मर गया जिस से कम्पनी को अवसर मिल गया था और उसने मीर कासिम जो जाफर का दामाद था, को सत्ता दिलवा दी। इस हेतु 27 सितंबर 1760 एक संधि भी हुई जिसमे कासिम ने 5 लाख रूपये तथा बर्दवान, मिदनापुर, चटगांव के जिले भी कम्पनी को दे दिए। इसके बाद धमकी मात्र से जाफ़र को सत्ता से हटा दिया गया और मीर कासिम सत्ता मे आ गया। इस घटना को ही 1760 की क्रांति कहते है।
मीर कासिम का शासन काल ( 1760-64)
मीर कासिम ने रिक्त राजकोष, बागी सेना, विद्रोही जमींदार जैसी विकट समस्याओ का हल निकाल लिया। बकाया लागत वसूल ली, कम्पनी की मांगें पूरी कर दी, हर क्षेत्र मे उसने कुशलता का परिचय दिया। अपनी राजधानी मुंगेर ले गया, ताकि कम्पनी के कुप्रभाव से बच सके सेना तथा प्रशासन का आधुनिकीकरण आरम्भ कर दिया।
उसने दस्तक पारपत्र के दुरूपयोग को रोकने हेतु चुंगी ही हटा दी। मार्च १७६३ मे कम्पनी ने इसे अपने विशेषाधिकार का हनन मान युद्ध आरम्भ कर दिया। लेकिन इस बहाने के बिना भी युद्ध आरम्भ हो ही जाता क्योंकि दोनों पक्ष अपने अपने हितों की पूर्ति मे लगे थे। कम्पनी को कठपुतली चाहिए थी लेकिन मिला एक योग्य हाकिम।
1764 युद्ध से पूर्व ही कटवा, गीरिया, उदोनाला, की लडाईयों मे नवाब हार चुका था उसने दर्जनों षड्यन्त्र्कारियों को मरवा दिया (वो मीर जाफर का दामाद था और जानता था कि सिराजुदोला के साथ क्या हुआ था।)
अवध, मीर कासिम, शाह आलम का गठ जोड़:-
मीर कासिम ने अवध के नवाब से सहायता की याचना की, नवाब शुजाउदौला इस समय सबसे शक्ति शाली था। मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई(1761) से उबर नही पाए थे, मुग़ल सम्राट तक उसके यहाँ शरणार्थी था, उसे अहमद शाह अब्दाली की मित्रता प्राप्त थी।
जनवरी 1764 मे मीर कासिम उस से मिला उसने धन तथा बिहार के प्रदेश के बदले उसकी सहायता खरीद ली। शाह आलम भी उनके साथ हो लिया। किंतु तीनो एक दूसरे पर संदेह करते थे।
परिणाम
परिणाम बेहद मह्ताव्पूर्ण निकले। सहज ही प्रयास से पूरा अवध कम्पनी को मिल गया था। नवाब शुजाउदौला की हालत इतनी गिर गई की उसने कम्पनी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था (मई 1764)। शाह आलम भी कम्पनी की शरण मे आ गया था। बंगाल अब कम्पनी का अधीनस्थ राज्य बन गया। अवध उस पर आश्रित तथा मुग़ल सम्राट कम्पनी का पेंशन भोगी। ये सभी कार्य इलाहाबाद की संधि (16 अगस्त 1764) से हुआ इस के बाद बंगाल, बिहार, उड़ीसा, झारखण्ड की दीवानी कम्पनी को मिल गई थी। बंगाल मे द्वैध शासन शुरू हो गया। मीर कासिम ने अवध के नवाब से सहायता की याचना की, नवाब शुजाउदौला इस समय सबसे शक्ति शाली था। मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई से उबर नही पाए थे, मुग़ल सम्राट तक उसके यहाँ शरणार्थी था, उसे अहमद शाह अब्दाली की मित्रता प्राप्त थी जनवरी 1764 मे मीर कासिम उस से मिला उसने धन तथा बिहार के प्रदेश के बदले उसकी सहायता खरीद ली। शाह आलम भी उनके साथ हो लिया। किंतु तीनो एक दूसरे पर संदेह करते थे।
युद्ध:-
23 अक्टूबर 1764 को युद्ध हुआ जिसमे मुनरो ने तीनो को हरा दिया था।