Usia Public School

Usia Public School "Usia Public School" is an unique intiative for School Education. UPS strongly believe on the Islamic philsosphy of education.

UPS has to change the modern narrative of education where only slave and robot is being produced.

05/12/2025

स्कूल के सिलेबस और सब्जेक्ट्स के अलावा बच्चों को उनकी ज़िन्दगी से जुड़े हक़ीक़ी पहलुओं पर भी बात करना बहुत ज़रूरी है। अगर स्टूडेंट एक बार सही रास्ते पर आ जाए तो फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वह उस मंज़िल की तरफ़ जा पहुँचेगा जहाँ हर माँ-बाप उसे देखना चाहता है।
कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें माँ-बाप को अपने बच्चों से करनी ही चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पाता, इसलिए इस गैप को हम पूरा करने की भरपूर कोशिश करते हैं।

Mohsin Khan
Usia Public School

06/02/2025

Aliya Khan
Standard - VII

Selection in various competitive exam could be possible only due to the hardwork of Students itself.
16/06/2024

Selection in various competitive exam could be possible only due to the hardwork of Students itself.

Selection in various competitive exam could be possible only due to the hardwork of students itself.
16/06/2024

Selection in various competitive exam could be possible only due to the hardwork of students itself.

06/12/2023

Mariya Khan
Standard - III
Giving her view about Prophet Muhammad SAW.

03/12/2023

Meharbani karke apne bachho ke andar se English ka Raub khatm karein.
Angreji bolne walo se apne bachho ko mutassir na hone de aur na khud aap mutassir ho.

Yeh sirf ek Jaban hai jo waqt ke saath saath aa hi jayegi.

Bachho ko Gaur o Fikr karna wala banaye na ki andhi taqleed karne wala banaye.

Apne bachoo ko andhi taqleed karne wala zaroor banaye lekin Sirf Muhammad S A W ki.

हम और हमारी मुस्तक़बिल और उस मुस्तक़बिल को सवारने  के लिए तालीम की क्या अहमियत है? तो यक़ीनन बहुत बड़ी अहमियत है।  लेकिन सवा...
02/12/2023

हम और हमारी मुस्तक़बिल और उस मुस्तक़बिल को सवारने के लिए तालीम की क्या अहमियत है? तो यक़ीनन बहुत बड़ी अहमियत है।
लेकिन सवाल यह है कि मुस्तक़बिल कैसा ? कार्दाशेव स्केल पर टाइप 0 से लेकर टाइप 7 तक का मुस्तक़बिल फिलहाल मौजूद है और हमारी तरक़्क़ीयाफ्ता लोग भी आज 0.7 स्केल पर है और अगले 100 सालो में हम टाइप 1 स्केल पर पहुंच सकेंगे ।
टाइप 1 स्केल पर हमारा मुस्तक़बिल यह होगा की हम आधे रोबोट और आधे इंसान यानी साईबोर्ग होंगे जिसकी शुरुआत अब हो भी चुकी है।
अब जरा टाइप 6 स्केल पर हमारे मुस्तक़बिल का अंदाजा लगाए इसलिए की हज़रत ए इंसान इस जिस्म की क़ैद ओ बंद से आज़ाद हो जायेंगे । और टाइप 7 स्केल पर इंसान कभी पहुंच ही नहीं पायेगा क्योंकि यही उसकी लिमिटेशन होगी।

यह सारी बातें किसी मजहबी किताब में नहीं बल्कि साइंसदानो की मैथमेटिकल कैलकुलेशन है। इन सारे स्केल तक का सफर करने के लिए इंसान को किस चीज की ज़रुरत होगी ? यक़ीनन एजुकेशन।
आज हमारी इंसानी अख़लाक़ीयात और तहज़ीब जिस स्केल पर है इसका डायरेक्ट रिलेशन कार्दाशेव स्केल से भी है ।
तो क्या एजुकेशन के बढ़ने के साथ साथ हमारे अखलकियात और तहज़ीब में बदलाव नहीं आएगी ?
हर इंसान अपने 50 साल पीछे की दुनिया को देखे तो पायेगा की उस वक़्त हमारी अख़लाक़ीयात और तहज़ीब दोनों ऊंची थी आज के बनिस्बत।
तालीम बढ़ती चली गयी अख़लाक़ीयात और तहज़ीब घटती चली गयी ।
सूद , रिबा किसी ज़माने में काबिल ए मजम्मत क़ाबिल ए हकारत समझी जाती थी। और आज ?
इस महफ़िल में बैठा कौन सा इंसान इस अज़ीम गुनाह से पाक है ? जिसकी पादाश में गुनाह अपनी सगी माँ से ज़िना करने से भी कही ज्यादा है।
जिसने बनु ए इंसानियत को न दिखने वाली जंजीरो में जकड रखा है।
आज यह गुनाह ए अज़ीम ज़ुल्म ए अज़ीम हमारे तालीम का अहम् हिस्सा है और इसमें मुलव्विस लोग मुआशरे के इज़्ज़तदार और मानिंद लोग है।

कभी फिरौन ने कहा था कि ये निज़ाम मेरा है मर्जी मेरी चलेगी , हमारी नजरो में बद्तरीन काफिर है फिरौन।
आज हम कहते हैं कि निज़ाम हम बनाएंगे क़ानून हम बनाएंगे मर्ज़ी सिर्फ हमारी होगी कि इंसान क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे।
और ये हमारे तालीम का अहम हिस्सा है और इसमे मुलव्विस लोग आला दर्जे के रसूखदार और इज्जत दार लोग हैं। गोया कि फिरौन के कुफ्र को हमने अपने ऊपर तकसीम कर लिया.... ।
हजरत ए इंसान के जद्दे अमजद कौन हैं? आदम या होमोसैपियन? आपकी तालीम क्या बताती है आपको? आदम या होमोसैपियन?
बहुत कम उमर में हमारे जेहनो में ये डाल दिया जाता है कि हम आदम की नसल से नहीं बल्कि बंदरो की नसल से है। बजाहिर कोई मुसलमान इस चीज को नहीं मानता लेकिन यह छोटी से बात उसके डीप साइकोलॉजी में ऐसा यलगार करती है कि वो बाकी जिंदगी शक ओ सुबह में ही रह जाता है। और जिसका ज़हूर इल्हाद की शक्ल में दिख जाता है हत्ता कि नीम मुलहिद को इस बात का एहसास तक नहीं हो पाता है।

यकीनन तालीम ने हमारे अक़दार हमारे अख़लाक़ीयात और हमारे तहज़ीब को बदल कर रख दिया। इबलीस ए अजाज़ील ने अल्लाह ताला से एक वादा किया था, कि मैं तुम्हारे बंदो को मग्ज़ूब ए अलैहिम बनाऊंगा उस रास्ते पर लाऊंगा जिस पर तेरी अज़ाब नाज़िल हुई और मुझे कह लेने दीजिए कि आज अजाजील अपने वादे में कामयाब है और तालीम उसका सबसे बेहतर हथियार है ।
हम जब तालीम की बात करते हैं तो हमारा मकसद आज की तालीम होती है न कि पुराने जमाने की तालीम जिसका अक़दार ओ तख्खयुलात बिल्कुल अलग थे।
आज की तालीम एक पूरा पैकेज है वो आपको माशी फरवानी जरूर देगी लेकिन अपने साथ एक नई तहज़ीब लेकर आएगी और शैतान ए अज़ाजील को हमें इसी तहज़ीब पर लाना था। जरा गौर करें...क्या हम उस तहजीब की तरफ गमजान नहीं हो चुके हैं?

तमाम दलाएल की बुनियाद पर मै यह कह सकता हूँ कि तालीम हमारे मुस्तकबिल को कुछ इस तरह से बदल कर रख देगी कि जिसे आज हम शदीद गैर इख़्लाक़ी, ज़ुल्म और गुनाह समझते है कल वो हमारे लिए हमारे जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाएगी।
यूरोप की मिसाल हमारे सामने मौजूद है।
तालीम के बदौलत आज यूरोप गुरबत से निकलकर फ़रावानी की ज़िन्दगी में दाखिल हुआ गोया जिस मुल्क ने तालीम अपनाई ग़ुरबत को अलविदा कह दिया लेकिन असल सवाल तो यह है की क्या इस तालीम ने इंसानी अक़दार को इंसानी बनाने में भी कोई किरदार निभाया है ?
हरगिज नहीं।
क्योंकि इस तालीम का मरकज ओ मस्कन नफ़्स है न की रूह और जैसे भी नफ़्स को तस्कीन मिले इस तालीम ने उसको जाएज़ ठहराया।
इस तालीम ने जो भी सोशल साइंसेज इकोनोमिकल साइंसेज नेचुरल साइंसेज परवान चढ़ाई सबने इंसान की नफ़्स को मुक़द्दम रखा नफ़्स को भड़काया और अपने रब से दूर किया।
क्या वजह है की आज जो जितना तालीम याफ्ता है मजहब से उसकी उतनी ही दूरी है?
रिबा में शामिल लोगो का अल्लाह और उसके रसूल से ऐलान ए जंग है और हम तालीम याफ्ता यह कहकर की बिना रिबा के कोई मुआशी निज़ाम ही नहीं चल सकता क्या अल्लाह और उसके रसूल से ऐलान ए जंग नहीं कर रहे है ?
ये जदीद तालीम की ज़रुरत ही क्यों पड़ी ? क्या हम पूरानी रिवायत पर रह कर ज़िन्दगी को आसान नहीं बना सकते थे ?
यूरोप ने अपने गुलामो को जहनी तौर पर अपने ताबे करना था और दूसरी चीज की उन्हें ऐसे मज़दूर चाहिए थे जो उनके निज़ाम को उनके हुक्म पर चला सके।
आप खुश होते है की हम आज़ाद है और मुझे अफ़सोस है की हम ऐसे गुलाम है जिसे अपनी गुलामी का भी एहसास नहीं है। जिस्म आपकी ज़रूर आज़ाद होगी जेहन तो आपका गुलाम है। ऐसा इसलिए की हमारे जेहन को इस तालीम के ज़रिये मुसख्खर कर लिया गया ।
इस तालीम ने हमें सरफ़रोश, खुद्दार , दाना, हकीम और फ़रासत वाला नहीं बनाया बल्कि खुद गरज़, लालची, बुजदिल और दुनिया परस्त बनाया है अलबत्ता मुआशी फ़रावानी ज़रूर बख्शी है।
लिहाजा यह तालीम हमारे मुस्तक़बिल को ज़रूर बदलेगी हमें और ज्यादा खुदगर्ज़, लालची, बुजदिल और दुनिया परस्त बनाएगी ।
अगरचे तो हमें मुआशी फ़रावानी के बदले ये सारी चीजे मंज़ूर है फिर तो हमें इस तालीम को ज़ोर ओ शोर के साथ अपना लेनी चाहिए।
लेकिन मेरा दिल कहता है कि किसी मुसलमान को दौलत के वास्ते बुजदिली, लालच, खुदगर्ज़ी और दुनिया परस्ती नहीं चाहिए।
लेकिन जाने अनजाने में हम इस तालीम के शिकार ज़रूर है और यक़ीनन ये तालीम मुस्तक़बिल में अपने नए नए रंग में हमें रंगती जाएँगी ।
और फिर से वही बात की तालीम की भरपूर अहमियत है मुस्तक़बिल को बनाने के लिए लेकिन मुस्तक़बिल कैसा ?
ऐसा मुस्तक़बिल जिसमे इंसानो के अक़दार, अख़लाक़ीयात, तहज़ीब, तमद्दुन सब कुछ बदल चुकी होगी।
यक़ीनन इल्म हासिल करने वाला और इल्म से आरी रहने वाला बराबर नहीं हो सकते लेकिन कौन सा इल्म ?
इल्म वो जो इंसानो को इंसानो की गुलामी से निकाले, नेक ,गैरत-मंद, खुद्दार और फरासत वाला बनाये।
ज़रा सोचे कि क्या इल्म जो हम हासिल करते हैं या जिसकी हम बात करते हैं वो हमारे अंदर इनमें से कोई एक खूबी भी पैदा करती है?

अगर जवाब ना है तो फिर हमें ऐसे इल्म की तरफ पेशकदमी करने की ज़रुरत है जो हमें इस दुनिया में भी सुकून बक्शे और उस दुनिया में भी। यह हमारे लिए बहुत आसान नहीं है। “Energy can neither be created nor destroyed” यह कहने के बजाये हम यह कहते कि …
It is only Allah who create energy and destroy it.
तालीम से हमने अपने रब को गायब कर दिया और यही वो अलमिया है जिसने माजी के इंसानो की मुस्तक़बिल यानी आज के इंसानो फ़िक्र को ऐसा तराशा की आज हम सभी नीम मुल्हिद बन चुके है।
आज हमें खुदा से ज्यादा उसके क़ुदरत के कानून उसी की पैदा करदा माद्दी वसाएल पर भरोसा है। अगर ये आज की बात है तो क्या कल खुदा का इंकार नहीं होगा ?
क्या यूरोप ने इस तालीम को हासिल कर खुदा का इंकार नहीं कर दिया ?
तो तालीम हमारे मुस्तक़बिल पर असरअन्दाज ज़रूर होगी हमारे मुस्तक़बिल को खूबसूरत ज़रूर बनाएगी लेकिन याद रखिये हमारे इस दुनिया में आने का मक़सद भुला देगी।
दुनिया की अक्सरियत इस दुनिया में आने का मक़सद भूल चुकी है
हमें तय करना होगी की हमने आलम ए अरवाह में जो वादा अपने रब से किया था उसे भुला देना है या ज़िंदा रखना है।
यक़ीनन ये तालीम हमें उस वादे से दूर ले जाएगी। इस दुनिया के बाद एक हक़ीक़ी दुनिया भी तो है और वही तो हमारी असल मुस्तक़बिल है। क्यों न हम एक ऐसे तालीम को अपनाये जो हमें इस दुनिया में भी कामयाबी दे और उस हक़ीक़ी दुनिया में भी।
याद रहे ये तालीम हमारी आईन्दा नस्लों को इस दुनिया में खूब कामयाबी दे लेकिन उस हक़ीक़ी दुनिया में में नाकाम न करा दे।
हमारे सामने दो - दो मुस्तक़बिल है। एक ..... इस दुनिया का मुस्तक़बिल और एक इस दुनिया के बाद का मुस्तक़बिल।
फैसल हमें करना है की क्या हमें दोनों मुस्तक़बिल में कामयाबी चाहिए या सिर्फ इस दुनिया के मुस्तक़बिल में कामयाबी चाहिए ?
अगरचे तो हमें दोनों मुस्तक़बिल में कामयाबी चाहिए तो हमें एक नए तालीम और उसके नए बयानिये और निज़ाम को अपनाना होगी।
ये काम आसान नहीं है। निहायत मुश्किल काम है लेकिन इसकी कीमत इस मुश्किल से कही ज्यादा है जिसे हम जन्नत कहते है।
अगर ये तालीम हमारे लिए जन्नत का रास्ता और कुंजी बन जाये तो फिर क्या कहना।
क्या हम इस बदलाव के लिए तैयार है ?
सवाल मुझे खुद से भी है और आप सब से भी है।

सौलत खान ( Mohsin Khan )
Usia Public School

27/12/2022

Founder of Usia Public School could not stop themselves to run in race with students. :) ;)

27/12/2022

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