History Of Rajasthan By Royal Computer Center Nimod

History Of Rajasthan By Royal Computer Center Nimod By Er Pankaj kumar

06/04/2021

राजस्थान की चित्र शैलियां (पार्ट-1)

राजस्थान की चित्रकला शैली पर गुजरात तथा कश्मीर की शैलियों का प्रभाव रहा है।

राजस्थानी चित्रकला के विषय
1. पशु-पक्षियों का चित्रण 2. शिकारी दृश्य 3. दरबार के दृश्य 4. नारी सौन्दर्य 5. धार्मिक ग्रन्थों का चित्रण आदि

राजस्थानी चित्रकला शैलियों की मूल शैली मेवाड़ शैली है।

भौगौलिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला शैली को चार भागों में बांटा गया है। जिन्हें स्कूलस कहा जाता है।

1.मेवाड़ स्कूल:- उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, चावण्ड शैली, देवगढ़ शैली, शाहपुरा, शैली।

2.मारवाड़ स्कूल:- जोधपुर शैली, बीकानेर शैली जैसलमेर शैली, नागौर शैली, किशनगढ़ शैली।

3.ढुढाड़ स्कूल:- जयपुर शैली, आमेर शैली, उनियारा शैली, शेखावटी शैली, अलवर शैली।

4.हाडौती स्कूल:- कोटा शैली, बुंदी शैली, झालावाड़ शैली।

शैलियों की पृष्ठभूमि का रंग
हरा - जयपुर की अलवर शैली

गुलाबी/श्वेत - किशनगढ शैली

नीला - कोटा शैली

सुनहरी - बूंदी शैली

पीला - जोधपुर व बीकानेर शैली

लाल - मेवाड़ शैली

पशु तथा पक्षी
हाथी व चकोर - मेवाड़ शैली

चील/कौआ व ऊंठ - जोधपुर तथा बीकानेर शैली

हिरण/शेर व बत्तख - कोटा तथा बूंदी शैली

अश्व व मोर:- जयपुर व अलवर शैली

गाय व मोर - नाथद्वारा शैली

वृक्ष
पीपल/बरगद - जयपुर तथा अलवर शैली

खजूर - कोटा तथा बूंदी शैली

आम - जोधपुर तथा बीकानेर शैली

कदम्ब - मेवाड़ शैली

केला - नाथद्वारा शैली

नयन/आंखे
खंजर समान - बीकानेर शैली

मृग समान - मेवाड शैली

आम्र पर्ण - कोटा व बूंदी शैली

मीन कृत:- जयपुर व अलवर शैली

कमान जैसी - किशनगढ़ शैली

बादाम जैसी - जोधपुर शैली

1. मेवाड़ स्कूल
उदयपुर शैली
राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली है।

शैली का प्रारम्भिक विकास कुम्भा के काल में हुआ।

शैली का स्वर्णकाल जगत सिंह प्रथम का काल रहा।

महाराणा जगत सिंह के समय उदयपुर के राजमहलों में "चितेरोंरी ओवरी" नामक कला विद्यालय खोला गया जिसे "तस्वीरों रो कारखानों "भी कहा जाता है।

विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतन्त्र नामक ग्रन्थ में पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से मानव जीवन के सिद्वान्तों को समझाया गया है।

पंचतन्त्र का फारसी अनुवाद "कलिला दमना" है, जो एक रूपात्मक कहानी है। इसमें राजा तथा उसके दो मंत्रियों कलिता व दमना का वर्णन किया गया है

उदयपुर शैली में कलिला और दमना नाम से चित्र चित्रित किए गए थे।

सन 1260-61 ई. में मेवाड़ के महाराणा तेजसिंह के काल में इस शैली का प्रारम्भिक चित्र श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चूर्णि आहड़ में चित्रित किया गया। जिसका चित्रकार कमलचंद था।

सन् 1423 ई. में महाराणा मोकल के समय सुपासनह चरियम नामक चित्र चित्रकार हिरानंद के द्वारा चित्रित किया गया।

प्रमुख चित्रकार - मनोहर लाल, साहिबदीन (महाराणा जगत सिंह -प्रथम के दरबारी चित्रकार) कृपा राम, अमरा आदि।

चित्रित ग्रन्थ - 1. आर्श रामायण - मनोहर व साहिबदीन द्वारा। 2. गीत गोविन्द - साहबदीन द्वारा।

चित्रित विषय -मेवाड़ चित्रकला शैली में धार्मिक विषयों का चित्रण किया गया।

इस शैली में रामायण, महाभारत, रसिक प्रिया, गीत गोविन्द इत्यादि ग्रन्थों पर चित्र बनाए गए। मेवाड़ चित्रकला शैली पर गुर्जर तथा जैन शैली का प्रभाव रहा है।

नाथ द्वारा शैली
नाथ द्वारा मेवाड़ रियासत के अन्र्तगत आता था, जो वर्तमान में राजसमंद जिले में स्थित है।

यहां स्थित श्री नाथ जी मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराजा राजसिंह न 1671-72 में करवाया था।

यह मंदिर पिछवाई कला के लिए प्रसिद्ध है, जो वास्तव में नाथद्वारा शैली का रूप है।

इस चित्रकला शैली का विकास मथुरा के कलाकारों द्वारा किया गया।

महाराजा राजसिंह का काल इस शैली का स्वर्ण काल कहलाता है।

चित्रित विषय - श्री कृष्ण की बाल लीलाऐं, गतालों का चित्रण, यमुना स्नान, अन्नकूट महोत्सव आदि।

चित्रकार - खेतदान, घासीराम आदि।

देवगढ़ शैली
इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराजा द्वाारिकादास चुडावत के समय हुआ।

इस शैली को प्रसिद्धी दिलाने का श्रेय डाॅ. श्रीधर अंधारे को है।

चित्रकार - बगला, कंवला, चीखा/चोखा, बैजनाथ आदि।

शाहपुरा शैली
यह शैली भीलवाडा जिले के शाहपुरा कस्बे में विकसित हुई।

शाहपुरा की प्रसिद्ध कला फडु चित्रांकन में इस चित्रकला शैली का प्रयोग किया जाता है।

फड़ चित्रांकन में यहां का जोशी परिवार लगा हुआ है।

श्री लाल जोशी, दुर्गादास जोशी, पार्वती जोशी (पहली महिला फड़ चित्रकार) आदि

चित्र - हाथी व घोड़ों का संघर्ष (चित्रकास्ताजू)

चावण्ड शैली

इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराणा प्रताप के काल में हुआ।

स्वर्णकाल -अमरसिंह प्रथम का काल माना जाता है।

चित्रकार - जीसारदीन इस शैली का चित्रकार हैं

राजस्थान की चित्र शैलियां (पार्ट-2)

नीसारदीन न "रागमाला" नामक चित्र बनाया !

2. मारवाड़
स्कूल
जोधपुर शैली
इस शैली पर मुगल शैली का प्रभाव हैं।

इस शैली का प्रारम्भिक विकास राव मालदेव (52 युद्धों का विजेता) के काल में हुआ।

स्वर्णकाल, जसवंत सिंह प्रथम का काल रहा।

अन्य संरक्षक - मानसिंह, शूरसिंह, अभय सिंह थे।

चित्रित विषय - राजसी ठाठ-बाट, दरबारी दृक्श्य आदि।

चित्रकार - किशनदास भाटी, देवी सिंह भाटी, अमर सिंह भाटी, वीर सिंह भाटी, देवदास भाटी, शिवदास भाटी, रतन भाटी, नारायण भाटी, गोपालदास भाटी, प्रमुख थे।

प्रमुख चित्र - इस चित्रकला शैली में मुख्यतः लोकगाथाओं का चित्रण किया गया। जैसे:-"मूमलदे-निहालदे", ढोला-मारू", उजली-जेठवा"।

किशनगढ़ शैली
किशनगढ़ शैली, किशनगढ के शासक सांवत सिंह राठौड़ के समय फली-फूली।

इस शैली का स्वर्णकाल 1747 से 1764 ई. का समय माना जाता है।

महाराजा सांवत सिंह के समय इस शैली का सर्वश्रेष्ठ चित्र बणी-ठणी को सांवत सिंह के चित्रकार "मोरध्वज निहाल चन्द" द्वारा चित्रित किया गया।

इस शैली के चित्र "बणी-ठणी" पर सरकार द्वारा 1973 ई. में 20 पैसें का डाक टिकट जारी किया जा चुका।

एरिक डिक्सन ने "बणी-ठणी" चित्र की "मोनालिसा" कहा है।

इस शैली को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर दिलाने का श्रेय एरिक डिक्सन तथा अली को दिया जाता है।

किशनगढ़ शैली, का प्रमुख विषय नारी सौंदर्य रहा है।

यह शैली, कागड़ा शैली, से प्रभावित रही है।

अन्य चित्र -चांदनी रात की संगीत गोष्ठी (चित्रकार-अमर चंद)

अन्य चित्रकार - छोटू सिंह व बदन सिंह अन्य प्रमुख चित्रकार है।

किशनगढ के शासक सांवत सिंह अन्तिम समय में राजपाट ढोड़कर-वृदांवन चले गए और कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। उन्होने अपना नाम "नागरीदास" रखा तथा 'नागर समुच्चय " नाम से काव्यरचना करने लगे।

बीकानेर शैली
यह शैली, मुगल शैली, से प्रभावित रही।

इस शैली, का प्रारम्भिक विकास रायसिंह राठौड़ के समय हुआ।

इस शैली, का स्वर्णकाल महाराजा अनूपसिंह का काल माना जाता है।

इस शैली, का प्रयोग आला-गिला कारीगरी तथा उस्ता कला में किया गया।

इस शैली, के अन्तर्गत महाराजा राय सिंह के समय प्रसिद्ध चित्रकार हामित रूकनुद्दीन थे।

महाराजा गज के समय शाह मोहम्मद (लाहौर से लाए गए)

महाराजा अनूपसिंह के प्रमुख दरबारी चित्रकार हसन, अल्लीरज्जा और रामलाल थे।

अन्य चित्रकार - मुन्नालाल व मस्तलाल अन्य प्रमुख चित्रकार थे।

इस शैली में चित्रण का विषय दरबारी दृश्य, बादल दृश्य थे।

इस शैली में पुरूष आकृति दाड़ी मूंह युक्त तथा उग्रस्वभाव वाली दर्शाई गई।

इस शैली, का सबसे प्राचीन चित्र "भागवत पुराण" महाराजा रायसिंह के समय चित्रित किया गया।

जैसलमेर शैली
राज्य की एक मात्र शैली है जिस पर किसी अन्य शैली का प्रभाव नहीं है।

इस शैली में रंगों की अधिकता देखने को मिलती है।

इस शैली का प्रसिद्ध चित्र "मूमल" है।

"मूमल" को 'मांड की मोनालिसा' कहा जाता है।

इस शैली का प्रारम्भिक विकास हरराय भाटी के काल में हुआ।

इस शैली का स्वर्णकाल अखैराज भाटी का काल माना जाता है।

नागौर शैली
इस शैली में धार्मिक चित्रण किया गया है।

नागौर शैली में हल्के /बुझे हुए रंगों का प्रयोग किया गया है।

3. ढूढाड़ स्कूल
अलवर शैली
अलवर शैली पर ईरानी, मुगल तथा जयपुर शैली का प्रभाव है।

महाराजा विनय सिंह का काल इस शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।

महाराजा शिवदान के समय इस शैली में वैश्या या गणिकाओं पर आधारित चित्र बनाए गए, अर्थात कामशास्त्र पर आधारित चित्र इस शैली की निजी विशेषता है।

इस शैली में हाथी दांत की प्लेटों पर चित्रकारी का कार्य चित्रकार मूलचंद के द्वारा किया गया।

बसलो चित्रण अर्थात् बार्डर पर सुक्ष्म चित्रण तथा योगासन इस शैली के प्रमुख विषय है।

अलवर शैली के चित्रों की पृष्ठ भूमि में शुभ्र आकाश का तथा सफेद बादलों का दृश्य दिखाया गया है।

प्रमुख चित्रकार - मुस्लिम संत शेखसादी द्वारा रचित ग्रन्थ मुस्लिम पर आधारित चित्र गुलाम अली तथा बलदेव नामक चित्रकारों द्वारा तैयार किए गए। डालचंद, सहदेव व बुद्धाराम अन्य प्रमुख चित्रकरण है।

आमेर शैली
इस शैली मै प्राकृतिक रंगों की प्रधानता है।

इस शैली का प्रारम्भिक विकास मानसिंह- प्रथम के काल में हुआ।

मिर्जा राजा जयसिंह का काल आमेर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।

आमेर चित्रकला शैली का प्रयोग आमेर के महलों में भिति चित्रण के रूप में किया गया है। इस शैली पर मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव रहा।

प्रमुख चित्र - 1. बिहारी सतसई (जगन्नाथ -चित्रकार) 2.आदि पुराण (पुश्दत्त -चित्रकार )

जयपुर शैली
जयपुर शैली का प्रारम्भिक विकास सवाई जयसिंह के समय हुआ।

जयपुर शैली का स्वर्णकाल सवाई प्रताप सिंह का काल माना जाता है।

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06/04/2021

वनरक्षक एवं वनपाल भर्ती 2020™:
✅राजस्थान के प्रमुख वन्यजीव अभयारण्य ✊

1. राष्ट्रीय मरू उद्यान, जैसलमेर

2. सरिस्का मरू उद्यान, अलवर

3. दर्रा अभ्यारण्य, कोटा, झालावाड़

4. सवाई मानसिंह, सवाई माधोपुर

​5. कैला दैवी, करौली

6. कुंभलगढ़, उदयपुर

7. फुलवारी की नाल, उदयपुर

8. टाडगढ़ रावली, अजमेर

9. सीतामाता, प्रतापगढ़

10. रामगढ़ विषधारी, बूंदी

11. जमवारामगढ़, जयपुर

12. मांउट आबु, सिरोही

13. राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य - कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर ( राजस्थान, MP, UP तीन राज्यो में)

14. भैंसरोडगढ़, चितौडगढ

15. बंधबरैठा, भरतपुर

16. बस्सी- चितौड़गढ़

17. जवाहर सागर -कोटा

18. शेरगढ़- बांरा

19. जयसमंद, उदयपुर

20. नाहरगढ़, जयपुर

21. रामसागर, धौलपुर

22. केसरबाग, धौलपुर

23. वनविहार, धौलपुर

24. तालछापर, चुरू

25. सज्जनगढ़, उदयपुर

26. सरिस्का अभ्यारण -अलवर (सबसे छोटा अभयारण्य)

27. सवाईमाधोपुर अभ्यारण्य- सवाईमाधोपुर

🔰राजस्थान की प्रसिद्ध होलीया ☄️
( फाल्गुन पूर्णिमा )

1 रोने- बिलखने वाली होली = जोधपुर

2 गोबर के कंडो की होली = गलियाकोट (डूंगरपुर)

3 राड रमण की होली = भिलुड़ा ग्राम (डूंगरपुर)

4 पत्थर मार होली = बाड़मेर

5 लठमार होली = श्री महावीरजी चांदन गांव (करौली)

6 डेगची या बाल्टी मार होली = बीकानेर

7 कोडा मार होली = भिनाय(अजमेर)

8 दूध व दही की होली = नाथद्वारा (राजसमंद)

9 बादशाह की होली = नाथद्वारा (राजसमंद)

10 अंगारों की होली = केकड़ी (अजमेर)+ लालसोट ( राजसमंद)

11 देवर भाभी की होली = ब्यावर (अजमेर)

12 नहान की होली = सांगोद (कोटा)

13 मुर्दों की होली = मरुधनी (भीलवाड़ा)

14 फूलों की होली = गोविंद देव जी मंदिर (जयपुर)

15 कंकड़ मार होली = जैसलमेर

16 भाटा गैर = जालौर

17 कानुडा गांव का गैर नृत्य = बाड़मेर

18 गोटा गैर = भीनमाल

06/04/2021

Important points of Rajasthan Agriculture
अजमेर।
गाय भैंस का कृत्रिम गर्भाधारण केन्द्र(फ्रोजन सिमन बैंक)
बस्सी, जयपुर
मण्डौर, जोधपुर
राज्य भेड़ प्रजनन केन्द्र - चित्तौड़गढ़, जयपुर, फतेहपुर(सीकर), बांकलिया(नागौर)
राज्य गौवंश प्रजनन केन्द्र - बस्सी(जयपुर), कुम्हेर(भरतपुर), डग(झालावाड़), नोहर(हनुमानगढ़), चांदन(जैसलमेर), नागौर।
बकरियां
राजस्थान में सबसे बड़ा पशुधन बकरियां है। 19 वीं पशु गणना के अनुसार इनकी कुल संख्या 80.24 लाख थी।

देश का कुल बकरा मांस उत्पादन में राजस्थान का प्रथम(35 प्रतिशत) स्थान है।

बकरी की नस्ल
जमनापुरी - सर्वाधिक दुध देने वाली बकरी
लोही - सर्वाधिक मांस देने वाली बकरी
जखराना - सर्वाधिक दुध व सांस देने वाली श्रेष्ठ नस्ल - अलवर
बरबरी - सुन्दर बकरी - भरतपुर, सवाई माधोपुर
अन्य बकरी की नस्ल - परबतसरी, सिरोही व मारवाड़ी।

गाय
गौवंश की नस्लें
1. गिर गाय - उद्गम - गिर प्रदेश(गुजरात)।

इसे रेडां/अजमेरा भी कहते हैं।

अजमेर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा।

2. राठी - लालसिंधी एवं साहिवाल की मिश्रण नस्ल।

सर्वाधिक दुध देने वाली गाय की श्रेष्ठ नस्ल।

गंगानगर, जैसलमेर, बीकानेर।

3. थारपारकर - उद्गम - बाड़मेर का मालाणी प्रदेश।

दुसरी सर्वाधिक दुध देने वाली गाय।

उत्तरी - पश्चिमी सीमावर्ती जिले।

4. नागौरी - उद्गम - नागौरी का सुहालक प्रदेश।

इसका बैल चुस्त व मजबुत कद काठी का होता है।

नागौर, बीकानेर, जोधपुर।

5. कांकरेज - उद्गम - कच्छ का रन।

गाय की द्विप्रयोजनीय नस्ल।

जालौर, पाली, सिरोही, बाड़मेर।

6. सांचौरी - जालौर, पाली, उदयपुर।

7. मेवाती - अलवर, भरतपुर,कोठी(धौलपुर)।

8. मालवी - मध्यप्रदेश की सीमा वाले जिले।

9. हरियाणवी - हरियाणा के सीमा वाले जिले।

भैंस
भैंस की नस्ल
1. मुर्रा(कुन्नी) - सर्वाधिक दुध देने वाली भैंस की नस्ल।

जयपुर, अलवर।

2. बदावरी - इसके दुध में सर्वाधिक वसा होती है।

भरतपुर, सवाई माधोपुर, अलवर।

3. जाफाराबादी - भैंस की श्रेष्ठ नस्ल।

कोटा, बांरा, झालावाड़।

अन्य नस्ल - नागपुरी, सुरती, मेहसाना।

भेड़
भेड़ की नस्लें

1. चोकला(शेखावटी) - इसका ऊन श्रेष्ठ किस्म का होता है इसे भारत की मेरिनों कहते है। चुरू, सीकर, झुन्झुनू।

2. जैसलमेरी - सर्वाधिक ऊन देने वाली भेड़ की नस्ल।

क्षेत्र - जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर।

3. नाली - इसका ऊन लम्बे रेशे का होता है, जिसका उपयोग कालीन बनाने में किया जाता है।

क्षेत्र - गंगानगर, बीकानेर, चुरू, झुन्झुनू।

4. मगरा - सर्वाधिक मांस देने वाली नस्ल।

क्षेत्र - जैसलमेर, बीकानेर, चुरू, नागौर।

5. मारवाड़ी - इसमें सर्वाधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है।

क्षेत्र - जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर।

6. सोनाड़ी/चनोथर - लम्बे कान वाली नस्ल।

क्षेत्र - उदयपुर, डुंगरपुर, बांसवाड़ा।

7. पूंगला - बीकानेर में।

8. मालपुरी/अविका नगरी - टोंक, बुंदी, जयपुर।

9. खेरी नस्ल - भेड़ के रेवड़ों में पाई जाती है।

ऊंट
अन्य पशुधन में ऊंटों की संख्या सर्वाधिक है। 19 वीं पशुगणना के अनुसार राजस्थान में ऊंट 3.25 लाख थे।

ऊंट की नस्ल
1. नांचना - सवारी व तेज दौड़ने की दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंट।

2. गोमठ - भारवाहक के रूप में प्रसिद्ध ऊंट।

फलौदी(जोधपुर)।

अन्य नस्ल - अलवरी, बाड़मेरी, बीकानेरी, , कच्छी ऊंट, सिन्धी ऊंट।

जैसलमेरी ऊंट - मतवाली चाल के लिए प्रसिद्ध।

रेबारी ऊंट पालक जाती है। पाबू जी राठौड की ऊंटों का देवता भी कहा जाता है। ऊंटों में सर्रा नामक रोग पाया जाता है।

केन्द्रीय ऊंट प्रजनन केन्द्र जोडबीड (बीकानेर) में है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा इस केन्द्र की स्थापना की गई है। राजस्थान में देश के 70 प्रतिशत ऊंट पाये जाते है। विश्व में सर्वाधिक ऊंट आस्ट्रेलिया में है।

राजस्थान का ऊन उत्पादन में देश में प्रथम स्थान है।

केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड - जोधपुर।

केन्द्रीय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला - बीकानेर।

राजस्थान में सर्वाधिक ऊन उत्पादन जोधपुर, बीकानेर, नागौर में व न्यूनतम ऊन उत्पादन झालावाड़ में होता है।
नोट - केन्द्रीय ऊंट प्रजनन केन्द्र जोहडबीड़ बीकानेर की स्थापना -5 जुलाई 1984।

कुक्कुट
पशुगणना के समय मुर्गे मुर्गियों की गणना भी की जाती है। 19 वीं पशुगणना के समय इनकी संख्या 80.24 लाख थी। सर्वाधिक कुक्कुट अजमेर में व देशी कुक्कुट बांसवाडा जिले में है।

अजमेर में मुर्गी पालन प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है। अण्डों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रजत व सुनहरी क्रांतियां आरम्भ की गई है।

"हाॅप एण्ड मिलियम जोब प्रोग्राम" अण्डो के विपणन हेतु आरम्भ की गई है।

रानी खेत व बर्डफ्लू मुर्गे व मुर्गियों में पाये जाने वाली प्रमुख बिमारियां है।

राजकीय कुक्कुटशाला - जयपुर।

डुंगरपुर व बांसवाड़ा में दो बतख व चूजा पालन केन्द्र स्थापित किये हैं, जो आदिवासीयों को बतख व कुक्कुट चूजे उपलब्ध करवाता है।

01/04/2021

History of India
भारत का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना माना जाता है।
65,000 साल पहले, पहले आधुनिक मनुष्य, या होमो सेपियन्स, अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में पहुँचे थे, जहाँ वे पहले विकसित हुए थे।

सबसे पुराना ज्ञात आधुनिक मानव आज से लगभग 30,000 वर्ष पहले दक्षिण एशिया में रहता है।
6500 ईसा पूर्व के बाद, खाद्य फसलों और जानवरों के वर्चस्व के लिए सबूत, स्थायी संरचनाओं का निर्माण और कृषि अधिशेष का भण्डारण मेहरगढ़ और अब बलूचिस्तान के अन्य स्थलों में दिखाई दिया।
ये धीरे-धीरे सिंधु घाटी सभ्यता में विकसित हुए, दक्षिण एशिया में पहली शहरी संस्कृति, जो अब पाकिस्तान और पश्चिमी भारत में 2500-1900 ई.पू. के दौरान पनपी

मेहरगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है जहां नवपाषाण युग (7000 ईसा-पूर्व से 2500 ईसा-पूर्व) के बहुत से अवशेष मिले हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता, जिसका आरम्भ काल लगभग 3300 ईसापूर्व से माना जाता है,

प्राचीन मिस्र और सुमेर सभ्यता के साथ विश्व की प्राचीनतम सभ्यता में से एक हैं। इस सभ्यता की लिपि अब तक सफलता पूर्वक पढ़ी नहीं जा सकी है। सिन्धु घाटी सभ्यता वर्तमान पाकिस्तान और उससे सटे भारतीय प्रदेशों में फैली थी। पुरातत्त्व प्रमाणों के आधार पर 1900 ईसापूर्व के आसपास इस सभ्यता का अकस्मात पतन हो गया।

19वीं शताब्दी के पाश्चात्य विद्वानों के प्रचलित दृष्टिकोणों के अनुसार आर्यों का एक वर्ग भारतीय उप महाद्वीप की सीमाओं पर 2000 ईसा पूर्व के आसपास पहुंचा और पहले पंजाब में बस गया और यहीं ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की गई। आर्यों द्वारा उत्तर तथा मध्य भारत में एक विकसित सभ्यता का निर्माण किया गया, जिसे वैदिक सभ्यता भी कहते हैं। प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्यता सबसे प्रारम्भिक सभ्यता है जिसका सम्बन्ध आर्यों के आगमन से है। इसका नामकरण आर्यों के प्रारम्भिक साहित्य वेदों के नाम पर किया गया है। आर्यों की भाषा संस्कृत थी और धर्म "वैदिक धर्म" या "सनातन धर्म" के नाम से प्रसिद्ध था, बाद में विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा इस धर्म का नाम हिन्दू पड़ा।

वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब (भारत) और हरियाणा राज्य आते हैं, में विकसित हुई। आम तौर पर अधिकतर विद्वान वैदिक सभ्यता का काल 2000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के बीच में मानते है, परन्तु नए पुरातत्त्व उत्खननों से मिले अवशेषों में वैदिक सभ्यता से संबंधित कई अवशेष मिले है जिससे कुछ आधुनिक विद्वान यह मानने लगे हैं कि वैदिक सभ्यता भारत में ही शुरु हुई थी, आर्य भारतीय मूल के ही थे और ऋग्वेद का रचना काल 3000 ईसा पूर्व रहा होगा, क्योंकि आर्यों के भारत में आने का न तो कोई पुरातत्त्व उत्खननों पर अधारित प्रमाण मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानों से कोई प्रमाण मिला है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व परिषद् द्वारा की गयी सरस्वती नदी की खोज से वैदिक सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और आर्यों के बारे में एक नया दृष्टिकोण सामने आया है। हड़प्पा सभ्यता को सिन्धु-सरस्वती सभ्यता नाम दिया है, क्योंकि हड़प्पा सभ्यता की 2600 बस्तियों में से वर्तमान पाकिस्तान में सिन्धु तट पर मात्र 265 बस्तियाँ थीं, जबकि शेष अधिकांश बस्तियाँ सरस्वती नदी के तट पर मिलती हैं, सरस्वती एक विशाल नदी थी। पहाड़ों को तोड़ती हुई निकलती थी और मैदानों से होती हुई समुद्र में जाकर विलीन हो जाती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में बार-बार आता है, यह आज से 4000 साल पूर्व भूगर्भी बदलाव की वजह से सूख गयी थी।

ईसा पूर्व 7वीं और शुरूआती 6वीं शताब्दि सदी में जैन और बौद्ध धर्म सम्प्रदाय लोकप्रिय हुए। अशोक (ईसापूर्व 265-241) इस काल का एक महत्वपूर्ण राजा था जिसका साम्राज्य अफगानिस्तान से मणिपुर तक और तक्षशिला से कर्नाटक तक फैल गया था। पर वो सम्पूर्ण दक्षिण तक नहीं जा सका। दक्षिण में चोल सबसे शक्तिशाली निकले। संगम साहित्य की शुरुआत भी दक्षिण में इसी समय हुई। भगवान गौतम बुद्ध के जीवनकाल में, ईसा पूर्व ७ वीं और शुरूआती 6 वीं शताब्दी के दौरान सोलह बड़ी शक्तियाँ (महाजनपद) विद्यमान थे। अति महत्‍वपूर्ण गणराज्‍यों में कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और वैशाली के लिच्‍छवी गणराज्‍य थे। गणराज्‍यों के अलावा राजतन्त्रीय राज्‍य भी थे, जिनमें से कौशाम्‍बी (वत्‍स), मगध, कोशल, कुरु, पान्चाल, चेदि और अवन्ति महत्‍वपूर्ण थे। इन राज्‍यों का शासन ऐसे शक्तिशाली व्‍यक्तियों के पास था, जिन्‍होंने राज्‍य विस्‍तार और पड़ोसी राज्‍यों को अपने में मिलाने की नीति अपना रखी थी। तथापि गणराज्‍यात्‍मक राज्‍यों के तब भी स्‍पष्‍ट संकेत थे जब राजाओं के अधीन राज्‍यों का विस्‍तार हो रहा था। इसके बाद भारत छोटे-छोटे साम्राज्यों में बंट गया।

आठवीं सदी में सिन्ध पर अरबों का अधिकार हो गया। यह इस्लाम का प्रवेश माना जाता है। बारहवीं सदी के अन्त तक दिल्ली की गद्दी पर तुर्क दासों का शासन आ गया जिन्होंने अगले कई सालों तक राज किया। दक्षिण में हिन्दू विजयनगर और गोलकुण्डा के राज्य थे। 1556 में विजय नगर का पतन हो गया। सन् 1526 में मध्य एशिया से निर्वासित राजकुमार बाबर ने काबुल में पनाह ली और भारत पर आक्रमण किया। उसने मुग़ल वंश की स्थापना की जो अगले 300 वर्षों तक चला। इसी समय दक्षिण-पूर्वी तट से पुर्तगाल का समुद्री व्यापार शुरु हो गया था। बाबर का पोता अकबर धार्मिक सहिष्णुता के लिए विख्यात हुआ। उसने हिन्दुओं पर से जज़िया कर हटा लिया। 1659 में औरंगज़ेब ने इसे फिर से लागू कर दिया। औरंगज़ेब ने कश्मीर में तथा अन्य स्थानों पर हिन्दुओं को बलात मुसलमान बनवाया। उसी समय केन्द्रीय और दक्षिण भारत में शिवाजी के नेतृत्व में मराठे शक्तिशाली हो रहे थे। औरंगज़ेब ने दक्षिण की ओर ध्यान लगाया तो उत्तर में सिखों का उदय हो गया। औरंगज़ेब के मरते ही (1707) मुगल साम्राज्य बिखर गया। अंग्रेज़ों ने डचों, पुर्तगालियों तथा फ्रांसिसियों को भगाकर भारत पर व्यापार का अधिकार सुनिश्चित किया और 1857 के एक विद्रोह को कुचलने के बाद सत्ता पर काबिज हो गए। भारत को आज़ादी 1947 में मिली जिसमें महात्मा गांधी के अहिंसा आधारित आन्दोलन का योगदान महत्वपूर्ण था। 1947 के बाद से भारत में गणतान्त्रिक शासन लागू है। आज़ादी के समय ही भारत का विभाजन हुआ जिससे पाकिस्तान का जन्म हुआ और दोनों देशों में कश्मीर सहित अन्य मुद्दों पर तनाव बना हुआ है।

स्रोत
प्राचीन भारत का इतिहास समान्यत विद्वान भारतीय इतिहास को एक संपन्न पर अर्धलिखित इतिहास बताते हैं पर भारतीय इतिहास के कई स्रोत है। सिंधु घाटी की लिपि, अशोक के शिलालेख, हेरोडोटस, फ़ा हियान, ह्वेन सांग, संगम साहित्य, मार्कोपोलो, संस्कृत लेखकों आदि से प्राचीन भारत का इतिहास प्राप्त होता है। मध्यकाल में अल-बेरुनी और उसके बाद दिल्ली सल्तनत के राजाओं की जीवनी भी महत्वपूर्ण है। बाबरनामा, आईन-ए-अकबरी आदि जीवनियां हमें उत्तर मध्यकाल के बारे में बताती हैं।

प्रागैतिहासिक काल (3300 ईसा पूर्व तक)

भीमबेटका के शैल-चित्र (३०,००० वर्ष पुराने)
भारत में मानव जीवन का प्राचीनतम प्रमाण १००,००० से ८०,००० वर्ष पूर्व का है।। पाषाण युग (भीमबेटका, मध्य प्रदेश) के चट्टानों पर चित्रों का कालक्रम ४०,००० ई पू से ९००० ई पू माना जाता है। प्रथम स्थायी बस्तियां ने ९००० वर्ष पूर्व स्वरुप लिया। उत्तर पश्चिम में सिन्धु घाटी सभ्यता ७००० ई पू विकसित हुई, जो २६वीं शताब्दी ईसा पूर्व और २०वीं शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य अपने चरम पर थी। वैदिक सभ्यता का कालक्रम भी ज्योतिष के विश्लेषण से ४००० ई पू तक जाता है।

पहला नगरीकरण (3300 ईसापूर्व–1500 ईसापूर्व)
सिन्धु घाटी सभ्यता
मुख्य लेख: सिंधु घाटी सभ्यता
द्रविड़ मूल
वैदिक सभ्यता (1500 ईसापूर्व–600 ईसापूर्व)
भारत को एक सनातन राष्ट्र माना जाता है क्योंकि यह मानव सभ्यता का पहला राष्ट्र था। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध में भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन आता है।

भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वयंभु मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद भक्त ध्रुव के पिता थे। इन्हीं प्रियव्रत के दस पुत्र थे। तीन पुत्र बाल्यकाल से ही विरक्त थे। इस कारण प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त कर एक-एक भाग प्रत्येक पुत्र को सौंप दिया। इन्हीं में से एक थे आग्नीध्र जिन्हें जम्बूद्वीप का शासन कार्य सौंपा गया। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। यह हिमवर्ष या अजनाभवर्ष ही प्राचीन भारत देश था। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे। ऋषभदेव ने वानप्रस्थ लेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे।

दूसरा नगरीकरण (600 ईसापूर्व–200 ईसापूर्व)

१६ महाजनपद
मुख्य लेख: प्राचीन भारत
१००० ईसा पूर्व के पश्चात १६ महाजनपद उत्तर भारत में मिलते हैं। ५०० ईसवी पूर्व के बाद, कई स्वतंत्र राज्य बन गए। उत्तर में मौर्य वंश, जिसमें चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक सम्मिलित थे, ने भारत के सांस्कृतिक पटल पर उल्लेखनीय छाप छोड़ी | १८० ईसवी के आरम्भ से, मध्य एशिया से कई आक्रमण हुए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में इंडो-ग्रीक, इंडो-स्किथिअन, इंडो-पार्थियन और अंततः कुषाण राजवंश स्थापित हुए | तीसरी शताब्दी के आगे का समय जब भारत पर गुप्त वंश का शासन था, भारत का "स्वर्णिम काल" कहलाया। दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न समयकाल में कई राजवंश चालुक्य, चेर, चोल, कदम्ब, पल्लव तथा पांड्य चले | विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, खगोल शास्त्र, प्राचीन प्रौद्योगिकी, धर्म, तथा दर्शन इन्हीं राजाओं के शासनकाल में फले-फूले |

प्रारंभिक मध्यकालीन भारत (200 ईसापूर्व–1200 ईसवी)
मुख्य लेख: मध्यकालीन भारत
12वीं शताब्दी के प्रारंभ में, भारत पर इस्लामी आक्रमणों के पश्चात, उत्तरी व केन्द्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन हो गया; और बाद में, अधिकांश उपमहाद्वीप मुगल वंश के अधीन। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली निकला। हालांकि, विशेषतः तुलनात्मक रूप से, संरक्षित दक्षिण में, अनेक राज्य शेष रहे अथवा अस्तित्व में आये।

गत मध्यकालीन भारत (1200 – 1526 ईसवी)
प्रारंभिक आधुनिक भारत (1526 – 1858 ईसवी)
भारत में उपनिवेश और ब्रिटिश राज

ब्रितानी भारत (१८६० ई)
17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेन सहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया। अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और १८४० ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए। १८५७ ई में ब्रिटिश इस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध असफल विद्रोह, जो कि भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम से जाना जाता है, के बाद भारत का अधिकांश भाग सीधे अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।

आधुनिक और स्वतन्त्र भारत (1850 ईसवी के बाद)

भारत की स्वतन्त्रता और विभाजन साथ-साथ
मुख्य लेख: आधुनिक भारत और स्वतन्त्रता के बाद भारत का संक्षिप्त इतिहास
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये संघर्ष चला। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप 15 अगस्त, 1947 ई को सफल हुआ जब भारत ने अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की, मगर देश को विभाजन कर दिया गया। तदुपरान्त 26 जनवरी, 1950 ई को भारत एक गणराज्य बना।

13/01/2021

NAGAUR DISTRICT DEATAILS
BY ER PANKAJ KUMAR NIMOD
CONT 9610800153
नागौर जिले का कुल #क्षेत्रफल – 17,718 वर्ग किलोमीटर

नागौर जिले की मानचित्र स्थिति – 25°25′ से 27°40′ उत्तरी अक्षांश तथा 73°18′ से 75°15′ पूर्वी देशान्‍तर है।

नागौर जिले में कुल #वनक्षेत्र – 235.93 वर्ग किलोमीटर

नागौर जिले के #उपनाम → अहिच्छत्रपुर, औजारों की नगरी, राजस्थान की धातु नगरी

नागौर जिले में #विधानसभा क्षेत्रों की संख्‍या 10 है, जो निम्‍न प्रकार है →

1. लाडनूं, 2. डीडवाना, 3. जायल, 4. नागौर, 5. खींवसर, 6. मेड़ता, 7. डेगाना, 8. मकराना, 9. नावां, 10. परबतसर

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार नागौर जिले की जनसंख्‍या के आंकड़े निम्‍नानुसार है →

कुल #जनसंख्या—33,07,743

पुरुष—16,96,325;

स्त्री—16,11,418

दशकीय वृद्धि दर—19.2%;

#लिंगानुपात—950

जनसंख्या घनत्व—187;

#साक्षरता दर—62.8%

पुरुष साक्षरता—77.2%;

महिला साक्षरता—47.8%

नागौर जिले में कुल पशुधन – 31,50,011 (LIVESTOCK CENSUS 2012)

नागौर जिले में कुल पशु घनत्‍व – 178 (LIVESTOCK DENSITY(PER SQ. KM.))

नागौर जिले का ऐतिहासिक विवरण →

प्राचीन समय में नागौर #जांगल देश की राजधानी रहा था। राजस्‍थान के निर्माण के पूर्व नागौर जोधपुर रियासत का एक भाग था। यह मारवाड़ रियासत का एक परगना माना जाता था। प्राचीन शिलालेखों तथा इतिहासविदों के अनुसार नागौर का प्राचीन नाम अहिच्छत्रपुर था। चौहान वंश के वासुदेव के साम्राज्य की आरम्भ में राजधानी अहिच्छत्रपुर ही थी।

इस नगर पर लगभग 2 हजार वर्षों तक नागवंशीय राजाओं का अधिकार रहा, जिन्‍हें बाद में परमार राजपूतों ने पराजित किया। मुगल शासन के शक्तिहीन होने के पश्‍चात् जोधपुर के राठौड़ राजाओं का नागौर पर अधिकार हो गया।
जोधपुर के तत्‍कालीन महाराजा गजसिंह प्रथम के वीर पुत्र अमरसिंह राठौड़ की शौर्य गाथाओं के कारण नागौर
इतिहास में अपना महत्त्वपूर्ण स्‍थान रखता है।

किसान केशरी स्व. #बलदेव राम मिर्धा नागौर के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्तित्व के व्यक्ति थे।

कृष्‍ण भक्‍त मीरा की जन्‍मस्‍थली मेड़ता भी इसी जिले में है। विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के प्रवर्तक जम्‍भेश्‍वर जी का अवतार भी जिले के पीपासर गांव में हुआ था। नागौर जिले का खरनाल गांव लोक देवता तेजाजी का जन्‍मस्‍थली है।

आजादी के बाद व राजस्‍थान बनने पर नागौर को जिला मुख्‍यालय का दर्जा मिला तथा तत्‍कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्‍टूबर, 1959 को नागौर से ही #पंचायती राज का श्री गणेश किया।

नागौर जिले की प्रमुख नदियाँ—

जोजड़ी नदी—जोजड़ी नदी का उद्गम नागौर जिले के पोंडलू गाँव की पहाडिय़ों से होता है। यह लूनी की सहायक नदियों में एकमात्र ऐसी नदी है, जिसका उद्गम अरावली की पहाडिय़ों से नहीं होता है। यह लूनी नदी में पश्चिम दिशा से मिलती है तथा यह लूनी की एकमात्र ऐसी सहायक नदी है, जो दांयी तरफ से लूनी नदी में मिलती है।

नागौर जिले में बहने वाली अन्‍य नदियाँ—लूनी, हरसौर।

डीडवाना झील—इस झील का नमक खाने योग्य नहीं है। डीडवाना झील पर 1960 में ‘राजस्थान स्टेट कैमिकल वर्क्‍स’ नामक उर्वरक कारखाना स्थापित किया गया, जो देश का सबसे बड़ा कारखाना है। इस झील के नमक का प्रयोग चमड़ा व कागज उद्योग में होता है। यहाँ पर नमक बनाने वाली संस्थाएँ देवल कहलाती हैं।

नावां झील—यहाँ पर भारत सरकार का मॉडल साल्ट फार्म (आदर्श लवण उद्योग) विकसित किया गया है।

अन्य—डेगाना, भैरोंदा, कुचामन झील।

इन्दिरा गाँधी नहर की लिफ्ट नहर—गजनेर लिफ्ट (वर्तमान नाम-पन्नालाल बारुपाल लिफ्ट) से नागौर को पेयजल की आपूर्ति होती है।

नागौर जिले के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्‍थल →

नागौर का किला→ नागौर के किले के उप नाम → नाग किला या नगाणा। इस दुर्ग का निर्माण सोमेश्वर के सामन्त कैमास (के मास) ने विक्रम संवत् 1211 में करवाया।

नागौर किले की विशेषता है कि इस किले के बाहर से चलाये गये तोपों के गोले किले के महलों को क्षति पहुँचाये बिना ही उपर से निकल जाते हैं। नागौर के किले में कुल 28 बुर्ज है। यहाँ पर शुक्र तालाब, सुन्दर फव्वारा एवं अकबरी मस्जिद का निर्माण अकबर ने करवाया। इंग्लैण्ड के प्रिन्स चार्ल्‍स इस दुर्ग का अवलोकन कर चुके हैं। इस दुर्ग के बादल महल व शीशमहल भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। अमरसिंह की शौर्य गाथाएँ इसी दुर्ग से जुड़ी है। 2007 में साफ-सफाई के लिए यूनेस्को ने इस किले को ”अवार्ड ऑफ एक्सीलैन्स” पुरस्कार से सम्मानित किया था।

कुचामन का किला→उपनाम—जागीरी किलों का सिरमौर तथा अणखला किला। इस गिरी दुर्ग का निर्माण वनखण्डी महात्मा के आशीर्वाद से मेड़तिया शासक ‘झालमसिंह‘ ने करवाया। इस दुर्ग के बारे में प्रसिद्ध कथन—”ऐसा किला राणी जाये के पास भले ही हो ठुकराणी जाये के पास नहीं।”

खींवसर का किला—इस किले में औरंगजेब ठहरा था वर्तमान में यह किला एक हेरिटेज होटल है।

मालकोट का किला—मेड़ता, निर्माता-मालदेव।

नागौर के प्रसिद्ध मन्दिर →

कैवाय माता—किनसरिया, परबतसर। किनसरिया का प्राचीन नाम सिणहडिये था। कैवाय माता दहिया राजवंश की कुलदेवी है। इसकी मूर्ति अजीत सिंह ने स्थापित करवाई।

दधिमति माता—दधिमति माता का मंदिर मांगलोद, जायल (नागौर) में स्थित है। यह माता दाधीच ब्राह्मणों की कुल देवी है। इसकी पूजा नवरात्रों में की जाती है। मांगलोद के आस-पास के क्षेत्र को पुराणों में कुशा क्षेत्र कहा गया है। इस माता के मन्दिर में राम के वनवास से लेकर रावण के वध तक का चित्रण है।

भंवाल माता—नागौर, इस माता के मन्दिर में बकरे की बलि दी जाती है।

तेजाजी—नागवंशीय जाट, पिता-ताहड़, माता-राजकुंवर, पत्नी-पैमलदे, तेजाजी को साँप ने सैन्दरिया (ब्यावर, अजमेर) में डसा उनकी मृत्यु सुरसुरा (किशनगढ़, अजमेर) में हुई। मृत्यु का समाचार घोड़ी सिणगारी/लीलण ने पहुंचाया। तेजाजी की मूर्ति सुरसुरा में थी जिसको परबतसर का हाकिम परबतसर लाया था।

तेजाजी के प्रमुख स्थल—परबतसर (नागौर) मेला-भाद्रपद शुक्ल – दशमी को लगता है। यह मेला आय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला है। इस मेले में कृषि के औजारों का सर्वाधिक क्रय-विक्रय होता है।

बलदेव पशु मेला—मेड़ता, चैत्र शुक्ल एकम् से पूर्णिमा,

रामदेव पशु मेला—मानासर, माघु शक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक।

हरिराम बाबा—झोरड़ा गाँव (नागौर) हरिराम बाबा सर्पदंश के इलाज हेतु प्रसिद्ध है। मंदिर में मूर्ति के स्थान पर साँप की बाँबी है।

वीर कल्लाजी—कल्‍लाजी का जन्म—सामियाणा (मेड़ता, नागौर) में हुआ। इनकी कुलदेवी नागणेची माता थी। कल्लाजी को ”शेषनाग का अवतार” माना जाता है कल्लाजी ने 23 फरवरी, 1568 को अपने चाचा जयमल को कन्धों पर बिठाकर अकबर के साथ युद्ध किया। इन्हें 4 हाथों व 2 सिर के लोकदेवता कहते हैं। कल्लाजी की छतरी चित्तौड़ दुर्ग के भैरव पोल में है। इनकी मुख्य पीठ—रनेला (सिरोही), प्रमुख तीथ स्थल—सामलिया (डूंगरपुर)।

मीरां बाई—मीरा बाई जन्म का 1498 ई. कुड़की गाँव (पाली) में हुआ था। मीरांबाई के पिता रतन सिंह बाजोली, मेड़ता के जागीरदार थे। अत: मीरांबाई का लालन-पालन मेड़ता में हुआ। मीरांबाई के पति महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज थे, जिनकी मृत्यु खातोली के युद्ध (1517) में हुई। मीरांबाई को विक्रमादित्य ने जहर का प्याला पिलाया, जिसको अमृत समझकर मीरां बाई ने पी लिया। मीरा बाई ने अपना जीवन का अन्तिम समय डाकोर (द्वारिका, गुजरात) में गुजारा।

चारभुजा मंदिर—मेड़ता में, मीरा संग्रहालय—मेड़ता (नागौर)

सन्त शिरोमणि श्री लिखमीदासजी महाराज मंदिर- अमरपुरा धाम (नागौर)

वीर तेजाजी मंदिर- खरनाल (नागौर)

#रानाबाई जी की जीवित समाधि-हरनावाँ पट्टी।

#कर्माबाई जी का मंदिर कालवा (मकराना)

#जाम्भोजी—इनका जन्म 1451 ई. पीपासर (नागौर) में हुआ।

नवल सम्प्रदाय—संस्थापक-नवलदासजी (हस्सालाव-नागौर), प्रधान पीठ—जोधपुर।

निरंजनी सम्प्रदाय—संस्थापक-हरिदास जी। इनका जन्म कापड़ौद (नागौर) में हुआ। हरिदास जी को ”कलयुग का वाल्मीकि” कहते हैं।

प्रधान पीठ—गाढ़ा (डीडवाना-नागौर) मेला फाल्गुन शुक्ल एकम् से द्वादशी।

रामस्नेही सम्प्रदाय रेण शाखा—संस्थापक दरियावजी, रेण को दरियापंथ भी कहते हैं।

संत हम्मी-उद्दीन—इनकी दरगाह नागौर (तारकीन की दरगाह) में है। यहाँ राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा उर्स लगता है। इन्हें राजस्थान का दूसरा ख्वाजा कहते हैं। इनके उपनाम—सन्यासियों का सुल्तान। इनकी मजार-गिनाणी तालाब के पास है।

गुसाई मंदिर—जुंजाला (नागौर)

जसनगर का शिव मंदिर—जसनगर (नागौर)

चतुरदास जी का मंदिर—बुटाटी गाँव (मेड़ता, नागौर) चतुरदास जी महाराज लकवे के निदान हेतु प्रसिद्ध है।

नागौर के मारोठ में जीण माता का मन्दिर है।

अमर सिंह की छतरी—नागौर में झड़ा (बड़ा) तालाब के समीप 16 कलात्‍मक खम्भों पर स्थित है।

लाछां गुजरी की छतरी—नागौर-तेजाजी ने लाछां की गायों को छुड़ाने के लिए (मेर) सिरोही के मीणाओं से मडांवरिया नामक स्थान पर युद्ध किया। लाछां गुजरी, तेजाजी की पत्‍नी पेमलदे की सहेली थी।

चौधरी लिखमाराम—राजस्थान के प्रथम जिला प्रमुख।

हवलदार शम्भुदयाल सिंह—प्रथम अशोक चक्र विजेता।

बनवारी लाल जोशी—छोटी खाटू (नागौर), U.P. व उत्तराखण्ड के पूर्व राज्यपाल।

नागौर जिले के अन्‍य महत्त्वपूर्ण तथ्‍य →

भारत में पंचायतीराज व्यवस्था की शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को जवाहर लाल नेहरु ने नागौर जिले के मेड़ता के बगदरी गाँव से की। इसी समय राजस्‍थान के साथ ही आन्‍ध्रपदेश में भी पंचायतीराज व्‍यवस्‍था का प्रारम्‍भ हुआ था।
राजस्थान में सर्वाधिक पशु मेले—नागौर
विश्नाई सम्प्रदाय के सर्वाधिक धार्मिक स्थल—रोटू (नागौर)।
भक्त कवयित्री करमाबाई का सम्बन्ध नागौर से है।
कानाती मस्जिद का लेख—(1641) नागौर—इसके अनुसार अनेक चौहान गौरी के काल में मुसलमान बन गये।
अमरपुर का लेख, बाकलिया का लेख—नागौर।
जामी मस्जिद का लेख—मेड़ता (नागौर)
कुराड़ा (परबतसर)—यहाँ से ताँबे के औजार मिले हैं। यहाँ पर राजस्थान राज्य के पुनर्गठन से पहले सर्वप्रथम 1934 में ताम्र सामग्री मिली।

खुड़ी—(नागौर), यहाँ से नालीदार टोंटी का कटोरा मिला।
‘मतीरे की राड़’—1644 ई. में, नागौर के शासक अमरसिंह व बीकानेर शासक कर्ण सिंह के मध्य हुई। जिसमें अमरसिंह विजयी हुआ।

गिंगोली (परबतसर)—यहाँ पर 1807 में जयपुर नरेश जगत सिंह व जोधपुर के मानसिंह राठौड़ के मध्य युद्ध हुआ। इस युद्ध में जयपुर नरेश जगतसिंह विजयी रहा।

अकबर ने 1570 ई. में नागौर दरबार लगाया था।
डाबड़ा काण्ड—13 मार्च, 1947 को हुआ, जिसमें चुन्नी लाल शर्मा, रुघाराम चौधरी, रामाराम चौधरी शहीद हो गये।
दरियाँ—टाँकला ग्राम नागौर की प्रसिद्ध है।
न्यूनतम जनजाति प्रतिशत वाला जिला-नागौर है।
गोगेलाव कन्जर्वेशन रिजर्व—नागौर, स्थापना—09 मार्च 2012।
रोटू कन्जर्वेशन रिजर्व—नागौर, स्थापना 29 मई 2012
राजस्थान में जीरा मण्डी—मेड़ता (नागौर)।
गीर व नागौरी गाय का प्रजनन केन्द्र—नागौर।
नागौरी बैल कृषि कार्यो हेतु प्रसिद्ध है (बादावास नागौर के)।
नागौर जिले के ‘वरुण गाँव’ की बकरियाँ प्रसिद्ध है।
रैंवत की पहाड़ी-डेगाना, भारत का प्रमुख टंगस्टन उत्पादन क्षेत्र है।
नागौर के भदवासी, गोठ मांगलोद, मांगलू जिप्सम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
राजस्थान में सबसे अच्छी किस्म का संगमरमर सफेद संगमरमर—मकराना (नागौर) में मिलता है, जिससे आगरा का ताजमहल व कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल बना हुआ है।
खींवसर (नागौर) में राज्य का दूसरा परमाणु बिजलीघर बनाया जा रहा है।
सफेद सीमेंट—गोटन (नागौर) यहाँ पर राज्य की प्रथम सीमेंट फैक्ट्री (जे.के. व्हाइट सीमेंट) 1984 में स्थापित की गई।
मूँडवा गाँव, नागौर में अबुंजा सीमेंट कम्पनी द्वारा सीमेंट प्लांट लगाने की घोषणा।
वर्स्‍टेड स्पिनिंग मिल—लाडनूं (नागौर) कताई हेतु प्रसिद्ध है।
अकबर का दरबारी रत्न अबुल फजल नागौर का था।
भारत की पहली रेल बस सेवा → मेड़ता रोड़ से मेड़ता सिटी के बीच 12 अक्टूबर 1994 को चलाई गई।
हड़बूजी का जन्म भूंडेल नागौर में हुआ था।
राजस्थान में देश का पहला भूमिगत गैस बिजलीघर मेड़ता रोड़ (नागौर) में बनाया।
जुलाई 2010 को खींवसर नागौर में निजी क्षेत्र की पहली सबसे बड़ी ‘सौर ऊर्जा परियोजना ‘रिलायंस इण्डस्ट्रीज’ द्वारा स्थापित की गई।
जैन विश्वभारती विद्यापीठ—लाडनूँ (नागौर) स्थापना—आचार्य तुलसी की प्रेरणा से 1971 में। 20 मार्च, 1991 में इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।
एमरी स्टोन की चक्कियों के लिए प्रसिद्ध—कुचामन।
नागौर जिला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) के अन्तर्गत आता है, लेकिन नागौर की केवल लाडनूँ पंचायत समीति जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) के अन्तर्गत आती है।

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