"Positive-Thougths"

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28/04/2026

*_29-04-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - पतित जगत से नाता तोड़ एक बाप से बुद्धियोग लगाओ तो माया से हार नहीं हो सकती''_*

*_प्रश्नः-_* समर्थ बाप साथ होते हुए भी यज्ञ में अनेक विघ्न क्यों पड़ते हैं? कारण क्या है?

*_उत्तर:-_*'यह विघ्न तो ड्रामा अनुसार पड़ने ही हैं क्योंकि जब यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ें तब तो पाप का घड़ा भरे। इसमें बाप कुछ नहीं कर सकते, यह तो ड्रामा में नूँध है। विघ्न पड़ने ही हैं लेकिन विघ्नों से तुम्हें घबराना नहीं है।

*_गीत:-कौन है माता, कौन पिता है...._*

*_ओम् शान्ति।_*

बच्चों ने बेहद के बाप का फरमान सुना। यह जो इस जगत के मम्मा-बाबा हैं, यह जो तुम्हारा नाता है, देह के साथ है क्योंकि देह से पहले-पहले माता की फिर पिता की लागत होती है फिर भाई-बन्धु आदि की होती है। तो बेहद के बाप का कहना है कि इस जगत में तुम्हारे जो मात-पिता हैं उनसे बुद्धि का योग तोड़ दो। इस जगत से नाता नहीं रखो क्योंकि यह सब हैं कलियुगी छी-छी नाते। जगत अर्थात् दुनिया। इस पतित दुनिया से बुद्धि का योग तोड़ मुझ एक से जोड़ो और फिर नये जगत के साथ जोड़ो, क्योंकि अब तुमको मेरे पास आना है। सिर्फ नाता जोड़ने की बात है और कोई बात नहीं और कोई तकलीफ नहीं। नाता जोड़ेंगे वह जिनको डायरेक्शन मिलता है। सतयुग में पहले नाता अच्छा होता है, सतोप्रधान फिर नीचे उतरते जाते हैं। फिर जो सुख का नाता है वह आहिस्ते-आहिस्ते कम होता जाता है। अभी तो बिल्कुल ही इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ना पड़े। बाप कहते हैं मेरे साथ नाता जोड़ो। श्रीमत पर चलो और जो भी देह के नाते हैं वह सब छोड़ दो। विनाश तो होना ही है। बच्चे जानते हैं बाप जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है, वह भी ड्रामा अनुसार सर्विस करते हैं। वह भी ड्रामा के बन्धन में बंधे हुए हैं। मनुष्य तो समझते हैं वह सर्वशक्तिमान् हैं। जैसे श्रीकृष्ण को भी सर्वशक्तिमान् मानते हैं, उनको स्वदर्शन चक्र दे दिया है। समझते हैं उनसे गला काटते हैं। परन्तु यह नहीं समझते कि देवतायें हिंसा का काम कैसे करेंगे। वह तो कर नहीं सकते। देवताओं के लिए तो कहा जाता है - अहिंसा परमो धर्म था। उन्हों में हिंसा कहाँ से आई? जिसको जो आया वह बैठकर लिख दिया है। कितनी धर्म की ग्लानी की है। बाप कहते हैं इन शास्त्रों में सच तो बिल्कुल आटे में नमक मिसल है। यह भी लिखा हुआ है कि रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा था। उसमें असुर विघ्न डालते थे। अबलाओं पर अत्याचार होते थे। वह तो ठीक लिखा हुआ है। अभी तुम समझते हो - शास्त्रों में सच क्या है, झूठ क्या है। भगवान खुद कहते हैं इस रूद्र ज्ञान यज्ञ में विघ्न पड़ेंगे जरूर। ड्रामा में नूँध है। ऐसे नहीं कि परमात्मा साथ है तो विघ्नों को हटा देंगे। इसमें बाप क्या करेंगे! ड्रामा में होने का ही है। यह सब विघ्न डालें तब तो पाप का घड़ा भरे ना। बाप समझाते हैं ड्रामा में जो नूँध है वही होना है। असुरों के विघ्न जरूर पड़ेंगे। अपनी राजधानी जो स्थापन हो रही है। आधाकल्प माया के राज्य में मनुष्य कितना तमोप्रधान बुद्धि, भ्रष्टाचारी बन जाते हैं। फिर उनको श्रेष्ठाचारी बनाना बाप का काम है ना। आधाकल्प लगता है भ्रष्टाचारी बनने में। फिर एक सेकेण्ड में बाप श्रेष्ठाचारी बनाते हैं। निश्चय होने में देरी थोड़ेही लगती है। ऐसे बहुत अच्छे बच्चे हैं जिन्हों को निश्चय होता है, झट प्रतिज्ञा करते हैं, परन्तु माया भी तो पहलवान है ना। कुछ न कुछ मन्सा में तूफान लाती है। पुरुषार्थ कर कर्मणा में नहीं आना है। सब पुरुषार्थ कर रहे हैं। कर्मातीत अवस्था तो हुई नहीं है। कुछ न कुछ कर्मेन्द्रियों से हो जाता है। कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने में बीच में विघ्न जरूर पड़ेंगे। बाप ने समझाया है - पुरुषार्थ करते-करते अन्त में जाकर कर्मातीत अवस्था होती है फिर तो इस शरीर को रहना नहीं है, इसलिए टाइम लगता है। विघ्न कुछ न कुछ पड़ते हैं। कहाँ माया हरा भी देती है। बाक्सिंग है ना। चाहते हैं बाबा की याद में रहें, परन्तु रह नहीं सकते। थोड़ा बहुत टाइम जो पड़ा हुआ है, धीरे-धीरे वह अवस्था धारण करनी है। कोई जन्मते ही राजा तो नहीं होता है। छोटा बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होगा ना, इसमें भी टाइम लगता है। अब तो बाकी थोड़ा समय रहा है। सारा मदार पुरुषार्थ के ऊपर है। अटेन्शन देना है, हम कैसे भी करके बाप से वर्सा लेंगे जरूर। माया का सामना जरूर करेंगे इसलिए प्रतिज्ञा करते हैं। माया भी कम नहीं है। हल्के से हल्के रूप में भी आती है। रुस्तम के सामने अच्छा जोर मारती है। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। बाप कहते हैं कि तुम बच्चों को अभी समझाता हूँ। बाप द्वारा तुम सद्गति को पा लेते हो। फिर इस ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती। ज्ञान से सद्गति हो जाती है। सद्गति कहा जाता है सतयुग को।

तो मीठे-मीठे बच्चों को लक्ष्य मिला है - यह भी समझते हैं ड्रामा अनुसार झाड़ बढ़ने में टाइम तो लगता ही है। विघ्न तो बहुत पड़ते हैं। चेंज होना पड़ता है। कौड़ी से हीरे जैसा बनना पड़ता है। रात-दिन का फ़र्क है। देवताओं के मन्दिर अभी तक भी बनाते रहते हैं। तुम ब्राह्मण अभी मन्दिर नहीं बनायेंगे क्योंकि वह है भक्ति मार्ग। दुनिया को यह पता ही नहीं कि अब भक्ति मार्ग खत्म हो ज्ञान मार्ग जिंदाबाद होना है। यह सिर्फ तुम बच्चों को मालूम है। मनुष्य तो समझते हैं कलियुग अभी बच्चा है। उन्हों का सारा मदार है - शास्त्रों पर। तुम बच्चों को तो बाप बैठ सभी वेदों शास्त्रों का राज़ समझाते हैं। बाप कहते हैं - अभी तक तुम जो पढ़े हो, वह सब भूल जाओ। उनसे कोई की सद्गति होती नहीं। भल करके अल्पकाल का सुख मिलता आया है। सदा सुख ही सुख मिले, ऐसे हो नहीं सकता। यह है क्षण भंगुर सुख। मनुष्य दु:ख में रहते हैं। मनुष्य यह नहीं जानते कि सतयुग में दु:ख का नाम निशान नहीं होता है। उन्होंने वहाँ के लिए भी ऐसी बातें बता दी हैं। वहाँ कृष्णपुरी में कंस था, यह था..। श्रीकृष्ण ने जेल में जन्म लिया। बहुत बातें लिख दी हैं। अब श्रीकृष्ण स्वर्ग का पहला नम्बर प्रिन्स, उसने क्या पाप किया? यह हैं दन्त कथायें, सो भी तुम अभी समझते हो जबकि बाप ने सच बताया है। बाप ही आकर सचखण्ड स्थापन करते हैं। सचखण्ड में कितना सुख था, झूठ खण्ड में कितना दु:ख है। यह सब भूल गये हैं। तुम जानते हो हम श्रीमत पर सचखण्ड स्थापन करके उसके मालिक बनेंगे।

बाप समझाते हैं, ऐसे-ऐसे श्रीमत पर चलने से तुम ऊंच पद पा सकेंगे। बच्चे यह जानते हैं हमको यह पढ़ाई पढ़कर सूर्यवंशी महाराजा महारानी बनना है। दिल भी सबकी होती है ऊंच पद पाने की। सबका पुरुषार्थ चलता है। अच्छे पक्के भक्त जो होते हैं वह चित्र साथ में रखते हैं तो घड़ी-घड़ी उनकी याद रहेगी। बाबा भी कहते हैं त्रिमूर्ति का चित्र साथ में रख दो तो घड़ी-घड़ी याद आयेगी। बाप को याद करने से हम सूर्यवंशी घराने में आ जायेंगे। कमरे में त्रिमूर्ति का चित्र लगा हुआ होगा तो घड़ी-घड़ी नज़र सामने पड़ेगी। बाबा द्वारा हम इस सूर्यवंशी घराने में जायेंगे। सवेरे उठते ही नज़र उस पर जायेगी। यह भी एक पुरुषार्थ है। बाबा राय देते हैं - अच्छे-अच्छे भगत बहुत पुरुषार्थ करते हैं। आंख खोलने से ही श्रीकृष्ण याद आ जाये, इसलिए चित्र सामने रख देते हैं। तुम्हारे लिए तो और ही सहज है। अगर सहज याद नहीं आती, माया हैरान करती है तो यह चित्र मदद करेंगे। शिवबाबा हमको ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। हम बाबा से विश्व का मालिक बन रहे हैं। इस सिमरण में रहने से भी मदद बहुत मिलेगी। जो बच्चे समझते हैं याद घड़ी-घड़ी भूल जाती है तो बाबा राय देते हैं, चित्र सामने रख दो तो बाप भी और वर्सा भी याद आयेगा। परन्तु ब्रह्मा को याद नहीं करना है। सगाई करते हैं तो दलाल थोड़ेही याद आता है। तुम बाबा को अच्छी रीति याद करो तो बाबा भी तुमको याद करेगा। याद से याद मिलती है। अभी माशुक के आक्युपेशन का तुमको पता है। शिव के कितने ढेर भगत हैं। शिव-शिव कहते रहते हैं। परन्तु वह रांग है - शिवकाशी, विश्वनाथ फिर गंगा कह देते हैं। पानी के किनारे जाकर बैठते हैं। यह समझते नहीं कि ज्ञान का सागर बाप है। बनारस में बहुत फॉरेनर्स आदि जाते हैं देखने। बड़े-बड़े घाट हैं फिर भी सभी के बाप का मन्दिर तो खींचता है। सब उनके पास जाते हैं। मन्दिर तो किसके पास जायेगा नहीं। मन्दिर के देवतायें खींचते हैं। शिवबाबा भी खींचते हैं। नम्बरवन है शिवबाबा फिर सेकेण्ड नम्बर में यह ब्रह्मा, सरस्वती सो विष्णु। विष्णु सो ब्रह्मा। ब्राह्मण सो विष्णुपुरी के देवतायें। विष्णुपुरी के देवतायें सो ब्राह्मण। अब तुम्हारा धन्धा यह रहा, हम सो देवता बन रहे हैं तो औरों को भी रास्ता बताना है। और सब हैं जंगल में ले जाने वाले। तुम जंगल से निकाल बगीचे में ले जाते हो। शिवबाबा आकर कांटों को फूल बनाते हैं। तुम भी यह धन्धा करते हो। इन बातों को तुम ही जानते हो। कोई राजा-रानी तो हैं नहीं जिनको तुम समझाओ। गाया हुआ है पाण्डवों को 3 पैर पृथ्वी के नहीं मिलते थे। बाप समर्थ था तो उनको विश्व की बादशाही दे दी। अभी भी वही पार्ट बजेगा ना। बाप है गुप्त। श्रीकृष्ण को तो कोई विघ्न पड़ न सके। अब बाप आये हैं, बाप से आकर वर्सा लेना है, इसके लिए मेहनत करनी होती है। दिन प्रतिदिन नई-नई प्वाइंट्स निकलती रहती हैं। देखने में आता है, प्रदर्शनी में समझाने से अच्छा प्रभाव पड़ता है। बुद्धि से काम लिया जाता है कि प्रदर्शनी से अच्छा प्रभाव होता है या प्रोजेक्टर से? प्रदर्शनी में समझाने से चेहरा देखकर समझाया जा सकता है। समझते हो गीता का भगवान बाप है, तो बाप से फिर वर्सा लेने का पुरुषार्थ करना है। 7 रोज़ देना है। लिखकर दो। नहीं तो बाहर जाने से ही माया भुला देगी।

तुम्हारी बुद्धि में आ गया - हमने 84 का चक्र लगाया है, अभी जाना है। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। यह चित्र तो साथ में होने ही चाहिए। बड़े अच्छे हैं। बिड़ला आदि भी यह नहीं जानते कि इन लक्ष्मी-नारायण ने यह राज्य-भाग्य कब और कैसे लिया। तुम जानते हो तो तुमको बड़ी खुशी होनी चाहिए। लक्ष्मी-नारायण का चित्र ले, झट कोई को समझायेंगे। उन्होंने यह पद कैसे पाया? यह बातें बुद्धि से समझने और समझाने की हैं। मंजिल है ऊंची। जो जैसा टीचर है वह वैसे ही सर्विस करते हैं। देखते हैं - कौन-कौन सेन्टर सम्भाल रहे हैं, अपनी अवस्था अनुसार। नशा तो सबको है। परन्तु विवेक कहता है समझाने वाला जितना होशियार होगा उतना सर्विस अच्छी होगी। सब तो होशियार हो नहीं सकते। सबको एक जैसा टीचर मिल नहीं सकता। जैसे कल्प पहले चला था वैसे ही चल रहा है। बाप कहते हैं अपनी अवस्था को जमाते रहो। कल्प-कल्प की बाजी है। देखा जा रहा है - कल्प पहले मुआफिक हर एक का पुरुषार्थ चल रहा है। जो कुछ होता है - हम कह देते कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। फिर खुशी भी रहती है, शान्ति भी रहती है। बाप कहते हैं कर्म करते हुए बाप को याद करो। बुद्धि का योग वहाँ लटका रहे तो बहुत कल्याण होगा, जो करेगा सो पायेगा। अच्छा करेगा अच्छा पायेगा। माया की मत पर सब बुरा ही करते आये हैं। अब मिलती है श्रीमत। भला करो तो भला हो। हर एक अपने लिए मेहनत करते हैं। जैसा करेंगे वैसा पायेंगे। क्यों न हम योग लगाते सर्विस करते रहें। योग से आयु बढ़ेगी। याद की यात्रा से निरोगी बनना है तो क्यों न हम बाबा की याद में रहें! यथार्थ बात है तो क्यों न हम कोशिश करें। ज्ञान तो बिल्कुल सहज है। छोटे बच्चे भी समझ जाते हैं और समझाते हैं। परन्तु वह योगी तो नहीं ठहरे ना। यह तो पक्का कराना है कि बाप को याद करो। जो समझते हैं, घड़ी-घड़ी भूल जाता है तो चित्र रख दें, तो भी अच्छा है। सवेरे चित्र को देखते ही याद आ जाता है। शिवबाबा से हम विष्णुपुरी का वर्सा ले रहे हैं। यह त्रिमूर्ति का चित्र ही मुख्य है, जिसका अर्थ तो तुमने अभी समझा है। दुनिया में ऐसे त्रिमूर्ति का चित्र और कोई के पास है नहीं। यह तो बिल्कुल सहज है। हम लिखें वा न लिखें। यह तो सभी जानते हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) माया की बॉक्सिंग में कभी भी हार न हो - इसका ध्यान रखना है। कल्प पहले की स्मृति से अपनी अवस्था को जमाना है। खुशी और शान्ति में रहना है।

2) अपना भला करने के लिए श्रीमत पर चलना है। इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ देना है। माया के तूफान से बचने के लिए चित्रों को सामने रख बाप और वर्से को याद करना है।

*_वरदान:-_* मनन द्वारा बाप की प्रापर्टी को अपनी प्रापर्टी बनाने वाले दिव्य बुद्धिवान भव

बाप द्वारा जो भी खजाना मिलता है, उसे मनन करो तो अन्दर समाता जायेगा। प्रापर्टी तो सबको एक जैसी मिली हुई है लेकिन जो मनन करके उसे अपना बनाते हैं, उन्हें उसका नशा और खुशी रहती है इसलिए कहा जाता है - अपनी घोट तो नशा चढ़े। जो मनन की मस्ती में सदा मस्त रहते हैं उन्हें दुनिया की कोई भी चीज़, उलझन आकर्षित नहीं कर सकती। उन्हें दिव्य बुद्धि का वरदान स्वत: मिल जाता है।

*_स्लोगन:-_* मन की उलझन को समाप्त करने के लिए निर्णय शक्ति को बढ़ाओ।

*_ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो_*

ऐसे नहीं समझो कि हम तो सदैव झुकते ही रहते हैं लेकिन हमारा कोई मान नहीं, जो झुकते नहीं व झूठ बोलते हैं उनका ही मान है - नहीं। यह अल्पकाल का है, लेकिन आप दूरादेशी बुद्धि रखो, यहाँ जितनों के आगे झुकेंगे अर्थात् नम्रता के गुण को धारण करेंगे, तो सारा कल्प ही सर्व आत्मायें आगे आगे नमन करेंगी। सतयुग त्रेता में राजा के रिगार्ड में काँध से नहीं लेकिन मन से झुकेंगे और द्वापर कलियुग में काँध झुकायेंगे।

🌞

28/04/2026

गीता उपदेश 🙏🌹

27/04/2026

*_28-04-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - बाप समान लवली बनने के लिए अपने को आत्मा बिन्दु समझ बिन्दु बाप को याद करो''_*

*_प्रश्नः-_* याद में रहने की गुप्त हड्डी मेहनत हर एक बच्चे को करनी है - क्यों?

*_उत्तर:-_* क्योंकि याद के बिगर आत्मा, पाप आत्मा से पुण्य आत्मा नहीं बन सकती। जब गुप्त याद में रहे, देही-अभिमानी बनें, तब विकर्म विनाश हों। धर्मराज की सजाओं से बचने का साधन भी याद है। माया के तूफान याद में ही विघ्न डालते हैं इसलिए याद की गुप्त मेहनत करो तभी लक्ष्मी-नारायण जैसा लवली बन सकेंगे।

*_गीत:-ओम् नमो शिवाए..._*

*_ओम् शान्ति।_*

यह महिमा है सबके बाप की। याद किया जाता है भगवान अर्थात् बाप को, उन्हें मात-पिता कहते हैं ना। गॉड फादर भी कहा जाता है। ऐसे नहीं सब मनुष्यों को गॉड फादर कहेंगे। बाबा तो उनको (लौकिक बाप को) भी कहते हैं। लौकिक बाप जिसको कहते हैं वह भी फिर पारलौकिक बाप को याद करते हैं। वास्तव में याद करने वाली आत्मा है, जो लौकिक बाप को भी याद करती है। वह आत्मा अपने रूप को, आक्युपेशन को नहीं जानती है। आत्मा अपने को ही नहीं जानती तो गॉड फादर को कैसे जानेगी। अपने लौकिक फादर को तो सब जानते हैं, उनसे वर्सा मिलता है। नहीं तो याद क्यों करें। पारलौकिक बाप से जरूर वर्सा मिलता होगा। कहते हैं ओ गॉड फादर। उनसे रहम, क्षमा मागेंगे क्योंकि पाप करते रहते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। परन्तु आत्मा को जानना और फिर परमात्मा को जानना, यह डिफीकल्ट सब्जेक्ट है। इज़ी ते इज़ी और डिफीकल्ट ते डिफीकल्ट। भल कितना भी साइन्स आदि सीखते हैं, जिससे मून तक चले जाते हैं। तो भी इस नॉलेज के आगे वह तुच्छ है। अपने को और बाप को जानना बड़ा मुश्किल है। जो भी बच्चे अपने को ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हैं, वह भी अपने को आत्मा निश्चय करें। मैं आत्मा बिन्दी हूँ, हमारा बाप भी बिन्दी है - यह भूल जाते हैं। यह है डिफीकल्ट सब्जेक्ट। अपने को आत्मा भी भूल जाते तो बाप को याद करना भी भूल जाते। देही-अभिमानी बनने का अभ्यास नहीं है। आत्मा बिन्दी है, उनमें ही 84 जन्मों का पार्ट नूँधा हुआ है। जो मैं आत्मा भिन्न-भिन्न शरीर ले पार्ट बजाती हूँ, यह घड़ी-घड़ी भूल जाता है। मुख्य बात यही समझने की है। आत्मा और परमात्मा को समझने के सिवाए बाकी नॉलेज तो सबकी बुद्धि में आ जाता है। हम 84 जन्म लेते हैं, सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी ... बनते हैं। यह चक्र तो बहुत सहज है। समझ जाते हैं। परन्तु सिर्फ चक्र को जानने से इतना फायदा नहीं है, जितना अपने को आत्मा निश्चय कर बाप को याद करने में फायदा है। मैं आत्मा स्टार हूँ। फिर बाप भी स्टार अति सूक्ष्म है। वही सद्गति दाता है। उनको याद करने से ही विकर्म विनाश होने हैं। इस तरीके से कोई भी निरन्तर याद नहीं करते। देही-अभिमानी नहीं बनते हैं। घड़ी-घड़ी यह याद रहे मैं आत्मा हूँ। बाप का फरमान है मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। मैं बिन्दी हूँ। यहाँ पार्टधारी आकर बना हूँ। मेरे में 5 विकारों की कट चढ़ी हुई है। आइरन एज़ में हैं। अब गोल्डन एज़ में जाना है इसलिए बाप को बहुत प्यार से याद करना है। इस रीति बाप को याद करेंगे तब कट निकल जायेगी। यह है मेहनत। सर्विस की लबार तो बहुत मारते हैं। आज यह सर्विस की, बहुत प्रभावित हुए परन्तु शिवबाबा समझते हैं आत्मा और परमात्मा के ज्ञान पर कुछ भी प्रभावित नहीं हुआ। भारत हेविन और हेल कैसे बनता है। 84 जन्म कैसे लेते हैं, सतो रजो तमो में कैसे आते हैं। सिर्फ यह सुनकर प्रभावित होते हैं। परमात्मा निराकार है, यह भी समझ जाते हैं। बाकी मैं आत्मा हूँ, मेरे में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। बाप भी बिन्दी है, उनमें सारा ज्ञान है। उनको याद करना है। यह बातें कोई भी समझते नहीं। मुख्य बात समझते नहीं हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी की नॉलेज बाप ही देते हैं। गवर्मेन्ट भी चाहती है कि वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी होनी चाहिए। यह तो उनसे भी सूक्ष्म बातें हैं। आत्मा क्या है, उनमें कैसे 84 जन्मों का पार्ट है। वह भी अविनाशी है। यह याद करना, अपने को बिन्दी समझना और बाप को याद करना जिससे विकर्म विनाश हों - इस योग में कोई भी तत्पर नहीं रहते हैं। इस याद में रहें तो बहुत लवली हो जाएं। यह लक्ष्मी-नारायण देखो कितने लवली हैं। यहाँ के मनुष्य तो देखो कैसे हैं। खुद भी कहते हैं हमारे में कोई गुण नाहीं। हम जैसे मलेच्छ हैं, आप स्वच्छ हैं। जब अपने को आत्मा निश्चय कर बाप को याद करें तब सफलता मिले। नहीं तो सफलता बहुत थोड़ी मिलती है। समझते हैं हमारे में बहुत अच्छा ज्ञान है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी हम जानते हैं। परन्तु योग का चार्ट नहीं बताते हैं। मुश्किल कोई हैं जो इस अवस्था में रहते हैं अर्थात् अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते हैं। बहुतों को अभ्यास नहीं है। बाबा समझते हैं कि बच्चे सिर्फ ज्ञान का चक्र बुद्धि में फिराते हैं। बाकी मैं आत्मा हूँ, बाबा से हमको योग लगाना है, जिससे आइरन एज़ से निकल गोल्डन एज़ में जायेंगे। मुझ आत्मा को बाप को जानना है, उसकी याद में ही रहना है, यह बहुतों का अभ्यास कम है। बहुत आते भी हैं। अच्छा-अच्छा भी कहते हैं। बाकी उनको यह पता नहीं पड़ता कि अन्दर कितनी कट लगी हुई है। सुन्दर से श्याम बन गये हैं। फिर सुन्दर कैसे बने? यह कोई भी नहीं जानते हैं। सिर्फ हिस्ट्री-जॉग्राफी जानने का काम नहीं है। पावन कैसे बनें? सजा न खाने का उपाय है - सिर्फ याद में रहना। योग ठीक नहीं होगा तो धर्मराज की सज़ायें खायेंगे। यह बहुत बड़ी सब्जेक्ट है, जिसको कोई उठा नहीं सकते। ज्ञान में अपने को मियाँ मिट्ठू समझ बैठते हैं, इसमें कोई शक नहीं। मूल बात है योग की। योग में बहुत कच्चे हैं इसलिए बाप कहते हैं खबरदार रहो, सिर्फ पण्डित नहीं बनना है। मैं आत्मा हूँ, मुझे बाप को याद करना है। बाप ने फरमान दिया है - मनमनाभव। यह है महामन्त्र। अपने को स्टार समझ बाप को भी स्टार समझो फिर बाप को याद करो। बाप का कोई बड़ा रूप नहीं सामने आता है। तो देही-अभिमानी बनने में ही मेहनत है। विश्व के महाराजा महारानी एक बनते हैं, जिनकी लाखों प्रजा बनती है। प्रजा तो बहुत है ना। हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानना तो सहज है परन्तु जब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करेंगे तब पावन बनेंगे। यह अभ्यास बड़ा डिफीकल्ट है। याद करने बैठेंगे तो बहुत तूफान विघ्न डालेंगे। कोई आधा घण्टा भी एकरस हो बैठे, बड़ा मुश्किल है। घड़ी-घड़ी भूल जायेंगे। इसमें सच्ची-सच्ची गुप्त मेहनत है। चक्र का राज़ जानना सहज है। बाकी देही-अभिमानी हो बाप को याद करना, यह मुश्किल कोई समझते हैं और उस एक्ट में आते हैं। बाप की याद से ही तुम पावन बनेंगे। निरोगी काया, बड़ी आयु मिलेगी। सिर्फ वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाने से माला का दाना नहीं बन सकते। दाना बनेंगे याद से। यह मेहनत कोई से पहुँचती नहीं है। खुद भी समझते हैं कि हम याद में नहीं रहते। अच्छे-अच्छे महारथी इस बात में ढीले हैं। मुख्य बात समझाना आता ही नहीं है। यह बात है भी मुश्किल। कल्प की आयु इन्होंने बड़ी कर दी है। तुम 5 हजार वर्ष सिद्ध करते हो। परन्तु आत्मा-परमात्मा का राज़ कुछ भी नहीं जानते हैं, याद ही नहीं करते हैं इसलिए अवस्था डगमगाती रहती है। देह-अभिमान बहुत है। देही-अभिमानी बनें तब माला का दाना बन सकें। ऐसे नहीं वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं इसलिए हम माला में नजदीक आ जायेंगे, नहीं। आत्मा इतनी छोटी है, इसमें 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। इस बात को पहले-पहले बुद्धि में लाना है, फिर चक्र को याद करना है। मूल बात है योग की। योगी अवस्था चाहिए। पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बनना है। आत्मा पवित्र होगी योग से। योगबल वाले ही धर्मराज के डन्डों से बच सकते हैं। यह मेहनत बड़ी मुश्किल कोई से होती है। माया के तूफान भी बहुत आयेंगे। यह बहुत हड्डी गुप्त मेहनत है। लक्ष्मी-नारायण बनना मासी का घर नहीं है। यह अभ्यास हो जाए तो चलते फिरते बाप की याद आती रहे, इसको ही योग कहा जाता है। बाकी यह ज्ञान की बातें तो छोटे-छोटे बच्चे भी समझ जायेंगे। चित्रों में सब युग आदि लगे हुए हैं। यह तो कॉमन है। जब कोई भी कार्य शुरू करते हैं तो स्वास्तिका लगाते हैं। यह निशानी है सतयुग, त्रेता... की बाकी ऊपर में है छोटा-सा संगमयुग। तो पहले अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते रहेंगे तब ही वह शान्ति फैल सकती। योग से विकर्म विनाश होंगे। सारी दुनिया इस बात में भूली हुई है आत्मा और परमात्मा के बारे में, कोई कहते परमात्मा हजारों सूर्यों से तेजोमय है, परन्तु यह हो कैसे सकता। जबकि कहते हैं - आत्मा सो परमात्मा फिर तो दोनों एक हुए ना। छोटे बड़े का फर्क नहीं पड़ सकता। इस पर भी समझाना है। आत्मा का रूप बिन्दी है। आत्मा सो परमात्मा है तो परमात्मा भी बिन्दी ठहरा ना। इसमें फर्क तो हो न सके। सब परमात्मा हो जाएं तो सब क्रियेटर हो जाएं। सर्व की सद्गति करने वाला तो एक बाप है ना। बाकी तो हर एक को अपना पार्ट मिला हुआ है। यह बुद्धि में बिठाना पड़े, समझ की बात है। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो कट निकल जायेगी। यह मेहनत है। एक तो आधाकल्प देह-अभिमानी हो रहे हो। सतयुग में देही-अभिमानी रहते भी बाप को नहीं जानते। ज्ञान को नहीं जानते। इस समय जो तुमको नॉलेज मिलती है वह नॉलेज गुम हो जाती है। वहाँ सिर्फ इतना जानते हैं कि हम आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा लेते हैं। पार्ट बजाते हैं। इसमें फिकर की क्या बात है। हर एक को अपना-अपना पार्ट बजाना है। रोने से क्या होगा? यह समझाया जाता है अगर कुछ समझें तो शान्ति आ जाए। खुद समझेंगे तो औरों को भी समझायेंगे। बुजुर्ग लोग समझाते भी हैं, रोने से क्या वापिस थोड़ेही आयेंगे। शरीर छोड़ आत्मा निकल गई, इसमें रोने की क्या बात है। अज्ञानकाल में भी ऐसे समझते हैं। परन्तु वह यह थोड़ेही जानते हैं कि आत्मा और परमात्मा क्या चीज़ है। आत्मा में खाद पड़ी है, वह तो समझते आत्मा निर्लेप है। तो यह बहुत महीन बातें हैं। बाबा जानते हैं बहुत बच्चे याद में रहते नहीं हैं। सिर्फ समझाने से क्या होगा। बहुत प्रभावित हुआ, परन्तु इससे उसका कोई कल्याण थोड़ेही हुआ। आत्मा-परमात्मा की पहचान मिले तब समझें बरोबर हम उनके बच्चे हैं। बाप ही पतित-पावन है। हमको आकर दु:ख से छुड़ाता है। वह भी बिन्दी है। तो बाप को निरन्तर याद करना पड़े। बाकी हिस्ट्री-जॉग्राफी जानना कोई बड़ी बात नहीं है। भल समझने लिए आते हैं परन्तु इस अवस्था में तत्पर रहे कि मैं आत्मा हूँ, इसमें ही मेहनत है। आत्मा परमात्मा की बात तो तुमको भी बाप ही आकर समझाते हैं। सृष्टि का चक्र तो सहज है। जितना हो सके उठते बैठते देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। देही-अभिमानी बहुत शान्त रहते हैं। समझते हैं मुझे साइलेन्स में जाना है। निराकारी दुनिया में जाकर विराजमान होना है। हमारा पार्ट अभी पूरा हुआ। बाप का रूप छोटा बिन्दी समझेंगे। वह कोई बड़ा लिंग नहीं है। बाबा बहुत छोटा है। वही नॉलेजफुल, सर्व के सद्गति दाता हैं। मैं आत्मा भी नॉलेजफुल बन रहा हूँ। ऐसा चिंतन जब चले तब ऊंच पद पा सकें। दुनिया भर में कोई आत्मा और परमात्मा को नहीं जानते।

तुम ब्राह्मणों ने अब जाना है। संन्यासी भी नहीं जानते। न आकर समझेंगे। वह तो सब अपने-अपने धर्मों में ही आने वाले हैं। हिसाब-किताब चुक्तू कर चले जायेंगे। तुमको ही यह मेहनत करने से बाप से वर्सा मिलेगा। अब फिर देही-अभिमानी बनना है। दिल तो आत्मा में है ना। आत्मा को ही दिल बाप से लगाना है। दिल शरीर में नहीं है। शरीर के तो सब स्थूल आरगन्स हैं। दिल को लगाना यह आत्मा का काम है। अपने को आत्मा समझ फिर परमात्मा बाप से दिल लगानी है। आत्मा बहुत सूक्ष्म है। कितनी छोटी सूक्ष्म आत्मा, पार्ट कितना बजाती है। यह है कुदरत। इतनी छोटी चीज़ में कितना अविनाशी पार्ट भरा हुआ है। वह कभी मिटने वाला नहीं है। बहुत सूक्ष्म है। तुम कोशिश करेंगे तो भी बड़ी चीज़ याद आ जायेगी। मैं आत्मा छोटा स्टार हूँ तो बाप भी छोटा है। तुम बच्चों को पहले-पहले मेहनत यह करनी है। इतनी छोटी सी आत्मा ही इस समय पतित बनी है। आत्मा को पावन बनाने का पहले-पहले यह उपाय है। पढ़ाई पढ़नी है। बाकी खेलना, कूदना तो अलग बात है। खेलने का भी एक हुनर है। पढ़ाई से मर्तबा मिलता है। खेल कूद से मर्तबा नहीं मिलता है। खेल आदि की डिपार्टमेन्ट अलग होती है। उनसे ज्ञान वा योग का कनेक्शन नहीं है। यह भोग आदि लगाना भी खेल है। मुख्य बात है याद की। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) धर्मराज की सजाओं से बचने के लिए याद की गुप्त मेहनत करनी है। पावन बनने का उपाय है अपने को आत्मा बिन्दी समझ बिन्दु बाप को याद करना।

2) ज्ञान में अपने आपको मिया मिट्ठू नहीं समझना है, एकरस अवस्था बनाने का अभ्यास करना है। बाप का जो फरमान है उसे पालन करना है।

*_वरदान:-_*:हर कर्म करते हुए कमल आसन पर विराजमान रहने वाले सहज वा निरन्तर योगी भव

निरन्तर योगयुक्त रहने के लिए कमल पुष्प के आसन पर सदा विराजमान रहो लेकिन कमल आसन पर वही स्थित रह सकते हैं जो लाइट हैं। किसी भी प्रकार का बोझ अर्थात् बंधन न हो। मन के संकल्पों का बोझ, संस्कारों का बोझ, दुनिया के विनाशी चीज़ों की आकर्षण का बोझ, लौकिक सम्बन्धियों की ममता का बोझ - जब यह सब बोझ खत्म हों तब कमल आसन पर विराजमान निरन्तर योगी बन सकेंगे।

*_स्लोगन:-_* सहनशीलता का गुण धारण कर लो तो असत्यता का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।

*_ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो_*

किसके संस्कार सरल, मधुर होते हैं तो वह संस्कार स्वरूप में आते हैं। जब संस्कार बापदादा के समान बन जायेंगे तो बापदादा के स्वरूप सभी को देखने में आयेंगे। जैसे बापदादा वैसे हूबहू वही गुण, वही कर्तव्य, वही बोल, वही संकल्प अनुभव होंगे। सभी के मुख से निकलेगा यह तो वही लगते हैं।

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27/04/2026
27/04/2026

Goodmoring & God

26/04/2026

👉 “डर के आगे क्या सच में जीत है?”

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👉 “क्या failure ज़रूरी है success के लिए?”

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*_27-04-2026 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन_*

*_“मीठे बच्चे - तुम्हें फूल बन सबको सुख देना है, फूल बच्चे मुख से रत्न निकालेंगे''_*

*_प्रश्नः-_* फूल बनने वाले बच्चों प्रति भगवान की कौन सी ऐसी शिक्षा है, जिससे वह सदा खुशबूदार बना रहे?

*_उत्तर:-_*'हे मेरे फूल बच्चे, तुम अपने अन्दर देखो - कि मेरे अन्दर कोई आसुरी अवगुण रूपी कांटा तो नहीं है! अगर अन्दर कोई कांटा हो तो जैसे दूसरे के अवगुण से ऩफरत आती है वैसे अपने आसुरी अवगुण से ऩफरत करो तो कांटा निकल जायेगा। अपने को देखते रहो - मन्सा-वाचा-कर्मणा ऐसा कोई विकर्म तो नहीं होता है, जिसका दण्ड भोगना पड़े!

*_ओम् शान्ति।_*

रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ समझाते हैं। इस समय यह रावण राज्य होने कारण मनुष्य सब हैं देह-अभिमानी इसलिए उन्हों को जंगल का कांटा कहा जाता है। यह कौन समझाते हैं? बेहद का बाप। जो अब कांटों को फूल बना रहे हैं। कहाँ-कहाँ माया ऐसी है जो फूल बनते-बनते फट से फिर कांटा बना देती है। इसको कहा ही जाता है कांटों का जंगल, इसमें अनेक प्रकार के जानवर मिसल मनुष्य रहते हैं। हैं मनुष्य, परन्तु एक दो में जानवरों मिसल लड़ते-झगड़ते रहते हैं। घर-घर में झगड़ा लगा हुआ है। विषय सागर में ही सब पड़े हैं, यह सारी दुनिया बड़ा भारी विष का सागर है, जिसमें मनुष्य गोते खा रहे हैं। इसको ही पतित भ्रष्टाचारी दुनिया कहा जाता है। अभी तुम कांटों से फूल बन रहे हो। बाप को बागवान भी कहा जाता है। बाप बैठ समझाते हैं - गीता में है ज्ञान की बातें और फिर मनुष्यों की चलन कैसी है - वह भागवत में वर्णन है। क्या-क्या बातें लिख दी हैं। सतयुग में ऐसे थोड़ेही कहेंगे। सतयुग तो है ही फूलों का बगीचा। अभी तुम फूल बन रहे हो। फूल बनकर फिर कांटे बन जाते हैं। आज बड़ा अच्छा चलते फिर माया के तूफान आ जाते हैं। बैठे-बैठे माया क्या हाल कर देती है। बाप कहते रहते हैं हम तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। भारतवासियों को कहते हैं तुम विश्व के मालिक थे। कल की बात है। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। हीरे जवाहरातों के महल थे। उनको कहते ही हैं गार्डन ऑफ अल्लाह। जंगल यहाँ है, फिर बगीचा भी यहाँ होगा ना। भारत स्वर्ग था, उसमें फूल ही फूल थे। बाप ही फूलों का बगीचा बनाते हैं। फूल बनते-बनते फिर संगदोष में आकर खराब हो जाते हैं। बस बाबा हम तो शादी करते हैं। माया का भभका देखते हैं ना। यहाँ तो है बिल्कुल शान्ति। यह दुनिया सारी है जंगल। जंगल को जरूर आग लगेगी। तो जंगल में रहने वाले भी खत्म होंगे ना। वही आग लगनी है जो 5 हजार वर्ष पहले लगी थी, जिसका नाम महाभारत लड़ाई रखा है। एटॉमिक बॉम्ब्स की लड़ाई तो पहले यादवों की ही लगती है। वह भी गायन है। साइन्स से मिसाइल्स बनाये हैं। शास्त्रों में तो बहुत कहानियाँ हैं। बाप बच्चों को समझाते हैं - ऐसे कोई पेट से थोड़ेही मूसल आदि निकल सकते हैं। अभी तुम देखते हो साइंस द्वारा कितने बॉम्ब्स आदि बनाते हैं। सिर्फ 2 बॉम ही लगाये तो कितने शहर खत्म हो गये। कितने आदमी मरे। लाखों मरे होंगे। अब इस इतने बड़े जंगल में करोड़ों मनुष्य रहते हैं, इनको आग लगनी है।

शिवबाबा समझाते हैं, बाप तो फिर भी रहमदिल है। बाप को तो सबका कल्याण करना है। फिर भी जायेंगे कहाँ। देखेंगे बरोबर आग लगती है तो फिर भी बाप की शरण लेंगे। बाप है सर्व का सद्गति दाता, पुनर्जन्म रहित। उनको फिर सर्वव्यापी कह देते। अभी तुम हो संगमयुगी। तुम्हारी बुद्धि में सारा ज्ञान है। मित्र-सम्बन्धियों आदि के साथ भी तोड़ निभाना है। उनमें हैं आसुरी गुण, तुम्हारे में हैं दैवी गुण। तुम्हारा काम है औरों को भी यही सिखलाना। मन्त्र देते रहो। प्रदर्शनी द्वारा तुम कितना समझाते हो। भारतवासियों के 84 जन्म पूरे हुए हैं। अब बाप आये हैं - मनुष्य से देवता बनाने अर्थात् नर्कवासी मनुष्यों को स्वर्गवासी बनाते हैं। देवता स्वर्ग में रहते हैं। अभी अपने को आसुरी गुणों से ऩफरत आती है। अपने को देखा जाता है, हम दैवीगुणों वाले बने हैं? हमारे में कोई अवगुण तो नहीं हैं? मन्सा-वाचा-कर्मणा हमने कोई ऐसा कर्म तो नहीं किया जो आसुरी काम हो? हम कांटों को फूल बनाने का धन्धा करते हैं वा नहीं? बाबा है बागवान और तुम ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हो माली। किसम-किसम के माली भी होते हैं। कोई तो अनाड़ी हैं जो किसको आप समान नहीं बना सकते। प्रदर्शनी में बागवान तो नहीं जायेंगे। माली जायेंगे। यह माली भी शिवबाबा के साथ है, इसलिए यह भी नहीं जा सकता। तुम माली जाते हो सर्विस करने के लिए। अच्छे-अच्छे मालियों को ही बुलाते हैं। बाबा भी कहते हैं अनाड़ियों को न बुलाओ। बाबा नाम नहीं बतलाते हैं। थर्डक्लास माली भी हैं ना। बागवान प्यार उनको करेंगे जो अच्छे-अच्छे फूल बनाकर दिखायेंगे। उस पर बागवान खुश भी होगा। मुख से सदैव रत्न ही निकालते रहते हैं। कोई रत्न के बदले पत्थर निकालेंगे तो बाबा क्या कहेंगे। शिव पर अक के फूल भी चढ़ाते हैं ना। तो कोई ऐसे भी चढ़ते हैं ना। चलन तो देखो कैसी है। कांटे भी चढ़ते हैं, चढ़कर फिर जंगल में चले जाते हैं। सतोप्रधान बनने बदले और ही तमोप्रधान बनते जाते हैं। उनकी फिर क्या गति होती है!

बाप कहते हैं - मैं एक तो निष्कामी हूँ और दूसरा पर-उपकारी हूँ। पर-उपकार करता हूँ भारतवासियों पर, जो हमारी ग्लानी करते हैं। बाप कहते हैं - मैं इस समय ही आकर स्वर्ग की स्थापना करता हूँ। किसको कहो स्वर्ग चलो। तो कहते स्वर्ग में तो हम यहाँ हैं ना। अरे स्वर्ग होता है सतयुग में। कलियुग में फिर स्वर्ग कहाँ से आया। कलियुग को कहा ही जाता है नर्क। पुरानी तमोप्रधान दुनिया है। मनुष्यों को पता ही नहीं है कि स्वर्ग कहाँ होता है। स्वर्ग आसमान में समझते हैं। देलवाड़ा मन्दिर में भी स्वर्ग ऊपर में दिखाया है। नीचे तपस्या कर रहे हैं। तो मनुष्य भी इसलिए कह देते - फलाना स्वर्ग पधारा। स्वर्ग कहाँ है? सबके लिए कह देते स्वर्गवासी हुआ। यह है ही विषय सागर। क्षीर सागर विष्णुपुरी को कहा जाता है। उन्होंने फिर पूजा के लिए एक बड़ा तलाव बनाया है। उसमें विष्णु को बिठाया है। अभी तुम बच्चे स्वर्ग में जाने की तैयारी कर रहे हो। जहाँ दूध की नदियाँ होंगी। अभी तुम बच्चे फूल बनते जाओ। ऐसी कोई चलन कभी नहीं चलनी है जो कोई कहे, यह तो कांटा है। हमेशा फूल बनने के लिए पुरुषार्थ करते रहो। माया कांटा बना देती है, इसलिए अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करनी है।

बाप कहते हैं - गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है। बागवान बाबा कांटों से फूल बनाने आये हैं। देखना है हम फूल बने हैं। फूलों को ही सर्विस के लिए जहाँ-तहाँ बुलाते हैं। बाबा गुलाब का फूल भेजो। दिखाई तो पड़ता है ना - कौन, कौनसा फूल है। बाप कहते हैं - मैं आता ही हूँ तुमको राजयोग सिखलाने। यह है ही सत्य नारायण की कथा। सत्य प्रजा की नहीं है। राजा रानी बनेंगे तो प्रजा भी अन्डरस्टुड बनेंगी। अभी तुम समझते हो राजा रानी तथा प्रजा कैसे नम्बरवार बनती है। गरीब जिनके पास दो पाँच रूपया भी नहीं बचता है, वह क्या देंगे। उनको भी उतना मिलता है, जितना हजार देने वाले को मिलता है। सबसे ज्यादा भारत गरीब है। किसको भी याद नहीं है कि हम भारतवासी स्वर्गवासी थे। देवताओं की महिमा भी गाते हैं परन्तु समझ नहीं सकते। जैसे मेंढक ट्रां-ट्रां करते हैं। बुलबुल आवाज कितना मीठा करती है, अर्थ कुछ नहीं। आजकल गीता सुनाने वाले कितने हैं। मातायें भी निकली हैं। गीता से कौन सा धर्म स्थापन हुआ? यह कुछ भी नहीं जानते हैं। थोड़ी रिद्धि-सिद्धि कोई ने दिखाई तो बस, समझेंगे यह भगवान है। गाते हैं पतित-पावन। तो पतित हैं ना। बाप कहते हैं - विकार में जाना यह नम्बरवन पतितपना है। यह सारी दुनिया पतित है। सब पुकारते हैं - हे पतित-पावन आओ। अब उनको आना है वा गंगा स्नान करने से पावन बनना है? बाप को मनुष्य से देवता बनाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम कांटे से फूल बन जायेंगे। मुख से कभी पत्थर नहीं निकालो। फूल बनो। यह भी पढ़ाई है ना। चलते-चलते ग्रहचारी बैठ जाती है तो फेल हो जाते हैं। होपफुल से होपलेस हो जाते हैं। फिर कहते हैं हम बाबा के पास जायें। इन्द्र की सभा में गन्दे थोड़ेही आ सकते हैं। यह इन्द्र सभा है ना। ब्राह्मणी जो ले आती है उस पर भी बड़ी जवाबदारी है। विकार में गया तो ब्राह्मणी पर भी बोझ पड़ेगा, इसलिए सम्भाल कर किसको ले आना चाहिए। आगे चल तुम देखेंगे साधू सन्त आदि सब क्यु में खड़े हो जायेंगे। भीष्म पितामह आदि का नाम तो है ना। बच्चों की बड़ी विशाल बुद्धि होनी चाहिए। तुम किसी को भी बता सकते हो - भारत गार्डन ऑफ फ्लावर था। देवी देवतायें रहते थे। अभी तो कांटे बन गये हैं। तुम्हारे में 5 विकार हैं ना। रावण राज्य माना ही जंगल। बाप आकर कांटों को फूल बनाते हैं। ख्याल करना चाहिए - अभी हम गुलाब के फूल नहीं बने तो जन्म जन्मान्तर अक के फूल ही बनेंगे। हर एक को अपना कल्याण करना है। शिवबाबा पर थोड़ेही मेहरबानी करते हैं। मेहरबानी तो अपने पर करनी है। अब श्रीमत पर चलना है। बगीचे में कोई जायेंगे तो खुशबूदार फूलों को ही देखेंगे। अक को थोड़ेही देखेंगे। फ्लावर शो होता है ना। यह भी फ्लावर शो है। बड़ा भारी इनाम मिलता है। बहुत फर्स्टक्लास फूल बनना है। बड़ी मीठी चलन चाहिए। क्रोधी के साथ बड़ा नम्र हो जाना चाहिए। हम श्रीमत पर पवित्र बन पवित्र दुनिया स्वर्ग का मालिक बनने चाहते हैं। युक्तियां तो बहुत होती हैं ना। माताओं में त्रिया-चरित्र बहुत होते हैं। चतुराई से पवित्रता में रहने के लिए पुरुषार्थ करना है। तुम कह सकती हो कि भगवानुवाच काम महाशत्रु है, पवित्र बनो तो सतोप्रधान बन जायेंगे। तो क्या हम भगवान की नहीं मानें! युक्ति से अपने को बचाना चाहिए। विश्व का मालिक बनने के लिए थोड़ा सहन किया तो क्या हुआ। अपने लिए तुम करते हो ना। वह राजाई के लिए लड़ते हैं तुम अपने लिए सब कुछ करते हो। पुरुषार्थ करना चाहिए। बाप को भूल जाने से ही गिरते हैं। फिर शर्म आती है। देवता कैसे बनेंगे। *_अच्छा!_*

*_मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।_*

*_धारणा के लिए मुख्य सार:-_*

1) माया की ग्रहचारी से बचने के लिए मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकालने हैं। संग दोष से अपनी सम्भाल रखनी है।

2) खुशबूदार फूल बनने के लिए अवगुणों को निकालते जाना है। श्रीमत पर बहुत-बहुत नम्र बनना है। काम महाशत्रु से कभी भी हार नहीं खानी है। युक्ति से स्वयं को बचाना है।

*_वरदान:-_* शक्तियों को करामत के बजाए कर्तव्य समझकर प्रयोग करने वाले पूजन वा गायन योग्य भव

याद द्वारा जो शक्तियों की प्राप्ति होती है उन्हें करामत समझकर प्रयोग नहीं करना लेकिन कर्तव्य समझकर कार्य में लगाना। उन मनुष्यों के पास रिद्धि सिद्धि की करामत होती है लेकिन आपके पास है श्रीमत। श्रीमत से शक्तियां जरूर आती हैं इसीलिए संकल्प से कर्तव्य सिद्ध होते हैं। संकल्प से किसको कार्य की प्रेरणा दे सकते हो, यह भी शक्ति है लेकिन श्रीमत में जब अपनी मनमत मिक्स न हो तब गायन और पूजन योग्य बनेंगे।

*_स्लोगन:-_* किसी भी प्रकार की हलचल में दिलशिकस्त होने के बजाए बड़ी दिल वाले बनो।

*_ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो_*

जो सरलचित हैं वही मधुरता के गुण सम्पन्न हैं, वही सदा हर्षित रहते हैं। हर्षितचित हैं तो सबको आकर्षित करते हैं। हर्षित का अर्थ ही है अतीन्द्रिय सुख में झूमना। ज्ञान का सुमिरण करते, अव्यक्त स्थिति का अनुभव करते अतीन्द्रिय सुख में झूमना, इसको कहा जाता है हर्षित। ऐसा जो हर्षित रहता है वही आकर्षित करता है।

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