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The Message तुममें कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही रहने चाहिएँ जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ भलाई का हुक्म दें और बुराइयों से रोकते रहें।[3:104]

अमन का पैगाम इन्सानियत के नाम
‘‘हे नबी![सल्ल०] कहो, हे किताब वालो, आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है। यह कि हम अल्लाह के सिवाए किसी की बन्दगी न करें, उसके साथ किसी को शरीक... न ठहराएं, और हममें से कोई अल्लाह के सिवाए किसी को अपना रब (उपास्य) न बना ले। इस दावत को स्वीकार करने से यदि वे मुँह मोड़ें तो साफ़ कह दो, कि गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (केवल अल्लाह की बन्दगी करने वाले) हैं।’’ कुरान आले इमरान 3:64

इंसान का रिज़्क़ अल्लाह तआला ने उसके लिए मुकर्रर कर रखा है। वह अपने बंदे को वहाँ से भी रिज़्क़ देता है, जहाँ से इंसान को...
15/09/2026

इंसान का रिज़्क़ अल्लाह तआला ने उसके लिए मुकर्रर कर रखा है। वह अपने बंदे को वहाँ से भी रिज़्क़ देता है, जहाँ से इंसान को गुमान भी नहीं होता।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: “ज़मीन पर चलने वाला कोई जानदार ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे न हो।”
[📖 सूरह हूद 11:6]

और फ़रमाया: “जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देता है और उसे वहाँ से रिज़्क़ देता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।” [📖 सूरह अत-तलाक़ 65:2-3]

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “अगर तुम अल्लाह पर ऐसा भरोसा रखो जैसा भरोसा रखने का हक़ है, तो वह तुम्हें उसी तरह रिज़्क़ देगा जैसे परिंदों को देता है। वे सुबह भूखे निकलते हैं और शाम को पेट भरे लौटते हैं।” [📖 जामे अत-तिर्मिज़ी, 2344]

इसलिए रिज़्क़ की फ़िक्र में मायूस मत हो। मेहनत करो, हलाल रास्ता अपनाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो।
जिस रिज़्क़ को अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, वह तुम्हें होकर रहेगा—चाहे वह किसी भी रास्ते से आए। अल्लाह हमें हलाल रिज़्क़ और उसमें बरकत अता फ़रमाए। आमीन।

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ज़मज़म का पानी, जिसे दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान बड़ी अकीदत और मोहब्बत से देखते हैं, मक्का मुकर्रमा के मुबारक कुएँ से आ...
15/09/2026

ज़मज़म का पानी, जिसे दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान बड़ी अकीदत और मोहब्बत से देखते हैं, मक्का मुकर्रमा के मुबारक कुएँ से आज भी जारी है। इसकी शुरुआत एक अज़ीम मोअजिज़े (चमत्कार) के तौर पर हुई थी और 4000 साल से ज़्यादा गुज़र जाने के बावजूद यह नेमत आज तक कायम है।
इस मुबारक पानी का ताल्लुक हज़रत हाजरा (अलैहस्सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहस्सलाम) के मशहूर वाक़िए से है। ज़मज़म अपने रूहानी फ़ज़ाइल, पाकीज़गी और इस्लामी तारीख़ में ख़ास मक़ाम की वजह से हमेशा से मुसलमानों के लिए बेहद अहम रहा है।

सदियों से मक्का मुकर्रमा आने वाले हाजी और उमरा करने वाले लोग ज़मज़म को अल्लाह की रहमत, रिज़्क़ और हरमैन शरीफ़ैन की सबसे अज़ीम बरकतों में से एक निशानी समझते आए हैं। 🤍

#नोट: इस्तेमाल की गई तस्वीरें AI द्वारा बनाई गई या सिर्फ़ तशरीही (Illustrative) हो सकती हैं। तारीखी और दीनी हवाले आम तौर पर मशहूर और क़बूलशुदा इस्लामी रिवायतों पर आधारित हैं।

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अल्लाह की रहमत से कभी मायूस मत होना, इंसान से ग़लतियाँ होती हैं, वह कभी न कभी अपने रब से दूर भी हो जाता है। लेकिन अल्लाह...
15/09/2026

अल्लाह की रहमत से कभी मायूस मत होना, इंसान से ग़लतियाँ होती हैं, वह कभी न कभी अपने रब से दूर भी हो जाता है। लेकिन अल्लाह तआला की रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला है। जब भी इंसान सच्चे दिल से उसकी तरफ़ लौटता है, तौबा करता है और अपनी ज़िंदगी सुधारने की कोशिश करता है, तो उसे अपने रब की तरफ़ लौटने का रास्ता मिलता है।

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“बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार (तक़वा वाला) है।” (क़ुरआन 49:13)...
14/09/2026

“बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार (तक़वा वाला) है।” (क़ुरआन 49:13)

इस्लाम ऐसे दौर में आया था जब लोग नस्ल, क़बीले, रंग और समाजी हैसियत के आधार पर बंटे हुए थे। इस्लाम ने इन तमाम फ़र्क़ों को मिटाकर तक़वा (अल्लाह का डर और उसकी फ़रमाँबरदारी) को असली मयार बना दिया। अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत को एक मर्द और एक औरत से पैदा किया, ताकि हम समझें कि हमारे बीच के फ़र्क़ उसकी हिकमत की निशानियाँ हैं, किसी की बरतरी का सबब नहीं।

हज़रत बिलाल इब्न रबाह (रज़ियल्लाहु अन्हु) हब्शा (अबीसीनिया) से ताल्लुक रखते थे। इस्लाम क़ुबूल करने की वजह से उन्हें ग़ुलामी और सख़्त ज़ुल्म का सामना करना पड़ा। मगर उनका ईमान इतना मज़बूत था कि तमाम तकलीफ़ों के बावजूद उनकी ज़ुबान पर सिर्फ़ एक ही कलिमा रहता था: “अहद, अहद” (यानी अल्लाह एक है, अल्लाह एक है)।

बाद में रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) से फ़रमाया: “मैंने जन्नत में अपने आगे तुम्हारे क़दमों की आहट सुनी।” (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

यह अज़ीम हदीस हमें याद दिलाती है कि इस्लाम में इज़्ज़त और मक़ाम नस्ल, दौलत, खानदान या दुनियावी रुतबे से नहीं मिलता, बल्कि ईमान और नेक आमाल से मिलता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा में फ़रमाया: “किसी अरब को किसी ग़ैर-अरब पर और किसी ग़ैर-अरब को किसी अरब पर कोई फ़ज़ीलत नहीं। न किसी गोरे को किसी काले पर और न किसी काले को किसी गोरे पर कोई बरतरी है, सिवाय तक़वा के।” (मुस्नद अहमद)

इसलिए किसी इंसान को उसकी नस्ल, ज़ुबान, रंग या ख़ानदानी पृष्ठभूमि की वजह से कमतर समझने से पहले यह याद रखिए कि अल्लाह तआला दिलों और आमाल को देखता है, जबकि इंसान अक्सर सिर्फ़ ज़ाहिरी शक्ल-सूरत को देखते हैं।

अल्लाह तआला हमारे दिलों से तकब्बुर (घमंड) को दूर फ़रमाए, उम्मत को नेकी और तक़वा पर एकजुट करे, और हमें जन्नत वालों में शामिल फ़रमाए #आमीन_या_रब्बुल_आलमीन।

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या अल्लाह! जब मेरी हड्डियाँ मिट्टी के नीचे होंगी, जब मेरा नाम पहले की तरह अक्सर नहीं लिया जाएगा, और जब यह दुनिया मेरे बग...
14/09/2026

या अल्लाह! जब मेरी हड्डियाँ मिट्टी के नीचे होंगी, जब मेरा नाम पहले की तरह अक्सर नहीं लिया जाएगा, और जब यह दुनिया मेरे बग़ैर आगे बढ़ चुकी होगी, तो मुझे उन लोगों से महरूम न करना जो मुझे अपनी दुआओं में याद रखें।

एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब हम अपने घर, अपने परिवार, अपना माल, अपनी चीज़ें और वह सब कुछ पीछे छोड़ जाएँगे जिसे जमा करने में हमने अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी। हमें मिट्टी के नीचे रख दिया जाएगा और हमारे साथ सिर्फ़ हमारे आमाल रह जाएँगे।

नबी ﷺ ने हमें बताया कि जब इंसान मर जाता है तो उसके आमाल का सिलसिला ख़त्म हो जाता है, सिवाय तीन चीज़ों के: सदक़ा-ए-जारीया, ऐसा इल्म जिससे लोग फ़ायदा उठाएँ, या नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करती रहे। (सहीह मुस्लिम 1631)

इसीलिए किसी ऐसे शख़्स के लिए सच्चे दिल से दुआ करना जो इस दुनिया से जा चुका हो, कोई छोटी बात नहीं है। यह ज़िंदा लोगों की तरफ़ से मरहूम के लिए एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा है।

अल्लाह तआला ख़ुद मोमिनों को यह दुआ सिखाता है:

“ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो हमसे पहले ईमान के साथ गुज़र चुके हैं।” (क़ुरआन 59:10)

इसलिए जब भी आपको कोई ऐसा शख़्स याद आए जो इस दुनिया से जा चुका है, उसके लिए दुआ करें।

अल्लाह से माँगें कि वह उसके गुनाहों को माफ़ फ़रमाए, उस पर रहमत फ़रमाए, उसकी क़ब्र को रोशन करे, उसकी क़ब्र को कुशादा करे, उसके दर्जे बुलंद फ़रमाए और उसे जन्नत में दाख़िल फ़रमाए।

और शायद एक दिन हम भी मिट्टी के नीचे होंगे।

शायद हमारी तस्वीरें पुरानी हो जाएँगी।
शायद हमारी चीज़ें बाँट दी जाएँगी।
शायद हमारी आवाज़ फिर सुनाई नहीं देगी।
शायद बहुत से लोग अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ जाएँगे।

लेकिन अल्लाह तआला हमारे पीछे ऐसे नेक दिल लोग छोड़ दे जो हमें अपनी दुआओं में याद करते रहें।

या अल्लाह! जब हम ज़िंदा हों तो हमें माफ़ फ़रमा, जब हमारी मौत आए तो हमें माफ़ फ़रमा, और जब हम मिट्टी के नीचे हों तब भी हमें माफ़ फ़रमा।

हमें उन लोगों में शामिल फ़रमा जिनके नेक आमाल उनकी मौत के बाद भी जारी रहें, और हमें ऐसे नेक लोगों की दुआएँ नसीब फ़रमा जो हमारे लिए सच्चे दिल से दुआ करें।

आमीन या रब्बल आलमीन।

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हम अक्सर Prophet Muhammad ﷺ के बारे में यह कहते हैं कि वह सबसे महान इंसान थे और वाकई थे। लेकिन उसी सांस में हम यह भूल जा...
14/09/2026

हम अक्सर Prophet Muhammad ﷺ के बारे में यह कहते हैं कि वह सबसे महान इंसान थे और वाकई थे। लेकिन उसी सांस में हम यह भूल जाते हैं कि उनकी ज़िंदगी अंदर से कैसी थी।

उन्होंने अपने पिता Abdullah ibn Abd al-Muttalib को कभी देखा ही नहीं। वह उनके पैदा होने से पहले ही इंतक़ाल कर गए। उनकी माँ Aminah bint Wahb का इंतक़ाल तब हुआ जब वह सिर्फ़ 6 साल के थे एक बच्चा, जो दर्द को समझ सकता था, लेकिन उसे संभालना नहीं जानता था। फिर उनके दादा Abdul Muttalib का इंतक़ाल हुआ जब वह 8 साल के थे। और फिर उनके चाचा Abu Talib जो उनके सहारा और हिफाज़त करने वाले थे नुबूवत के 10वें साल में इंतक़ाल कर गए। उसी साल उनकी पत्नी Khadijah bint Khuwaylid رضي الله عنها का भी इंतक़ाल हुआ।

इस साल को उन्होंने खुद “आम-उल-ह़ुज़्न” (ग़म का साल) कहा क्योंकि वह सच में ग़म से भरा हुआ था।
यह सब उन्होंने उस वक़्त सहा जब अभी क़ुरआन की कोई आयत उनके निजी दर्द के बारे में नाज़िल नहीं हुई थी। वह एक यतीम थे ऐसे समाज में जहाँ यतीम की कोई हैसियत नहीं थी फिर भी वह टिके रहे। और फिर अल्लाह ने उन्हें चुना।

ताइफ़ का वाक़िआ दिल हिला देता है। वह वहाँ गए अकेले या Zayd ibn Harithah رضي الله عنه के साथ लोगों को इस्लाम की दावत देने। लेकिन वहाँ के सरदारों ने उन्हें ठुकरा दिया। मज़ाक उड़ाया। फिर बच्चों और ग़ुलामों को उनके पीछे लगा दिया, जिन्होंने पत्थर मारे यहाँ तक कि उनके मुबारक पाँव खून से भर गए। वह एक बाग़ में पनाह लेकर बैठे।

तब Jibreel عليه السلام आए, और पहाड़ों के फ़रिश्ते के साथ। फ़रिश्ते ने कहा: अगर आप कहें तो मैं इन लोगों को दो पहाड़ों के बीच कुचल दूँ। लेकिन उन्होंने क्या कहा? “नहीं… बल्कि मुझे उम्मीद है कि उनकी आने वाली नस्लों में ऐसे लोग होंगे जो सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करेंगे।” वह ख़ून से लथपथ थे… और दुआ उन लोगों के लिए कर रहे थे जिन्होंने उन्हें ज़ख्मी किया था। क्या इससे बड़ी मोहब्बत हो सकती है?

Khadijah bint Khuwaylid رضي الله عنها वह औरत जिन्होंने सबसे पहले उन पर ईमान लाया, हर तरह से उनका साथ दिया 25 साल तक उनकी पत्नी रहीं। उन्होंने 50 साल की उम्र में उन्हें खो दिया। लेकिन वह उन्हें कभी नहीं भूले। उनकी मौत के सालों बाद भी वह उनकी सहेलियों को तोहफ़े भेजते थे। उनका ज़िक्र ऐसे करते थे कि Aisha bint Abi Bakr رضي الله عنها कहती थीं कि उन्हें किसी से इतनी गैरत नहीं हुई जितनी ख़दीजा से।

उन्होंने अपने बेटे इब्राहीम को खोया… अपने प्यारे चाचा Hamza ibn Abdul-Muttalib رضي الله عنه को उहुद के मैदान में खोया… अपने साथियों को दफ़्न किया… भूख झेली… ताने सुने… नमाज़ में उनके ऊपर गंदगी डाली गई… उन्हें पागल, जादूगर और झूठा कहा गया।

और उन्होंने खुद कहा: “किसी नबी को उतनी तकलीफ़ नहीं दी गई जितनी मुझे दी गई।” (तिर्मिज़ी 3178) लेकिन यह शिकायत नहीं थी यह हक़ीक़त थी। और इसके बावजूद… उन्होंने कभी हार नहीं मानी। न ताइफ़ के बाद… न ग़म के साल के बाद… न उहुद के बाद… वह चलते रहे। क्योंकि उनका मक़सद उनके दर्द से बड़ा था।

अल्लाह ﷻ ने फ़रमाया: “यक़ीनन तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में बेहतरीन नमूना है।” (सूरह अल-अहज़ाब 33:21) एक नमूना कोई दूर की चीज़ नहीं बल्कि एक इंसान, जिसने दर्द सहा, खोया, ठुकराया गया… और फिर भी आगे बढ़ता रहा।

ताकि तुम समझ सको तुम्हारा दर्द इस बात की निशानी नहीं कि अल्लाह ने तुम्हें छोड़ दिया है। उसने अपने नबी को भी नहीं छोड़ा। और तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा। उन्होंने यह सब सहा… ताकि आज तुम्हारे पास इस्लाम हो। ताकि तुम सूरह अल-फ़ातिहा पढ़ सको… सज्दा कर सको…
और जब ज़िंदगी मुश्किल हो जाए तो तुम्हारे पास एक रब हो… और एक नबी ﷺ जिनकी ज़िंदगी यह साबित करती है कि अल्लाह की तरफ़ लौटना हमेशा क़ीमती होता है। क्या इससे बड़ी मोहब्बत हो सकती है? ﷺ

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पाँच नमाज़ें, अल्लाह की तरफ़ लौटने के पाँच मौक़े।फ़ज्र — जब पूरी दुनिया नींद में होती है।ज़ुहर — दिन की मसरूफ़ियत के बीच...
14/09/2026

पाँच नमाज़ें, अल्लाह की तरफ़ लौटने के पाँच मौक़े।

फ़ज्र — जब पूरी दुनिया नींद में होती है।
ज़ुहर — दिन की मसरूफ़ियत के बीच।
अस्र — जब वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा होता है।
मग़रिब — जब सूरज ग़ुरूब हो जाता है।
इशा — अपनी आँखें बंद करने से पहले।

नमाज़ सिर्फ़ एक मामूल नहीं, बल्कि अल्लाह के साथ आपका रोज़ाना का रिश्ता है। ज़िंदगी चाहे कितनी ही मसरूफ़ क्यों न हो जाए, कभी भी दुनिया को उस ज़ात से ज़्यादा अहमियत न दें, जिसने आपको यह ज़िंदगी अता की है।

अपनी पाँचों नमाज़ों की हिफ़ाज़त करें और अल्लाह से दुआ करें कि वह नमाज़ को आपके दिल का सुकून और आपकी आख़िरत का नूर बना दे। 🤲

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14/09/2026

सवाल: एक दिन में कितनी नमाज़ें फ़र्ज़ हैं?

ईसा (अलैहिस्सलाम) को सूली पर नहीं मारा गया। अल्लाह तआला ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया, और क़यामत से पहले वह दोबारा दुनिया...
13/09/2026

ईसा (अलैहिस्सलाम) को सूली पर नहीं मारा गया। अल्लाह तआला ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया, और क़यामत से पहले वह दोबारा दुनिया में तशरीफ़ लाएँगे। उनका वापस आना क़यामत की बड़ी निशानियों में से एक है। वह इंसाफ़ के साथ हुकूमत करेंगे, रसूलुल्लाह ﷺ की शरीअत के मुताबिक़ फैसला करेंगे, दज्जाल को क़त्ल करेंगे, और अपना मिशन पूरा करने के बाद हर इंसान की तरह उनका भी इंतिकाल होगा।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "बल्कि अल्लाह ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया। और अल्लाह ज़बरदस्त, हिकमत वाला है।" [सूरह अन-निसा (4:158)]

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है! बहुत जल्द मरयम के बेटे (ईसा अलैहिस्सलाम) तुम्हारे बीच एक इंसाफ़ करने वाले हाकिम बनकर उतरेंगे। वह सलीब को तोड़ देंगे, ख़िनज़ीर (सूअर) को क़त्ल कर देंगे, जिज्या को ख़त्म कर देंगे, और माल इतना ज़्यादा हो जाएगा कि कोई सदक़ा क़ुबूल करने वाला नहीं मिलेगा।" [सहीह अल-बुख़ारी (3448), सहीह मुस्लिम (155)]

रसूलुल्लाह ﷺ ने यह भी फ़रमाया: "मेरे और ईसा (अलैहिस्सलाम) के दरमियान कोई नबी नहीं आया। वह उतरेंगे... वह ज़मीन पर चालीस साल रहेंगे, फिर उनका इंतिकाल होगा, और मुसलमान उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करेंगे।" [सुनन अबू दाऊद (4324)] (शैख़ अल-अलबानी रहिमहुल्लाह ने इसे सहीह क़रार दिया है।)

मुस्नद अहमद की कुछ रिवायतों में भी यह ज़िक्र मिलता है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) अपने नुज़ूल (दुबारा आने) के बाद चालीस साल तक ज़मीन पर रहेंगे। लेकिन इस ख़ास तफ़सील के लिए सुनन अबू दाऊद की रिवायत सबसे ज़्यादा मशहूर और मुस्तनद (प्रामाणिक) दलील मानी जाती है।

ईसा (अलैहिस्सलाम) का दोबारा आना कोई अलामती या मज़ाज़ी बात नहीं, बल्कि अल्लाह का सच्चा वादा और क़यामत की बड़ी निशानियों में से एक है।

उनका मिशन तौहीद की सच्चाई को ज़ाहिर करेगा, उनके बारे में फैली हुई ग़लत अकीदों को ख़त्म करेगा, और ज़मीन पर इंसाफ़ क़ायम करेगा। इसके बाद अल्लाह के हुक्म से उनका इंतिकाल होगा।

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देखते है कितने लोग सही जवाब देते है?☺️
13/09/2026

देखते है कितने लोग सही जवाब देते है?☺️

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