23/07/2021
क्या कोई उत्कृष्ट प्रेमी होने के साथ-साथ अद्भुत वैरागी भी हो सकता है? इस सवाल पर जब आंतरिक चिन्तन की प्रक्रिया शुरू होती है तब हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन परिवेश में विचरण करते हुए कृष्ण भक्ति धारा में पहुंचकर कुछ शान्ति का अनुभव करती है। शायद ऐसा लगता है कृष्ण का प्रेम ही नहीं वैराग्य भी रसमय है। ना जाने कितने रूप है श्री कृष्ण के एक तरफ गोपियों के साथ रास रचाते हुए कृष्ण है तो दूसरी ओर प्रेम में डूबे कृष्ण तथा तीसरे वैराग्य के सबसे ऊँचे पहाड़ पर आसन जमाए हुए भी श्री कृष्ण दिखाई देते है। ऐसा लगता है मानवीय प्रवृत्तियों का शायद ही कोई रंग हो जो कृष्ण के जीवन में समाया न हो।
आध्यात्मिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए एक बात समझनें वाली यह भी है कि भारत के अवतार पुरूषों में सिर्फ श्री कृष्ण ही है जिन्हें पूर्णावतार या पूर्ण -पुरूष माना गया है तथा वे लोकजंनमानस तथा लोक चेतना के चहतें चेहरे आज भी है] वों श्री कृष्ण है] कान्हा है] गोपाल है] मुरलीधर-मुरली मनोहर है] मोरमुकुटधारी है] माधव है] कैशव है] मधुसुदन है] योगेश्वर है तो कहीं छलियां आदि भी है। परंतु कृष्ण को कितने ही रूपों में देखने की कोशिश कीजिए अंत में उनका विराट रूप ही वर्णनातीत नजर आता है। श्री कृष्ण ऐसे यौद्धा भी है जो युद्ध लड़ते नही लड़वाते है जैसे महाभारत युद्ध में अर्जुन के साथ रहकर उन्होनें जीत की इबारत लिख दी थी। जीवन के हर मोड़ पर सकारात्मकता की प्रेरणा जगाने वाले श्रीकृष्ण की आज देश को आवश्यकता है न ही मठाधीशों की न जुमलेबाजों की। आज हमें फिर से एक ऐसा द्वारकाधीश चाहिए जो सत्ताधारकों की निरंकुशता का प्रतिरोध करते हुए क्रांतिकारिता का उद्घोषक बनकर स्वछंद विचारों वाले गणतंत्र प्रिय समाज का निर्माण करे। परंतु कुछ बुद्धिजीवियों कहना यह भी है कि द्वारकाधीश से ज्यादा तो कान्हा अच्छे थे। अब बताइए कि एक ही आदमी दो अलग-अलग नामों से अच्छा या बुरा कैसे हो सकता है। इस बात को उजागर करते हुए कौमी एकता की बात करने वाले संकीर्ण मानसिकता के शिकार लोग कहते है महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण राधा से पुनः मिलते है तब राधा ताना देते हुए कहती है कि 'तुम कान्हा थे तभी तक अच्छे थे द्वारकाधीश बने तो बुरे हो गए'। तुमने अपनी सेना को पांडवों और कौरवों के युद्ध में मरवा दिया] इसलिए तुम्हारी छवि नकारात्मक हो गई। इसी पर कुछ मानवाधिकार की बात करने वाले बुद्धिजीवियों का कहना था कि युद्ध में हमेशा मरने वाले आम लोग होते है।
श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के एकमात्र ऐसे चरित्र है जो मनुष्य होकर भी परमेश्वर है] रससिक्त प्रेमी है] जीवन का एक विराट दर्शन है। गीता के संदेश वाहक कृष्ण ऐसे सकाम है-जो निष्काम कर्मयोग का संदेश निःशंक देते हुए मनुष्य में ईश्वर की स्थापना करते है। जाहिर है] चाणक्य से कम यथार्थवादी श्रीकृष्ण आज भी नही दिखते] इसलिए भारतीय राजनीतिज्ञों को चाणक्य नीति के साथ-साथ श्रीकृष्ण से भी राजनीतिक सिद्धातों को सीखना चाहिए] हमें आज परिस्थितियों को देखते हुए रूढ़ियों से लड़ता जननायक नही प्रगतिशील विचारों का उद्घोषक चाहिए। राम राज्य की झूठी कपोल कल्पना से बहलाने वाले मठाधीशों की नही वरण पुराणों में व्याप्त श्रीकृष्ण के प्रचंड क्रांतिकारी रूप की आवश्यकता है] इसलिए अब राम राज्य में फिर से एक और द्वारकाधीश को पुनः जन्म लेना होगा।
चलो! कुछ समय के लिए ही सही]
श्रीकृष्ण तुमको लौट आना होगा]
कुछ किरचनें अवसादों की]
कुछ बादल धुन्ध और संकीर्णताओं के]
कर हस्तक्षेप आधिकारिक सामंजस्य का]
कुछ समय के लिए की सही इनकों हटाना होगा]
शायद स्थिरता के लिए]
श्रीकृष्ण तुमको फिर लौट आना होगा......