20/03/2018
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👉एक थी " गौरैया "।👈
छोटी सी, पतली सी, नाज़ुक सी, खूबसूरत, मासूम, परी जैसी वो हमारी थी हमारे जैसी हमारे बीच रहा करती थी अकसर हमारी चारपाई पर बैठ कर हमसे बाते किया करती थी।हमारे दुःख सुख में हमारे साथ रहा करती थी।किसी गरीब की गौरैया कभी किसी अमीर के यहां अपना आशायाने नही बनाती थी।पूरी ज़िंदगी पूरी आत्मयता के साथ एक ही घर में गुजरने वाली गौरैय्या जब अपने बच्चों को उड़ना सिखाती तो लड़खड़ाते हुये बच्चे कभी हमारे कांधों पर बैठ जाते और हम उन्हें पकड़कर प्यार से सहलाते पानी पिलाते और फिर उड़ने में उनकी मदद करते। गौरैया खुश होकर इधर उधर उड़ती और दुआएं देती।
आज" गौरैया दिवस " पर उसकी बहुत याद आ रही है।वो अब हमें नही मिलती वो हमारे साथ नही रहती वो हमें दुआएं नही देती।उसके बच्चे अब हमसे उड़ना सीखना नही चाहते।आखिर उसकी तबाही दास्ताँ तो खुद हमने ही लिखी है। हम इतने स्वार्थी हो गए कि अपने बड़े खूबसूरत पक्के मकानों में उसके छोटे से घोंसले के लिये एक छोटा सा सूराख तक नही छोड़ते।अपनी छतों की चारदीवारी भी हमे खूबसूरत चाहिए।हमसे नाउम्मीद नन्ही सी गौरैया हमसे दूर चली गयी ।शायद कभी वापस न आने के लिये।मगर हमे क्या फर्क पड़ता है? हम तो इंसान हैं स्वार्थ के लिये अपने खून तक को छोड़ देते है। वो तो फिर भी एक नन्हा सा परिंदा थी आखिर वो हमारे किस काम की थी जो उसके जाने का हम अफ़सोस करें? तो क्या हुआ जो हम अपने बचपन को याद करें हमने तो अपने बच्चों का बचपन ही छीनकर मोबाइल, कम्प्यूटर,और टी, वी, के हवाले कर दिया।
जाओ गौरैया जहां भी रहो खुश रहो।अब हम तरक्की कर रहें है।सफलताएं हासिल कर रहें।आधुनिक हो रहें हैं।पता नही अब हम तुम्हारे लायक़ नही रहे या तुम हमारे लायक़ नही रही।
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(RASHID ARSHI JI..........SEOHARA)