31/07/2012
R.L.Shroff High School/रामेश्वर लाल शर्राफ उच्च विद्यालय
Now it is a Govt. Undertaking School./ वर्तमान में यह एक सरकारी उच्च विद्यालय है|
सन १९५० की बात है स्वर्गीय पंडित सुरनाथ झा जो देवघर के पांडा समाज के, और देवघर के तात्कालिक १ मात्र हाइस्कूल आर मित्र हाई स्कूल में अध्यापक थे, को अवध बाबू ने एक दिन कहा, ' इस विद्यालय में एक साधारण शिक्षक के रूप में कितने दिन काम करते रहेंगे ? इससे आपकी प्रतिभा के साथ पूरा न्याय नहीं होगा । आप एक स्कूल क्यों नहीं खोल लेते ?'
इन बातों ने उन्हें काफी संवेदित किया । उन्होंने १ स्कूल खोलने की सोची जि
31/07/2012
सन १९५० की बात है स्वर्गीय पंडित सुरनाथ झा जो देवघर के पांडा समाज के, और देवघर के तात्कालिक १ मात्र हाइस्कूल आर मित्र हाई स्कूल में अध्यापक थे, को अवध बाबू ने एक दिन कहा, ' इस विद्यालय में एक साधारण शिक्षक के रूप में कितने दिन काम करते रहेंगे ? इससे आपकी प्रतिभा के साथ पूरा न्याय नहीं होगा । आप एक स्कूल क्यों नहीं खोल लेते ?'
इन बातों ने उन्हें काफी संवेदित किया । उन्होंने १ स्कूल खोलने की सोची जिसमें शहर के हर समाज हर जाती हर धर्म के लोग शिक्षा प्राप्त कर सकें बिना किसी भेद भाव के | उन्होंने ये विचार आपने बड़े भाई स्वर्गीय पंडित इंद्रनाथ झा से कही उन्होंने भी उनका समर्थन किया और सभी प्रकार के सहयोग का आश्वासन दिया|
बड़े भाई स्वर्गीय इंद्रनाथ झा ने ये विचार अपने नियोक्ता, नगर सेठ काशीनाथ शर्राफ (उर्फ गिल्लू सेठ)को बताई| छात्रों में सुरनाथ बाबू के प्रति प्रश्नातीत श्रद्धा और स्वीकृति थी ऐसे भूतपूर्व छात्रों में एक थे श्री काशीनाथ शर्राफ । वे नगर के लब्धप्रतिष्ठ सम्पन्न व्यवसायी तथा समर्पित कांग्रेसी नेता स्वर्गीय श्री रामेश्वर लाल शर्राफ के पुत्र थे| इस काम में धन लगाने को राजी किया| सेठ सहर्ष राजी हो गए पर उन्होंने अपनी सीमा समझते हुए सुरनाथ बाबू से प्रधानाध्यापक के पद के अलावे स्कूल के संचालन का समस्त दायित्व ग्रहण करने का अनुरोध किया।बस प्रारम्भ हुई एक जय-यात्रा, एक नए स्कूल को गढने की कवायद|
दोनों भाईओं ने ये बीड़ा उठया और बैद्यनाथ का नाम ले कर स्कूल १९५१ में स्वर्गीय पंडित सुरनाथ झा के नेतृत्व में एक भाड़े के माकन में शुरू कर दिया| स्कूल का नाम सेठ काशीनाथ शर्राफ के पिता रामेश्वर लाल शर्राफ के नाम पर रखा गया|
और इस प्रकार सन 1951 में एक किराए के मकान में रामेश्वर लाल शर्राफ हाई इंग्लिश स्कूल की स्थापना हुई । सुरनाथ बाबू ने अपने भूतपूर्व मेधावी छात्रों में से शिक्षकों का चयन किया था । गुरू-शिष्य समीकरण में एक नया आयाम जुड़ा था । प्रधानाध्यापक का सहयोगी शिक्षको के साथ का संबंध, सेवा-शर्तों से नहीं, मानवीय संवेदनाओं से निध्र्दारित था ।
इसके समानान्तर एक और अभियान शुरू हुआ, छात्रों का नामांकन अभियान । शर्राफ हाई स्कूल की स्थापना कर उन्होंने बहुत सारे वञ्चित परिवारों में प्रकाश का प्रवेश संभव कर दिया था । उनके छात्रों तथा उनके अभिभावकों के स्मृति-चारण से पता चलता है कि अपने स्कूल में छात्रों के नामांकन-अभियान में वे स्कूल के बाद के क्षणों में अपनी पुरानी सायकिल पर अकेले ग्रामांचल में घूम-घूमकर अभिभावकों को अनुप्रेरित करते । साधनहीन अभिभावकों को भरोसा दिलाते, स्कूल से फीस में रियायत नियमानुसार सीमा से अधिक नहीं दी जा सकती थी , इसलिए अनेक जरूरतमन्द छात्रों की फीस का भार वे वहन करते ।
पीछे मुड़कर देखने पर एक तस्वीर उभरती है । सुरनाथ बाबू के इस अभियान से ऐसी अनेक प्रतिभाओं को उभरने के अवसर मिले जिनके लिए अन्यथा यह संभव नहीं हो पाता । आर्थिक अभाव तथा प्रेरणा की अनुपस्थिति उनकी संभावनाओं को अंकुरित ही नहीं होने देती । कहा जा सकता है कि उनके इस अभियान के परिणामस्वरूप देवघर के नगर और ग्रामाञ्चल के विभिन्न तबके जो शिक्षा के प्रकाश से अपरिचित थे , शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल हो पाए ।
धीरे धीरे कारवां बढ़ता गया और १० साल के अंदर में १ पूर्ण स्कूल खड़ा हो गया जो आज भी उसी शान और बाण से चल रहा है | वैसा स्कूल जिसमें सभी वर्ग के लोग बिना किसी भेद भाव के एक साथ बैठ कर शिक्षा का अलख जगा सकें | तात्कालिक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में एक क्रांति कारी कदम था| उस समय छुआछूत , जातीयता आदि सकीर्ण मानसिकता अपने चरम पर समज में मौजूद था , फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और आगे बढते गए | आज वह स्कूल झारखण्ड के गिने चुने सरकारी स्कूलों में गिना जाता है|
भारत सरकार के राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें उनके उत्क्रिष॒ठ कार्यों के लिए तात्कालिक बिहार के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित किया|
सुरनाथ बाबू एक कुशल वैज्ञानिक की भाँति दक्ष अवलोकन की क्षमता से युक्त होने के साथ एक संवेदनशील कलाकार की तरह सौन्दर्य-बोध से अलंकृत थे । किसी की जरूरत को समझने और यथासम्भव सहायता करने की प्रवणता उनमें सहज रूप से अन्तर्निहित थी । इसकी सम्पुष्टि उनके सम्पर्क में आए अनगिनत लोग करते हैं,। उनमें से अनेकों ने स्पृहनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं ।
उनकी तस्वीर से यह मालूम होता है कि गुरू का कर्त्तव्य विद्यार्थियों को सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, सही मार्ग-दर्शन करना भी होता है । उन्हें एक साथ द्रोण और कृष्ण की भूमिकाओं का निर्वाह करना होता है ।
तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार कभी नहीं मानी और आगे बढते गए|
स्वर्गीय पंडित इंद्रनाथ और सुरनाथ झा के पिताजी का देहांत उनके बचपन काल में ही हो गया था जब बड़े भाई की उम्र मात्र बारह साल थी और छोटे की एग्यारह |
18/11/2011
रामेस्वर लाल श्रोफ्फ़ उच्च विद्यालय के सह संस्थापक और संस्थापक
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