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31/08/2017

विश्व व्यापार संगठन (WTO) का बदलता स्वरूप

सन् 2015 में नैरोबी में हुई विश्व व्यापार संगठन (WTO) की मंत्रिस्तरीय बैठक में इसकी अप्रांसगिकता पर ही अधिक चर्चा हुई और ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप को एक तरह से इसका विकल्प बताया गया था। इस बैठक में विश्व व्यापार संगठन के दोहा सम्मेलन को आगे बढ़ाने या उन पर प्रतिबद्धता से काम करने के बारे में कोई निर्णय नहीं हो पाया। यह विकासशील देशों के लिए अहितकर रहा। विकासशील देश काफी समय से संगठन की प्रासंगिकता पर आवाज उठा रहे हैं, क्योंकि उनके हित इससे जुड़े हुए हैं। संगठन में अमीर या विकसित देशों का वर्चस्व रहा है और वे अपने हिसाब से इसे चलाना चाहते हैं। विकासशील देशों के लिए यह एक बड़ी समस्या है।

कृषि सब्सिडी और खाद्य सामग्री की स्टॉक होल्डिंग –
कृषि और बौद्धिक संपदा, दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर विकसित देशों के एकतरफा नियम बनाने से भारत जैसे विकासशील देश भी परेशान हैं।कृषि के क्षेत्र में विकसित देशों ने छोटे कृषकों के हितों की पूर्णतः अनदेखी की है। भारत की मांग रही है कि उस जैसे प्रभुत्व संपन्न देश को अपने देश के गरीब वर्ग को सब्सिडी पर भोजन उपलब्ध कराने के बारे में नियम बनाने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। दरअसल, भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चलाने के लिए खाद्य भंडारण पर्याप्त रखना पड़ता है। भारत को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चलाने के लिए कृषि में जो सब्सिडी देनी पड़ती है, वह संगठन के नियमों के विरूद्ध है। जब भारत ने अपने पक्ष को सदस्य देशों को समझाया, तो इसे ‘पीस क्लॉज़‘ के तहत स्वीकार कर लिया गया। भारत की मांग है कि खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य सामग्री के सार्वजनिक भंडारण को संगठन में हमेशा के लिए स्वीकृति मिलनी चाहिए। इस पर कोई निर्णय नहीं हो सका।

व्यापार संबंधी पक्ष –
विकासशीन देशों की समस्याओं का हल न निकलते देख व्यापार को सरल बनाने (Trade Facilitation) के लिए देशों के बीच आपसी बातचीत और समझौतों को गति दी गई। इसमें उन सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया, जिसमें आपसी व्यापार के शुल्क को कम किया जा सके। साथ ही इस समझौते में देशों को अपने सीमा शुल्क एवं सुविधाओं में परिवर्तन भी करना होगा। गरीब देशों के लिए यह एक मुश्किल काम है, क्योंकि सीमा पर आधुनिक सेवाओं के लिए धन लगाना उनके लिए संभव नहीं है। फिर भी विकासशील देशों ने शुरूआत में इसका विरोध करते हुए भी इसे बाली सम्मेलन में स्वीकृति दे दी।

ई – कॉमर्स और निवेश –
अब 2017 में ब्यूनस आयर्स में होने वाली 11वीं मंत्रिस्तरीय बैठक से इलैक्ट्रॉनिक, कॉमर्स और निवेश को भी शामिल करने का प्रस्ताव किया गया है। इसका समर्थन इंटरनेशनल चेंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) और बी-20 (जी-20 देशों का बिज़नेस समूह) ने भी किया है। माइक्रो, लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योगों को बढ़ावा देना इस पक्ष की ख़ास बात है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि ई-कॉमर्स के ज़रिए छोटे और बड़े व्यापार के बीच की खाई को भरा जा सकेगा। साथ ही छोटे दर्जे के व्यापारियों के लिए नए बाज़ार खुल जाएंगे।

इस प्रस्ताव में आईसीसी और बी-20 ने विकासशील देशों को ई-कामर्स के जरिए दूसरे देशों के बाज़ारों से जुड़ने हेतू उनके संसाधनों में भी वृद्धि करने की मांग की है। यह मांग ट्रेड फेसीलीटेशन समझौते के अनुरूप ही है। अब विश्व व्यापार संगठन के लिए इन देशों को आर्थिक सहायता देना एक चुनौती है, क्योंकि इसके पास अभी ऐसी कोई सुविधा नही है।

विश्व व्यापार संगठन के मुख्य निदेशक ने ई-कॉमर्स का जबर्दस्त समर्थन किया है। उनका मानना है कि ई-कॉमर्स से व्यापार के परंपरागत तरीके को बदला जा सकेगा। समस्या यही है कि विकासशील और गरीब देशों में फिलहाल इंटरनेट का उपयोग बहुत कम किया जाता है। इससे ई-कॉमर्स का वाकई लाभ उठाने वाले देशों के लिए प्रश्नचिन्ह लग जाता है।इस आगामी बैठक में दूसरा पक्ष निवेश का होने वाला है। इस पर देश आपस में बंटे हुए हैं। विकासशील देशों ने पहले भी इस पर सवाल उठाए थे कि निवेशक देश को अगर निवेश किए जाने वाले मेजबान देश से कुछ विवाद हैं, तो उन्हें किस अंतरराष्ट्रीय पैनल में सुलझाया जाएगा।वर्तमान में कई देश द्विपक्षीय निवेश समझौतों (Bilateral Investment Treaty-BIT) पर काम कर रहे हैं। भारत भी इसमें शामिल है। भारत के बी.आई.टी. के नए मॉडल में विदेशी निवेशकों की शक्तियों को कम कर दिया गया है। साथ ही उनकी तरफ से विवाद उठाने की शक्तियों पर भी शिकंजा कसा गया है।यह निश्चित है कि ई-कॉमर्स और निवेश को विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने से अमीर एवं गरीब देशों के बीच खटास आएगी। हम वैश्वीकरण के जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें सभी देशों और उनके नागरिकों को समान अधिकार देने संबंधी नए नियम बनाने का यह उपयुक्त समय है। इसके बाद ही सभी देश विश्व के व्यापार में समान अवसर प्राप्त कर सकेंगे।

31/08/2017

सुधारवादी योजना

नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति) आयोग ने वर्ष 2017-18 से 2019-20 तक के तीन वर्ष के लिए अपना एजेंडा पेश कर दिया है। प्रस्तुत एजेंडा केंद्र और राज्य सरकारों के आगामी नीतिगत कदमों के लिए निर्देश का काम करेगा। जैसा कि एजेंडा में कहा भी गया है, ‘अपेक्षाकृत कम समय में नीतिगत बदलावों के लिए इसमें तमाम महत्त्वाकांक्षी प्रस्ताव हैं।’ अभी यह पता नहीं है कि नीति आयोग की सुधार की आकांक्षा पर पूरा और समुचित क्रियान्वयन होगा कि नहीं। परंतु इसे गंभीरता से लेने की तमाम वजह हैं। नीति आयोग के पूर्ववर्ती योजना आयोग के ही तर्ज पर बनी योजना प्रक्रिया के अनुरूप इस एजेंडे की शुरुआत इस प्रश्न से होती है कि सरकारी संसाधनों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? इसमें दलील दी गई है कि कुल व्यय में गैर विकासात्मक राजस्व व्यय की हिस्सेदारी को वर्ष 2015-16 के 47 फीसदी से घटाकर वर्ष 2019-20 तक 41 फीसदी किया जाए। इसके अलावा पूंजीगत व्यय में सतत सुधार किया जाए। एजेंडे में कहा गया है कि पुराने योजनागत, गैर योजनागत व्यय के अंतर को खत्म करने से इस बात का स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकेगा कि उत्पादक व्यय क्या हो सकता है?

अगर राजस्व की बात करें तो एजेंडा में मध्यम अवधि के ढांचे की बात कही गई है जिसमें यह मान लिया गया है कि अगले तीन साल में कर राजस्व में 14 से 17 फीसदी तक की बढ़ोतरी होगी। कहा गया है कि यह जीडीपी में वृद्घि अप्रत्यक्ष कर में मामूली वृद्घि के रूप में होगी। वहीं प्रत्यक्ष कर के मामले में यह बढ़ोतरी अधिक हो सकती है। एजेंडे के मध्यम अवधि के राजकोषीय ढांचे में विनिवेश प्राप्तियों को लेकर भी आशावादी अनुमान जताए गए हैं। अगले दो वित्त वर्ष में हर वर्ष 80,000 करोड़ रुपये की प्राप्ति का अनुमान है। इसे देखते हुए ही राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मार्ग पर बढऩे और वर्ष 2018-19 तक राजकोषीय घाटे को कम करके जीडीपी के 3 फीसदी तक लाने की बात कही गई है। इसके लिए वर्ष 2019-20 तक राजस्व घाटे को कम करके जीडीपी के 1 फीसदी से कम के स्तर पर लाना होगा। यह एजेंडा कम, मध्य या उच्च वृद्घि जैसे विभिन्न परिदृश्यों के अधीन घाटे को लेकर भी मशविरा देता है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एजेंडे के मुताबिक राजकोषीय सुदृढ़ीकरण स्वास्थ्य पर किए जाने व्यय को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये या कुल व्यय का 3.6 फीसदी करने की गुंजाइश भी तैयार करता है। शिक्षा पर किए जाने व्यय में भी भारी इजाफे का इरादा जाहिर किया गया है। इसके अलावा सड़कों तथा रेलवे के पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी की बात भी इसमें शामिल है। उम्मीद यह की गई है कि सड़क और रेल क्षेत्र का पूंजीगत व्यय मौजूदा 71,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वर्ष 2019-20 तक 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाया जा सकेगा।
कुलमिलाकर एजेंडा सुधारवादी और आशावादी नजर आ रहा है। ऐसे में उसकी यह दलील सही है कि निर्यात को बढ़ावा देने की सरकार की नीतियों में अहम भूमिका रहेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि समुचित मेहनताने वाले रोजगार तैयार करना अहम होगा। एजेंडा में कहा गया है कि केवल चार विकासशील देशों ने तीन दशक में अपने आप में सफलतापूर्वक बदलाव किया है। ये देश हैं, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन। इनमें से प्रत्येक मामले में निर्यात की अहम भूमिका रही है। एजेंडे में निर्यात एवं श्रम आधरित क्षेत्रों को लेकर सुधार की जो सूची है वह बहुत सुविचारित है। सवाल यह है कि क्या सरकार इस सलाह पर ध्यान देगी और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को प्राथमिकता बनाते हुए भी रोजगारपरक क्षेत्रों में लचीलेपन और सुधार को अंजाम देगी। इस प्रश्न का उत्तर ही यह बताएगा कि नीति आयोग अपने पूर्ववर्ती से अधिक प्रभावी है या नहीं?

31/08/2017

Getting India wrong

Debates between Nehru, Gandhi, Bhagat Singh, and Ambedkar deserve serious reflection; but the fact remains that they were all part of the anti-colonial resistance, abhorred the ‘Hindu Raj’ project, and upheld ideals of diversity and dignity for the weak and vulnerable. The Sangh and its ideological brothers, on the other hand, had only the ‘Hindu Rashtra’ inspired by fascism for its ideal.

In his article, ‘Coming full circle at 70’ (IE, August 15), RSS and BJP leader Ram Madhav argues that for the first time after Independence, India’s rulers are “rooted in India’s genius,” because “high constitutional positions” are all held today by individuals subscribing to “the same ideological fraternity” of “the Conservative Right” that according to Madhav, represents India’s “core”, as it does America’s.

Madhav implies that Nehru’s ideology was alien and represented the “coloniser’s view” while Gandhi’s was Indian. Madhav seems to conveniently forget that Gandhi’s killer too was of the same “ideological fraternity” to which Kovind, Naidu, and Modi belong. There is a wealth of documentary evidence to show those of the RSS’ “ideological fraternity” collaborated with the colonisers and were inspired by Italian and German fascism. Savarkar promised to be the “the staunchest advocate of loyalty” to the colonial government (letter dated November 24, 1913). Shyama Prasad Mukherjee, as a minister in Bengal, helped the British combat the Quit India Movement (Mookerjee, Leaves from a Diary, OUP, 1993). Golwalkar (We or Our Nationhood Defined, 1939) described Germany’s purge of Jews as “race pride… a good lesson for us in Hindusthan to learn and profit by.”Debates between Nehru, Gandhi, Bhagat Singh, and Ambedkar deserve serious reflection; but the fact remains that they were all part of the anti-colonial resistance, abhorred the “Hindu Raj” project, and upheld ideals of diversity and dignity for the weak and vulnerable. The Sangh and its ideological brothers, on the other hand, had only the “Hindu Rashtra” inspired by fascism for its ideal.

Madhav’s claim that India’s current rulers reflect Gandhi’s prioritisation of villages is mocked by the BJP governments’ ongoing plan to drown out the land of 40,000 village families waging a Gandhian satyagraha against the Sardar Sarovar Dam. It is interesting that Madhav lists caste — that Ambedkar branded as “anti-national” and sought to annihilate — as part of the corpus of “the genius of India”. Madhav is celebrating social hierarchies as “Indian” and deriding constitutional values as “western liberal discourse”. The RSS organ, Organiser (in an editorial on November 30, 1949) had in a similar vein complained that the Indian Constitution was inspired by the West and did not reflect the native genius of the Manusmriti.Madhav’s use of the word “mob” implies that only the alien, deracinated “western” elites are offended by the spate of lynch mob violence; ordinary Indians are “enjoying it”. The Supreme Court’s historic ruling on the right to privacy also affirms that attacks on constitutional liberties of the minorities — including those of diet and faith — cannot be justified by claims that the mob/majority is “enjoying it”.

It is worth recalling Ambedkar’s candid words here: “Constitutional morality is not a natural sentiment… We must realise that our people have yet to learn it. Democracy in India is only a top dressing on an Indian soil which is essentially undemocratic.” Far from celebrating the undemocratic “Indian soil” as “genius of India”, Ambedkar called upon Indians to transform the soil itself with democratic nutrients that could nurture the sapling of democracy.

In 70 years, India’s rulers have not made any serious effort to transform that soil. It is movements and struggles of India’s people — movements of workers, peasants, Dalits, feminists, socialists, the Left; movements for civil liberties and environmental justice — that have done so, confronting and facing repression by governments ruled by the Congress and other parties in the process. Rulers have — in vain — branded those movements (the feminist movement for instance) as “alien” and “western”: But the movements thrived with the confidence that they represent the striving of Indians to be the best version of themselves.Fascism always boasted of endorsement and even adoration from “the mob”, always claimed itself to be organic and its enemies, alien. But the fact is that the fascist mob — while it may draw on illiberal tendencies and traditions — is not born but bred by conscious political effort and craft. And “humble” people who become members of the fascist mob do realise their colossal crime later: Na**sm, once equated with German nationalism, is now reviled and loathed not only in Germany but the world over.

31/08/2017

Doklam defused

Tensions ease for now, use crisis as opportunity to shore up Indian position on China

Plaudits are due to Indian diplomacy for having defused a dangerous crisis on the border. But there is little room either for triumphalism or for complacency. The end of the Doklam standoff between India and China bolsters stability in Asia – at least for now. The 72 day standoff began when New Delhi objected to Chinese road building in the India-Bhutan-China trijunction area in Doklam. The latter was in contravention of a 2012 agreement that trijunction boundary points are to be decided through consultation between all three parties. India was forced to intervene when the Chinese side disregarded its strategic sensitivities in the region and brushed aside ally Bhutan’s protestations.

Unlike China which used its official spokespersons and state-run media to issue strident statements in an attempt to build psychological pressure on India, the latter quietly but firmly stuck to its position on the basis of legal principles and past agreements. This was smart strategy as dragging the dispute was disadvantageous for Beijing. With a major Chinese Communist Party congress coming up in a few months and the marquee September 3-5 Brics summit being hosted in China’s Xiamen, the Chinese leadership was under pressure to resolve the Doklam issue without appearing to concede much.

In that sense, India provided China a face-saver by not contesting Beijing’s interpretation of the withdrawal and keeping the terms of Doklam disengagement under wraps. However, the lack of an explicit understanding also means China can resume road building in Doklam in future, or press India at other places along the Line of Actual Control. This necessitates a two-pronged approach. First, India needs to remain vigilant and strengthen its position on the ground. Building and upgrading critical border infrastructure to facilitate movement of troops is necessary to safeguard strategic interests and add muscle to diplomacy.

Further, India should leverage its huge market for Chinese goods and use this as a bargaining chip – if the Chinese can block Indian goods and services through non-tariff barriers, New Delhi could raise quality issues with Chinese imports. Such economic measures should force China to take Indian interests more seriously. That said, New Delhi should also not lock itself into an anti-China mode. Chinese leadership is neither a monolith nor impractical. There are many in Beijing who want beneficial ties. New Delhi should be prepared to capitalise on this when an opportunity presents itself.

30/08/2017
30/08/2017

गर्म गैस का गोला हमारा सूरज
अंतरिक्ष में सूरज जैसे अरबों तारे हैं। लेकिन यदि सूरज न होता तो धरती पर जीवन संभव नहीं था। सूरज सैकड़ों सालों से वैज्ञानिको को आकर्षित और रोमांचित कर रहा है। आइये जानें इसके बारे में कुछ खास तथ्य।
उष्ण ऊर्जा का प्राचीन गोला
हमारा सूरज अरबों सालों से चमक रहा है, मानवो के अस्तित्व में आने से पहले से। उसका विकास 4.6 अरब साल पहले गैस के बादलों से हुआ। और अंदाजा है कि वह कम से कम 5 अरब सालों तक चमकता रहेगा, जब तक उसकी ऊर्जा का भंडार खत्म न हो जाए।
वैज्ञानिको के लिए आदर्श
सूरज दरअसल एक बड़ा परमाणु रिएक्टर है। उसके सत्व में तापमान और दबाव इतना ज्यादा है कि हाइड्रोजन परमाणु मिलकर हीलियम परमाणु बन जाते हैं। इस प्रक्रिया में बहुत सारी ऊर्जा पैदा होती है। सूरज के पदार्थ(हायड्रोजन) की एक चुटकी इतनी ऊर्जा पैदा करती है जितना पाने के लिए हजारों मीट्रिक टन कोयला जलाना होगा।
पृथ्वी का सौ गुना
धरती से देखने पर सूरज बहुत बड़ा नहीं लगता। वह आकाश में चमकदार स्पॉट की तरह दिखता है। लेकिन असल में उसका घेरा 700,000 किलोमीटर और उसके गर्भ का तापमान 1।5 करोड़ डिग्री सेल्सियस है। बाहर की आखिरी सतह पर भी उसका तापमान 5,500 डिग्री सेल्सियस रहता है।
अरबों में एक
हमारे ब्रह्मांड में सितारे इसलिए चमकते हैं क्योंकि वे अपने गर्भ में ऊर्जा पैदा करते हैं। सूरज भी दूसरे अरबों सितारों की ही तरह है। दूसरे सितारों की तुलना में सूरज मध्यम आकार का है। कुछ तारे उससे भी 100 गुणा बड़े हैं तो कुछ उसके आकार का केवल एक दहाई।
बाहर से अशांत
सूरज की बाहरी सतह खौलती उबलती दिखती है। गर्म और चमकदार तरल सूरज के अंदर से बाहर निकलता है, ठंडा होता जाता है और फिर से अंदर की ओर चला जाता है। सूरज धरती के इतना करीब है कि खगोलशास्त्री इस प्रक्रिया को विस्तार से देख सकते हैं।
अद्भुत धब्बे
कभी कभी सूरज की सतह पर बड़े बड़े काले धब्बे दिखने लगते हैं और करीब महीने भर रहते हैं। ईसा के जन्म से भी पहले मानवो को इन धब्बों के बारे में पता था। काफी समय तक लोग इसके बारे में चकित रहते थे लेकिन अब पता है कि ये धब्बे तीव्र चुम्बकीय क्षेत्र के कारण दिखते हैं।
खतरनाक तूफान
जब सूरज अत्यंत सक्रिय होता है तो भूचुम्बकीय तूफान पैदा हो जाते हैं। और सूरज बड़ी मात्रा में आवेशित अणुओं को अंतरिक्ष में फेंक देता है। ये अणु उपग्रहों से टकरा सकते हैं और उन्हें नष्ट कर सकते हैं। वे पृथ्वी पर बिजली के सब स्टेशनों के काम में भी बाधा डाल सकते हैं।
चमकता आकाश
भूचुम्बकीय तूफानों का ही एक असर पोलर लाइट भी है। अरुणोदय की चमक। ये तब दिखता है जब आवेशित अणु धरती के वातावरण से टकराते हैं। ऐसा कितनी बार होगा यह सौर चक्र पर निर्भर करता है। ग्यारह साल में एक बार सूरज खास तौर पर सक्रिय होता है।
यादगार पल
इसका ध्यान रखना चाहिए कि सूर्यग्रहण भले ही यादगार पल होते हैं लेकिन उन्हें कभी खुली आंखों से नहीं देखना चाहिए। चांद आंशिक रूप से सूरज को ढक ले, तब भी सूरज बहुत चमकीला होता है। आंखों को सूरज की किरणों से नहीं बचाया तो उन्हें नुकसान पहुंच सकता है।

30/08/2017

भारतीय प्रजातंत्र का संकट

भारतीय अर्थव्यवस्था का समय-समय पर बहुत ध्यान रखा गया। सन् 1991 से आर्थिक उदारीकरण के दौर में खाद्य आपूर्ति एवं विदेशी मुद्रा के बड़े संकटों को भी आसानी से सुलझा लिया गया। अतः आर्थिक पैमाने पर भारत एक तरह से खरा उतर रहा है। परंतु सन् 1947 के बाद से ही प्रजातंत्र का एक बड़ा आधार कमजोर रह गया है, और वह है- सामाजिक। जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग आज भी गरीबी में दबा हुआ है।
अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन भी मानते हैं कि क्षमताएं ही व्यक्ति के जीवन को जीने योग्य बनाती है। यही सच्ची स्वतंत्रता है। अतः सरकार का ध्यान चहंुमुखी विकास पर होना चाहिए।
अलग-अलग सरकारों ने लगभग सात दशकों के काल में सार्वजानिक क्षेत्र के माध्यम से सामाजिक रूप से बहिष्कृत, दलित एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को ऊपर उठाने के प्रयत्न किये। परंतु यह असफल रहा। निजी क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाकर सरकारें पिछड़े वर्गों की क्षमताओं के विकास में असफल रहीं। अब किसी प्रत्यक्ष योजना के माध्यम से ही उन्हें सशक्त किया जा सकता है।
क्रय-शक्ति में विश्व की तीसरी बड़ी शक्ति होते हुए भी भारत आज विश्व की बड़ी अशिक्षित एवं कुपोषित जनसंख्या का घर बना हुआ है। अब समय है, जब हम मानवीय अभावों की ओर अधिक ध्यान दें। भारतीय महिलाओं एवं दलितों की स्थिति को सबसे पहले सुधारने की जरूरत है।
प्रजातंत्र की पूर्णता के लिए आवश्यक है कि हम सब अलग होते हुए भी समान रहें। इसके लिए कुछ ऐसी सार्वजानिक नीतियों का निर्माण करना होगा, जिसमें भागीदारी में समानता हो। स्कूल, अस्पताल, उद्यान एवं श्मशान जैसे सभी सार्वजनिक सुविधाओं में सबको समान अवसर एवं सुविधा दिया जाना सुनिश्चित करना होगा।
भारत में सभी वर्ग के लोगों के स्वतंत्र एवं शांतिपूर्ण ढंग से रहने योग्य सार्वजनिक नीतियों का अभाव है। दूसरे देशों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि वहाँ ऐसे प्रावधान किए गए हैं। सिंगापुर में भी चीनी, भारतीय एवं मलय जातियों में सांमजस्य बढ़ाने के लिए जन आवास समिति गठित की गई है।
गुजरात एवं अन्य प्रांतों में दलितों की पिटाई, महिलाओं का बलात्कार एवं मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यकों के प्रति अत्याचार करके हम अपने देश को ही आतंकवाद का घर बना रहे हैं। अगर हम इन शाक्तियों पर नियंत्रण नहीं पा सके, तो प्रजातंत्र घिसटता हुआ ही दिखाई देगा।

30/08/2017

लचर स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारा जा सकता है

सन् 2015 में भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 10 लाख 26 हजार बच्चों की मौत हुई। इनमें से आधे तो अपने जन्म के पहले माह में ही मौत का शिकार हो गए। वहीं दूसरी ओर इसी वर्ष हमने लगातार आठ उपग्रह एक साथ छोड़े जाने का इतिहास रचा। इसे हम अपना दुर्भाग्य ही मान सकते हैं कि एक ओर तो हम मंगल ग्रह पर मिशन भेजने में सक्षम हैं, परंतु दूसरी ओर हम किसी गाँव में प्रसव-पीड़ा से तड़प रही माँ की मदद के लिए नहीं पहुँच पाते। आज हम सॉफ्टवेयर के सबसे बड़े निर्यातक हैं, लेकिन दूसरी ओर इन सॉफ्टवेयर को बनाने वाले युवाओं के स्वास्थ्य की ओर हमारा ध्यान नही के बराबर है।

दोनों पक्षों की ये चरम स्थितियाँ हमारी नसों और अंतर्रात्मा को क्यों नहीं झकझोरती ? अब समय आ गया है कि हम विकास के पथ पर चलते हुए अपनी सार्वजनिक एवं निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बिल्कुल भी अनदेखी न करें एवं उन्हें चुस्त-दुरूस्त रखने के उतने ही प्रयास करें, जितने कि हम मंगलयान और सॉफ्टवेयर के निर्माण में कर रहे हैं।

भारत ने धारणीय विकास के लक्ष्यों को अपनाया है। इन लक्ष्यों में न. 3 स्वास्थ्य से ही जुड़ा हुआ है, जो सभी उम्र के लोगों के लिए अच्छे स्वास्थ्य और अच्छे जीवन स्तर की वकालत करता है। भारत के लिए इस लक्ष्य को पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि अगर बीमारियों के लिहाज से असंकामक रोगों या जीवन-शैली जन्य रोगों का प्रतिशत देखें, तो वह 63% के करीब है, जिसके आगामी दशक में 78% हो जाने की संभावना है। इन बीमारियों का प्रभाव हमारे सर्वाधिक सक्षम वर्ग पर पड़ रहा है। साथ ही इन रोगों के ईलाज का खर्च घातक रोगों के ईलाज से कई गुना अधिक होता है।

रोगों की तीव्रता और बढ़ती संख्या को देखते हुए इनके निदान एवं उपचार का बोझ अकेले सरकार पर नहीं डाला जा सकता। हम देख भी रहे हैं कि निजी क्षेत्र ने इस दिशा में अनेक प्रयास किए हैं। अगर पूरे पिछले दशक पर नज़र डालें, तो स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र का बहुत योगदान रहा है। इस क्षेत्र ने स्वास्थ्य सेवाओं में बुनियादी सुविधाओं के अलावा उच्चतम तकनीकों का भी उपयोग किया है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य पर्यटन को बहुत बढ़ावा मिला है। इंतजार इस बात का है कि अब सरकार भी इस क्षेत्र में साधन संपन्न होकर स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों को कम करने के लिए सामने आए। इन सब प्रयासों के लिए सरकार को कुछ निम्न कदम उठाने की आवश्यकता होगी –

स्वास्थ्य सुरक्षा को ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता‘ के रूप में घोषित करना होगा। इस प्राथमिकता को बजट में ऊपर का स्थान देना होगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में उéतिशील संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जा सके। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सके।
इस उद्योग को ‘जीरो रेटिंग जीएसटी‘ के अंतर्गत रखा जाए। साथ ही ऐसी व्यवस्था की जाए कि इस क्षेत्र को ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट‘ का लाभ मिल सके।
सन् 1961 के आयकर अधिनियम की धारा 35 ए डी के अंतर्गत 150% के भार से लदी (150% Weighted Depreciation Scheme) अवमूल्यन योजना को पाँच वर्षों के लिए बढ़ा दिया जाए।
इस क्षेत्र को मीनीमम ऑल्टर्नेट टैक्स (Minimum Atlernate Tax) से छूट दी जानी चाहिए। साथ ही रियल एस्टेट इंवेस्टमेन्ट ट्रस्ट के अधीन आने वाले ढ़ांचों को कैपीटल गेन टैक्स से भी छूट दी जाए। इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
अनुसंधान एवं विकास की गतिविधियों में संलग्न देशी संस्थानों को 200% के (Weighted Deduction) के लिए 10 वर्ष की अवधि मिलनी चाहिए। साथ ही इस क्षेत्र में अनुसंधान के प्रयासों में जोश से जुटे स्वदेशी संस्थानों के लिए डिडक्शन को 250% करने पर विचार किया जाना चाहिए।
अस्पतालों के अधिग्रहण और विलय को सरल एवं आकर्षक बनाने के लिए इसे आयकर अधिनियम की धारा 72ए के अंतर्गत औद्योगिक उपक्रम की श्रेणी में लाया जाना चाहिए।
जीवनरक्षक उपकरणों पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। हो सके, तो इन्हें शुल्क मुक्त ही कर दिया जाए, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की कीमत में भी कमी आएगी और बहुत से जीवनों की रक्षा की जा सकेगी।
हमें इस बात को समझना होगा कि बीमारी या रोग व्यक्तिगत नहीं होते। इसका निराकरण समग्र रूप से किया जा सकता है। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का आधार अब लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की शिक्षा देने पर होना चाहिए। भारत को स्वस्थ बनाने का उत्तरदायित्व व्यक्तिगत एवं निजी क्षेत्र के प्रयासों से सरकार को सहयोग देना है। हमारे देश की इस जटिल समस्या को सुलझाने के लिए कोई जादुई मंत्र तो नहीं है, जो क्षणभर में कायापलट कर दे। परंतु ऐसा भी नहीं है कि हम अपेक्षित उपायों को तत्परता से अपनाकर इसे सुलझा न सकें।

30/08/2017

सार्वजनिक स्वास्थ्य में पीपीपी मॉडल

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति बहुत ही दयनीय है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जहाँ एक हजार लोगों पर कम से कम एक डॉक्टर होना चाहिए, वहीं भारत में यह अनुपात सत्रह सौ लोगों पर एक डॉक्टर का है। इतना ही नहीं बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जहाँ एक हजार व्यक्तियों पर साढे़ तीन बिस्तरों की व्यवस्था होनी चाहिए, वहीं भारत में यह 1.3 बिस्तर की है। छोटे शहरों और गांवों की हालत तो बहुत ही अधिक बदतर है।

यही कारण है कि भारत की बाल मृत्यु दर पड़ोसी देश नेपाल और बगला देश से भी अधिक खराब है। भारत में सन् 2011 से 2015 के बीच एक हजार में से अड़तालीस बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले ही चल बसते हैं।

यह जानना जरूरी है कि भारत ने पिछले बीस सालों में तीव्र आर्थिक वृद्धि की है, लेकिन स्वास्थ्य पर वह अपनी जी.डी.पी. का केवल एक प्रतिशत ही खर्च करता है। जबकि इसकी तुलना में चीन तीन प्रतिशत, ब्राजील1 प्रतिशत तथा विकसित देश अमेरीका तो 8.3 प्रतिशत खर्च करता है।
दुखद बात यह है कि स्वास्थ्य बीमा के अभाव के कारण हर साल भारत के तीन प्रतिशत लोग कर्ज में फंस कर बुरी तरह गरीब हो जाते हैं।
वस्तुतः भारत को ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं की अत्यन्त आवश्यकता है, जो सस्ती हो और सबकी पहुंच में भी हो। इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित आधारभूत ढांचे को पुनर्जीवित करना होगा, नये चिकित्सा केन्द्र बनाने होंगे और आई.टी. टेक्नोलॉजी का उपयोग करना होगा।
भारत को अपनी कुल जी.डी.पी. का कम से कम ढाई प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करना होगा। साथ ही इस क्षेत्र में पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाना होगा। द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत संरचनाएं उपलब्ध करा पाना अकेले सरकार के लिए सम्भव नहीं है। हा, यह जरूर ध्यान रखना होगा कि इस मॉडल के तहत उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाएं सस्ती हों तथा प्रभावशाली एवं कुशल भी हों।
स्वास्थ्य क्षेत्र में पीपीपी का सबसे अच्छा उदाहरण राजस्थान सरकार ने प्रस्तुत किया है। इस मॉडल के तहत निजी क्षेत्र प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा उप केन्दों तक का संचालन पूरे राज्य में कर रहा है। इस मॉडल के तहत सरकार ने आवश्यक आधारभूत संरचनाएं, दवाईयां तथा उपकरण आदि उपलब्ध कराये हैं। प्रायवेट क्षेत्र ने डॉक्टर, नर्स, अन्य स्टाफ तथा चैबीस घटे मेडीकल सेवाएं उपलब कराई हैं। यह प्रणाली सफलतापूर्वक काम कर रही हैं।

30/08/2017

भारत की बदलती स्वास्थ्य स्थिति की जरूरतें?
भारत की बदलती स्वास्थ्य स्थिति की जरूरतें?

अब प्रत्येक वर्ष डेंगू और चिकनगुनिया के कारण हमारी उत्पादक क्षमता एवं स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च पर बहुत प्रभाव पड़ने लगा है। ये बिमारियां हमारी योजनाओं की स्थिति का एक तरह से साक्ष्य प्रस्तुत कर रही हैं कि हमारी व्यवस्थाएं कितनी लचर हैं।

क्या किया जाना चाहिए?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उत्तम स्वास्थ सेवाओं के लिए दवाएं, सूचना, सेवा, स्वास्थ्य कार्यदल, वित्त एवं प्रशासन जैसे छः मानदण्ड स्थापित किए हैं। हम जानते हैं कि सस्ती जेनेरिक दवाएं बनाने के अलावा भारत बाकी के मानदण्डों पर खरा नहीं उतरता।
हमें बीमारियों के रोकथाम, निदान और उपचार के साथ-साथ बीमारी पर निगरानी, डाटा एकत्र करना, स्वास्थ्य क्षेत्र में आधुनिक शोध, स्वास्थ्य सेवा के लिए कार्यदलों का प्रशिक्षण, पर्याप्त स्टाफ, सभी लोगों के लिए पोषण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षित एवं प्रभावशाली दवाओं की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य एवं पोषण के लिए सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर काम करना होगा।
घर-घर में स्वास्थ्य एवं पर्याप्त पोषण की पहुंच के लिए मोहल्ला क्लीनिक की अवधारणा बहुत अच्छी है। परंतु इसका कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की राह पर चलने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन एवं एकीकृत बाल विकास योजना को अधिक आर्थिक सहयोग देना होगा।
सामाजिक क्षेत्र में जन-भागीदारी को बढ़ाकर हम अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकते हैं। भारत के बदलते प्रजातांत्रिक एवं जानपदिक रोग विज्ञानी परिवेश के परिपेक्ष्य में सरकार की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है। इसके लिए गंभीर प्रयास की आवश्यकता होगी।

30/08/2017

भारत में रोजगार की स्थिति

भारत में रोजगार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

अलग-अलग संस्थानों और सरकारी सर्वेक्षणों में भी यह बात सामने आ रही है।

अगर हम आठ श्रमिक आधारित उद्योगों में किए गए श्रमिक ब्यूरो के सर्वेक्षण को सही माने; तो 2011 में जहाँ नौ लाख रोजगार थे, उसमें 2013 में19 लाख और 2015 में मात्र 1.35 लाख रोजगार रह गये हैं।
जबकि आंकड़े दिखाते हैं कि हर महीने लगभग दस लाख नए लोग रोजगार की तलाश में जुड़ जाते हैं।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी रोजगार के अवसर बढ़ाने की आवश्यकता को लेकर कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अगले दस वर्षों में लगभग5 करोड़ रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे।
2011 की जनगणना से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में7 प्रतिशत की प्रतिवर्ष की औसत बढ़ोत्तरी हुई, रोजगार की वृद्धि दर केवल 1.8 प्रतिशत ही रही।
समस्या के कारण क्या हैं?

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ देने वाले विद्यार्थियों संख्या बहुत ज्यादा है। 2015 का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि 15 वर्ष की आयु वाले बच्चों की संख्या मात्र8 प्रतिशत है, जो व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रहे हैं या ले चुके हैं। देश के विकास के लिए सार्वाजनिक शिक्षा प्रणाली का विकसित एवं सुदृढ़ होना जरूरी है। वर्ष 2015-16 के बजट में शिक्षा के क्षेत्र में 3 प्रतिशत से 3.1 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी की गई।
‘मेक इन इंडिया’के तहत आई कंपनियां भारत में अपने उद्योग अपने उत्पाद बेचने के उद्देश्य से लगाएंगी। ये उस तुलना में रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं कराएंगी। जबकि लघु और मध्यम दर्जे के उद्योग लगभग 40 प्रतिशत लोगों को रोजगार देते हैं। साथ ही भारतीय निर्मित सामान में 45 प्रतिशत तथा कुल निर्यात में 40 प्रतिशत का योगदान देते हैं। चूंकि इन उद्योगों के लिए सरकारी नीति बहुत सहायक नहीं है, इसलिए इन्हें बढावा नहीं मिल पा रहा है।
एक सर्वे के अनुसार लगभग 95 प्रतिशत उद्योगों को बैंक के दायरे में लाने की जरूरत है। लघु उद्योग बैंकों से बहुत कम लाभ ले पा रहे हैं।
सार्वजनिक बैंक इन लघु उद्योगों को ऋण देने की बजाए बड़ी कंपनियों को ऋ़ण देते हैं।
सरकार की वित्तीय नीति का लाभ बड़ी कंपनियों को भी अधिक मिलता है। वर्ष 16-17 के बजट में कर की लगभग साढ़े पाँच लाख करोड़ रुपये की छूट दी गई, इसका ज्यादा लाभ बड़ी कंपनियों को ही मिला।
समाधान

2016-17 के बटज में पहली बार रोजगार की बृद्धि के लिए ‘स्टैण्ड अप’और ‘स्टार्ट अप’जैसे कार्यक्रम शुरू किये गये हैं। स्टार्ट अप इंडिया सूचना एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अवसर देगा, जबकि स्टैण्ड अप स्थानीय कारीगरों को अपना उद्याग बढ़ाने में सहायता देगा।
निर्यात करने वाले उद्योगों, लघु एवं मध्यम् दर्जे के उद्योगों तथा कृषि उत्पाद की प्रोसेसिंग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे गाँवों और कस्बाई क्षेत्रों के युवाआंे को लाभ मिलेगा।

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