Ekal Bhartiya Sanskriti Vishwa Vidhyalaya

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Invite views of members on HIND SWARAJ AND GANDHIAN PRINCIPLES CRITICISM WELCOME BASED ON PRINCIPLES AND POLICIES INSTEAD OF BLAME GAME AND LEG PULLING.

WORK FOR ALL THROUGH BARTER SYSTEM, GANDHIAN POLICIES UNDERSTANDING THROUGH PROPER COMMUNICATION. CORRECTION OF WRONG BELIEF ABOUT GANDHIAN IDEAS AND MAKING HIM RESPONSIBLE FOR EVERYTHING WITHOUT PRACTICING AND FOLLOWING HIM. SHAME TO MATERIALISM AND CONSUMERISM. LOVE TO HUMANITY AND BROTHERHOOD JOINT FAMILY INDIAN CULTURE.

20/06/2026

All amendments in since 1950 were
1. Antinational
2. Anti humanity for भौतिकवादी भोगवादी
3. Anti majority community for अंधानुकरण of western culture
4. Anti सर्वे भवन्तु सुखिनः
So need to be cancelled subject to reconsideration by an appropriate committee
So constitution distributed by WAS ORIGINAL 1950 WITH AMENDMENTS IN ANNEXURES

SO CANCEAL ALL ANNEXURES BY 1 RESOLUTOONS

20/06/2026

O

18/06/2026
17/06/2026

यह मुकदमा Rahul Gandhi के खिलाफ दायर मानहानि (Defamation) केस का है, जिसे Satyaki Savarkar ने दायर किया है। सत्यकी सावरकर, Vinayak Damodar Savarkar के पड़पोते (grandnephew) हैं।
अदालत में क्या कहा गया?
जिरह (cross-examination) के दौरान सत्यकी सावरकर ने अदालत में स्वीकार किया कि:
सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के सामने 10 बार mercy/clemency petitions (दया याचिकाएं) दायर की थीं।
इन याचिकाओं का रिकॉर्ड सरकारी अभिलेखों में मौजूद है।
उसी दौर के कई अन्य क्रांतिकारियों, जैसे Bhagat Singh, Rajguru, Batukeshwar Dutt और Ashfaqulla Khan ने ऐसी दया याचिकाएं नहीं दी थीं।

उन्होंने यह भी माना कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अपने विचारों पर अंत तक अडिग रहे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार से किसी प्रकार की रियायत नहीं मांगी।
सत्यकी सावरकर का बचाव क्या था?
सत्यकी सावरकर ने साथ ही यह भी कहा कि:
दया याचिका दाखिल करना ब्रिटिश शासन में एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया थी।
केवल सावरकर ही नहीं, अन्य कैदी भी ऐसी याचिकाएं देते थे।
याचिकाओं की भाषा को ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा (loyalty) का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की याचिकाओं को लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्हें आशंका थी कि रिहा होने पर वे फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। �

विवाद क्यों है?
सावरकर की दया याचिकाओं को लेकर वर्षों से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस चलती रही है।
आलोचकों का तर्क है कि:
बार-बार दया याचिका देना ब्रिटिश सत्ता के साथ समझौते का संकेत था।
समर्थकों का तर्क है कि:
यह जेल से बाहर आकर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति थी।
उस समय दया याचिका देना असामान्य नहीं था।

इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि स्वयं सावरकर के पड़पोते सत्यकी सावरकर ने अदालत में यह स्वीकार किया कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को 10 दया याचिकाएं दी थीं, जबकि कुछ अन्य क्रांतिकारियों ने ऐसा नहीं किया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इससे सावरकर की देशभक्ति या क्रांतिकारी भूमिका कम नहीं हो जाती और दया याचिकाओं को ब्रिटिश समर्थक होने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

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