16/07/2019
*भगवद्गीतामृतम्...*
*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू ।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।१८/६५।*🌹
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से स्नेह युक्त वचन कहते हैं- मैने तेरे प्रति अति गोपनीय और रहस्यमय ज्ञान को कहा है अतः तू इस गहन विषय पर सम्पूर्णता से विचार कर जैसी तेरी इच्छा हो वैसा कर ...६३
अर्जुन के कुछ भी उत्तर नहीं देने पर श्री गोविन्द कहते हैं, तू मेरा अतिशय प्रिय होने से मेरे कहे परम गोपनीय रहस्य को फिर से सुन ।क्योंकि मेरे ये वचन तेरे हित के लिए ही कहे जा रहे हैं... ६४
श्री कृष्ण को अर्जुन अपना सखा मानते हैं, यह सत्य है परन्तु यहाँ पर विशेष बात यही है कि श्री कृष्ण स्वयं अर्जुनको *'प्रियोऽसि मे'* कह रहे हैं । यह प्रेम युक्त आत्मीयता अपने सखा के प्रति ठाकुरजी का इसीलिए है क्योंकि श्री कृष्ण ही अर्जुन के एकमात्र आधार, अवलम्बन व गति हैं ऐसी स्थिति में परमेश्वर श्री कृष्ण उसे *सम्पूर्ण प्रेमाभक्ति* प्रदान कर रहे हैं । क्योंकि उनका वचन है
*न मे भक्तः प्रणश्यति ..९/३१*
श्री कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन *तू मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव, परमात्मा में ही अनन्य प्रेम वाला तथा नित्य निरन्तर रहने वाली अचल निष्ठा से युक्तहो (मुझ शङ्ख चक्र गदा पद्म और रत्न जड़ित किरीट कुण्डलआदि दिव्य आभूषण धारी परमेश्वर कोअतिशय श्रद्धा पूर्वक प्रेमा भक्ति युक्त भाव से श्रवण, कीर्तन, मनन और पाठ अध्ययन द्वारा भजने वाला हो । मेरे सच्चिदानंदघन स्वरूप में निश्छल प्रीति हो जाने से मनवाणी,और शरीर का भी सर्व भावमय समर्पण हो जायेगा।जिससे तू मेरा श्रद्धा भक्तिव प्रेमविह्वलता से एकाग्र चित्त हो कर पूजन करने वाला हो जायेगा।इन दुर्लभ भावों को प्राप्त कर तेरे मन में मेरे चिन्तन के साथ मेरे विभूति, बल ऐश्वर्य, गाम्भीर्य, उदारता, वात्सल्य, सर्व शक्तिमान आदि अनेकों अनेकों गुणों का ज्ञान होगा । जिसके द्वारा मुझ को सबका सर्वाश्रय जानकर मुझमें तेरा विनय,भक्ति व शरणागति आदि का सम्पूर्ण रूप से समर्पण भाव प्रकट होगा। और साष्टांग प्रणाम करने का ह्रदय में उद्वेग होगा जिसके करने पर तू सम्पूर्ण रूप से मुझ को ही प्राप्त करेगा ।यह मेरा सत्य वचन है, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय सखा है* ...🌹🙏🌹
*सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।१८/६६।*🌹
*अन्ततः भगवान श्री कृष्ण का अत्यंत उदार कृपापूर्ण,स्नेह युक्त वचन- हे अर्जुन तू सभी प्रकार के धर्मों अर्थात त्रिगुणात्मक प्रकृति से उत्पन्न विभिन्न धर्मों में अपने स्वभाव अनुसार अपने कल्याण का आश्रय ढूंढना, ऐसी अभिमान पूर्ण आसक्ति को त्याग कर तू केवल मुझ सच्चिदानंदघन में ही मन को लगाने वाला होजा। मुझ वासुदेव में होने वाली श्रद्धा व प्रीति से युक्त होकर तू मेरीही शरणागति को प्राप्त। होगा क्योंकि जगदीश्वर भगवान श्री कृष्ण की शरणागति सब प्रकार के अज्ञान, दम्भ, अहंकार आदी को स्वतः ही दूर करके ह्रदय में भगवद् प्रीती और साधु सेवा जैसे सद्गुणों को बढ़ाने वाली है। अन्तर्यामी परमेश्वर जो ह्रदयस्थ होकर सद्ज्ञान प्रदान करते हैं,अपने परम सात्विक प्रकाश से भक्त को अपने स्वरूप भूत (धाम) में ही सदैव वास प्रदान करते हैं। जो परम पवित्र एवं परमानन्द पूर्ण दुर्लभ शान्ति के धाम हैं ।भगवान श्री कृष्ण सर्वसमर्थ हैं और मनुष्य सदा से ही त्रिगुणात्मक प्रकृति की सात्विक राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तियों से युक्त है। एक साधारण व्यक्ति भी अपने प्रयास से पूर्ण को पाने की साधना नहीं कर सकता जब तक कि उसको उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मा की अहैतुकि कृपा का अवलम्बन ना मिल जाये । यही पूर्णता श्री भगवान अपने इस अमृत वचन में जीव को प्रदान कर रहे हैं कि सभी धर्मों को छोड़ कर केवल मुझ परमेश्वर का अवलम्बन स्वीकार कर,मेरे ही शरणागति को प्राप्त कर। मैं तुझे तेरे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दुंगा,यह मेरा सत्य वचन है। कृपा निधान परमेश्वर श्री कृष्ण कहते हैं- मेरी शरणागति को प्राप्त व्यक्ति सदा के लिए मेरा अपना हो, मेरे प्रेमाभक्ति पूर्ण दिव्य सनातन धाम का अधिकारी हो जाता है*..🌹🙏🌹
*बंदऊँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ।।* 🌹
*बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा ।सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ।।*🌹
*सुकृति संभु तन बिमल बिभूति ।मंजुल मंगल मोद प्रसूति ।।*🌹
*श्री गुरू पद नख मनि गन जोति ।सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ।।*🌹
*उघरहिं बिमल बिलोचन ही के ।मिटहिं दोष दुःख भव रजनी के ।।सूझहिं राम चरित मनि मानिक ।गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक ।।*🌹
*दोहा-*
*संत सरल चित्त जगत हित जानि सुभाउ सनेहु ।बालविनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु ।।*🌹🙇♀
मानस-बालकाण्ड/सो•५,...दो•३
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*जय जय श्री राधे*