18/08/2024
अपने नाम के पहले अक्षर से जाने अपना भविष्य
आपके नाम का पहला अक्षर से जाने अपना भविष्य || Know your future by the first letter of your name
Know your future by the first letter of your nameअपने नाम के पहले अक्षर से जाने अपना भविष्य know your future by the first letter of your nameknow your future...
31/10/2022
अध्यात्मिक सुंदरता मानव जीवन की सबसे अच्छी और सात्विक सुन्दरता है
जय श्री राम
#सुविचार
31/10/2022
जय सियाराम
जीवन मे एक नियम ज़रूर बना कर रखना चाहिए
मित्र या आपसे सम्बंधित लोग यदि सुःख मे है, तो बिना आमंत्रण के उनके यहाँ नहीं जाना चाहिए,
पर यदि मित्र मुसीबत या दुःख मे है तों आमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए!
30/10/2022
आज का सुविचार-----
गाँव के कुएँ पर 3 महिलाएँ पानी भर रही थीं।
तभी एक महिला का बेटा वहाँ से गुजरा।
उसकी माँ बोली---" वो देखो, मेरा बेटा,
English medium में है। "
थोड़ी देर बाद दूसरी महिला का पुत्र गुजरा।
उसकी माँ बोली---" वो देखो मेरा बेटा,
Cbse में है। "
तभी तीसरी महिला का पुत्र वहाँ से गुजरा,
दुसरे बेटों की तरह ही उसने भी अपनी माँ को देखा
और माँ के पास आया।
पानी से भरी गघरी उठाकर उसने अपने कंधे पर रखी,
दुसरे हाँथ में भरी हुई बाल्टी सम्हाली और
माँ से बोला---" चल माँ, घर चल। "
उसकी माँ बोली---" ये सरकारी हिंदी स्कूल में पढता है। "
उस माँ के चेहरे का आनंद देख बाकी दूसरी
दो महिलाओं की नजरें झुक गईं।
उपरोक्त कथा का तात्पर्य सिर्फ यही है कि,
लाखों रुपए खर्च करके भी संस्कार नहीं खरीदे
जा सकते...!!
#सुविचार
#जय #श्री #कृष्ण #राधे #राधे
23/10/2022
(((( जैसे खाओ अन्न,वैसा होगा मन ))))
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जैसा अन्न हम खाते हैं, हमारी बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है।
अगर अन्न गलत ढंग से अर्जित धन से आया है, तो हमारी बुद्धि पथभ्रष्ट हो जाती है, जबकि परिश्रम से अर्जित धन से आया अन्न हमें धर्म-कर्म की ओर उन्मुख करता है।
भीष्म पितामह ने यह जानते हुए भी कि कौरव पांडवों के साथ सरासर अन्याय कर रहे हैं, युद्ध में कौरवों का साथ दिया।
दुर्योधन जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था, तब वह मूक दर्शक बने इस अधर्म को सहन करते रहे।
अपने अंतिम समय शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर के अनुरोध पर उपस्थित जनों को धर्म के मर्म का उपदेश दे रहे थे।
द्रौपदी भीष्म पितामह के मुंह से धर्म के महत्व की बात सुनकर हंस पड़ीं।
भीष्म पितामह को समझते देर नहीं लगी कि पांचाली उनकी कथनी-करनी के अंतर को याद कर हँस रही है।
भीष्म पितामह ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा, बेटी द्रौपदी, तुम्हारा हंसना बिलकुल सही है।
मैं उस समय दुर्योधन का अन्न खाता था। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पापी का अन्न खाने से बुद्धि मलिन हो जाती है। मेरी बुद्धि उसी पाप के अन्न के कारण मलिन हुई।
दुर्योधन के अन्न से जो रक्त बना था, उसे अर्जुन के बाणों ने शरीर से बाहर निकाल दिया है और अब मेरा शरीर शुद्ध हो गया है।
इसलिए मैं आज धर्म और न्याय की बात कहने का अधिकारी हो गया हूँ। यह सुनकर द्रौपदी भीष्म पितामह के चरणों में नतमस्तक हो गईं।
साभार :- bhaktipath wordpress
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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18/10/2022
( श्रद्धा और विश्वास )
एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया।
पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई।
जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।
शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है...
लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज़ चलता है।
भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।
रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि..
इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।
खैर करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।"
शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?"
वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।"
सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं।
आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।"
वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई।
कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।
शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी।
शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी..
और जोर जोर से *ऊँ भूर्भुवः स्वः ..... ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।
शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो...?"
महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था।
मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।
शास्त्री जी बोले क्या मतलब ??"
महिला बोली की आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है।
लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा "भव सागर" तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी..
और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था...
मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।"
शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले...
माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।"
"इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूं। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए।
उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले मां चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।"
सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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13/10/2022
कहानी एक गर्भवती हिरनी की जिसकी महत्ता हमारे जीवन में देखी जारही है -
जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घुम रही थी, कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये।
वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।
उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।
उसने दाये देखा, तो एक शिकारी तीर का निशाना, उस की तरफ साध रहा था। घबराकर वह दाहिने मुडी, तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुडी, तो नदी में जल बहुत था।
मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ?
क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी ?क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?
हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का कारिष्मा देखिये। बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा,शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा।और शिकारी, शेर को घायल ज़ानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। हिरनी ने शावक को जन्म दिया।
हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, जब हम पूर्ण पुरुषार्थ के बावजूद चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।अन्तत: यश, अपयश ,हार ,जीत, जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
09/10/2022
आप सभी को शरद पूर्णिमा की ढेर सारी शुभकामनाएं एवं बधाई