Bhasha-Bharat

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28/10/2020

Translated_by_Reyaz

14/09/2020

इतिहास का एक गमगीन मैच
वह चिली के सैन्य तानाशाही का दौर थे। 1973 में चिली सेना की तानाशाही के गिरफ़्त में था। खेल के मैदान कंसंट्रेशन कैंप बना दिए गए थे। वहाँ के नेशनल स्टेडियम को एक यातना शिविर में तब्दील कर दिया गया था।
और वह दिन था जब चिली की राष्ट्रीय टीम को सोवियत संघ के खिलाफ विश्व कप का निर्णायक क्वालीफाइंग मैच खेलना था।
तानाशाह, पिनोशेट ने निर्णय लिया कि यह मैच नेशनल स्टेडियम में खेला जायेगा।
फिर क्या था। बिना देर किए कैदियों को वहाँ से हटाया गया।
फुटबॉल के अधिकारीयों ने मैदान का मुवायना किया। उन्होंने पाया कि स्टेडियम खेल के लिए एकदम फिट है। और फाइनल मैच खेलने के लिए हामी भर दी गई।
लेकिन तानाशाही और यातना की इस जमीन पर सोवियत टीम ने खेलने से इनकार कर दिया।
अस्सी हज़ार दर्शकों ने इस मैच को देखने के लिए टिकट खरीदा था। दर्शकों की भीड़ आई और फ्रांसिस्को वाल्देस ने खाली नेट में उस मैच का पहला गोल किया। वहाँ मौजूद लोगों ने ताली बजाई।
यह ऐसा मैच था जिसे चिली की टीम ने किसी के ख़िलाफ़ नहीं खेला था।

10/09/2020

20 नवम्बर
बच्चे कुछ कहते रहते हैं।
यह दिन अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस का है।
मैं घूमने के लिए निकला हूँ। और उस बच्ची से मेरी मुलाक़ात होती है। वह दो साल की होगी या दो साल से थोड़ी बड़ी। यह वही उम्र है जब हम मासूम होते हैं और मासूमियत भारी शरारतें कराते हैं।
वह बच्ची पेड़ों के हरियाली के साथ झूम रही है। हरियाली को देख रही है। और घास से कह रही है, हेलो घास!' 'गुड मॉर्निंग। गुड मार्निंग हरी घास!'
फिर वह चिड़ियों की आवाज़ सुनने के लिए रूकती है। चिड़ियाँ पेड़ों पर बैठी चहचहा रही हैं। वह उन्हें देखकर ताली बजाती है।
इसी दिन दोपहर में एक लड़का मेरे घर पर आता है। उसकी उम्र शायद आठ या नौ साल होगी। वह मेरे लिए एक तोहफा ले आया है।
यह पेंटिंग का एक फोल्डर है।
वह लड़का डे ला विक्टोरिया के बगल में स्थित मोंतेव्देओ के स्कूल का छात्र है। वह मुझे पेंटिंग का यह फोल्डर सौंपता है। और कहता है, ये पेंटिंग मैंने बनाई है।

10/09/2020

19 नवम्बर
काई और पत्थर
वह 1915 की एक सुबह थी जब साल्ट लेक सिटी में फायरिंग दस्ते ने गोलियों से उसे भून दिया था। उसका नाम जोसफ हिलस्ट्रोम था। लोग उसे हिल ही कहा करते थे।
वह स्वीडन में पैदा हुआ था इसलिए अमेरिका के लिए एक विदेशी नागरिक था।
वह अपना नाम और अपनी नौकरी बदलता रहता था। तकरीबन हजार बार तो उसने अपना पता बदला था।
हिल ने अमेरिकी मजदूरों के लिए गीत लिखे और उन्हें गाया। उसने मजदूरों के लिए कार्टून बनाया। वह जीवन भर इस कोशिश में लगा रहा कि मेहनत करने वाले की आवाज़ बन सके।
अपनी आख़िरी रात उसने अपने साथियों से कहा था, कि उसकी मौत के बाद कोई रोकर वक़्त बर्बाद न करे। हमें अपनी उम्मीदों को कायम रखना है। आकांक्षाओं को ज़िंदा रखना है।
मेरे घर और परिवार के लोगों को भी रोने की कोई जरूरत नहीं।
क्योंकि एक गिरते हुए पत्थर पर काई नहीं लगा करती।
अब उसका घर एक म्यूजियम है। जहाँ से कभी-कभी नाटक, संगीत और कविताओं के पढ़े जाने की आवाज़े आती रहती हैं।

10/09/2020

18 नवम्बर
चार बार ज़र्रो ने जन्म लिया
पहली बार वह 1615 में पैदा हुआ। उस वक़्त उसका नाम विलियम लम्पोर्ट था। वह रेडहेड और आयरिश था।
जब उसका नाम और देश बदला तो वह दुबारा पैदा हुआ। अबकी बार उसका नाम गुइल्लें लोम्बर्दो था। और उसका नया मुल्क़ था स्पेन। यहाँ वह नेवी का कप्तान था।
अपनी तीसरी पैदाइश में वह मैक्सिको की आज़ादी का नायक बना। उसने आज़ादी की लंबी लड़ाई लड़ी। और साल 1659 में उसे मौत की सज़ा सुना दी गई।
उसने खुद को जिंदा जलाए जाने को अपमान समझा। उसने सूली पर चढ़कर मरना बेहतर समझा।
लेकिन बीसवीं सदी में वह फिर से ज़िंदा हो उठा। इस चौथी बार मिली ज़िंदगी में वह खुद को डिएगो दे ला वेगा कहता था। और अब वह अपने चेहरे पर मास्क पहनता था। वह ज़ोरो था। शोषित-पीड़ित लोगों की तरफ से तलवार चलाने वाला। उनके हक़ के लिए लड़ने वाला। उसका अपना एक निशान था। अँग्रेजी वर्णमाला का आख़िरी अक्षर 'Z'।
आपने हॉलीवुड की जो फिल्में देखी हैं। वहाँ डगलस फेयरबैंक्स, टाइरोन पावर, एलेन डेलोन और एंटोनियो बंडारस जिन तलवारों को लेकर पर्दे पर दिखते हैं।
उन तलवारों के पीछे का साहस यही तो था।

10/09/2020

17 नवम्बर
चार कान वाला संगीतकार
1959 में एक दिन उसने दुनिया को अलविदा कह दिया। ब्राज़ील ने उसे आज भी अलविदा नहीं कहा। लोग उसे आज भी याद करते हैं। वह एक ब्राजीलीयन संगीतकार था। उसका नाम था हेल्टर विला-लोबोस।
सब कहते हैं कि उसके पास दो जोड़ी कान थे। एक जोड़ी अंदर और दूसरी जोड़ी बाहर।
जीवन के शुरुआती वर्षों में वह वेश्यालयों में पियानो बजाया करता था। रात का शहर उसका होता और उसके जीवन का खर्च चल जाता। रातें बीती और जाने कितनी रातें बीती।
उसने संगीत को फिर नए तरीके से खोजना शुरू किया। उसने अपने बाहरी कान बंद कर लिए। जहाँ ठहाकों का शोर था, मादकता थी, उलाहने थे। यह सब उसे सुनाई देना बंद हो गया।
और उसने अपने भीतर के कानों को खोल लिए। उस संगीत को सुनना शुरू किया जो उसके भीतर बज रहा था। सुरीला था वह।
बाद के समय में उसके भीतर के यही कान जनता के अपमानों को सुरों में ढालते रहे।
जो जहर समाज में घुल रहा था वह उसे संगीत में पिरोता रहा।

10/09/2020

15 नवम्बर
ह्यूगो ब्लांको का जन्म पेरू में हुआ था। वह 1934 में पहली बार पैदा हुआ था।
वह एक गोरी नस्ल का बच्चा था। जिस हुआनोक्वितो शहर में वह पला-बढ़ा। वह रेड इंडियन की आबादी वाला शहर था। उसके ज़्यादातर दोस्त क्वेशुआ भाषा बोलते थे।
जब वह कुज़्को के स्कूल में दाखिल हुआ तो वहाँ पत्थरों से बनी हुई फर्श थी। इस फर्श पर बैठने की इजाज़त केवल सभ्य लोगों को थी। सभ्य होने का अर्थ था गोरा होना। इंडियंस को उस पर बैठने की मनाही थी।
ह्यूगो ब्लांको का दूसरा जन्म उस वक़्त हुआ जब वह दस बरस का था।
स्कूल में उसे पता चला कि डॉन बार्टोलोम पाज़ ने फ्रांसिस्को ज़माटा नामक एक इंडियान चपरासी को लोहे की गरम-लाल छड़ों से पीटा है। बार्टोलोम एक जमीदार था और अकूत धन-दौलत का मालिक था। उसके पास बहुर से नौकर-चाकर थे। उसने जामाटा को इसलिए पीटा था क्योंकि उसने गायों की देखभाल अच्छे से नहीं की थी।
ऐसा अक्सर होता रहता था। यह मामला भी इतना बड़ा नहीं था। लेकिन इस पिटाई के निशान ह्यूगो के ज़ेहन पर छप गए और ताउम्र छपे रहे।
ह्यूगो जो कि इंडियन नहीं था इन वर्षों में इंडियन बन गया। उसने किसान यूनियन बनाई। किसानों को संगठित किया। और उनके हक़-अधिकारों के लिए लड़ना शुरू किया। इस सबके लिए उसने जीवनभर कीमत चुकाई। जलालत, पिटाई, यातना, हिरासत और उत्पीड़न झेला। उसने बेदखली की ज़िंदगी बिताई।
वह चौदह दिनों की भूख हड़ताल के बीच का कोई एक दिन था जब ह्यूगो अपनी ज़िंदगी को आगे खीचने में असमर्थ हो गया। और वहाँ की असंवेदनशील और क्रूर सरकार ने तोहफे में उसे ताबूत और कफन के कपड़े भेज दिए।

10/09/2020

14 नवम्बर
वह पहली महिला पत्रकार थी
1889 की एक सुबह वह लड़की अपने घर से दुनिया की यात्रा पर निकल पड़ी थी।
उसका नाम नेल्ली ब्लय था।
जूल्स वर्ने को यह यक़ीन न था कि यह छोटी और सुंदर सी बच्ची अस्सी दिनों से भी कम समय में पूरी दुनिया का चक्कर लगा आएगी।
लेकिन नेल्ली ने केवल बहत्तर दिनों में दुनिया को अपने आगोश में ले लिया।
इस दौरान उसने जो कुछ सुना और जो कुछ देखा उसे वह दर्ज करती रही।
बाद में उसने उसे लेखों में तब्दील किया।
यह इस युवा रिपोर्टर का न तो पहला और न ही आखिरी कारनामा था।
मैक्सिको के बारे में लिखते हुए, वह इतनी मैक्सिकन हो गई कि मैक्सिको की सरकार को उसे तुरंत निर्वासित करना पड़ा।
कारखानों के बारे में लिखने के लिए, उसने कारखाने में रहकर असेंबली लाइन पर काम किया।
कैदियों के बारे में लिखने के लिए उसने अपने आपको चोरी के मामले गिरफ्तार करवा लिया और कैदियों के बीच पहुँच गयी।
पागलखाने के बारे में लिखने के लिए, उसने पागलपन का बेहतरीन अभिनय किया। ऐसा अभिनय कि डॉक्टरों को उसे रोगी साबित करना पड़ा। फिर उसने उन मनोचिकित्सा उपचारों का खंडन किया जिसे उसने झेला था। जो किसी को पागल कर देने के लिए काफी थे।
जब नेल्ली बीस बरस की थी, उस समय पिट्सबर्ग में पत्रकारिता मर्दों का पेशा माना जाता था।
मर्दों के इस पेशे को चुनौती देते हुए उसने अपने पहले लेख को प्रकाशित करने का दुस्साहस किया था।
पहले विश्व युद्ध में उसने कई बार बंदूक की गोलियों को चकमा दिया। उसने अपना आख़िरी लेख भी वही लिखा।

10/09/2020

13 नवम्बर
मोबी-डिक का जन्मदाता
यह 1851 की बात है। जब वह ह्वेल मछली दुनिया में पहली बार आई। उसका नाम मोबी-डिक था।
पहले वह लेखक की कल्पना में आई और फिर उस किताब में। किताब का पहला संस्करण न्यूयॉर्क में इसी वर्ष प्रकाशित हुआ था।
हरमन मेलविले ने जल और थल दोनों की खूब यात्राएं की थी। और इन यात्राओं पर कुछ किताबें लिखी। लेकिन उसकी बहुमूल्य कृति, मोबी-डिक कभी सफल न हो पाई। बाद में भी जो किताबें आईं उनके साथ भी कुछ बेहतर न हुआ। वह अपनी ज़िंदगी में एक असफल लेखक रहा।
सफलता और असफलता बेहद संदिग्ध चीज है। यह दुर्घटनाओं की तरह होती हैं।
इन्हीं असफलताओं के चलते उसकी मौत हो गई थी। लेकिन बहुत बाद के वर्षों में उसे बेहद सराहा गया। लेकिन इसकी ख़बर उसे कहाँ लगी होगी।

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