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05/09/2019

आज शिक्षक दिवस है। हर इंसान एक एक शिक्षक है। मैं जब भी आपसे मिलता हूं कुछ न कुछ सीखता हूं। आपके व्यक्तित्व से, आपकी बातों से, आपके व्यवहार से। शिक्षक जात-पात और उम्र की सीमाओं से ऊपर होता है। शिक्षक दिवस पर मेरा प्रणाम स्वीकार करें। साथ ही यह आशीॅबाद और शुभकामना दे की मै भी एक शिक्षक की तरह मागॅदशॅक बन सकु।
शरबेन्दु शेखर झा
मुजफ्फरपुर

20/05/2018

B.Tech Admissions
Top college Delhi Delhi Ncr
West Bangal
M P
UP

06/03/2018
18/10/2017

शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !

आपको सपरिवार दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाईदूज
की हार्दिक शुभकामनाएं.
एवं दीपोत्सव आपके जीवन को
सुख, समृद्धि, सुख-शांति, सौहार्द
एवं अपार खुशियों की रोशनी से जग-मग करे...।

02/10/2017

जाने कितने झूले थे फाशी पर, कितनो ने गोली खाई थी !
क्यों झूट बोलते हो जनाब ,की चरखे से आज़ादी आई थी !!
लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन का सभी देश बासियो को उनके त्याग और बलिदान पर फूल अर्पण !
जय जवान जय किसान !

14/07/2015

First time in india
Industry linked PGDM Program
Where job letter of 4 to 10 lakhs rupees per annum is offered before starting of the program
PGDM in Supply Chain Management
Job In Company like : Flipkart, Snapdeal, Amazon, TCI, Safexpress
Interested call @ 8750261902, 9507060809

09/07/2015

Hurry Hurry Hurry
last chance for B.Tech Admission
No Donation

01/01/2015

.May the coming Year be bright,
filled with good health, fun, frolic & enthusiasm......
May agonies of the past be washed away with the New tide......
Stay blessed always......
Happy New Year 2015.
God bless you and fulfil all your desire whatever you want in your life.
God bless you.

Wishing all of you a very happy & prosperous Diwali
23/10/2014

Wishing all of you a very happy & prosperous Diwali

प्रथम शैलपुत्री / Pratham Shailputriशैलपुत्रीShailputriशारदीय नवरात्र आरम्भ होने पर इस दिन कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर...
25/09/2014

प्रथम शैलपुत्री / Pratham Shailputri
शैलपुत्री
Shailputri
शारदीय नवरात्र आरम्भ होने पर इस दिन कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है। पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बायें हाथ में कमल सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गईं तो वहाँ अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियाँ अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। इस स्वरूप का आज के दिन पूजन किया जाता है। आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे। किसी एकान्त स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोये जाते हैं। उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं।

ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

कवच

ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

सती की कथा

शैलपुत्री के पूजन से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार यहीं नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थी। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सभी देवताओं को यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमन्त्रित किया लेकिन शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमन्त्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने की लिए मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकर जी को बतायी। उन्होंने कहा प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं, अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया है उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं, किन्तु हमें नहीं बुलाया है। ऐसी परिस्थिति में तुम्हारा वहां जाना श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकर जी के इस उपदेश से सती को बोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, माता और बहनों से मिलने की व्यग्रता और उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की आज्ञा दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास का भाव था। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को संताप हुआ। उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा था। दक्ष ने उनके पति शंकर जी के प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। उन्हें लगा भगवान शंकर की बात न मान यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की है। वह अपने पति का अपमान सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान उस दारूण दु:खद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया। सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रुप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हेमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व भंजन किया था।

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