14/09/2026
विश्व हिन्दी महासम्मेलन 2026 में कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक को ‘वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दी सम्मान’
हिन्दी, भारतीय ज्ञान-परम्परा, उच्च शिक्षा, शोध एवं सांस्कृतिक संवाद के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित सम्मान
नई दिल्ली, 14 सितम्बर 2026। हिन्दी दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर में आयोजित विश्व हिन्दी महासम्मेलन 2026 में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक को प्रतिष्ठित ‘वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। हिन्दी भाषा, भारतीय ज्ञान-परम्परा, उच्च शिक्षा, शोध तथा सांस्कृतिक संवाद के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया यह सम्मान उनके शैक्षणिक एवं संस्थागत नेतृत्व की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।सम्मेलन का मुख्य विषय ‘वसुधैव कुटुम्बकम् और हिन्दी : वैश्विक संवाद की साझा भाषा’ रहा। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए शिक्षाविदों, साहित्यकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा हिन्दीप्रेमियों ने सम्मेलन में सहभागिता की। वक्ताओं ने हिन्दी को भारतीय सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान-विनिमय, मानवीय मूल्यों और विश्वबन्धुत्व की भावना को अभिव्यक्त करने वाली सशक्त भाषा के रूप में रेखांकित किया।समारोह के मुख्य अतिथि भारत सरकार के पूर्व केन्द्रीय मन्त्री श्री अश्विनी कुमार चौबे रहे। सम्मेलन में हिन्दी की वैश्विक भूमिका, भारतीय भाषाओं की समृद्ध परम्परा तथा विश्व समुदाय के मध्य सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संवाद की सम्भावनाओं पर व्यापक विमर्श हुआ।
कुलपति के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने अर्जित की नई शैक्षणिक ऊँचाइयाँ
प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक के कुशल एवं दूरदर्शी नेतृत्व में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने शिक्षा, शोध, गुणवत्ता, नवाचार तथा संस्थागत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (NAAC) द्वारा A++ ग्रेड प्राप्त हुआ, जो संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध-संस्कृति, प्रशासनिक दक्षता और संस्थागत उत्कृष्टता को रेखांकित करता है।यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की विकास-यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसमें अध्यापकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के सामूहिक प्रयासों के साथ-साथ कुलपति के प्रभावी नेतृत्व की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रोफेसर पाठक ने विश्वविद्यालय की कार्यसंस्कृति में गुणवत्ता, अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को विशेष महत्व देते हुए शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा प्रशासनिक सुधारों को संस्थागत विकास का आधार बनाया है।
शिक्षा, शोध और नवाचार को नई दिशा
कुलपति के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों को शोधपरक दृष्टि, गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और विद्यार्थियों के समग्र विकास से जोड़ने पर विशेष बल दिया जा रहा है। पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक शैक्षणिक आवश्यकताओं के मध्य सार्थक समन्वय स्थापित करने की दिशा में निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं।प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक का दृष्टिकोण है कि संस्कृत, हिन्दी तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को केवल पारम्परिक अध्ययन तक सीमित न रखते हुए आधुनिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और वैश्विक विमर्श से जोड़ा जाना चाहिए। इसी दृष्टि के अनुरूप विश्वविद्यालय में शोध, अकादमिक विमर्श, अन्तर्विषयक अध्ययन तथा ज्ञान-विनिमय की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा रहा है।उन्होंने विद्यार्थियों के लिए ऐसे शैक्षणिक वातावरण के निर्माण पर बल दिया है, जिसमें ज्ञानार्जन के साथ रचनात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी विकास हो।
समग्र विश्वविद्यालय विकास की दिशा में निरन्तर पहल
प्रोफेसर पाठक के नेतृत्व में विश्वविद्यालय के समग्र विकास को बहुआयामी दृष्टि से आगे बढ़ाया जा रहा है। शैक्षणिक अधोसंरचना के सुदृढ़ीकरण, शोध गतिविधियों के विस्तार, डिजिटल संसाधनों के प्रभावी उपयोग, अकादमिक गुणवत्ता में निरन्तर सुधार तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।विश्वविद्यालय में आधुनिक शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधानपरक वातावरण विकसित करने, विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को समकालीन संदर्भों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक ने संस्थागत विकास को केवल भौतिक संसाधनों के विस्तार तक सीमित न रखते हुए उसे शैक्षणिक गुणवत्ता, मानवीय मूल्यों, शोध की प्रतिष्ठा और सामाजिक उपयोगिता से जोड़ने का प्रयास किया है। उनके दृष्टिकोण में विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान उसके भवनों से नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान-संस्कृति, शोध-परम्परा और विद्यार्थियों के भविष्य-निर्माण से निर्धारित होती है।
संस्थागत नेतृत्व और प्रशासनिक दक्षता का सशक्त उदाहरण
कुलपति के रूप में प्रोफेसर पाठक ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण को अधिक सुदृढ़, अनुशासित और विकासोन्मुख बनाने की दिशा में निरन्तर कार्य किया है। शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, समयबद्ध कार्यप्रणाली तथा विद्यार्थियों के हितों को संस्थागत प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया है।उन्होंने अध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए रचनात्मक एवं प्रेरणादायी वातावरण विकसित करने पर विशेष बल दिया है। शोध, नवाचार और अकादमिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हुए विश्वविद्यालय की कार्यसंस्कृति को अधिक सक्रिय, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।उनकी दृष्टि में शिक्षा केवल उपाधि प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, बौद्धिक विकास, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र-निर्माण का सशक्त आधार है।
हिन्दी और भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति प्रतिबद्धता
प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक हिन्दी को भारत की सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक संवेदना और राष्ट्रीय चेतना की सशक्त संवाहक भाषा मानते हैं। उनके अनुसार हिन्दी का विकास भारतीय भाषाओं के सम्मान, उच्चस्तरीय शोध, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा वैश्विक स्तर पर ज्ञान-विनिमय के व्यापक विस्तार से जुड़ा है।वे भारतीय ज्ञान-परम्परा को आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुत करने तथा युवा पीढ़ी को अपनी भाषायी और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। उनके शैक्षणिक नेतृत्व में भाषा, साहित्य, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के विविध आयामों को परस्पर जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान-परम्परा को समकालीन विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
विश्व हिन्दी महासम्मेलन में हिन्दी के वैश्विक स्वरूप पर व्यापक विमर्श
विश्व हिन्दी विद्यापीठ तथा भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में हिन्दी के अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप, भारतीय भाषाओं की परस्पर समृद्धि तथा वैश्विक शान्ति के लिए सांस्कृतिक संवाद की आवश्यकता पर व्यापक चर्चा हुई।सम्मेलन के आयोजन में भूमण्डलीय शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. मार्कण्डेय राय तथा भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान के कुलाध्यक्ष डॉ. प्रियरंजन त्रिवेदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।उल्लेखनीय है कि विश्व हिन्दी विद्यापीठ का उद्घाटन 14 सितम्बर 2000 को आयोजित सहस्राब्दी विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर तत्कालीन उपप्रधानमन्त्री एवं राजभाषा मन्त्री श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था। इस गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विश्व हिन्दी महासम्मेलन हिन्दी को वैश्विक संवाद, ज्ञान-विनिमय और सांस्कृतिक सहभागिता की प्रभावशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में निरन्तर प्रयासरत है।
विश्वविद्यालय परिवार में हर्ष और गौरव
कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक को प्राप्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दी सम्मान’ से श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिवार में हर्ष और गौरव का वातावरण है। अध्यापकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने इस सम्मान को कुलपति के शैक्षणिक एवं बौद्धिक योगदान के साथ-साथ विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा से जुड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा है।विश्वविद्यालय परिवार का मानना है कि यह सम्मान प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक के व्यक्तिगत शैक्षणिक योगदान के साथ-साथ उस संस्थागत दृष्टि और कार्य-संस्कृति का भी सम्मान है, जिसके माध्यम से विश्वविद्यालय शिक्षा, शोध, नवाचार, भारतीय ज्ञान-परम्परा और अकादमिक उत्कृष्टता के क्षेत्र में निरन्तर आगे बढ़ रहा है।NAAC द्वारा प्राप्त A++ ग्रेड तथा विश्वविद्यालय में जारी विकासोन्मुख शैक्षणिक एवं संस्थागत गतिविधियाँ इस प्रगति-यात्रा को नई गति प्रदान कर रही हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दी सम्मान’ इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में जुड़ गया है, जो हिन्दी, भारतीय ज्ञान-परम्परा और वैश्विक सांस्कृतिक संवाद के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।