17/06/2026
धूप भी छाँव भी ज़िंदगी निराली मैंने यह देखा है,
हर आँख नम यहाँ और सवाली मैंने यह देखा है।
कुदरत बनाती तो ग़लत होने पर मिटा भी देती है,
कहीं खिल रही कहीं मुरझी डाली मैंने यह देखा है।
जीवन है तो उतार-चढ़ाव मुश्किलें तमाम आनी है,
बिना मुश्किलों का जीवन ख़याली मैंने यह देखा है।
फलदार पेड़ जब भी देखा मैंने झुका ही हुआ देखा,
मेहनत किए बग़ैर ना आती रवानी मैंने यह देखा है।
कुदरत का इंसाफ़ तो होकर ही रहता है "पुखराज"
दिखा देती औकात कुदरत सयानी मैंने यह देखा है।
~ पुखराज
( स्वरचित एवं मौलिक रचना सर्वाधिकार सुरक्षित)