03/04/2019
जन्म उद्देश्यों से पूर्ण है,
चरित्र रहस्यों से परिपूर्ण है,
बिना कृपा उनके जीवन अपूर्ण है,
परमपिता कृष्णा ही सम्पूर्ण है।
मथुरा में जन्मे देवकीनन्दन,
गोकुल में क्रीड़ा करते यशोदानन्दन,
राधा संग प्रेमलीला बरसाने में,
हे प्रभु! तेरी माया तो तू ही जाने।
कुरुक्षेत्र की वो पावन धरती,
साक्ष्य है बुराई के अन्त की,
सत्य असत्य छल निश्छल की रणनीति,
सत् उद्देश्य पूर्ण को उचित ठहरायी जिसने ये नीति।
अपनों के आगे व्यथित पार्थ भी,
उठ खड़ा हुआ लेकर धनुष बाण भी,
जब कृष्ण वाणी निकली बनकर गीता का सार,
जन्म मरण सीखता आज भी जिससे संसार।
राधा के श्याम तुम मीरा के घनश्याम भी तुम,
आकाश भी तुम पाताल भी तुम,
परमात्मा! हर आत्मा में तुम,
कण कण में विद्यमान हो तुम।
आदि भी तुम अनन्त हो तुम,
महाभारत का आधार गीता का सार हो तुम,
वर्णन भी क्या सम्भव तुम्हारा,
हर वर्णन में ही हो तुम।
हर टूटे विश्व़ास की आस हो तुम,
हर ओष्ठ की निश्छल मुस्कान हो तुम,
हे मुरली वाले! परमेश्व़र जगदीश्व़र स्वामी,
धरती के हर जीवात्मा के उद्धारक हो तुम।।