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जन्म उद्देश्यों से पूर्ण है,चरित्र रहस्यों से परिपूर्ण है,बिना कृपा उनके जीवन अपूर्ण है,परमपिता कृष्णा ही सम्पूर्ण है।मथ...
03/04/2019

जन्म उद्देश्यों से पूर्ण है,
चरित्र रहस्यों से परिपूर्ण है,
बिना कृपा उनके जीवन अपूर्ण है,
परमपिता कृष्णा ही सम्पूर्ण है।

मथुरा में जन्मे देवकीनन्दन,
गोकुल में क्रीड़ा करते यशोदानन्दन,
राधा संग प्रेमलीला बरसाने में,
हे प्रभु! तेरी माया तो तू ही जाने।

कुरुक्षेत्र की वो पावन धरती,
साक्ष्य है बुराई के अन्त की,
सत्य असत्य छल निश्छल की रणनीति,
सत् उद्देश्य पूर्ण को उचित ठहरायी जिसने ये नीति।

अपनों के आगे व्यथित पार्थ भी,
उठ खड़ा हुआ लेकर धनुष बाण भी,
जब कृष्ण वाणी निकली बनकर गीता का सार,
जन्म मरण सीखता आज भी जिससे संसार।

राधा के श्याम तुम मीरा के घनश्याम भी तुम,
आकाश भी तुम पाताल भी तुम,
परमात्मा! हर आत्मा में तुम,
कण कण में विद्यमान हो तुम।

आदि भी तुम अनन्त हो तुम,
महाभारत का आधार गीता का सार हो तुम,
वर्णन भी क्या सम्भव तुम्हारा,
हर वर्णन में ही हो तुम।

हर टूटे विश्व़ास की आस हो तुम,
हर ओष्ठ की निश्छल मुस्कान हो तुम,
हे मुरली वाले! परमेश्व़र जगदीश्व़र स्वामी,
धरती के हर जीवात्मा के उद्धारक हो तुम।।

भगवद गीता में 3 रस्ते बताए गए है आत्मज्ञान को प्राप्त करने के। आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही योग है और कुल 5 प्रकार के यो...
23/02/2019

भगवद गीता में 3 रस्ते बताए गए है आत्मज्ञान को प्राप्त करने के। आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही योग है और कुल 5 प्रकार के योग है जिसमे से सिर्फ 3 योग का ही वर्णन भगवद गीता में है ये योग निम्न है:-

संख्या योग:- इसे ज्ञान योग भी कहते है। इस योग में सिर्फ एक व्यक्ति को समझना रहता है कि भगवन का स्वरुप असल में क्या है। मतलब की वो निर्गुण निरकर है जन्म मृतु से रहित है सारे सृस्टि से सारभूत है। वही ब्रह्मा विष्णु और महेश है। इस दुनिया में जो भी है वो यही है। यही हर तरफ है। उपर्युक्त बाते सिर्फ जान लेने से नाहु होगी इसे समझना भी होगा। समझने में और जानने क्या अंतर है यह बहुत से लोगों का प्रश्न होगा। यदि आप सिर्फ कोई चीज़ जानते है तो बस आप उस ज्ञान को दिमाग तक ही सिमित रखेंगे और आपका जीवन पहले की तरह ही चलेगा परंतु यदि आप समझ लेंगे तो आपका जीवन इस ज्ञान के साथ चलेगा। आप हर कार्य में यह ज्ञान लाएंगे। यह बदलाव आपने होगा।

कर्म योग:- इस योग में कहा है कि किसी भी व्यक्ति के लिए द्वेष नहीं रखना है। अपने इंद्रियों को अपने वश में रख कर अहिंसा से सिर्फ अपना कार्य करना है तो आपको आत्मज्ञान प्राप्त होगा।

आत्मज्ञान वही ज्ञान है जो संख्या योग में मैंने लिखा है और किसी भी योग से आप इसे प्राप्त कर सकते है मतलब किसी भी योग के अनुसरण से इस तथ्य को समझ सकते है।

भक्ति योग:- इस योग में सिर्फ आपको अपने आपको जीवित रखने के लिए नित्य कर्म करना है और बाकि के समय भगवन की भक्ति एवं भगवन का ध्यान करना है। कलयुग में तो सिर्फ दिन में श्री हरि का जप करके या फिर जब भी समय मिले ध्यान दीजीए की यहाँ आपको समय निकलना नहीं है भक्ति के लिए। आपको जब भी समय मिले बस श्री हरि का नाम स्मरण किजीए।

ध्यान योग:- इस योग में आपको सिर्फ ध्यान करना है।

क्रिया योग:- इस योग में आपको प्राणायाम करना है।

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