18/09/2026
धर्म व्यक्ति और समाज को जोड़ने, बिखरने से बचाने तथा निरंतर उन्नति की ओर ले जाने वाला अनुशासन है – डॉ. मोहन भागवत जी सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय उपक्रम ‘युवा धर्म संसद-2026’ का शुभारम्भ
अवन्तिका (उज्जैन) की पुण्यभूमि स्थित गीता भवन सभागार में आयोजित सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय उपक्रम ‘युवा धर्म संसद' के छठवें संस्करण (2026) का भव्य शुभारंभ मुख्य अतिथि परम पूज्य
डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ। इस अवसर पर उद्घाटन सत्र में Central Sanskrit University के कुलपति प्रो. Shrinivasa Varakhedi प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी पूज्य आचार्य श्री मिथिलेशनन्दिनी शरण जी महाराज (संरक्षक सेवाज्ञ संस्थानम् ) और श्री आशीष आशु जी (राष्ट्रीय अध्यक्ष सेवाज्ञ संस्थानम्) उपस्थित रहें।
युवा धर्म संसद में देशभर के 25 राज्यों से लगभग 1600 युवा प्रतिभागी तथा 300 से अधिक शिक्षाविद, शिक्षक, शोधकर्ता, विद्वान एवं धर्माचार्य शामिल होकर धर्म, संस्कृति, शिक्षा, तकनीक, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर संवाद कर रहे हैं।
स्वागत वक्तव्य में पूज्य आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज ने युवाओं को आत्मनिर्माण और भारत-बोध का संदेश देते हुए कहा कि अपने से नीचे को जीतने में वास्तविक विजय नहीं है, बल्कि जो आपसे उच्च है, उसे सिद्ध करने में विजय है। भारतीय युवा केवल युवा होने तक सीमित न रहे, बल्कि अपने निर्माण के साथ भारत को पहचाने। युवाओं के प्रश्नों में स्वयं युवा उपस्थित रहें और अपने प्रश्नों को बाजार, राजनीति अथवा अन्य बाहरी परिदृश्यों से प्रभावित होने के बजाय अपनी आत्मचेतना और जीवन-मूल्यों से जोड़कर देखें।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. Shrinivasa Varakhedi श्रीनिवास वरखेड़ी ने युवाओं को भारत की ज्ञान परंपरा और आत्मबोध से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि युवाओं को ‘इंडिया से भारत’ की ओर ले जाने वाली चेतना के साथ आत्मवान बनना चाहिए। युवा पीढ़ी के भीतर आत्मविश्वास, ज्ञान और भारतीय दृष्टि का विकास ही समाज और राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्यनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने धर्म को केवल वृद्धावस्था या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित मानने की धारणा को अस्वीकार करते हुए कहा कि धर्म का विचार युवावस्था से ही शुरू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन के प्रारंभ से अंत तक मनुष्य के आचरण और निर्णयों को दिशा देने वाला तत्व है। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है और मनुष्य के जीवन में उसके कर्तव्य, आचरण और उत्तरदायित्व को निर्धारित करता है।
मोहन भागवत जी ने धर्म और ‘रिलीजन’ के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म को केवल ‘रिलीजन’ के अर्थ में समझना उचित नहीं है। उन्होंने धर्म को ‘धृ’ धातु से जोड़ते हुए कहा कि जिसका अर्थ धारण करना है। धर्म व्यक्ति और समाज को जोड़ने, उन्हें बिखरने से बचाने तथा निरंतर उन्नति की ओर ले जाने वाला अनुशासन है। धर्म जीवन से दूर जाने या सब कुछ छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि भौतिक जीवन के साथ आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन स्थापित करने की दृष्टि है तथा निरंतर उन्नति की ओर ले जाने वाला अनुशासन है। धर्म जीवन से दूर जाने या सब कुछ छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि भौतिक जीवन के साथ आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन स्थापित करने की दृष्टि है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य प्रकृति की दृष्टि से अत्यंत सीमित क्षमताओं वाला प्राणी होते हुए भी अपनी बुद्धि के बल पर सृष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सका है। इसलिए उसके साथ सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। उन्होंने युवाओं को जीवन में परिश्रम और आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ दूसरों के हित और कल्याण का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने सत्य, करुणा, शुचिता और तप को मानवीय धर्म के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में रेखांकित किया।
सरसंघचालक जी ने कहा कि धर्म केवल बड़े-बड़े सिद्धांतों और व्याख्यानों तक सीमित नहीं है। भोजन के बाद कचरा न फैलाना, यातायात के नियमों का पालन करना, दूसरों को कष्ट न देना, अपने कर्तव्यों का पालन करना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी धर्म के आचरण का हिस्सा है। धर्म का वास्तविक स्वरूप पुस्तकों को पढ़ने या उसके बारे में बोलने से अधिक उसके व्यवहार में उतरने से प्रकट होता है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि व्यक्तिगत सफलता को व्यापक सामाजिक सफलता से जोड़कर देखा जाए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की जीत तभी सार्थक है, जब उसकी जीत में दूसरों की भी जीत शामिल हो। युवाओं को ज्ञान, दान और दुर्बलों के संरक्षण की भावना के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया। साथ ही अपनी उपासना और परंपरा के प्रति दृढ़ रहते हुए अन्य उपासनाओं के प्रति सम्मान रखना भी भारतीय जीवन-दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष है।
सेवाज्ञ संस्थानम् के तहत आयोजित युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण है। इससे पूर्व काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में आयोजन हो चुके हैं। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, धर्म, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण के प्रश्नों पर विचार करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना है।
तीन दिवसीय आयोजन में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व, भारतीय संस्कृति, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीक, सूचना एवं विचार का संघर्ष, सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय मूल्य तथा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे समसामयिक विषयों पर विभिन्न सत्रों में संवाद और मंथन किया जा रहा है।
युवा चिंतन, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रबोध के इस महाआयोजन में पूज्य सरसंघचालक जी का उद्बोधन बेहद प्रेरणादायी रहा।
Ministry of Education Pralhad Joshi Indian Knowledge Systems, MoE Murali Krishna Samskrita Bharati Samskrit Promotion Foundation