11/10/2025
आज के दर्शन 🙏💐
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बेहतर करने का प्रयास
जलता दीया एक सपना है, यह एक रोशनी है जो हर युवा को जगमगाता हुआ देखना चाहता है। युवा भारत का हर व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूरा प्रयोग कर पाए। हर युवा अपने दिशा और नजरिए को अच्छे से ध्यान रखकर कार्य कर पा।
महान कार्य करने के लिए एक - 'वजह' का होना बहुत जरुरी है और वह 'वजह' बड़ी होनी चाहिए और वास्तविक होनी चाहिए। हमें लोगों के भीतर से इसी 'वजह' को ढूढ़ना है, उनकी असली आवश्यकता क्या है, उन्हें किस प्
11/10/2025
आज के दर्शन 🙏💐
#शिक्षक_दिवस
शिक्षण पर्दे के पीछे की विधा है अर्थात समाज में आप योगदान अनुसार भले ही न दिखें, परन्तु समाज के पीछे होते आप ही हैं और आप ही वो हैं जो पर्दे के पीछे से समाज को दिशा दिखाते हैं।
आप की भूमिका, आप से ही तय होती है, आप स्वयं के दृष्टा है।
समर्पण, भाव, धैर्य, निरंतर प्रयास और आत्ममुग्धता का त्याग ही आपको सही दिशा प्रदान करता है।
वाद-विवाद से दूर रहते हुए अपने कार्य के प्रति समर्पण ही आपको शिक्षक बनाए रह सकता है।
जीविका हेतु मिलने वाला धन आपके दायित्व का निर्धारण मात्र नहीं है आपके कर्तव्यों के प्रति बोध व सजगता रखना ही आपके शिक्षक होने की निष्ठा को दर्शाता है।
और सच पूछिए तो शिक्षक मात्र उसे कहना उचित नहीं जो इसके लिए जीविका लेता है और यह उसका पेशा (profession) है। बल्कि समाज में रहते हुए हम किसी भी प्रोफेशन में हो अपने कृत्यों, अपने विचारों, आदतों, व्यवहार में वो गुण झलकने चाहिए जो समाज को आइना दिखाते हैं।
जब समाज आपको देख रहा होता है तो आपके कृत्य ही आपके माध्यम से समाज के लिए सीख बनती जाती है।
सीखने के लिए अथाह है, आप हर व्यक्ति, वस्तु, पशु, पक्षी, जीव से कुछ ना कुछ सीख रहे होते हैं अतः प्रकृति का सम्मान बनाये रखना यह हमारे बोध में सदा रहना चाहिए।
क्या सीखाना है और कितना सीखाना है, सबके बीच अच्छा संतुलन रखना ही आपको आदर्श शिक्षक बनाता है।
तो जी, समस्त शिक्षकगणों को सदा की भांति बारम्बार नमन व अभिनन्दन
शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
प्रकाशवाणी
#जलता_दीया
दीमाग तेज करने के आठ तरीके
१. एक विदेशी भाषा सीखें (except english)
२. ज्यादा पानी पीएं और फल खाये
३. Play games & Solve puzzles
४. Exercise regularly
५. Read more (Book reading
६. Meditation
७. Green Tea
८. Good Sleep
जैसे फलों का राजा आम है, मिठाइयों की रानी जलेबी, वैसे व्यायामों का सम्राट किसी को कहा जाना हो तो वो है पैदल चलना
एक तो पैदल कोई भी चल लेता है किसी ना किसी रुप में बूढ़ा हो, जवान या बच्चा
दूसरा इसका कोई साइड इफेक्ट्स नहीं है
अगर आप अति ना करें
यदि आप अति भी करते हैं तो भी इससे अन्य व्यायामों की अपेक्षा पैदल चलने की अति के नुकसान का प्रभाव कम होगा
और पैदल चलने के फायदे तो इतने हैं कि आप ऊंगलियों पर गिनते रह जायेंगे उंगलियां ही नहीं ऊंगलियों की पोर भी आप गिन लेंगे पर पैदल चलने के फायदे खत्म नहीं होंगे
वैसे आप सोच रहें होंगे पैदल चलने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है..
सबसे पहली बात जो सब बहाने बनाते हैं कि उनके पास व्यायाम के लिए समय नहीं बचता.. या फिर.. आज टाइम नहीं मिला.. इनते दिन तक बिजी हूँ.. बीमार हूँ.. इत्यादि-इत्यादि
वाले लोग भी पैदल चल सकते हैं
आप घर से बाहर नहीं निकलते तो घर-आँगन-झत पर ही पैदल चल सकते हैं
आप विद्यार्थी हैं या पढ़ाकू हैं- आप चलते-चलते पढने की कोशिश बनाइए नींद भी नहीं आएगी, दिमाग भी एक्टिव रहेगा, और इधर-उधर के विचार भी नहीं आयेंगे
बस पकड़ना हो, मेट्रो से कहीं जाना हो तो पैदल स्टेशन तक जाइए
पैदल चलना आपसे कोई खर्च भी नहीं मागता बल्कि काफी हद तक आपके पैसे भी बचाता है और आपको स्वस्थ और सक्रिय भी रखता है।
खाने के बाद धीमी चाल में पैदल जरुर चलें, हाँ ये याद रखें भरपेट खाने के बाद यदि भागते हुए कहीं जाना पड़े तो इससे होने वाले कष्ट को मृत्यु के समय के कष्ट के समान माना जाता है,
इसलिए
प्रतिदिन शाम के खाने के बाद पहले 3 किलोमीटर धीमी चाल में उसके बाद के तीन किलोमीटर तेज चाल में उसके बाद के तीन किलोमीटर दौड़ लगायें, और आपको किसी भी दूसरे एक्सरसाइज की जरुरत नहीं, और इतना नहीं कर सकते तो एक किलोमीटर तो चलिए ही चलिए
गोवर्धन परिक्रमा, वृन्दावन परिक्रमा, अयोध्या परिक्रमा, काशी परिक्रमा, चित्रकूट परिक्रमा, ओमकारेश्वर परिक्रमा, अयोध्या परिक्रमा, नर्मदा परिक्रमा आदि अनेकों परिक्रमाएं
ऊंचे पहाड़ियों पर माता जी के दर्शन के लिए पैदल चलना हो
सावन में कांवड़ियों द्वारा जल लाने और चढ़ाने की परम्परा
पहाड़ों पर लम्बी-लम्बी पैदल यात्राएं
धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के साथ शारीरीक स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति, तन-मन की शुद्धि के लिए भी प्रायोजित होती है।
पर आप यदि बहुत ही ज्यादा लम्बी यात्रा करने की सोचें तो डाक्टर से परामर्श भी जरुर कर लें
हो सकता है कि आप कहें कि पैदल चलते हुए बोरियत होती है तो एक काम करें पैदल चलते हुए आप चार कदम में गहरी सांस ले चार से आठ कदम तक रोंके और फिर चार कदम में छोड़ दें। यही क्रिया पूरे वॉक के दौरान करें।
पैदल चलते हुए आप गहरी सांस लेने के साथ-साथ
आप कीर्तन कर सकते है, (प्रभात फेरियां इसी का उदाहरण हैं)
गीत गुन-गुना सकते हैं
आडियो-बुक सुन सकते हैं
(वीडियो नहीं देख सकते ठोकर लग सकती है या टकरा सकते है)
अपने घर में धीमी चाल में मद्धम-मद्धम चलते हुए आप पढिए, एक अलग ही सक्रियता का अनुभव रहेगा आपको
बाकी पैदल चलते-चलते खुद इतने विचार और फायदें अनुभव करेंगे कि इससे भी बड़ी पोस्ट आपकी आने लगेगी।
धर्म की स्थापना में अधर्म करना भी धर्म ही होता है। किसी सच्चे की जान जा रही हो और के एक झूठ से उस "सच्चे" की जान बच जाए उसे झूठ नहीं कहते.. वो धर्म है।
महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने शिखंडी, अश्वत्थामा, घटोत्कच का प्रयोग किया; अंग राज कर्ण को मरवाया वो अधर्म नहीं नीति थी, धर्म था.. भगवान ने शास्त्रों में अपने चरित्र चित्रण द्वारा हर को वो कर्म करके बताया है कि कैसे जीना है। और हाँ.. एक बात और जो याद रखनी चाहिए कि अधर्म की शुरुआत पहले कौरवों ने की थी..।
वर्तमान परिदृश्य में आप बहुत से मौके देखेंगे.. और सोचेंगे.. क्या करु.. तब अपने "विवेक" का प्रयोग कीजिए और अपने शास्त्रों का अनुशरण कीजिए।
शास्त्रों में (महाभारत-रामायण-भगवदगीता) आपके हर भूत-वर्तमान-भविष्य की शंका का समाधान लिखा हुआ है और शंका का समाधान लोगों की कहीं-सुनी से मत करिए, "शास्त्रों को पढिए।" वहीं प्रामाणिक है।
इस बात को याद रखिए कि "शास्त्रों को पढिए।"
कुछ बड़ा करते हुए.. हमेशा सब धुधंला-धुधंला सा नजर आता है,, सारी लाइटें ग्रीन नहीं होती.. बार-बार रास्ता भटकते रहते हैं या भटकाव होता रहता है..
पर इसकी वजह से चलना रोका नहीं जा सकता.. पहाड़ों की सड़कें बड़ी सर्पिली होती है.. हर अगले मोड़ पर एक नया नजारा होता है.. वो आपको ऊपर भी ले जा सकता है, नीचे भी पहुंचा सकता है.. पर यह नियती नहीं होती है.. नियति होती है चलना.. चलते रहना..
और.. चलते रहना ही मंजिल है। हो सकता है जहाँ हम पहुंचे वो हमारी मंजिल ना हो.. पर ये बात जरूर है कि ये हमारे मंजिल का रास्ता जरुर है.. बिना इस रास्ते पर चले हम मंजिल तक नहीं पहुंच सकते...
आपके लाख कोशिशों के बावजूद यदि कोई काम सिद्ध नहीं होता तो उसे प्रभु की इच्छा पर छोड़ दो,
क्योंकि करना उन्हीं को है
आपके पास जो है जो प्रभु ने आपको दिया है उसका भी आनन्द लेते रहो साथ के साथ,
क्योंकि
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
सूरज सो कर उठा तो फोन उसने खुद से दूर कर दिया। आज वह फोन से दूर ही रहना चाहता था
उसकी हर सुबह फोन के साथ ही शुरु होती थी पहले व्हाट्सएप फिर फेसबुक फिर कब वह रील्स में उलझ जाता पता ही नहीं चलता !!
चुपचाप बैठे अभी उसे कुछ ही सेकंड बीते होंगे.. कि उसकी बेचैनी शुरु हो गई थी.. जैसे उसका कलेजे का टुकड़ा झीन लिया हो किसी ने..
कुछ ही मिनटों की चुप्पी के बाद फोन उसके हाथ में आ गया था.. ऐसा नहीं है.. उसका फोन उसका टाइम बर्बाद ही करता है यह सोच कर उसने फोन के फाइल मैनेजर एप से फाइल से 'राम चरित मानस' सर्च किया अब फोन की स्क्रीन पर पी.डी.एफ. में राम चरित मानस खुल चुकी थी और अब रामायण की चौपाईयों और उसका अर्थ का वाचन शुरु हो गया था
मन ही मन में.. कभी बोल-बोल कर
पिछले काफी समय से वह इस ग्रंथ को अपनी फोन की स्क्रीन पर पढ़ रहा था, आज वह खुद से ही अच्छा फील करने लगा था कि उसने रील्स की चकाचौंध से आगे एक कदम बढ़ा दिया है।
बाथरुम में बदन पर जब पानी पड़ता है.. तब नहाते हुए मन इतने विचारों से भर जाता है.. कि क्या कहने..
बिल्कुल क्लीस्ट-क्लीयर.. नहाने के बाद जब आप बदन को तौलिए से पोछ रहे होते हैं तो आप आभास करते होंगे कि उस समय हमारा मन बिल्कुल साफ रहता है..
अगर हम नहा कर पेन-कागज लेके बैठ जाए तो हमारे लेख बड़े ही उम्दा होते.. शायद ऐसा करते तो हम भी एक-दो पुस्तकें रच चुके होते
मगर होता ये है कि हम नहाते ही ऐसे समय पर हैं कि हमें उसके बाद अपने काम पर जाना होता है या पूजा-ध्यान में लग जाते हैं.. या किसी कार्य से कहीं बाहर जाना होता है, सबकी अपनी डेड लाइन है, निन्यानबे का चक्कर
कहना ये कि यदि आप कुछ बेहतर लेखन करना चाहते हैं तो स्नान करने के बाद तुरन्त कागज-कलम लेकर बैठ जाइए
और याद रखिए मोबाइल पर ना लिखिए नहीं तो वो आपको थोड़ी देर में ही कहीं और भ्रमण कराने लगेगा.. मोबाइल को लेखन-पठन के समय निश्चित समय के लिए दूर रखिए।
गाँवों में बेकारी बहुत है और शान भी बहुत है, लोग बाहर जाते हैं कमाने, विदेश जाने की उत्कंठा प्रबल रहती है.. विदेश में रहना आसान भी होता है, कोई देखने वाला नहीं, ना ही कोई कहने वाला, कोई शान-शौकत का दिखावा नहीं, ना ही स्टेट्स का डर
लोग बाहर जाते हैं तो डट के काम करते हैं और जो नहीं करते उन्हें कोई ना कोई लात मार के तुरन्त वापस भेज देता है या तड़ीपार कर देता है.. तो इन दोनों से बचने के लिए डटना ही पड़ता है
बहुत सी मजबूरियों में जीवन गुजर रहा होता है, परन्तु पैसा मिल रहा होता है, कम या ज्यादा और जो भी मिलता है वह बच भी जाता है क्योंकि वहाँ किसको अपनी शानोशौकत दिखाए.. और अगर दिखांए तो घण्टों में कमाई लूट जायेगी
इसीलिए बाहर के कमाए पैसे बच जाते हैं.. ऐसा नहीं है कि हमारे आसपास काम या पैसे की कमी है और अगर कमी हो भी तो भी जितना काम विदेश में जाकर इन्सान करता है उस लगन से काम अगर अपने आसपास करे तो चहुंमुखी विकास हो
परन्तु आसपास काम करने में समस्या ये है कि लोग देखने वाले होते है, बहुत कहने वाले होते हैं, रायचन्दों की भरमार होती है, टांग खिचाई और फब्तियाँ रास्ते चलते मिल जाया करती है
और सबसे बड़ी समस्या कि 'पैसे नहीं बचते हैं' नाते-रिश्तेदारी निभाने ही हैं, सभी उत्सव मनाने ही हैं.. सबको खुश भी रखना है और अपने-आपको खुश भी दिखाते रहना है.. #फुल_स्टेट्स में
तो सच मानिए अगर आप अपने लोकल में रहकर पुरी मेहनत से जैसे विदेश में, किसी लाला के वहां, किसी कम्पनी में या किसी ठेकेदार या बॉस के दबाव में अपनी क्षमता से भी ज्यादा काम कर जाते हैं.. वो अनुशासन अगर सच में पैदा हो जाए तो आप अपने लोकल में भी कायदे में रहकर, लोकलज्जा के चक्कर में ज्यादा ना पड़े तो वैसी ही कमाई कर सकते हैं
और यहाँ की कमाई आपकी एक साख भी बनाएगी, एक आधार तैयार करेगी, साथ ही आपको जीवंतता भी प्रदान करेगी।
संभावनाओं की तलाश करें
अपनी शक्ति का विकास करें
#अजगर
Superiority Complex का चोला हम जितना ही गहरा और मोटा ओढ़ें रहते हैं, हमें सुरक्षा का उतना ज्यादा आभास होता रहता है परन्तु सच पूछिए तो ये गुब्बारे में भरी हवा की तरह है।
हमारा पद, हमारी उम्र, हमारी जाति, हमारा ज्ञान, हमारा वैभव इस गुब्बारे में हवा भरने के लिए नहीं है और इन सब चीजों से हम जो अपने अहंकार रुपी गुब्बारे में हवा ही भरते रहेंगे,,
तो वहीं गजल है "तुम्हारी दौलत नयी-नयी है$$"
समझिए, ये सब जो भी हमें प्राप्य है इसे हम दुसरों को दिखाने में क्यों मरे जा रहे हैं.. हाँ आपके पास है 'दिखाइए' "दिखाना भी चाहिए" पर "दिखाने के लिए दिखाना" ""दर्द देगा आपको"" क्योंकि कुछ देखेंगे 'बहुत नहीं भी देखेंगे' और कहीं ऐसा हो गया "जिसको दिखाना था उसी ने नहीं देखा" फिर तो काट़ों तो खुन नहीं वाली स्थिति हो जाएगी।।
पर एक बात है.. कि.. जीवन में सबकुछ पा लिया फिर करें क्या..!?? टाइम नहीं कटता.. क्योंकि अबतक का तो पूरा पाने की मेहनत में खर्च कर दिया और अब कुछ करने को है नहीं "दिखावे के सिवा" क्योंकि इसी दिखावे की लड़ाई को जीतने के लिए ही तो पूरे जीवन एड़ी चोटी का जोर लगाया और अब भी ना दिखाएं तो मेहनत तो सारी पानी हो जाएगी.. बात तो आप की भी सही है.. अब जिन्दगी में करें क्या??
यह गहन प्रश्न है..
और अब शुरु होती है "जीवंतता"
जैसे पर्वत की चोटी पर चढ़ते हैं तो वापस भी आना होता है।।
सागर में गहरे गोते लगाते हैं तो किनारे पर आते ही हैं।।
साँस गहरी भरते हैं तो वापस धीरे-धीरे छोड़ते भी हैं।।
अजगर जब किसी जीव को एक ही बार में निगलता है तो वह उसे महीनों पचाता है। अजगर को निगलने में समय नहीं लगता परन्तु अजगर बनना बड़ी बात है। सब कोई अजगर नहीं होता और भगवान ने यदि आपको इतना सामर्थ्य दिया है 'अजगर' के जैसा कि आपने एक ही बार में इतना ज्ञान और पुरुषार्थ निगल रखा है तो स्थिर हो जाइए और पचाइए इसे।।
स्थिर भाव से, हौले-हौले
पहले तो आपमें वो सामर्थ्य पैदा हुआ था कि आप एक ही बार में निगल पायें, आपको अजगर बनना पड़ा था और यदि आप छोटे-मोटे जीव हैं तो पहले अजगर बनिए।। हाँ.. कोई बात नहीं,, आप यदि आज अजगर नहीं बनना चाहते तो आपको अजगर को देख के जलन नहीं करनी चाहिए।। आपको अजगर को पूरा सम्मान देने के साथ ही, स्वयं को भी पूरा सम्मान देना चाहिए।।
हर जीव परमात्मा की संतान है और परमात्मा ने सबको अपना-अपना सामर्थ्य प्रदान किया है और समस्या तब आती है जब हम अपने सामर्थ्य को गौड़ करके अजगर बनने की कोशिश करने लगते है।।
जंगल में सब तरह के जीव हैं और हर कोई अजगर नहीं बन सकता, सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य है।।
अब चलिए वापस चलते हैं- उस मुद्दे पर जिस पर बात शुरु हुई थी कि "पचाना कैसे है??"
तो देखिए साथियों-
"दुनिया में आए हो तो लब कर लो
थोड़ा सा जी लो
थोड़ा-थोड़ा मर लो।।"
इन पक्तियों को याद रखिए- आज का सार ये है कि सभी से "लब" करना है, लब समझते हैं ना.. माने प्यार बस करना ही नहीं है
"सबसे प्रेमभाव रखना भी है।" छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, मालिक-स्वीपर, जाति पाती कोई भी हो।। सबसे "भावपूर्ण" प्रेम रखना है।
("भावपूर्ण" शब्द को ठहर के समझिए पहले।।)
तभी आप जो प्रेम रुपी जीव को निगले बैठें हो वो #पचेगा
और प्रेम को पचाते हुए कभी भी ये नहीं सोचना कि 'मुझे वापस प्रेम नहीं मिला" क्योंकि पचाना तो आपको है ना
(वापस पाने की इच्छा आपके निगले हुए भोजन में विष का काम करेगी)
अहंकार नहीं करना
गुस्सा तो बिल्कुल नहीं करना
क्योंकि ये याद रखना कि
थोड़ा सा जीना है
और
थोड़ा-थोड़ा मरना भी है
तो फिर #प्रेम बाटिए
#सच्चा_प्रेम
(यहाँ एक बात नोट करने की है कोई कह सकता है कि मेरे पास सबकुछ है पर प्रेम तो है नहीं, मैं प्रेम कैसे बांटू.. तो मैं आपको अपने गहरे अनुभव से बताना चाहूंगा कि "प्रेम पाने के एक ही स्त्रोत है #परमात्मा , परमात्मा में गहरी और भावपूर्ण आस्था रखिए और परमात्मा के माध्यम से प्राप्त प्रेम को पचाइए, यहीं जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।)
तो फिर #प्रेम बाटिए
#सच्चा_प्रेम
रात के ढाई बजे, यहीं भाव जगे है तो मैं भी अपना प्रेम पचा रहा हूँ, पूरे भाव और आस्था के साथ.. यह प्रेम यदि आप तक पहुंचे तो गुनगुनाईयेगा जरुर.. दुनिया में आए हो तो लब कर लो 🎶🎼
#जलतादीया