AyurSatva Academy of Ayurveda

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31/03/2024





31/03/2024




30/03/2024



30/03/2024




22/03/2024


19/02/2024

कल्क
(१) वर्धमान-पिप्पली-कल्क- 'त्रिवृद्धया पञ्चवृद्धचा वा सप्तवृद्धयाऽ- थवा कणाः । पिबेत् पिष्ट्वा दशदिनं तांस्तथैवापकर्षयेत् ।। एवं विंशद्दिनैः सिद्धं पिप्पलीवर्धमानकम् । अनेन पाण्डुवातास्रकासश्वासारुचिज्वराः । उदरार्शःक्षयश्लेष्मवाता नश्यन्त्युरोग्रहाः ।।' अर्थात् प्रतिदिन तीन-तीन, पाँच-पाँच अथवा सात-सात पीपल बढ़ाकर और उनको कल्कविधि से पीस कर दस दिन तक ( दूध के साथ) पिया जाय और इसी प्रकार ( वृद्धि-क्रम के अनुसार ही) घटाकर दस दिन तक उसका सेवन किया जाय (अर्थात् जिस क्रम से बढ़ाई जाय उसी क्रम से दस दिन तक घटाई जाय)। इस प्रकार बीस दिन सेवन करने से वर्धमानपिप्पली का सिद्ध प्रयोग होता है। इससे पाण्डुरोग, वातरक्त, कास, श्वास, अरुचि, ज्वर, उदर-विकार, अर्श, क्षय, कफ, वात और उरोग्रह ये सभी रोग नष्ट होते हैं।

(२) निम्बकल्क- 'लेपान्निम्बदलैः कल्को व्रणशोधनरोपणः । भक्षणा- च्छर्दिकुष्ठानि पित्तश्लेष्मकृमीञ्जयेत् ।।
अर्थात् नीम के पत्तों को पीसकर व्रण पर लेप लगाने से व्रण (घाव) शुद्ध होकर भर जाता है तथा निम्ब- कल्क को खाने से वमन, कुष्ठ, पित्त, कफजन्य विकार तथा कृमि-रोग नष्ट होते हैं।

(३) रसोनकल्क - 'शुद्धः कल्को रसोनस्य तिलतैलेन मिश्रितः । वातरोगाञ्जयेत्तीत्रान् विषमज्वरनाशनः ।।'
अर्थात् छिलके अलग करके शुद्ध किये लहसुन का कल्क बनाकर उसे तिल-तैल से मिश्रित कर सेवन करने से कठिन वातरोगों की शान्ति होती है तथा विषमज्वर नष्ट होता है।

(४) शुण्ठीकल्क - 'शुण्ठीतिलगुडैः कल्को दुग्धेन सह योजयेत् । परिणामभवं शूलमामवातं च नाशयेत् ।।' अर्थात् सोंठ, तिल और गुड़ के कल्क को दूध मिलाकर सेवन करने से परिणामशूल और आमवात नष्ट होते हैं।

17/02/2024

सूरण पुटपाक का अनुपान है?
A. आर्द्रक स्वरस
B. मधु, तैल
C. लवण, तैल
D. मधु, घृत

08/02/2024


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