Prakrit Language and Literature

Prakrit Language and Literature

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Prakrit is an ancient language of India.It was the mother tongue of the Indians.Many literature,inscriptions manuscripts available in Prakrit.Prof.

ANEKANT KUMAR JAIN

07/05/2026

Applications Open for the 7th Bhagwan Mahavira Prakrit Fellowship

Immerse yourself in the rich heritage of Prakrit — the language of the Jain Agamas — through a fully residential 9-month fellowship by the International School for Jain Studies (ISJS), India.

🗓 Duration: September 1, 2026 – May 31, 2027
📍 Location: Pune, India
🎓 Medium: English with Roman transliteration support
🏠 Fellowship includes support for boarding, lodging & study material
👥 Limited Seats: 10

This fellowship is designed to nurture serious scholars and seekers interested in Jain Studies and the Prakrit language.

🔗 Apply now: www.isjs.in

📩 [email protected]

02/05/2026
Photos from Prakrit Language and Literature's post 27/04/2026
10/03/2026

आज दैनिक जागरण ,नई दुनिया में प्रकाशित

04/03/2026

होलियसुहकामणाओ

जो होदि तं लहदु त्ति णिद्देसो वट्टदे जत्थ पव्वम्मि ।
होलीपव्वं तं णियमा तुं जाण खलु मणोजोगेणं।।1।।

अर्थ--जो होता है उसको ले लो-यह निर्देश जिस पर्व में रहता है,उस पर्व को तुम नियम से मनोयोग पूर्वक होली का पर्व
जानो।

जत्तो अप्पम्मि दहइ मोहाइवियारमलं णियदं।
तत्तो पुण अम्मेहिं पालिज्जइ पव्वमिणं सम्मं।।2।।

अर्थ-जिस पुरुषार्थ से आत्मा में मौजूद मोह आदि विकार स्वरूप मल जल जाता है,उस पुरुषार्थ से ही हम लोगों के द्वारा होली का पर्व मनाना चाहिये।

अप्पम्मि पुण जे संति रंगा खलु णियसहावसत्तिसंपण्णा।
तेहिं णूणं खेलिज्जा तह जह पप्फुरइ रयणत्तओ धम्मो।।3।।

अर्थ--आत्मा में अपने स्वभाव की शक्ति से सम्पन्न जो रंग हैं उन रंगों से हमें वैसे ही होली खेलनी चाहिए जैसे हमारी आत्मा में रत्नत्रय धर्म प्रस्फुरित होता है ।

सम्मं दंसण णाणं चारित्तं च जाव रंगंति णियमप्पाणं।
ताव पुण खेलिज्जइ तुम्मेहिं रंगमअं होलिअं पव्वं।।4।।

अर्थ - जब तक सम्यक् दर्शन-ज्ञान चारित्र हमारी आत्मा को रंगते हैं तब तक ही तुम्हारे द्वारा यह रंगमय होली खेली जानी चाहिए या होली का पर्व मनाना चाहिए।

एवं खलु पव्वमिणं सगीयेहिंं सुद्धरंगेहिं णिच्चं।
णंददु सव्वजणं णूणं हि रयणत्तयरंगमप्पाणं।।5।।

अर्थ- इस प्रकार यह होली पर्व अपनें शुद्ध रंगों से सदैव सब लोगों को और रत्नत्रय के रंग में रंगी उनकी आत्मा को आनंदित करे।

--प्रोफेसर श्रीयांश सिंघई जयपुर।

18/02/2026

*सूत्र (सुत्त)*

सुई जहा स-सुत्ता
ण णस्सदि पमाद-दोसेण।
एवं स-सुत्त-पुरिसो
ण णस्सदि तहा पमाद-दोसेण।

जहा = जिस प्रकार
स-सुत्ता = सूत्र/धागे से सहित
सुई = सुई
पमाय-दोसेण = प्रमाद दोष से
ण णस्सदि = खोती नहीं है
एवं = इस प्रकार
ससुत्त-पुरिसो = सूत्र के ज्ञान से सहित पुरुष
पमाददोसेण = प्रमाद दोष से
ण णस्सदि = नष्ट नहीं होता

जैसे सूत्र (धागे) से जुड़ी सुई प्रमाददोष के बावजूद खोती नहीं है, वैसे ही ससूत्र पुरुष (शास्त्रज्ञ पुरुष) प्रमाददोष के बावजूद भी नष्ट नहीं होता (संसार में नहीं खोता)।

A threaded needle is not lost despite negligence. Similarly, a man of the scriptures is not lost in this world, despite his indolence.

मूलाचार 973

🙏🏻🇮🇳

17/02/2026

प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाली प्रथम पत्रिका पागद भासा का नया अंक तैयार किया जा रहा है । प्राकृत भाषा में उनसे संबंधित गद्य या पद्य में रचित आपकी रचना,गाथा,लघु शोध लेख आदि यूनिकोड में टाइप करके ,प्रूफ आदि देखकर, निम्नलिखित ईमेल आई डी पर pdf और word फ़ाइल शीघ्र ही प्रेषित करें । संबंधित चित्र भी संलग्न करें ।

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