20/01/2013
दिशाहीन नारिवाद
जब हजारों वर्षों तक शिक्षा के मामले में भारतीय महिलाएं हाशिए पर थीं तब समाज का एक वर्ग था जो अध्यनरत था .... वर्तमान समाज में प्रचलित अधिकांश धारणाएं उन्हीं के द्वारा स्थापित हैं ..... अगर आपको उनकी धारणाओं को काटना है तो उनसे ज्यादा अध्यनरत होना पड़ेगा ........ नारीवादियों की थोथी बातें सतह पर ही वार करेंगी , जबकि जरूरत है जड़ पर प्रहार करने की ......!!!!!!
पिछले दो-चार दशकों के अध्यन के दौरान ही कुछ स्त्रियॉं के अंदर अगर नारिवाद पनप रहा है जो एक स्वाभाविक प्रक्रिया ही है (ज्ञानवर्धन व अहंकारवर्धन समानान्तरगामी हैं ) तो फिर आसानी से पुरुषों के मर्दवाद को समझा जा सकता है ..... !!!!!!
कुछ महिलाओं ने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए नफरत फैलाने का ज़ो ठीका लिया है वह काबिले तारीफ है , भले ही वो इसका ठीकरा मर्दों पड़ फोरती हों .....!!!!! वे नारी स्वतन्त्रता की जगह नारी-स्वच्छंदता की मांग कर रही हैं... ऐसा लगता है जैसे नारी स्वतन्त्रता का पहला सोपान योनिक स्वतन्त्रता ही है ...... !!!!!!
हम सभी जानते हैं एक स्त्री जब जन्म लेती हैं , तब उसके अंदर योनिकता जैसी कोई बात नहीं होती ..... तब उसके लिए जरूरी होता है उसका आहार , पोषण , स्वास्थ्य आदि ..... फिर कुछ बड़े होने पर शिक्षा , सुरक्षा, सुविधा आदि का मुद्दा आता है ..... योनिकता तो बहुत बाद की कड़ी है जो जवानी के साथ समाप्त भी हो जाती है ..... मगर पोषण , स्वास्थ्य , शिक्षा जैसे मुद्दे जीवन पर्यंत बने रहते हैं .... !!!!! नारीवादी नारी सम्मान के प्रति सही में गंभीर हैं तो उन्हें योनिकता की जगह इन मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए .... !!!!
कुछ दिनों पहले एक सर्वे में दावा किया गया था कि भारत में लगभग 40% बच्चे असुरक्षित अवस्था में जीने को मजबूर हैं .... तो निस्संदेह इसमें सिर्फ भावी पुरुष ही नहीं भावी महिलाएं भी होंगी ..... अब यह मुद्दा नारीवादियों कि प्राथमिकता में है ही नहीं ... !!!!! इस मुद्दे को कौन उठाएगा ....???
एक आंकड़े के अनुसार लगभग 6.8 लाख सेक्स वर्कर रजिस्टर्ड हैं , नाको के अनुमान के अनुसार अभी लगभग 12.63 लाख सेक्स वर्कर भारत में हैं.... !!!! इनकी माली हालत जग जाहीर है , ये भी महिलाएं ही हैं ..... इनके मुद्दे को कौन उठाएगा ....???
जहाँ तक योनिकता का सवाल है तो हमारे मनीषियों ने संयमित जीवन ( वो भी हमारी भोगोलिकता के कारण ) जीने की बात की है संकीर्णता की नहीं ...., अगर ऐसा होता तो हमारे यहाँ कामसूत्र नहीं लिखी जाती , अजंता एलोरा , खजूराहों की मूर्तियाँ नहीं बनती ......, क्या ये सब हमारी संकीर्ण सोंच का नतीजा है ??? यह हमारी उद्दात्त सोंच है .... इसकी कभी पश्चिम से तुलना नहीं की जा सकती ....!!!! जहाँ तक धर्म ग्रन्थों का सवाल है तो उसकी रचना उसके ठेकेदारों ने की है , आम जनता ने नहीं .... अत: धर्म ग्रन्थों का हवाला देकर आम पुरुषों को नहीं घसीटा जा सकता या घसीटा जाना चाहिए , जैसा अकसर नारीवादियाँ करती हैं ..... !!!!!!
भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्तमान नारिवाद दिशाहीन ही नज़र आ रही है ..... मुझे उम्मीद है कि आगे आने वाली पीढ़ी से है , जो स्त्री विमर्श के मुद्दे को संजीदगी से उठाएगी ......, वह सिर्फ 9-10% महानगरीय कामकाजी स्त्रियॉं को ही शामिल नहीं करेंगी अपितु ज्यादा से ज्यादा स्त्रियॉं को समावेशित करेगी ...... !!!!! वह पीढ़ी सिर्फ धर्म ग्रन्थों से तकियानूसी ही नहीं ढूंढेगी , इसके साथ ही इतिहास , भूगोल , जीव विज्ञान , मनोविज्ञान आदि का भी अध्यन करेगी और एक समग्र दृष्टिकोण के साथ मुद्दों को उठाएगी .....!!!!!
अब चुकीं लोहा ही लोहा को काटता है, अत: स्त्रियॉं को भी लोहे की तरह गलना , ढलना और जरूरत पड़ने पर चलना सीखना होगा....तभी यह संघर्ष आगे की दिशा ले पाएगा। यह एक प्रक्रिया है..जो अनवरत चलती रहनी चाहिए ..... !!!!
स्त्री-पुरुष के बीच नफरत , घृणा , द्वेष आदि फैलाने वाला कोई भी वाद हमें अस्वीकार्य होना चाहिए, उसका सामाजिक बहिष्कार हो और एक ऐसा समाज बने जहाँ स्त्री पुरुष के बीच प्यार , सम्मान व संवाद की स्थिति हो ....!!!!
याद रखिए संवादात्मक समाज का निर्माण ही समानता के मूल्य को स्थापित कर सकती है ।