Sneha Health & Educational Trust - Govt.Regd.

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We Help Poor Peoples And Senior Citizens . Awareness and Vaccination of Hepatitis-B,Typhoid,Cervical Cancer etc.

Sneha Health & Educational Trust is a registered, non governmental, non profitable, non political, secular, self aided and social welfare trust formed by a group of professionally-qualified social workers from different reputed institutions, educated locals, having real interest and the commitment to serve the people of different religions, languages and especially the locals who are in need. Sneh

06/03/2020

कोरोना खातिर का करीं का ना करीं ?

कोरोना से बाचे खाति कुछ जरुरी सावधानी ( Not To Do ) -

1- करेंसी / नोट के ढेर छुवे से बाचीं
2- केवांड़ी के हैंडल छुवे से बाचीं
3- आफिस के केटली , जग-मग भा कवनो अइसन सामान जवना के सभ लोग प्रयोग करत बा ओह के छुवे से बाचीं
4- वेंडिंग मशीन के छुवे से बाचीं
5- एटीम के बटन दबावे भा छुवे से बाचीं
6- रेलिंग/हैंडरेल , सीढी , एक्सक्लेटर आ जिम के सामान के छुवे से बाचीं
7- एलिवेटर के बटन / लिफ्ट के बटन के छुवे से बाचीं
8- सुलभ शौचालय भा पब्लिक बाथरुम में जाये आ छुवे छावे से बाचीं
9- अस्पताल कम जाईं जबले बहुत जरुरत ना होखे मत जाईं ।
10- मास्क जदि पहिरत बानी त इचिको नमी अइला के बाद ओह मास्क के मत पहिरी । नमी के आवते मास्क , वायरस के कैरियर बन सकेला ।

कोरोना से बाचे खातिर सावधानी ( To Do / Not To Do )

1- रोज कम से कम एक हाली नहाइल करीं , बहरी से घुम के आवत बानी त नहाए के कोशिश करीं ।

2- कपड़ा लगातार बदलत रहीं । अइसे त फैब्रिक अबहीं ले मिडियम बनल नइखे बाकिर कोरोना वायरस के एगो कैरियर इहो बन सकेला । कपड़ा के हलका गरम पानी से धोवल करीं

3- हाथ के लगातार धोवत रहीं । कवनो अइसन चीज रउवा छुवनी जवना के लगातार लोग छुवत बा त ओइसना समय में हाँथ जरुर धोई भा सैनिटाइजर रखले बानी ओकरा के लगा लिहीं । सैनिटाइजर नइखे त साबुन से धोई बाकिर कोशिश रहे कि हाथ साफ रहे ।

[ 2015 में एगो स्टडी के हिसाब से हमनी के एक घंटा में कम से कम 23 हाली आपन चेहरा छुवेनी जा , एह में 44 % आंख , नाक , मुह छुवेनी जा । एहि से बुझ लिहीं कि हाँथ के हाईजिन ( साफ सुथरा रहल कतना जरुरी बा ) ]

4- छींके के बेर , खांसे के बेर , खोखी आवत घरी आपन चेहरा ढांक लिहीं । अंजुरी बना के चेहरा के ढकल जा सकेला । टिश्यू के प्रयोग कइल जा सकेला । एह खातिर रुमाल के प्रयोग मत करीं काहें कि एकही रुमाल के बेर बेर प्रयोग रुमाल के कांटिमिनेंट ( गंदा भा इनफेक्ट ) क सकेला ।

5- घर में लगातार प्रयोग में रहे वाला चीजन के धोवत साफ रखले रहीं ।

6- वायरस , लार के माध्यम से एक दुसरा में फइल सकेला । एह से एकही गिलास चमच के प्रयोग मत करीं । कवनो ड्रिंक शेअर मत करीं ।

7- शौचालय / वाशरुम के साफ सुथरा राखी । गंदगी बेमारी के घर ह ।

8- सेल्फी लिहीं बाकिर ओकरा राड में अइलत ना बइठल होखे , ओह के साफ क लिहीं । सेल्फी स्टिक के ।

9- कुकुर बिलाई रखले बानी त ओकनी के साफ सुथरा राखीं , ओकनी से ढेर सटी मत ।

10 - बहुत जरुरी होखे तबे बहरी जाई , बहरी के खाई-पीहीं ।

कोरोना वायरस में , सावधानी ही बचाव ह [ Prevention is Cure in Coronavirus ]

साभार : WHO ( वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेसन )

संकलन - नबीन कुमार

Photos from Sneha Health & Educational Trust - Govt.Regd.'s post 19/02/2018

एकबार ध्यान से पढ़े ....
जागरूक बनें ..

डॉ प्रमोद

21/06/2017

मौसम में बदलाव के साथ ही शरीर में भी कई प्रकार के बदलाव शुरू हो जाते हैं और गर्मी में मौसम नमीयुक्त और चिपचिपा होने लगता है। इस मौसम में वायरल बुखार से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। वायरस से होने वाला बुखार, गला दर्द व नाक बहने की समस्याएं ज्यादा लेकर आता है।

वा यरल बुखार बच्चों व बड़ों को समान रूप से प्रभावित करता है। वायरल में संक्त्रमण की स्थिति कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकती है। वायरल में कई लोग खाना-पीना छोड़ देते हैं। लेकिन खाना छोडऩे से बीमारी और बढ सकती है। इसलिए जहा तक संभव हो वायरल में खूब खाना खाएं और डिहाइडेशन से बचने के लिए खूब पानी पिएं।

वायरल बुखार में खाने के फायदे

वायरल बुखार तभी होता है जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिए खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। अगर सेहतमंद ओर प्रोटीन युक्त खाना खाया जाए तो शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता खुद निर्मित हो जाती है। सादा, ताजा खाना ही खाएं क्योंकि हैवी फूड आसानी से पच नहीं सकते हैं। रखे हुए खाने को गर्म करके ही खाएं क्योंकि इससे सभी बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं। खाने में अदरक, लहसुन, हींग, जीरा, काली मिर्च, हल्दी और धनिये का प्रयोग अवश्य करें क्योंकि इनमें पाए जाने वाले तत्व पाचन शक्ति को बढाते हैं और वायरल के कीटाणुओं से लडते हैं।

वायरल बुखार में क्या-क्या खाएं

मौसमी संतरा व नीबूं खाएं जिसमें विटामिन-सी और वीटा कैरोटींस होता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है। वायरल फीवर होने पर डाई फूड खूब खाना चाहिए। डाई फूड में जिंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है। लहसुन में कैल्सियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और खनिज तत्व पाए जाते हैं। इससे सर्दी, जुकाम, दर्द, सूजन और त्वचा से संबंधित बीमारिया नहीं होती हैं। लहसुन घी या तेल में तलकर चटनी के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। खूब पानी पियें। इससे डिहाइडेशन के अलावा शरीर पर हमला करने वाले माइक्त्रो आर्गेनिच्म को बाहर निकालने में मदद मिलती है।

तुलसी के पत्ते में खासी, जुकाम, बुखार और सास संबंधी रोगों से लडने की शक्ति है। बदलते मौसम में तुलसी के पत्तियों को उबालकर या चाय में डालकर पीने से नाक और गले के इंफेक्शन से बचाव होता है। वायरल बुखार में हरी और पत्तेदार सब्जियों का अधिक मात्रा में प्रयोग करें। क्योंकि हरी सब्जियों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है जिससे डिहाइडेशन नहीं होता है। टमाटर, आलू और संतरा खाएं। इनमें विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। वायरल में दही खाना बंद न करें क्योंकि दही खाने से बैक्टीरिया से लडने में सहायता मिलती साथ ही यह पाचन क्त्रिया को सही रखता है। पेट खराब, आलसपन और बुखार को दूर करता है।

वायरल में गाजर खाएं, इसमें केरोटीन पाया जाता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है और कीटाणुओं से लडने में मदद मिलती है। अधिक मात्रा में केले और सेब का सेवन करें। इन दोनों ही में अधिक मात्रा में पोटैसियम पाई जाती है जो ऐसा इलेक्ट्रोलाइट है दस्?त समाप्?त होती है।
वयरल बुखार में खाना खूब खाएं लेकिन खाने का गलत कंबीनेशन कभी ना लें। मसलन अगर आप दही खा रहे हैं तो हैवी नॉनवेज या नींबू अथवा कोई खटटी चीज ना खाएं। ठंडे और तरल पेय पदाथरें का सेवन न करें क्योंहकि वे शरीर में पानी रोकते हैं और असंतुलन होता है। वायरल होने पर दिमाग पर बिलकुल जोर ना लगाएं क्योंकि ऐसा करने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होगी और वायरल ज्यादा दिनों तक रह सकता है।

20/06/2017

उम्र बढ़ने के साथ लोगों को सेहत संबंधित कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है जैसे कि जोड़ों का दर्द. जोड़ों का दर्द आजकल आम समस्या हो चुकी है. उम्र बढ़ने के अलावा अनहैल्दी खाना खाने से भी जोड़ों पर बुरा असर पड़ता है. जोड़ों के दर्द के लिए नींबू का छिलका बहुत फायदेमंद है. इसका इस्तेमाल करके आप इस परेशानी से छुटकारा पा सकते है. आज हम आपको बताएंगे कि कैसे आप नींबू के छिलकों का इस्तेमाल करके जोड़ों के दर्द से राहत पा सकते है.

सामग्री
– 2 नींबू के छिलके
– ऑलिव ऑयल

ऐसे करें इस्तेमाल :-

सबसे पहले नींबू के छिलकों को एक जार में डालकर थोड़ा सा ऑलिव ऑयल मिलाएं और जार अच्छे से बंद करें. इसे दो हफ्तों के लिए छोड़ दें. दो हफ्तों के बाद इसे रेशमी कपड़े में लेकर दर्द वाली जगह पर लगाएं. इसे बैडेंज से कवर करके चैबीस घंटे के लिए छोड़ दें. इससे हड्डियां मजबूत होगी और जोड़ों के दर्द से भी राहत मिलेगी.

Ayurvedic Treatments(Ayurveda) 12/08/2016

अपने कोलेस्ट्रोल स्तर को 130 एमजी-डीएल तक रखिए : कोलेस्ट्रोल के मुख्य स्रोत जीव उत्पाद है , जिनसे जितना अधिक हो , बचने की कोशिश करनी चाहिए । अगर आपको युक्त यानी लीवर में अतिरिक्त कोलेस्ट्रोल घटाने वाली दवाओं का सेवन करना पडा सकता है ।
अपना सारा भोजन बगैर तेल के बनाएं , लेकिन मसाले का प्रयोग बंद नहीं : मसाले हमें भोजन का स्वाद देते है , न की तेल का । हमारे ‘ जीरो आयल ‘ भोजन निर्माण विधि का प्रयोग करें और हजारों हजार जीरो आयल भोजन स्वाद के साथ समझोता किए बगैर तैयार करें । तेल ट्रिगलीराइडस होते है और रक्त स्तर 130 एमजी-डीएल के नीचे रखा जाना चाहिए ।
अपने तनावों को लगभग 50 प्रतिशत तक कम करें : इससे आपको ह्रदय रोग को रोकने में मदद मिलेगी , क्योंकि मनोवेग्नानीक तनाव ह्रदय की बीमारियों की मुख्य वजह है । इससे आपको बेह्तार जीवन स्तर बनाए रखने में भी मदद मिलेगी ।
हमेशा ही रक्त दबाव को 120-80 एमएम एचजी के आस – पास रखे : बढ़ा हुआ रक्त दबाव विशेष रूप से 130-90 से ऊपर ब्लांकेज को दुगुनी रफ्तार से बढ़ाएगा । तनाव में कमी , ध्यान , नमक में कमी तथा यहाँ तक की हल्की दवाएं लेकर भी एअक्त दबाव को कम करना चाहिए ।
अपने वजन को सामान्य रखे : आपका बाडी मॉस इंडेक्स 25 से नीचे रहना चाहिए । इसकी गणना आप अपने किलोग्राम वजन को मीटर में अपने कद के स्केयर के साथ घटाकर कर सकते है । तेल नहीं खाकर एवं निम्न रेशो वाले अनाजों तथा उब किस्म के सलादों के सेवन द्वारा आप अपने वजन को नियंत्रित कर सकते है ।
नियमित रूप से आधे घंटे तक टहलना जरूरी : टहलने की स्फ्तार इतनी होनी चाहिए , जिससे सीने में दर्द नहीं हो ओर हांफे भी नहीं । यह आपके अछे कोलेस्ट्रोल को बढाने में आपकी मदद कर सकता है ।
15 मिनट तक ध्यान और हलके योगा व्यायाम रोज करें : यह आपके तनाव तथा रक्त दबाव को कम करेगा । आपको ह्रदय रोग को कम नियंत्रित करने में मददगार साबित होगा ।
भोजन में रेशे और एंटी आक्सीदेट्स : भोजन में अधिक सलाद , सब्जियों तथा फलों का प्रयोग करें । ये आपको भोजन में रेशे और एंटी आक्सीदेट्स के स्रोत है और एचडीएल या गुड कोलेस्ट्रोल को बढाने में सहायक होते है ।
अगर आप मधुमेह से पीड़ित है , तो शक्कर को नियंत्रित रखे : ब्लड शुगर 100 एमजी डीएल से नीचे होना चाहिए और खाने के दो घंटे बाद उसे 140 एमजी-डीएल से नीचे होना चाहिए । व्यायाम , वजन में कमी , भोजन में अधिक रेशा लेकर तथा मीठे भोज्य पदार्थों से बचते हुए अधुमेह को खतरनाक न बनने दें । अगर आवश्यक हो , तो हल्की दवाओं के सेवन से फायदा पहुँच सकता है ।
हार्ट अटैक से पूरी तरह बचाव : हार्ट अटैक से बचने का सबसे आसान सन्देश है और हार्ट में अधिक रूकवाटे न होने दें । यदि आप इन्हें घटा सकते है , तो हार्ट अटैक कभी नहीं होगा ।
दिल के रोगों के लिए लाभकारी सब्जियां :

हमारे भोजन में अनेक ऐसी सब्जिया है , जिन्हें प्रतिदिन प्रयोग करके हार्ट की सभी बीमारियों से बचा जा सकता है । ये है -

प्याज - इसका प्रयोग सलाद के रूप में कर सकती है । इसके प्रयोग से रक्त का प्रवाह ठीक रहता है । कमजोर ह्रदय होने पर जिनको घबराहट होती है या ह्रदय की धड़कन बढ़ जाती है , उनके लिए प्याज बहुत ही लाभादारक है।

टमाटर - इसमें विटामिन सी , बीताकेरोटिन , लाइकोपीन , विटामिन एक व पोटेशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है , जिससे दिल की बीमारी का ख़तरा कम हो जाता है ।

लोकी - इसे घिया भी कहते है । इसके प्रयोग से कोलेस्ट्रोल का स्तर सामान्य अवस्था में आना शुरू हो जाता है । ताजी लोकी का रस निकालकर पोदीना पत्ती – 4 व तुलसी के 2 पत्ते डालकर दिन में दो बार पीना चाहिए ।

लहसुन - भोजन में इसका प्रयोग करें । खाली पेट सुबह के समय दो कलियाँ पानी के साथ भी निगलने से फायदा मिलता है ।

गाजर - बड़ी हुई धड़कन को कम करने के लिए गाजर बहुत ही लाभदायक है । गाजर का रस पिएँ , सब्जी खाए व सलाद के रूप में प्रयोग करें ।

Ayurvedic Treatments(Ayurveda)

Photos 26/12/2015
Mobile uploads 05/05/2015
Navabharat Press - फैटी लीवर से बचें, हो सकता है लीवर कैंसर 05/05/2015

आने वाले कुछ दशकों में लोगों को लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता लीवर की घातक बीमारी हेपेटाइटिस बी तथा सी के कारण नहीं, बल्कि शराब के बढ़ते सेवन तथा मोटापे के कारण होने वाली लीवर की प्रमुख बीमारी 'फैटी लीवर' से होगी. यह दावा विशेषज्ञों ने किया है.ग्लोबल अस्पताल मुंबई के हिपेटो-पैनक्रिएटो बायलरी सर्जरी तथा लीवर ट्रांसप्लांटेशन विभाग के प्रमुख तथा मुख्य सर्जन रवि मोहंका ने कहा, "हेपेटाइटिस बी के लिए टीका तथा हेपेटाइटिस बी तथा सी दोनों के लिए प्रभावी चिकित्सा उपलब्ध होने के कारण लीवर खराब होने के मामलों में कमी आ रही है. अल्कोहलिक व एनएएफएल (गैर अल्कोहल फैटी लीवर) के कारण भी कैंसर होने की संभावना होती है और दुनिया भर में लीवर कैंसर से सर्वाधिक मौतें होती हैं."उन्होंने कहा, "जीवनशैली में बदलाव के कारण अगर क्षति पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, तो इससे लीवर सिरोसिस हो सकता है, जिसके लिए लीवर प्रत्यारोपण एकमात्र उपाय है."मनुष्य के शरीर में लीवर दूसरा सबसे बड़ा अंग है, जो दाईं तरफ रिव केज में सुरक्षित रहता है और शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्यो को अंजाम देता है. खाना पचाने से लेकर यह शरीर के अंदर मौजूद हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.विशेषज्ञों के मुताबिक, एनएएफएल लीवर की गंभीर बीमारियों का एक प्रमुख कारण है जो मोटापा, जंक फूड के सेवन, कसरत न करने, मधुमेह तथा कोलेस्ट्रॉल की उच्च मात्रा से हो सकता है.बीएलके सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के निदेशक व वरिष्ठ परामर्शदाता योगेश बत्रा ने कहा, "आमतौर पर देखा जाता है कि सामान्य आबादी की लगभग 20 फीसदी एनएएफएल से पीड़ित है. मोटापाग्रस्त व मधुमेह से पीड़ित लोगों में यह आंकड़ा 80 फीसदी है. इनमें से पांच फीसदी लोगों में एनएएफएल लीवर की गंभीर बीमारियों का कारण बनता है."उन्होंने कहा, "सामान्य आबादी में हेपेटाइटिस बी के कैरियर दो से चार फीसदी हैं, जबकि हेपेटाइटिस सी के 1.5 फीसदी. इसलिए फैटी लीवर के मामले तेजी से बढ़ते हैं और हेपेटाइटिस बी तथा सी के पहले इसमें लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है."पारस अस्पताल में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी व हिपेटोलॉजी के परामर्शदाता डॉ. रजनीश मोंगा ने कहा कि फैटी लीवर में लीवर की कोशिकाओं में वसा जमा हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि फैटी लीवर से कुछ रोगियों के लीवर में सूजन हो सकता है, जिसके कारण धीमे-धीमे लीवर की कोशिकाओं की मौत होती जाती है और अंतत: लीवर सिरोसिस हो जाती है.रोग के निदान की चर्चा करते हुए बत्रा ने कहा कि अल्ट्रासाउंड से बीमारी आसानी से पकड़ में आ जाती है.उन्होंने कहा, "रोगी पेट में दर्द तथा थकावट की शिकायत लेकर आते हैं. अल्ट्रासाउंड से रोग की पहचान आसानी से हो जाती है. एमआरआई (मैग्नेटिक रिजोनांस इमेजिंग) रोग के निदान की ज्यादा विशिष्ट विधि है और रोग का वर्गीकरण बॉयोप्सी (लीवर से थोड़ा सा मांस निकालकर उसकी जांच) के द्वारा होता है."चिकित्सकों का कहना है कि यह बीमारी रोगी की पीढ़ियों में स्थानांतरित नहीं होता.मोंगा ने कहा, "जिन रोगियों में लीवर की बीमारी अंतिम चरण में होती है और जीवन प्रत्याशा एक साल से भी कम होती है, ऐसे मामलों में रोगी की जान बचाने का एकमात्र उपाय लीवर प्रत्यारोपण है. दुर्भाग्यवश भारत में अधिकांश लीवर प्रत्यारोपण में लीवर का दान रोगी के संबंधी ही करते हैं. अधिकांश अच्छे प्रत्यारोपण केंद्र में जिन रोगियों का प्रत्यारोपण होता है, उनके एक साल तक बचने की संभावना 90 फीसदी से ज्यादा होती है."

Navabharat Press - फैटी लीवर से बचें, हो सकता है लीवर कैंसर फैटी लीवर से बचें, हो सकता है लीवर कैंसर

03/05/2015

इस गर्मी में आपको तरोताजा रखने में कुछ भोजन काफी कारगर साबित होते हैं। फिर क्यों न इस मौसम में इनका लाभ उठाया जाए!
तपती गर्मी के इस मौसम में भी क्या आप पर्याप्त पानी नहीं पी पाते? क्या काफी पसीना निकलने के बावजूद आपके लिए 8-10 गिलास पानी पीना मुश्किल हो जाता है? ऐसे में कुछ ऐसे विकल्पों पर ध्यान देना जरूरी है, जिन्हें खाना भी आसान हो और जो आपके शरीर में पानी की कमी भी न होने दें। आइए जानें उन पांच चीजों के बारे में, जो आपके शरीर में पानी का स्तर ठीक रखती हैं।
दही
आपको गर्मी में डीहाइड्रेशन की समस्या से दूर रखने में दही सबसे अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसमें पानी की मात्रा 85 प्रतिशत होती है और शरीर के लिए जरूरी प्रोबायोटिक भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं। दही से अनेक स्वास्थ्य लाभ तो हैं ही, यह गर्मी की एलर्जी से बचाव के लिए भी शरीर का खूब साथ देता है। यह प्रोटीन, विटामिन बी और कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत है।
ब्रोकली
ब्रोकली में 89 प्रतिशत तक पानी होता है और यह न्यूट्रिशन से भरपूर होती है। इसकी प्रकृति एंटी इनफ्लेमेटरी होती है, जिस कारण यह गर्मी में होने वाली एलर्जी से बचाव करती है। इसे आप सलाद में कच्चा ही खा सकते हैं और टोस्ट के साथ हल्का तल कर भी इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। काफी संख्या में लोग इसकी सब्जी भी बनाते हैं।
सेब
एक कहावत है कि डॉंक्टर को खुद से दूर रखने के लिए रोजाना एक सेब खाएं। अनेक तरह से फायदेमंद सेब में 86 प्रतिशत पानी होता है। फाइबर, विटामिन सी आदि का तो यह अच्छा स्त्रोत है ही।
सलाद पत्ता
सलाद के पत्ते में जल तत्व 95 प्रतिशत होता है। सैंडविच में इसका अच्छा इस्तेमाल होता है। प्रोटीन और ओमेगा 3 से भरपूर सलाद पत्ते में फैट भी नहीं होता और कैलोरी भी बहुत कम होती है।
पके हुए चावल
पके हुए चावल भी गर्मी में आपके लिए काफी फायदेमंद हैं। इनमें 70 प्रतिशत जल तत्व होता है। इनमें पर्याप्त मात्रा में आयरन, कार्बोहाइड्रेट आदि भी होते हैं। साथ ही इस मौसम में चावल खाने में भी रुचिकर लगता है।

07/04/2015

हार्ट अटैक एक बहुत बड़ी समस्या जो बिना दस्तक आता है। कई बार तो ये माइनर होता तो कई बार किसी की जान भी जान सकती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि हार्ट अटैक के लक्षण महीना पहले ही दिखने लगते हैं। अमरीकन हार्ट एसोसिएशन्‍स साइंटिफिक सेशंस में हुए एक नए शोध के अनुसार हार्ट अटैक के लक्षण करीब एक महीने पहले से ही दिखने लग जाते हैं।



एक महीने पहले से सीने में हल्का दर्द, सांस लेने में दिक्कत, फ्लू की समस्‍या और घबराहट जैसे लक्षण दिखने देने लगते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर महीने भर पहले दिल के मरीजों में ये लक्षण पहचान लिए जाएं तो हार्ट अटैक को रोकने में काफी हद तक मदद मिल सकती है। आइए हार्ट अटैक के कई दिनों पहले से ही पता लगने वाले लक्षणों के बारे में जानें। इन लक्षणों से महीना पहले पता लग जाता है हार्ट अटैक का

सांस की तकलीफ
सांस की तकलीफ और थकान में शरीर को आराम की जरूरत होती लेकिन यह दिल पर अतिरिक्त तनाव के कारण हार्ट अटैक का लक्षण भी हो सकता है। यदि बिना किसी कारण के अक्‍सर थकान होती है या हमेशा थका-थका महसूस हो तो यह परेशानी का सबब हो सकता है। थकान और सांस की तकलीफ महिलाओं में आम होती है और इसकी शुरुआत हार्ट अटैक होने से कई दिनों पहले जाती है।

अधिक पसीना आना
बिना किसी काम और एक्‍सरसाइज के सामान्‍य से ज्याद पसीना आना हृदय की समस्याओं की पूर्व चेतावनी संकेत हैं। अवरुद्ध धमनियों के माध्यम से रक्त को दिल तक पंप करने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता हैं। जिससे आपके शरीर को अतिरिक्त तनाव में शरीर के तापमान को नीचा बनाए रखने के लिए अधिक पसीना आता है। अगर आपको बहुत अधिक पसीना आता है और चिपचिपी त्वचा का अनुभव होता है तो तुरंत अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

मतली और उल्टी
हार्ट अटैक से पहले हल्के अपच और अन्‍य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं देखने को मिलती हैं लेकिन अक्‍सर इसको नजरअंदाज कर दिया जाता है क्‍योंकि हार्ट अटैक की समस्‍या आमतौर पर बड़े लोगों में पाई जाती है और उनमें आमतौर पर अधिक अपच की समस्‍या होती है। सामान्‍य रूप से पेट में दर्द, अपच, हार्ट बर्न या उल्‍टी की समस्‍या होना हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है।

सीने में दर्द, दबाव, और बेचैनी
हार्ट अटैक का सबसे सामान्य लक्षण है सीने में दर्द या बेचैनी हालांकि कुछ लोगों को बिल्कुल भी सीने में दर्द का अनुभव नहीं होता। छाती के बीच में बेचैनी, दबाव, दर्द, जकड़न और भारीपन अनुभव करने पर तुरंत डाक्‍टर से संपर्क कर उन्हें चैक करवाना चाहिए।

शरीर के अन्‍य हिस्‍सों में दर्द
दर्द और जकड़न शरीर के अन्‍य हिस्‍सों में भी हो सकता है। इसमें बाहों, कमर, गर्दन और जबड़े में दर्द या भारीपन भी महसूस हो सकता है। कभी-कभी यह दर्द शरीर के किसी भी हिस्‍से से शुरू होकर सीधे सीने तक भी पहुंच सकता है। इन लक्षणों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए और संभावित हार्ट अटैक के लिए इनकी जांच की जानी चाहिए।

परिपूर्णता की भावना
हार्ट अटैक के पहले से दिखने वाले लक्षणों में परिपूर्णता की भावना भी आती है। इसमें व्‍यक्ति को हर समय भरा हुआ सा महसूस होता है। ऐसा इसलिए होता है क्‍योंकि जब ऑक्सीजन युक्त रक्त संचार प्रणाली के माध्यम से नहीं जा पाता तब शरीर पेट में दर्द के संकेतों को भेजकर जवाब देता है।

चिंता
लगातार होनी वाली चिंता और घबराहट को जीवन में होने वाले विशिष्ट तनाव से नहीं जोड़ा जा सकता है। रात को सोने में कठिनाई होना या रात में चिंता या संकट की भावना के कारण अचानक से उठ जाना भी हृदयाघात के पहले से दिखने वाले लक्षण हैं।

फ्लू जैसे लक्षण
चिपच‍िपी और पसीने से तर त्वचा, थका हुआ और कमजोर महसूस होने को अक्‍सर लोग फ्लू के लक्षण माना जाता है लेकिन वास्तव में यह हार्ट अटैक के लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा सीने में भारीपन या दबाव की भावना को भी लोग चेस्‍ट कोल्‍ड और फ्लू होने के नाम से भ्रमित होते हैं लेकिन यह हार्ट अटैक के लक्षण हो सकते हैं। ऐसा कोई भी लक्षण दिखाई देेने पर तुरंत डाक्‍टर से संपर्क करें।

पल्‍स और हार्ट रेट की धड़कन तेज होना
कभी-कभी हार्ट अटैक से पहले दिखने वाले अधिक समान्‍य लक्षण जैसे तेजी से और अनियमित रूप से पल्‍स और हार्ट रेट का चलना हृदय की धड़कन में असामान्य तेजी के रूप में जाना जाता है। यदि यह समस्‍या अचानक से आ जाती हैं तो इस अवधि के दौरान आपका दिल बहुत तेजी से और मुश्किल से धड़कता हैं और यह हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है।

05/04/2015

बुखार कैसे - कैसे............................

वायरल / फ्लू
किसी भी वायरस से होने वाला बुखार वायरल कहलाता है।
कैसे फैलता है
आमतौर पर इन्फेक्शन वाले शख्स और उसके कॉन्टैक्ट में आई चीजों जैसे फोन , हैंडल , टॉवल आदि छूने या इस्तेमाल करने से फैलता है।
कितने दिन रहता है
3 से 5 दिनों तक।
लक्षण
खांसी , नाक बहना या नाक बंद होना , सिर दर्द , जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द , थकावट , गला खराब , आंखों का लाल होना आदि।
टेस्ट
95 फीसदी मामलों में किसी टेस्ट की जरूरत नहीं होती। सीबीसी यानी कंप्लीट ब्लड काउंट। बुखार कम / खत्म नहीं होता तो डॉक्टर इस टेस्ट की मदद से जांचते हैं कि ब्लड में कोई इन्फेक्शन तो नहीं है। सीबीसी कम होंगे तो वायरल होगा और बढ़े हुए होंगे तो बैक्टीरियल फीवर होगा। सीबीसी से स्थिति साफ न हो या किसी खास वायरस का खतरा नजर आता है तो डॉक्टर वायरल एंटिजन टेस्ट ( वीएटी ) या पॉलीमरेज चेन रिएक्शन टेस्ट ( पीसीआर ) कराने की सलाह देते हैं।
इलाज
तापमान 102 डिग्री तक रहता है तो हर 6 घंटे में पैरासिटामोल की 1 गोली मरीज को दे सकते हैं। बच्चों को हर चार घंटे में दवा दे सकते हैं। बच्चों को 10 मिली प्रति किलो वजन के अनुसार पैरासिटामोल सिरप दे सकते हैं। दो - तीन दिन तक बुखार ठीक न हो तो डॉक्टर के पास जाएं।
टायफायड
इसे एंट्रिक फीवर और मियादी बुखार भी कहते हैं। यह सैल्मोनेला बैक्टीरिया से होता है , जिससे आंत में जख्म ( अल्सर ) हो जाता है , जो बुखार की वजह बनता है। यह बुखार आमतौर पर धीरे - धीरे करके बढ़ता है। पहले दिन कम , फिर थोड़ा तेज और धीरे - धीरे बढ़ता जाता है।
कैसे फैलता है
टायफायड खराब पानी से फैलता है। टायफायड वैक्सीन लगी होने के बावजूद यह बुखार हो सकता है , क्योंकि यह वैक्सीन 65 फीसदी ही सुरक्षा देती है।
कितने दिन रहता है
3-4 हफ्ते ( अगर इलाज न हो तो यह लंबा खिंच जाता है )
लक्षण
तेज बुखार , सिर दर्द , बदन दर्द , कमजोरी , उलटी , जी मितलाना , दस्त , कभी - कभी शौच में खून।
टेस्ट
ब्लड कल्चर। कभी - कभी विडाल और टायफिडॉट टेस्ट भी कराते हैं।
इलाज
इसमें एंटी - बायोटिक दवा आमतौर पर दो हफ्ते के लिए दी जाती है। कई बार दवा देने के बाद भी बुखार उतरने में 4-5 दिन लग सकते हैं , इसलिए परेशान न हों। हाथ बिल्कुल साफ रखें और पानी साफ और उबालकर पिएं।
मलेरिया
यह ' प्लाज्मोडियम ' नाम के पैरासाइट से होता है , जो मच्छर इंसानों में फैलाते हैं। माना जाता है कि मलेरिया में एक दिन छोड़कर बुखार आता है , लेकिन अब धीरे - धीरे बदलाव देखने में आ रहा है और कई मामलों में बुखार लगातार भी बना रहता है।
कैसे फैलता है
मलेरिया मादा ' एनोफिलीज ' मच्छर के काटने से होता है , जोकि गंदे पानी में पनपते हैं। ये मच्छर आमतौर पर दिन ढलने के बाद काटते हैं।
कब तक रहता है
1-2 हफ्ते ( इलाज के बिना यह लंबा खिंच जाता है )
लक्षण
रह - रहकर ( कभी - कभी लगातार भी ) ठंड के साथ तेज बुखार , सिर दर्द , कंपकंपी महसूस होना , शरीर दर्द , उलटी , जी मितलाना , कमजोरी आदि। कभी - कभी मरीज बेहोश भी हो जाता है।
टेस्ट
ब्लड स्मेयर टेस्ट और मलेरिया एंटीजन। ब्लड स्मेयर टेस्ट चढ़े बुखार में किया जाता है।
इलाज
इसमें क्लोरोक्विन जैसी एंटी - मलेरियल दवा दी जाती है। इन दवाओं के साइड - इफेक्ट्स हो सकते हैं , इसलिए इन्हें डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
डेंगू
डेंगू 3 तरह का होता है :
1. क्लासिकल ( साधारण ) डेंगू बुखार , 2. डेंगू हैमरेजिक बुखार (DHF), 3. डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS)
कैसे फैलता है
डेंगू मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है। इन मच्छरों के शरीर पर चीते जैसी धारियां होती हैं और ये बहुत ऊंचाई तक नहीं उड़ पाते। ये मच्छर दिन में , खासकर सुबह काटते हैं।
कितने दिन तक रहता है
5 से 10 दिन तक
लक्षण
ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना , तेज सिरदर्द , आंखों के पीछे दर्द , कमजोरी , उलटी , पेट दर्द , चक्कर आना। डेंगू हैमरेजिक बुखार में इन लक्षणों के साथ नाक और मसूढ़ों से खून आना , शौच या उलटी में खून आना या स्किन पर गहरे नीले - काले रंग के चिकत्ते जैसे लक्षण हो सकते हैं। डेंगू शॉक सिंड्रोम में इन लक्षणों के साथ - साथ कुछ और लक्षण भी दिखते हैं जैसे कि मरीज धीरे - धीरे होश खोने लगता है , उसका बीपी एकदम कम हो जाता है और तेज बुखार के बावजूद स्किन ठंडी लगती है।
टेस्ट

- एंटीजन ब्लड टेस्ट ( एनएस 1) और डेंगू सिरॉलजी। एनएस 1 पहले दिन ही पॉजिटिव आ जाता है लेकिन धीरे - धीरे पॉजिविटी कम होने लगती है। इसलिए बुखार होने के 4-5 दिन बाद टेस्ट कराते हैं तो एंटीबॉडी टेस्ट ( डेंगू सिरॉलजी ) कराना बेहतर है।
इलाज
- साधारण डेंगू बुखार का इलाज घर पर ही हो सकता है। मरीज को पूरा आराम करने दें। आराम दवा का काम करता है। उसे हर छह घंटे में पैरासिटामोल दें और बार - बार खूब सारा पानी और तरल चीजें ( नीबू पानी , छाछ , नारियल पानी आदि ) पिलाएं , ताकि ब्लड गाढ़ा न हो और जमे नहीं।
- मरीज में अगर जटिल तरह के डेंगू यानी DSS या DHF का एक भी लक्षण दिखाई दे तो उसे जल्दी - से - जल्दी डॉक्टर के पास ले जाएं। DHF और DSS बुखार में प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं , जिससे शरीर के जरूरी अंगों पर बुरा असर पड़ सकता है। डेंगू से कई बार मल्टि - ऑर्गन फेल्योर भी हो जाता है।
जरूर ध्यान रखें
- बुखार है ( खासकर डेंगू के सीजन में ) तो एस्प्रिन ( Aspirin ) बिल्कुल न लें। यह माकेर्ट में डिस्प्रिन ( Dispirin ), एस्प्रिन ( Aspirin ), इकोस्प्रिन ( Ecosprin ) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। ब्रूफेन ( Brufen ), कॉम्बिफ्लेम ( Combiflame ) आदि एनॉलजेसिक से भी परहेज करें क्योंकि अगर डेंगू है तो इन दवाओं से प्लेटलेट्स कम हो सकती हैं और शरीर से ब्लीडिंग शुरू हो सकती है। किसी भी तरह के बुखार में सबसे सेफ पैरासिटामोल लेना है।
- झोलाछाप डॉक्टरों के पास न जाएं। अक्सर ऐसे डॉक्टर बिना सोचे - समझे कोई भी दवाई दे देते हैं। डेक्सामेथासोन ( Dexamethasone ) इंजेक्शन और टैब्लेट तो बिल्कुल न लें। अक्सर झोलाछाप डॉक्टर मरीजों को इसका इंजेक्शन और टैब्लेट दे देते हैं , जिससे मौत भी हो सकती है।
- डेंगू बुखार के हर मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर किसी सेहतमंद शख्स के शरीर में डेढ़ से दो लाख प्लेटलेट्स होते हैं। प्लेटलेट्स बॉडी की ब्लीडिंग रोकने का काम करती हैं। प्लेटलेट्स अगर एक लाख से कम हैं तो मरीज को फौरन हॉस्पिटल में भर्ती कराना चाहिए। डेंगू में 24 घंटे में 50 हजार से एक लाख तक प्लेटलेट्स तक गिर सकते हैं। अगर प्लेटलेट्स गिरकर 20 हजार या उससे नीचे पहुंच जाएं तो प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। 40-50 हजार प्लेटलेट्स तक ब्लीडिंग नहीं होती। ब्लीडिंग शुरू हो जाए तो प्लेटलेट्स चढ़वाने में देरी न करें।
- डेंगू में कई बार चौथे - पांचवें दिन बुखार कम होता है तो लगता है कि मरीज ठीक हो रहा है , जबकि ऐसे में कई बार प्लेटलेट्स गिरने लगते हैं। बुखार कम होने के बाद भी एक - दो दिन में एक बार प्लेटलेट्स काउंट टेस्ट जरूर कराएं। डेंगू में मरीज के ब्लड प्रेशर , खासकर ऊपर और नीचे के बीपी के फर्क पर लगातार निगाह ( दिन में 3-4 बार ) रखना जरूरी है। दोनों बीपी के बीच का फर्क 20 डिग्री या उससे कम हो जाए तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। बीपी गिरने से मरीज बेहोश हो सकता है।
बच्चों का रखें खास ख्याल
- बच्चे नाजुक होते हैं और उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है इसलिए बीमारी उन्हें जल्दी जकड़ लेती है। ऐसे में उनकी बीमारी को नजरअंदाज न करें।
- बच्चे खुले में ज्यादा रहते हैं इसलिए इन्फेक्शन होने और मच्छरों से काटे जाने का खतरा उनमें ज्यादा होता है।
- बच्चों घर से बाहर पूरे कपड़े पहनाकर भेजें। मच्छरों के मौसम में बच्चों को निकर व टी - शर्ट न पहनाएं। रात में मच्छर भगाने की क्रीम लगाएं।
- अगर बच्चा बहुत ज्यादा रो रहा हो , लगातार सोए जा रहा हो , बेचैन हो , उसे तेज बुखार हो , शरीर पर रैशेज हों , उलटी हो या इनमें से कोई भी लक्षण हो तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।
- आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ - पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं इसलिए उनके पेट को छूकर और रेक्टल टेम्प्रेचर लेकर उनका बुखार चेक किया जाता है। बगल से तापमान लेना सही तरीका नहीं है , खासकर बच्चों में। अगर बगल से तापमान लेना ही है तो जो रीडिंग आए , उसमें 1 डिग्री जोड़ दें। उसे ही सही रीडिंग माना जाएगा।
- बच्चे को डेंगू हो तो उसे अस्पताल में रखकर ही इलाज कराना चाहिए क्योंकि बच्चों में प्लेटलेट्स जल्दी गिरते हैं और उनमें डीहाइड्रेशन ( पानी की कमी ) भी जल्दी होता है।
क्या खाएं , क्या नहीं
- बुखार में मरीज का खाना बंद न करें। मरीज को लगातार पानी , तरल चीजें और सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें। बुखार की हालत में शरीर को अच्छे और सेहतमंद खाने की जरूरत होती है।
- खाना ताजा और आसानी से पचने वाला हो। तेज बुखार से प्रोटीन को नुकसान होता है , इसलिए मरीज के खाने में प्रोटीन ( दालें , राजमा , दूध , अंडा , पनीर , मछली आदि ) जरूर हों , खासकर बच्चों के खाने में।
- मरीज को मौसमी फल और हरी सब्जियां खूब खिलाएं। विटामिन - सी से भरपूर चीजों ( आंवला , संतरा , मौसमी , टमाटर आदि ) लें। ये हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं।
- खाने में हल्दी का इस्तेमाल ज्यादा करें। सुबह आधा चम्मच हल्दी पानी के साथ या रात को आधा चम्मच हल्दी एक गिलास दूध या पानी के साथ लें। लेकिन अगर आपको नजला , जुकाम या कफ आदि है तो दूध न लें। तब आप हल्दी को पानी के साथ ले सकते हैं।
- बहुत ठंडा और बासी खाना न खाएं। बेहद तीखे , तले - भुने और गरिष्ठ खाने से भी परहेज करें।
बुखार में कॉमन गलतियां
1. कई बार लोग खुद और कभी - कभी डॉक्टर भी बुखार में फौरन एंटी - बायोटिक देने लगते हैं। सच यह है कि टायफायड के अलावा आमतौर पर किसी और बुखार में एंटी - बायोटिक की जरूरत नहीं होती।
2. ज्यादा एंटी - बायोटिक लेने से शरीर इसके प्रति इम्यून हो जाता है। ऐसे में जब टायफायड आदि होने पर वाकई एंटी - बायोटिक की जरूरत होगी तो वह शरीर पर काम नहीं करेगी। एंटी - बायोटिक के साइड इफेक्ट भी होते हैं। इससे शरीर के गुड बैक्टीरिया मारे जाते हैं।
3. डेंगू में अक्सर तीमारदार या डॉक्टर प्लेटलेट्स चढ़ाने की जल्दी करने लगते हैं। यह सही नहीं है। इससे उलटे रिकवरी में वक्त लग जाता है। जब तक प्लेटलेट्स 20 हजार या उससे कम न हों , प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं होती।
4. कई बार परिजन मरीज से खुद को चादर से ढकने कर रखने को कहते हैं , ताकि पसीना आकर बुखार उतर जाए। इससे बुखार फौरी तौर पर उतर भी जाता है लेकिन सही तापमान का अंदाजा नहीं हो पाता। इसकी बजाय उसे खुली और ताजा हवा लगने दें। उसके शरीर पर सादा पानी की पट्टियां रखें। जरूरत है तो कूलर / एसी चलाएं ताकि उसके शरीर का तापमान कम हो सके।
5. बुखार में मरीज या उसके परिजन पैनिक करने लगते हैं और आनन - फानन में तमाम टेस्ट ( मलेरिया , डेंगू , टायफायड आदि के लिए ) कराने लगते हैं। दो दिन इंतजार करने के बाद डॉक्टर के कहे मुताबिक टेस्ट कराना बेहतर है।
6. मरीज बुखार में कॉम्बिफ्लेम , ब्रूफेन आदि ले लेते हैं। अगर डेंगू बुखार है तो इन दवाओं से प्लेटलेट्स कम हो सकते हैं , इसलिए ऐसा बिल्कुल न करें। सिर्फ पैरासिटामोल ( क्रोसिन आदि ) किसी भी बुखार में सेफ है।
7. मरीज आराम नहीं करता और पानी कम पीता है। तेज बुखार में आराम जरूरी है। साथ ही , शरीर में पानी की कमी न हो तो उसे बीमारी से लड़ने में मदद मिलती है।
मच्छरों से बचाव जरूरी
मच्छरों को पैदा होने से रोकना और उन्हें काटने से रोकना , दोनों जरूरी हैं :
- अपने आसपास पानी जमा न होने दें , गड्ढों को मिट्टी से भर दें , रुकी हुई नालियों को साफ करें।
- अगर कहीं पानी जमा है तो उसमें पेट्रोल या केरोसिन ऑयल डालें ताकि मच्छर न पनपें।
- कूलरों , फूलदानों आदि का पानी हफ्ते में एक बार और पक्षियों को दाना - पानी देने के बर्तन को रोज पूरी तरह से खाली करें , उसे साफ करें और फिर भरें। घर में टूटे - फूटे डिब्बे , टायर , बर्तन , बोतलें आदि न रखें। अगर रखें तो उलटा करके रखें ताकि उनमें बारिश आदि का पानी इकट्ठा न हो।
- डेंगू के मच्छर साफ पानी में पनपते हैं , इसलिए पानी की टंकी को अच्छी तरह बंद करके रखें।
- अगर मुमकिन हो तो खिड़कियों और दरवाजों पर महीन जाली लगवाकर मच्छरों को घर में आने से रोकें।
- मच्छरों को भगाने और मारने के लिए मच्छरनाशक स्प्रे , मैट्स , कॉइल्स आदि इस्तेमाल करें। मैट्स या कॉइल जलाकर करीब आधे घंटे के लिए कमरा बंद कर दें। फिर सारी खिड़कियां खोल दें। मच्छर मर जाएंगे या भाग जाएंगे। जब मॉसकिटो रैपलेंट जलाएं तो खिड़की खुली रखें। गुग्गुल के धुएं से मच्छर भगाना अच्छा देसी उपाय है।
- घर के अंदर सभी जगहों में हफ्ते में एक बार मच्छरनाशक दवा का छिड़काव जरूर करें। यह दवाई फोटो - फ्रेम्स , पर्दों , कैलेंडरों आदि के पीछे और घर के स्टोर - रूम और सभी कोनों में जरूर छिड़कें। दवाई छिड़कते वक्त अपने मुंह और नाक पर कोई कपड़ा जरूर बांधें। साथ ही , खाने - पीने की सभी चीजों को ढककर रखें।
- ऐसे कपड़े पहनें , जिनसे शरीर का ज्यादा - से - ज्यादा हिस्सा ढका रहे।
- किसी को डेंगू या मलेरिया हो गया है तो उसे मच्छरदानी के अंदर रखें , ताकि मच्छर उसे काटकर दूसरों में बीमारी न फैलाएं।

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