20/08/2026
#शीर्षक: 🌿 कलयुग नीति 🌿
पुराने दौर में कहते थे—
“जैसी करनी, वैसी भरनी।”
कलयुग ने अर्थ बदल दिया—
“करनी चाहे जैसी भी हो,
भरनी वही है जो दिखती हो।”
पहले कहा जाता था—
“सादा जीवन, उच्च विचार।”
अब दौर ने नया सूत्र दिया—
“महँगा जीवन, ऊँचा प्रचार,
विचार रहें तो बस अखबार।”
पहले रिश्तों की पहचान थी—
“मुसीबत में जो साथ निभाए, वही सच्चा मीत।”
अब नई नीति कहती है—
“जो पोस्ट पर लाइक बढ़ाए,
वही अपना, वही पुनीत!”
पहले कहते थे—
“घर की मुर्गी दाल बराबर।”
आज की दुनिया बोली—
“घर का हुनर रहे अनजान,
बाहर मिले तो बने महान!”
पहले नीति थी—
“एक हाथ से ताली नहीं बजती।”
अब कलयुग की ताली देखिए—
“एक हाथ में मोबाइल हो,
दूसरे में दुनिया की खबरी!”
पहले कहा जाता था—
“नेकी कर, दरिया में डाल।”
आज की नीति कुछ यूँ हुई—
“नेकी कर, फोटो खिंचवा,
फिर सोशल मीडिया पर डाल।”
पहले बुजुर्ग कहते थे—
“बोली अनमोल है।”
अब कलयुग समझाता है—
“बोली जितनी मीठी रखो,
मतलब उतना गहरा रखो।”
पहले था—
“दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है।”
अब अनुभव कहता है—
“धोखा खाया जो एक बार,
पासवर्ड बदलता बार-बार!”
पहले कहा जाता था—
“समय बड़ा बलवान।”
आज की विडंबना देखिए—
“समय वही, इंसान बदल गया,
घड़ी नहीं—इंसान तेज चल गया।”
और सबसे बड़ी कलयुग नीति—
पहले इंसान रिश्ते बनाता था,
फिर संपत्ति कमाता था;
अब संपत्ति रिश्ते बनाती है,
और जरूरत रिश्ते निभाती है।
पहले शब्द वचन हुआ करते थे,
अब शब्द बस ‘स्टेटस’ हैं;
पहले लोग दिल में बसते थे,
अब लोग ‘कॉन्टैक्ट लिस्ट’ हैं।
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धन्यवाद
पल्लवी श्रीवास्तव
(स्वरचित)
दिनांक: 19/08/2026
💫 Power of Words 💫