Bhojpuri Khatir

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आईं भोजपुरी खातीर कुछ कइल जाव......

23/01/2026

सुरों में बसंत, साधना में सरस्वती! आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! माँ सरस्वती आप सबकी हर मनोकामना पूर्ण करें।

05/09/2024

“A good education can change anyone. A good teacher can change everything!” I'm Proud to be a teacher! Happy teacher's day to all 🎂

31/12/2023

Wishing you all happy new year

26/09/2023

कभी नेनुँआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था। कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी, वो दिन थे, जब सब्जी पे खर्चा पता तक नहीं चलता था। देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे,लेकिन खिचड़ी आते-आते उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी!

तब जीडीपी का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था।
ये सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा थीं। लोहे की कढ़ाई में, किसी के घर रसेदार सब्जी पके तो, गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी। धुंआ एक घर से निकला की नहीं, तो आग के लिए लोग चिपरि लेके दौड़ पड़ते थे संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए समाचारों से दिन रुखसत लेता था!

रातें बड़ी होती थीं, दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो।
किसान लोगो में कर्ज का फैशन नहीं था, फिर बच्चे बड़े होने लगे, बच्चियाँ भी बड़ी होने लगीं!

बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही,अंग्रेजी इत्र लगाने लगे। बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे, किसान क्रेडिट कार्ड डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया,इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी! बीच में मूछमुंडे इंजीनियरों का दौर आया। अब दीवाने किसान,अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे, बेटी गाँव से रुखसत हुई,पापा का कान पेरने वाला रेडियो, साजन की टाटा स्काई वाली एलईडी के सामने फीका पड़ चुका था!

अब आँगन में नेनुँआ का बिया छीटकर,मड़ई पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया, पिया के ढाई बीएचके की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं!

बहुत पुरानी यादें ताज़ा हो गई, सच में उस समय सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता था, जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था!

दही मट्ठा का भरमार था, सबका काम चलता था। मटर,गन्ना,गुड़ सबके लिए इफरात रहता था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि, आपसी मनमुटाव रहते हुए भी अगाध प्रेम रहता था!

आज की छुद्र मानसिकता, दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती थी, हाय रे ऊँची शिक्षा, कहाँ तक ले आई। आज हर आदमी, एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहा है!

विचारणीय है कि क्या सचमुच हम विकसित हुए हैं या यह केवल एक छलावा है....!

14/07/2023
01/04/2022

आरे! धरीछन बाबा, तूं ? (याद क के) ओ हो, हम त एकदम भुला गइल रनी हं जे बाबा काल्हुए नाया-नाया बिआह क के घर बसवलें हऽ। बांह झुराइल, लकड़ी अइसन टांग आ सूखल चाम पर तोहार पीयर धोती देख के त मिजाज लहालोट हो गइल! खोढ़िला खानी धंसल आंख के सिकुड़ल कोर पर कागज अइसन लागता जइसे बुझे खाती धुकधुकात दीया पर टेम के करिखा फइल गइल होखे। बिना दांत के मुँह में पान चाभ तारऽ त बुझा ता जे झगड़ू लोहार के भाथी चल रहल बा। अच्छा बाबा, हम ढ़ेर देर तले बिलमेब ना हमरा के देख के सिटपिटात काहे बाड़ऽ .........ऐ ? का कह ताड़? तोहार बतिया हमरा सुनात नइखे, ऐ दुखहारन - कान से कुछ ऊंच सुनीले, ओ-हो-हो-हो (व्यंग्य के हंसी का साथे) ई त हमहू बूझ तानी जे तूं ऊंच सुनेल! बाकी हमरा नजर में त तहार काने ना, आँख, मुँह, हाथ, गोड़ आ दिमाग - सब ऊँचे काम करे लेसऽ ए बाबा! ...... का कह ताड़ ? ‘का करीं, घर में केहू करनीहार ना रहे, लोग बलजोरी बिआह करा देलस!‘ .......... हं, हं, बात ठीके कह ताड़ऽ घर में जवान बेटा के कुंआर रखले बाड़ऽ ..... अच्छा, नीमन कइलऽ मूवे का बेरी में घर बसा लेलऽ! ऐ? का कह गइलऽ ‘हमरा सामने मूवे के नांव मत ल, नया नया शादी क के ले आइल बानी आ तूं आजुवे असगुन मनावे लगलऽ‘......... ना, ना, के कहता जे तूं जलदिए मर जइब। तूं त शादी के इमरित पी के अघा गइल बाड़ऽ। जमराजो का तहरा लगे आवे में दू-चार बार सोंचे के पड़ जााई। का बोल ताड़ऽ ‘इमरित मत कह ए दुखहारन, हम त एह शादी में बिका गइनी, बरबाद हो गइनी! जवनो आठ-दस काठा खेत बांचल रल ओकरो के बेंचि के एही में लगा देनी, सउदा बाड़ा महंगा पड़ल! सउदा! (व्यंग्य के हंसी) कवनो बात ना, सउदा चोख मिलल बा नूं बाबा! का कह ताड़? ‘अगर ईहे रहि त अफसोसे कवना बात के रलऽ समुझिह जे नौ बरिस के नेउरी बझा के ले आइल बानी - अबहीं बाड़ा पोसे के पड़ी हो!‘ ...... त नौ बरिस के नेउरिया बीया नू ? फिकिर मत करऽ नेउरी छोट भी होखे त बड़का बड़का सांपन के भी चबा जाये के ताकत रखेले। ई त नौ बरिस के बीया! ...... आछा, तनी हमरा नयकी नौबरखी आजी के देखइब ना? का कह ताड़ ‘भगबे कि ना एजा से - ई तोड़ आजी ना हिय, भउजी कहिहे भउजी।..... आछा, तहरे कहल नाम ठीक, तूं हमार बाबा, उ हमार भउजी!...... ओह! (हुछ इयाद क के) हम ई कवना बतबंगड़ में लागि गइनी! बाहर बरखा छूटि गइल। अब हमरा एजा से घिसके के चाहीं। आछा बाबा, राधाकिसिन के जोड़ी बनल रहो, हम चल तानी ........
(दूर से मस्ती में गीत गावे के आवाज - ‘नन्हका बलमुआ ले के सुतलीं अंगनवां बनवारी हो जड़ि गइलें एड़ी से कपार! चुप होखु, चुप होखु, नन्हका बलमुआं बनवारी हो रहरी में बोलेला सिआर!)

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