09/11/2025
लेफ्ट लेंस में बिहार चुनाव पर जाने माने पत्रकार उर्मिलेश के साथ चर्चा।
आज़ादी के बाद से अब तक बिहार में ऐसी सरकार नहीं बनी जिसने ज़रूरी मुद्दों को प्राथमिकता दी: उर्मि
लेफ़्ट लेंस के इस अंक में सुनिए बिहार चुनावों पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के साथ ख़ास बातचीत। उर्मिलेश लंबे समय से ...
11/10/2025
https://www.youtube.com/watch?v=jcoyN789SQE
देश के जन संघर्षों और वामपंथ की सीधी लड़ाई RSS से है: प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के गठन के 100 साल पूरे होने के मौक़े पर प्रधानमंत्री ने इसके नाम पर डाक टिकट और स...
02/10/2025
आज 2 अक्टूबर है — महात्मा गाँधी का जन्मदिवस, और साथ ही देश के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी का भी जन्मदिन। आज विजयादशमी भी है। लेकिन गाँधी को याद करना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि ज़रूरत है।
गाँधी को याद करना मतलब उस साम्राज्यवाद के असली चेहरे को पहचानना, जिसने अफ्रीका से लेकर भारत तक जनता को लूटा और दबाया। वही साम्राज्यवाद आज नए मुखौटे पहनकर हमारे सामने खड़ा है। नमक आंदोलन से लेकर स्वदेशी आंदोलन तक गाँधी की साम्राज्यवाद-विरोधी सोच को आज तिलांजलि दी जा रही है। किसान-मज़दूरों के अधिकार छीनकर फिर से "कंपनी राज" थोपने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में गाँधी को याद करना और भी जरूरी हो जाता है।
गाँधी को याद करेंगे तो उनके हत्यारे भी याद आएंगे। यह भी याद आएगा कि वह हत्या किसी अकेले व्यक्ति का काम नहीं थी, बल्कि संगठित षड्यंत्र था। वे संगठन आज सत्ता में हैं और अपने गठन के सौ साल पर जश्न मना रहे हैं। उनकी राजनीति में हत्या और नफ़रत का सिलसिला अब भी जारी है।
गाँधी को याद करना यानी इन सबको पहचानना और जनता के पक्ष में खड़े रहना है।
28/09/2025
https://youtu.be/64RArxJdqVk?si=bIE9tsGNAe1XQtwY
खेत मज़दूर सरकार के लिए सिर्फ़ आँकड़ा हैं, उनके लिए कोई नीति नहीं: विक्रम सिंह
लेफ़्ट लेंस में इस हफ़्ते हमारे साथ जुड़े अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन के सह-सचिव कॉमरेड विक्रम सिंह। उन्होंने ब....
07/09/2025
https://youtu.be/fNoZaf_OGcg?si=Dj1Uby-E4aErn2Dw
NCERT Textbooks are Downgrading Medieval Era, Ignoring India's Diversity: Prof. Amar Farooqui
In this week's Left Lens, historian Professor Amar Farooqui analyses the politics behind the recent changes to NCERT textbooks. He talks about how tampering ...
10/01/2024
आजकल 'प्राण-प्रतिष्ठा' की चर्चा आम है। तो सोचा इसपर कुछ प्रकाश डाला जाए!
जानते हैं दक्षिण भारत में इसी 'प्राण-प्रतिष्ठा' का परिणाम भक्ति-आंदोलन बना ?
हमलोग सुनते हैं - भक्ति द्रविड़ उपजी लायो रामानंद!
इसी द्राविड़ में मसाले की खेती और व्यापार का परिणाम था कि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। व्यापारी विदेशों से ढेर सारा धन कमाकर लौटते थे। वापस लौटने पर मंदिरों का निर्माण वे व्यापारी करवाते। खूब सारे मंदिर - उस द्राविड़ यानी दक्षिण भारत में आज भी मिलते हैं, छठी-सातवीं शताब्दी के।
अब देखिए, मंदिर किसने बनाया? मेहनतकश जनता जो शुद्र थी, उसी ने न ? लेकिन मंदिर बन जाने के बाद ब्राह्मणों ने उसमें 'प्राण-प्रतिष्ठा' कर उस शुद्र को अंदर आने से रोक दिया। आज भी मंदिर प्रवेश को लेकर कई संघर्ष देखे जा सकते हैं।
इसी एलियनेसन (अलगाव) से वह भाव पैदा हुआ - रखो अपने भगवान को अपने अपने मंदिरों में बंद कर। हमारा भगवान तो कण कण में व्याप्त है। वह तो मेरे अंदर ही वास करता है जैसे मृग के अंदर कस्तूरी, आदि आदि।
मंदिर के अंदर प्राण-प्रतिष्ठा कर जिस कर्म-कांड पर आधारित ब्राह्मण धर्म को नकारा गया - मोक्ष का एक वैकल्पिक रास्ता दिखाया गया, ब्रह्म से सीधा रिश्ता जोड़ने का मार्ग- यही तो है भक्ति। यही आंदोलन का रूप बना।
आज उसे उलट कर जो आंदोलन चलाया जा रहा है वह कर्मकांड को स्थापित करने का - राज्य के द्वारा प्रायोजित 'प्राण-प्रतिष्ठा' - कितना आगे ले जाने वाला है और कितना पीछे धकेलने वाला - इसे समझने की जरूरत है।
25/11/2023
कथा इस प्रकार है। एक बार आर्यावर्त भूमि पर अति पराक्रमी राजा का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा पराक्रम न भूतो और ना भविष्यति! ऐसा राजा जिसका टैग लाइन था -” ……..है तो मुमकिन है!” जो राजा प्रजा में गारंटी बेचता था! मने स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार आदि-आदि की गारंटी बस उसके नाम से चलती थी। इसका मतलब यह मत समझ लीजिएगा कि उनके राज में भूख, ग़रीबी, बीमारी और बेरोज़गारी आदि का वास नहीं था। मतलब यह कि इन सबके बड़े बड़े अपार्टमेंट आर्यावर्त में जगह जगह प्रचुर मात्रा में मौजूद थे। ये थे तभी पराक्रमी राजा का राज मुमकिन था। ख़ैर कथा को आगे बढ़ाते हैं।
पराक्रमी राजा का एक चिरकुट सलाहकार था। लेकिन पराक्रमी राजा के संसर्ग में रहकर वह भी शक्तिमान और चाणक्य आदि की उपाधि से ग्रस्त होता गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सारे दरबारी इन दोनों से त्रस्त होते चले गए। पराक्रमी राजा हो या उसका चिरकुट सलाहकार - दोनों के खून में व्यापार दौड़ता था। मने व्यापार से मिले मज़दूरों के खून पसीने की कमाई इनकी रगों में खून का काम करती। सो कहानी का शॉर्ट कट यह कि उनके दरबारियों ने तय किया कि एक बार फिर राजा को नंगा किया जाए!
कथा इसी बिंदु पर शुरू होती है।
हुआ यह कि पश्चिमी देशों से शिक्षा के व्यापार का प्रपोज़ल आ गया। व्यापार तो खून में बसता था, सो सलाहकार मचल गया। लेकिन पराक्रमी राजा चिरकुट तो था नहीं। मन तो उसका भी मचला, लेकिन आर्यावर्त जिसे उसने विश्वगुरु पहले ही घोषित किया हुआ था, उसको कैसे पश्चिमी देश का पिछलग्गू घोषित कराए। इससे पहले वाले राजा की यही भूल थी। उसने ग्लोबल स्टैंडर्ड के नाम पर ‘ग्लोबल कैपिटल के इन्वेस्टमेंट’ और “भारत के छात्रों को भारत में ही ग्लोबल स्टैण्डर की शिक्षा भारतीय रुपये में” का स्लोगन दे दिया।बस यहीं से उसके पराजय की कहानी गढ़ी गई। सो पराक्रमी राजा ने दरबार बुलाया। ग्लोबल पूँजी के प्रपोज़ल को उनके बीच रखा। तब तक उनका स्वदेशी मंच ख़ुद ही ज़हर खा कर परलोक सिधार चुका था, सो मामला पूरे दरबार में रखकर उसपर राय लेने का फ़ैसला किया।
समस्या जटिल थी। आख़िर विश्वगुरु वाला स्लोगन और पश्चिमी ग्लोबल कैपिटल वाली शिक्षा नीति का यह अंतर्विरोध कैसे हैंडल किया जाये?
कुपित पीड़ित दरबारियों को इससे अच्छा मौक़ा और क्या मिलता! उन्होंने कहा यही वक़्त है जब मैकाले की शिक्षा नीति के बरक्स भारतीय शिक्षा नीति को लाया जा सकता है। पराक्रमी राजा का चेहरा खिल गया। लेकिन उसके सलाहकार का खून जिसमें व्यापार दौड़ता था, उसकी भृकुटी तन गई। इतना देखना था कि दरबारी ने कहा - महाराज यह एकदम भारतीय मॉडल होगा, विश्वगुरु वाला मॉडल होगा। आप चिंता न करें। उसमें व्यापार भी बस फ़लेगा फूलेगा।
अगला सवाल आया कैसे ? तो दरबारी ने एक कमेटी का गठन करने की माँग की। इसे तथास्तु कहकर गठित कर दिया गया। खेल यहीं से हुआ कि आज राजा नंगा घूम रहा है, परंतु उसे कोई नंगा कहने की हिम्मत नहीं कर रहा। सब उस बच्चे के इंतज़ार में हैं जो बस अपनी अबोधता का परिचय दे। लेकिन सयाने दरबारियों की कथा को हम आगे बढ़ाते हैं।
शिक्षा का यह मॉडल बनाने के लिये कमेटी गठित हो गई। नामी गिरामी दरबारी उसका हिस्सा बने। उनके ऊपर बस एक अंतर्विरोध को पाटने का टास्क था - कैसे ग्लोबल कैपिटल वाली शिक्षा नीति को भारतीय शिक्षा नीति का पैकैजिंग किया जाए! यह काम इतना आसान होगा यह पीड़ित और त्रस्त दरबारियों के लिये चमत्कार की तरह था। सो एक चमत्कारी को इस कमेटी ने जब अपना गोल ऑब्जेक्ट सामने रखा तो उसने चुटकी बजायी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति हाज़िर हो गया। इसे एनईपी की संज्ञा दी गई। यह एक ऐसा वस्त्र था जो अलौकिक था। उसने सभी दरबारियों को बस एक ही संदेश दिया - इस वस्त्र को पराक्रमी राजा को पहना दो। फिर अगर उसका चिरकुट सलाहकार भी बोले कि राजा नंगा है तो, वह मारा जाएगा। बस सारे दरबारी एक स्वर में इसे बोलते रहना। कोई अंतर्विरोध नहीं आएगा।
भारतीय मूल्य, योगा, वैदिक गणित, राम राज का इतिहास, हिंदू पीठ, आदि आदि का जाप लगातार करना होगा, जब भी कोई देशद्रोही क़ौम-नष्ट वाले बोलें! इसके लगातार जाप का प्रभाव थोड़े दिनों में मिलेगा।
फिर क्या था दरबारियों की इस कमेटी का रिपोर्ट लागू हुआ। NEP का दिव्य वस्त्र धारण कर राजा घूम रहा है, देश परदेश में उसके पराक्रम की चर्चा हो रही है। सब देख रहे हैं -जो दिव्य वस्त्र पर सवाल उठा रहे वे जेलों में ठूँसे जा रहे हैं!
बस दरबारी खुश हैं। वे अपना मुँह छिपा कर हँसते हुए फ़ीफ़ी की ध्वनि में भारतीय मूल्य, योगा, वैदिक गणित, राम राज का इतिहास, हिंदू पीठ, आदि आदि का जाप कर रहे हैं।
कथा समाप्त हुई। राजा आज भी दिव्य वस्त्र धारण किए घूम रहा है। इस कथा का लेखक दिव्य वस्त्र में पराक्रमी राजा को देखकर गदगद भाव में दरबारियों की फ़ी फ़ी को एक्सपोज़ कर रहा है।
31/01/2023
संघर्ष को नकारकर सरकार और प्रशासन के साथ अपनी वैचारिक और पार्टी के आधार पर लाभ दिलाने का आश्वासन जब किसी यूनियन के संगठन का हो जाए और लोग उसपर भरोसा कर उन्हें नेतृत्व दे दें तब क्या होता है - यह दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ यानी डूटा में देखा जा सकता है।
NDTF ने यही किया। संघर्ष की डूटा को खत्म कर दिया।
आज हालत क्या है ?
यूनियन और असोसिएशन इसलिए बनाते हैं कि सामूहिक हितों को पाया जा सके, प्रशासन और सरकार के हमलों से बचा जा सके, प्रशासन और सरकार से व्यक्तिगत डर को भगाया जा सके।
जब सरकार, प्रशासन और यूनियन एक ही पार्टी के काबिज हो जाएं जिनका उद्देश्य ही शोषण पर आधारित विचारधारा हो - तब आप किससे बचने के लिए किसके पास जाएंगे ?
तब सरकार और प्रशासन का काम आसान हो जाता है। डर भगाने की जगह डर को बनाने का काम यूनियन का होता है।
डिस्प्लेसमेन्ट का पूरा गणित और पसरा हुआ डर - उसी कहानी को दुहरा रहा है।
DTF भले ही EC में लगातार तीन बार से हार रहा है, डूटा का नेतृत्व उसके पास था। यही वह प्लेटफॉर्म था जहां से प्रतिरोध को आयोजित किया जा रहा था। आज उसके पास न डूटा है और न EC। इसका परिणाम यह है कि प्रतिरोध विहीन डरा हुआ शिक्षक समुदाय असहाय है।
आज मौका है। देव कुमार और उसकी टीम को जीत दिलाकर EC का प्लेटफॉर्म प्रतिरोध का बनाएं और डूटा नेतृत्व को साफ संदेश दें।
लड़ेंगे तभी जीतेंगे।
29/01/2023
मनीष सिसोदिया के पत्र के जरिए AADTA का नया शिफ्ट सामने आया है। NDTF ने एब्जॉर्बशन की नई व्याख्या की थी - रेगुलराइजेशन इंटरव्यू के द्वारा। उसका क्या हश्र हुआ हम सब रोज देख रहे।
AADTA के द्वारा एब्जॉर्बशन की नई व्याख्या - रेगुलराइजेशन दिल्ली सरकार की चिट्ठी से VC के द्वारा GB की मदद से!
मने तू डाल डाल मैं पात पात!
जो दिल्ली सरकार के कॉलेज नहीं हैं उनमें पढ़ा रहे एडहॉक के लिए उनकी अब्जॉर्बेशन की व्याख्या क्या है ?
डूटा GBM से साफ समझ रही है - अब्जॉर्बेशन थ्रू यूजीसी वन टाइम रेगुलेशन।
लाचार को साझा संघर्ष का रास्ता दिखाने के बजाय गाजर दिखाना अमानवीय नहीं तो और क्या है ?
28/01/2023
मनीष सिसोदिया के पत्र को खारिज मत कीजिए। उसे जन-दबाव में लिखा गया पत्र समझिए।
आप पूछेंगे कैसे ?
तो सोचिए जब लक्ष्मीबाई कॉलेज में या स्वामी श्रद्धानंद या फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स में भीषण कत्लेआम चला इनकी मिलीभगत से - तो सब NDTF और AAD मने आम आदमी और अपोर्चुनिस्ट कांग्रेस के ताल और मेल से निर्मित AADTA के संधि स्थल बोले तो VC योगेश सिंह के कारनामे पर चुप ।
अब अचानक उसी योगेश सिंह को उनके प्रिय सिसोदिया के द्वारा पत्र लिखा जाता है कि भूल सुधार, माफी की गुहार - अब आगे हम और हमारे नुमाइंदे GB के द्वारा सबको अब्जॉर्ब करेंगे।
तो इसे जनतंत्र के द्वारा बनाई गई सामूहिक चेतना की जीत समझिए।
याद कीजिए आगी बागी टीम का - जब कहा गया कि एक भी डिस्प्लेसमेन्ट होगा तो विश्वविद्यालय ठप कर दिया जाएगा।
याद कीजिए मोदी के शाह का जिसने जुमला को नया अर्थ दिया था।
याद कीजिए उस केजरीवाल का जिसने दिल्ली चुनाव में घोषणा की थी कि सभी कॉन्ट्रेक्ट वालों को स्थायी किया जाएगा!
मौसेरे भाईयों के कहे पर आँख मूँदकर भरोसा करना 15 लाख का इंतजार करना होगा। हाँ इनपर दबाव बनाने के लिए लगातार डिस्प्लेसमेन्ट को मुद्दा बनाया जाना - यही ट्रेड यूनियन की भूमिका है। यही जनतंत्र की भूमिका है। यही विपक्ष की भूमिका है। यहीं से आपकी भूमिका जुड़ी है।
आपसे अपील है कि देव कुमार और उनकी टीम को अपना समर्थन देकर अपनी भूमिका निभाएं।