25/11/2023
कथा इस प्रकार है। एक बार आर्यावर्त भूमि पर अति पराक्रमी राजा का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा पराक्रम न भूतो और ना भविष्यति! ऐसा राजा जिसका टैग लाइन था -” ……..है तो मुमकिन है!” जो राजा प्रजा में गारंटी बेचता था! मने स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार आदि-आदि की गारंटी बस उसके नाम से चलती थी। इसका मतलब यह मत समझ लीजिएगा कि उनके राज में भूख, ग़रीबी, बीमारी और बेरोज़गारी आदि का वास नहीं था। मतलब यह कि इन सबके बड़े बड़े अपार्टमेंट आर्यावर्त में जगह जगह प्रचुर मात्रा में मौजूद थे। ये थे तभी पराक्रमी राजा का राज मुमकिन था। ख़ैर कथा को आगे बढ़ाते हैं।
पराक्रमी राजा का एक चिरकुट सलाहकार था। लेकिन पराक्रमी राजा के संसर्ग में रहकर वह भी शक्तिमान और चाणक्य आदि की उपाधि से ग्रस्त होता गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सारे दरबारी इन दोनों से त्रस्त होते चले गए। पराक्रमी राजा हो या उसका चिरकुट सलाहकार - दोनों के खून में व्यापार दौड़ता था। मने व्यापार से मिले मज़दूरों के खून पसीने की कमाई इनकी रगों में खून का काम करती। सो कहानी का शॉर्ट कट यह कि उनके दरबारियों ने तय किया कि एक बार फिर राजा को नंगा किया जाए!
कथा इसी बिंदु पर शुरू होती है।
हुआ यह कि पश्चिमी देशों से शिक्षा के व्यापार का प्रपोज़ल आ गया। व्यापार तो खून में बसता था, सो सलाहकार मचल गया। लेकिन पराक्रमी राजा चिरकुट तो था नहीं। मन तो उसका भी मचला, लेकिन आर्यावर्त जिसे उसने विश्वगुरु पहले ही घोषित किया हुआ था, उसको कैसे पश्चिमी देश का पिछलग्गू घोषित कराए। इससे पहले वाले राजा की यही भूल थी। उसने ग्लोबल स्टैंडर्ड के नाम पर ‘ग्लोबल कैपिटल के इन्वेस्टमेंट’ और “भारत के छात्रों को भारत में ही ग्लोबल स्टैण्डर की शिक्षा भारतीय रुपये में” का स्लोगन दे दिया।बस यहीं से उसके पराजय की कहानी गढ़ी गई। सो पराक्रमी राजा ने दरबार बुलाया। ग्लोबल पूँजी के प्रपोज़ल को उनके बीच रखा। तब तक उनका स्वदेशी मंच ख़ुद ही ज़हर खा कर परलोक सिधार चुका था, सो मामला पूरे दरबार में रखकर उसपर राय लेने का फ़ैसला किया।
समस्या जटिल थी। आख़िर विश्वगुरु वाला स्लोगन और पश्चिमी ग्लोबल कैपिटल वाली शिक्षा नीति का यह अंतर्विरोध कैसे हैंडल किया जाये?
कुपित पीड़ित दरबारियों को इससे अच्छा मौक़ा और क्या मिलता! उन्होंने कहा यही वक़्त है जब मैकाले की शिक्षा नीति के बरक्स भारतीय शिक्षा नीति को लाया जा सकता है। पराक्रमी राजा का चेहरा खिल गया। लेकिन उसके सलाहकार का खून जिसमें व्यापार दौड़ता था, उसकी भृकुटी तन गई। इतना देखना था कि दरबारी ने कहा - महाराज यह एकदम भारतीय मॉडल होगा, विश्वगुरु वाला मॉडल होगा। आप चिंता न करें। उसमें व्यापार भी बस फ़लेगा फूलेगा।
अगला सवाल आया कैसे ? तो दरबारी ने एक कमेटी का गठन करने की माँग की। इसे तथास्तु कहकर गठित कर दिया गया। खेल यहीं से हुआ कि आज राजा नंगा घूम रहा है, परंतु उसे कोई नंगा कहने की हिम्मत नहीं कर रहा। सब उस बच्चे के इंतज़ार में हैं जो बस अपनी अबोधता का परिचय दे। लेकिन सयाने दरबारियों की कथा को हम आगे बढ़ाते हैं।
शिक्षा का यह मॉडल बनाने के लिये कमेटी गठित हो गई। नामी गिरामी दरबारी उसका हिस्सा बने। उनके ऊपर बस एक अंतर्विरोध को पाटने का टास्क था - कैसे ग्लोबल कैपिटल वाली शिक्षा नीति को भारतीय शिक्षा नीति का पैकैजिंग किया जाए! यह काम इतना आसान होगा यह पीड़ित और त्रस्त दरबारियों के लिये चमत्कार की तरह था। सो एक चमत्कारी को इस कमेटी ने जब अपना गोल ऑब्जेक्ट सामने रखा तो उसने चुटकी बजायी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति हाज़िर हो गया। इसे एनईपी की संज्ञा दी गई। यह एक ऐसा वस्त्र था जो अलौकिक था। उसने सभी दरबारियों को बस एक ही संदेश दिया - इस वस्त्र को पराक्रमी राजा को पहना दो। फिर अगर उसका चिरकुट सलाहकार भी बोले कि राजा नंगा है तो, वह मारा जाएगा। बस सारे दरबारी एक स्वर में इसे बोलते रहना। कोई अंतर्विरोध नहीं आएगा।
भारतीय मूल्य, योगा, वैदिक गणित, राम राज का इतिहास, हिंदू पीठ, आदि आदि का जाप लगातार करना होगा, जब भी कोई देशद्रोही क़ौम-नष्ट वाले बोलें! इसके लगातार जाप का प्रभाव थोड़े दिनों में मिलेगा।
फिर क्या था दरबारियों की इस कमेटी का रिपोर्ट लागू हुआ। NEP का दिव्य वस्त्र धारण कर राजा घूम रहा है, देश परदेश में उसके पराक्रम की चर्चा हो रही है। सब देख रहे हैं -जो दिव्य वस्त्र पर सवाल उठा रहे वे जेलों में ठूँसे जा रहे हैं!
बस दरबारी खुश हैं। वे अपना मुँह छिपा कर हँसते हुए फ़ीफ़ी की ध्वनि में भारतीय मूल्य, योगा, वैदिक गणित, राम राज का इतिहास, हिंदू पीठ, आदि आदि का जाप कर रहे हैं।
कथा समाप्त हुई। राजा आज भी दिव्य वस्त्र धारण किए घूम रहा है। इस कथा का लेखक दिव्य वस्त्र में पराक्रमी राजा को देखकर गदगद भाव में दरबारियों की फ़ी फ़ी को एक्सपोज़ कर रहा है।