देख भाई!,
तुम्हारी अज्ञानता की वजह से अगर बचपन में ही तुम्हें खतना कर दिया जाये तो तुम मुसलमान हो जाओगे, बाद में होश आने पर तुम भले इस्लाम को अस्वीकार कर दो लेकिन बचपन में मिले जननांग जस-के-तस वापस नहीं मिलेंगे. एक बार खतना मतलब हमेशा के लिए शारीरिक रूप से मुसलमान भले तुम्हारा इस्लाम से मन भर जाये और बाद में मन परिवर्तन हो जाये. एक ही बार में मुसलमान हमेशा के लिए बना लेने की ये साम्राज्यवादी खेल कुछ अलग ही खतरनाक स्तर पर खेला जा रहा है.
मुसलमान बनने के बाद यहूदी बनोगे तो तुम्हारे जननांग एक बार और कटेंगे --- बहुत ही खतरनाक है बाबू धर्म का खेला.
खैर! बिरसा पर आते हैं. बिरसा को जब समझ नहीं था उसी समय स्कूल में एडमिशन के समय ईसाई बना दिया गया, वो भी बाईबल स्कूल था जो ईसाई बनने के बाद ही एडमिशन के लिए स्वीकार करता था. बाद में बिरसा को समझ में आ गया कि सब चरका-चरका दिकू लोग एक ही है, तो ईसाईयत से दूरी बना ली और मिशनरियों और अंग्रेजों और जमींदारों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी. अंततः "बिरसाइत धर्म" चलाया उसके पहले आनंद पांड़ के चक्कर में वैष्णवाइट भी बना था (वैसे तुम्हारी तरह कोई आकर ये नहीं बोलता रहता कि बिरसा वैष्णव था). तुम्हारे गुरुओं की समस्या ये है कि तुम्हें उतना ही बतायेगा जिससे उनका धार्मिक धंधा/ बिजनेस कहीं ख़राब न हो जाये.
वैसे भी तुमलोगों को ज्ञान और सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है, तुमलोग एक ही किताब पढ़ते हो वो है जादू की किताब और थेथरई करना है. तुमलोगों को अगर ज्ञान की ललक होती तो अब तक पता चल गया होता कि कुंवारी लड़की बिना किसी शुक्राणु और अंडाणु के मिलन से बच्चे पैदा नहीं कर सकती, और न ही कोई व्यक्ति मरने के बाद जिन्दा हो सकता है. बाकि जैसी तुमको गुलामी करनी है करो, हमें तो ज्ञान के सागर में कूदना है कुदते रहेंगे और शायद उसका दर्द लोगों को घर में, समाज में, और देश में होते रहेगा.
Adivasi School
Its a philosophy derived by nature and it's descendant. Indigenous Philosophy
आदिवासी कभी नहीं मरता है, वो पुरखा बनकर हमेशा-हमेशा के लिए हमारे आसपास हमारे रसोई में रहता है, हमारे खनिहाल में होता है, और हमारे सरना में होता है. हम उन्हें न स्वर्ग भेजते हैं और न ही नर्क.
न ही आदिवासी ब्रह्मा के पैर से पैदा हुआ है और न ही कुंवारी माँ की संताने और वंशज हैं. आधारभूत सिद्धांत (प्रिंसिपल) को बढ़िया से पकड़ो. यही प्रिंसिपल हमारे पुरखे सदियों सदियों से तार्किक रूप से मानते आये हैं.
आदिवासी आस्था और अध्यात्म में "विश्वास और ईश्वर" नगण्य है, क्यूंकि जल, जंगल, जमीन, सूरज तारे साक्षात् हैं और यही आस्था और अध्यात्म है. किधर को ईश्वर पर विश्वास (faith) रखना. सब आँखों और दिलों में राज करने वाले प्राकृतिक चरित्र ही आदिवासी अध्यात्म है.
20/04/2025
डोलडा के दाऊद, परासु का जौन, चलकद का अभिराम, बीरबाँकी का पौलुस का बिरसा के खिलाफ गद्दारी के बाद आगे पढ़ें.
जिनको ईसाई बने आदिवासी ईश्वर की तरह पूजते हैं उन्होंने बिरसा के साथ गद्दारी की. अंग्रेजों के साथ मिलकर रेवरेंड लस्टी (मुरहू मिशन) ने आदिवासियों के साथ और बिरसा मुंडा के खिलाफ खेल खेला और बिरसा और उसके अनुयायी नहीं समझ पाए.
22 अगस्त 1895 को बिरसा मुंडा की पहली गिरफ़्तारी के पीछे के मास्टरमाइंड मुरहू एंग्लिकन मिशन के रेवरेंड लस्टी थे.
आखिर रेवरेंड लस्टी बिरसा की गिरफ्तार में बिचौलिया क्यों बने हुए थे?
दरअसल अगस्त 1895 में आदिवासी खासकर मुंडा और सरदार अपनी आक्रामकता बढ़ा दिए तो और हजारो लोग बिरसा के आदेश और इशारे का इंतिजार कर रहे थे जिसमें मिशनरी चर्च (जिनको अंग्रेजों से शह और सुरक्षा प्राप्त था) पर आक्रमण के साथ-साथ कोर्ट कचहरी को भी ध्वस्त करने की मंशा थी. सभी चरका-चरका दिकू लोगों को जिसमें हॉफमन भी शामिल थे, 24 और 27 अगस्त को मार डालने की योजना थी.
ब्रिटिश पुलिस सुप्रीटेंडेड ने 20 कांस्टेबल और अपने विश्वसनीय सूत्रों, जिसमें रेवरेंड लस्टी भी शामिल थे को पता लगाने के लिए खूंटी और चलकद भेजा कि वहां क्या चल रहा है और कितने लोग बिरसा के साथ हैं. रांची से पुलिस सुप्रीटेंडेड पहले ही खूंटी पहुँच चुके थे. हालाँकि वे खूंटी होते हुए बंदगांव की ओर चल दिए. मुरहू में एंग्लिकन मिशन के रेवरेंड लस्टी ने, जो बिरसा के बार में पहले ही रिपोर्ट कर चुके थे, भीड़ को देखने के बाद कहा कि उन्हें ब्रिटिश पुलिस पार्टी के साथ जाने दिया जाये क्यूंकि उन्होंने बिरसा को नहीं देखा है. चालकद से लोगों ने लौटकर ये सुचना दी कि बिरसा के घर करीब 105 से 200 व्यक्ति इक्कठे थे. बिरसा के सभी अत्यधिक विश्वशनीय गुरु (प्रधान अनुयायी) चलकद से बाहर, लोगों और हथियारों को इकट्ठा करने के उद्देश्य से गए थे, फलतः उसी रात धावा बोलकर गिरफ्तार किया जाये.
ब्रिटिश पुलिस पार्टी 8:30 बजे सुबह को बंदगांव से चले. पुलिस उपाधीक्षक, मेयर्स और लस्टी हाथी में थे. उनके साथ बाबू जगमोहन सिंह और 20 सशस्त्र पुलिसवाले थे. बहुत ही उबड़-खाबड़ क्षेत्र में 14 मील की लम्बी और थका देने वाली यात्रा के बाद 3 बजे चलकद पहुंचे. 10 कॉन्स्टेबल पहले ही चुन लिए गए थे जिनके पास बंदूकें थीं. ब्रिटिश पुलिस पार्टी ने गाँव के नीचे संगीने गाड़ दीं और फिर लोग बिरसा के घर की और चल दिए. घर को उनलोगों ने चुपके-चुपके घेर लिया. खूंटी का पुलिस-दरोगा और एक दूसरा आदमी, जो बिरसा को पहचानने आया था, उसके घर में घुसे. बिरसा सोया हुआ था. उसके पूरे शरीर में हल्दी मली हुई थी. जब उसे हथकड़ी पहनायी जाने लगी तो उसने जोरों से प्रतिरोध किया. उसने मुंडारी भाषा में जोर से चिल्लाते हुए लोगों को खतरे से आगाह किया और कहा कि लोग हथियार लेकर आएं और गिरफ़्तारी से पहले छुड़ा लें. दालान में दूसरे कमरे से 10-12 आदमी निकलकर बाहर आये, परन्तु उनको पुलिस ने खदेड़ दिया. बाहर का दरवाजा बंद कर दिया गया. लस्टी ने उनसे मुंडारी में बात की और उनको शांत करने की कोशिश की. दालान में जो कुल्हाड़ियाँ पड़ी हुई थीं उसे हटा दिया गया और बिना किसी झंझट के बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया.
(बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन (1872-1901), 2008, पेज 86-87, कुमार सुरेश सिंह)
07/03/2025
रिश्तों, परम्पराओं, व जरूरतों का संगम -- मेला-जतरा,
#नरेश कुमार बेसरा
26/01/2025
झारखण्ड और पड़ोसी राज्यों में भाषा और लिपि की लड़ाई सिर्फ गलत और सही की लड़ाई नहीं है: भाग-2
पूरे बहस में मेरे लिए आदिवासी-आदिवासियत को प्राथमिकता है और रहेगी. धार्मिक लोग अक्सर चीजों को अंत/मंजिल/close set की तरह देखते हैं जबकि वैज्ञानिकता एक माध्य/Open Set की तरह है. जैसे बाईबल के अनुसार ईश्वर ने आदम को बनाया, और उसकी पसली निकाल कर हेवा को बनाया, बाद में ईश्वर के आदेश से जीसस का जन्म हुआ, चौथे दिन सूरज का निर्माण, किया सांप ने बात किया इत्यादि-इत्यादि. कहानी ख़त्म, इनके लिए यही धार्मिकता है और शायद यही (तथाकथित) वैज्ञानिकता भी. ऐसे उदाहरण इसलिए भी देने पड़े क्यूंकि ओलचिकी लिखित संताली का विरोध रोमन लिपि से शराबोर ईसाई लोग ही कर रहे हैं, शायद नॉर्वे और बॉडिंग का कर्ज उतारना है.
वैज्ञानिकता अपने-आप में शायद ही कभी पूर्ण होता है वो हमेशा उससे आगे सोचने को मजबूर और प्रेरित करता है, वो खुद इवॉल्व होता है और आपको भी इवॉल्व होने को कहता है. एवोल्यूशन की प्रक्रिया सतत है. यहाँ पर आदिवासी-आदिवासियत (व्यक्तिगत पहचान) बरकरार रखते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़नी हैं तो अपनी परंपरा, रिवाज, भाषा इत्यादि को प्रयोग के साथ-साथ इसकी वैज्ञानिक उपयोगिता और उसके बाजार को भी समझना पड़ेगा. तुम क्या हो इससे वैज्ञानिकता को कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन वैज्ञानिकता क्या है उससे तुमको और तुम्हारी पहचान को फर्क पड़ता है और पड़ता रहेगा.
एवोल्यूशन के दौरान तमाम किस्म के रास्ते (लिटरेचर) से गुजरना हो सकता है कुछ चींजें न्यूनतम रूप से कॉपी भी हो सकती हैं लेकिन हू-ब-हू कॉपी नहीं हो सकती. हू-ब-हूं कॉपी में आप अपनत्व खोकर किसी और को जीने लगते हो और आप, आप नहीं होते हो बल्कि जहाँ से जिस चीज को कॉपी किये हो उसका इमेज (प्रतिबिम्ब) होते हो. अगर आपकी अपनी पहचान है तो आप कभी भी हू-ब-हू कॉपी करने की नहीं सोच सकते हैं. अन्यथा आप ख़त्म हैं. हो सकता है एक इंसान को शायद इंसानी पहचान के अलावा किसी और पहचान की जरुरत भी न हो, या इंसानी पहचान की भी जरुरत न हो, हो सकता है वो अपने आप को अस्तित्वहीन भी मानता हो. व्यक्तिगत रूप से एक व्यक्ति इतना बड़ा समद्रष्टा दार्शनिक हो सकता है लेकिन बिडम्बना देखिये पूरे विश्वभर में जमीनों पर लकीरें खींची गयी हैं, लिंग, धर्म, जाति समुदाय, रेस की लकीरें खींची गयी हैं. वास्तव में इन लकीरों के रहते हुए भी आप बे-लकीर जिंदगी जी सकते हैं लेकिन निश्चयात्मक संकल्पना (Positive Concept) एक वस्तु स्थिति है जो सापेक्ष रूप से वर्णित और जी जाती है. अंततः आप एक पहचान के साथ जीने की कोशिश करते हैं.
अंग्रेजी के ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में अभी भी नए-नए शब्द जोड़े जा रहे हैं और आगे भी जोड़े जायेंगे क्यूँकि सभ्यता इवॉल्व हो रही है, आप इवॉल्व हो रहे हैं, नयी चीजों का निर्माण और नामकरण हो रहा है फिर उसका लिंग, उसका फोनेटिक्स से लेकर उच्चारण तक तय किये जा रहे हैं. अगर आप वैज्ञानिकता के सांचे में इवॉल्व नहीं होंगे, समाज इवॉल्व नहीं होगा. न समकालीनता समझ में आएगी, न ही भूत और भविष्य, फिर बोआ ट्राइब बनने में समय नहीं लगेगा.
हो सकता है ओलचिकी लिखित संताली भाषा भी अपने आप में पूर्ण न हों लेकिन ये तो संताली भाषायी लोगों का कर्तब्य है कि इसे वैज्ञानिकता में पिरोकर नयी ऊंचाई में ले जाये. कोई भी चीज पूर्ण नहीं होता है उसे पूर्ण बनाना पड़ता है. शायद! यहाँ से एक एक बड़ा सवाल उभरकर आएगा: संताली कौन? ये आपको 100 साल पीछे नहीं ले जायेगा, ये बृहत् संताल आदिवासी समाज के निर्माण में नयी सोच है. अपनी आदिवासी-आदिवासियत की खोज आपको अपने अंदर करनी है न की बाईबल, रामायण और क़ुरान में. विरोध करने वाले लोग दूर-द्रष्टा नहीं हैं, इन्हें बस अपने नौकरी की पड़ी है और ये मेहनत कर के नयी चीज नहीं सीखना चाहते हैं.
26/12/2024
Dhumkudiya-2024,
#धुमकुड़िया- 2024 एकदिवसीय कार्यशाला में कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई ! #ranchi #jharkhand
25/12/2024
24 दिसंबर को पेसा दिवस का ठेंगा आदिवासियों को इसलिए पकड़ा दिया गया की कहीं आदिवासी बिरसा का उलगुलान दिवस न मनाने लग जाएँ. वास्तव में 24 और 25 दिसंबर को आदिवासियों को उलगुलान दिवस मनाना चाहिए.
@क्यों?
बिरसा मुंडा का आंदोलन चर्च और ईसाईयों के खिलाफ हिंसक उलगुलान के रूप में शुरू हुआ था. इसके लिए बिरसा मुंडा ने 24 दिसम्बर 1899 का दिन निर्धारित किया था जो की क्रिसमस के एक दिन पहले था. खूंटी, तोरपा, कर्रा, तमाड़, बसिया, और उलिहातू के कई चर्च में और ईसाईयों पर बिरसा और उनकी आर्मी ने तीर चलाये था.
("बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन", पेज. 124, कुमार सुरेश सिंह)
मगर, मूर्खों और जाहिलों की दुनिया में बिरसा और उनके आंदोलन से किसको मतलब है?
20/07/2024
आदिवासी हैं उनके बारे में कुछ भी लिखो कुछ भी बोलो, कुछ ऐसा ही है
आदिवासियों के जीवन शैली में खेती करना, शिकार करना, नाचना, गाना, हॉकी, कबड्डी जैसे खेल गतिविधियां हमेशा से शुमार रहे हैं. अगर कोई कहे की ये सारी चीजें किसी ने आदिवासियों को सिखाया है तो उसी मानसिकता को साम्राज्यवादी मानसिकता कहते हैं जो तथाकथित सभ्य समाज हमेशा से थोपती रही है जो आज भी जारी है और आज अलजजीरा अपने कहानी में यही बातें फिर एक बार लेकर आ रही हैं. बहरहाल, झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में हॉकी की दीवानगी को लेकर जो 'अलजज़ीरा' ने कहानी की है उसके लिए उनका तहे दिल से धन्यवाद, लेकिन कुछ लाइनें हैं जिससे हम न सिर्फ असहमत हैं बल्कि वो तथ्य से दूर है. वो पंक्तियाँ युटुब वीडियो में समय के साथ नीचे उद्धृत हैं.
15 Seconds: Hockey has been introduced by missionaries in the 19th century (हॉकी की शुरुआत 19वीं सदी में मिशनरियों द्वारा की गई थी).
5:40 minutes: No matter how small a village is, you will always find two things in them, one a rough and ready hockey field and other is a mud house that serves as a church. It was the church who brought hockey to Hindu Majority India. In the mid-19th century Christian missionaries discovered the tribal society play the similar games involving hitting a ball through bamboo sticks. Hockey became important way to draw children in the mission schools and foster unity among tribal villagers (कोई भी गांव कितना भी छोटा क्यों न हो, आपको वहां हमेशा दो चीजें मिलेंगी, एक कच्चा और तैयार हॉकी का मैदान और दूसरा मिट्टी का घर जो चर्च है. यह चर्च ही था जो हॉकी को हिंदू बहुसंख्यक भारत में लाया. 19वीं सदी के मध्य में ईसाई मिशनरियों ने पाया कि आदिवासी समाज बांस की डंडियों से गेंद को मारने जैसे ही खेल खेलते हैं. हॉकी मिशन स्कूलों में बच्चों को आकर्षित करने और आदिवासी ग्रामीणों के बीच एकता को बढ़ावा देने का महत्वपूर्ण तरीका बन गया.).
साफ़ तौर पर, ईसाई मिशनरियों का आगमन 1845-50 के आसपास झारखण्ड में होता है. हॉकी खेल न सिर्फ झारखण्ड बल्कि भारत के गांवों में अभी भी लोगों के खून में है और अगर कोई कहे की आदिवासियों के बीच हॉकी खेल की शुरुआत मिशनरियों ने 19 वीं शताब्दी में शुरू की थी निहायत एक बकैती और गुलाम मानसिकता को प्रदर्शित करता है. 5 मिनट 40 सेकंड में ये कहना बिलकुल गलत है की चर्च ने ही हिन्दू मेजोरिटी भारत में हॉकी को लेकर आया है. ये जरूर है कि शिक्षा के साथ हॉकी, झारखण्ड जैसे जगहों में मिशनरियों द्वारा ईसाई में धर्मान्तरण कराना एक मजबूत हथियार रहा है जिसमें ये लोग ईसाई धर्मावलम्बियों को खेल में प्रोत्साहन देते रहे और बाकी के साथ भेदभाव करते रहे है. इसका ताजा उदाहरण ये है कि पिछले एक दशक को छोड़ दिया जाये तो शायद ही कोई आदिवासी (सरना) खासकर सिमडेगा से आपको हॉकी खिलाड़ी मिलेगा!!!
आदिवासियों के हर गांव में हॉकी का मैदान जरूर है, लेकिन हर गांव में चर्च नहीं है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार से हरेक गांव में मंदिर नहीं है. ----------------------, यहाँ खाली स्थान छोड़ रहा हूँ, विस्तृत रूप से नहीं लिख रहा हूँ क्यूँकि हम तुम्हारे समझदार होने का गुनाह करते आये हैं, थोड़ा और गुनाह कर लेते हैं. खैर! इससे जुड़ा हुआ मुद्दा ये है कि झारखण्ड में गांवों को मौजा कहा जाता था और काफी जगह पर वही है, या गांव कहा जाता है. ईसाई मिशनरियों के द्वारा एक नया नामकरण जारी है. अब कई गांवों को मिलाकर एक बड़ा चर्च बनाया जाता है जिसे पेरिस कहा जाता है और वही पेरिस किसी ईसाई का स्थानीय (लोकशनल) पहचान होता है. इनसे वार्तालाप के क्रम में आपको ये नहीं पूछा जाता है कि आप किस गांव या मौजा से हैं, बल्कि ये पूछा जाता है कि आप किस पेरिस से हैं. इनके प्रशासनिक क्षेत्र का नामकरण है. ये धार्मिक साम्राज्यवादियों ने गांवों के इतिहास और पहचान को लीलकर पेरिस में बदल दिया.
हॉकी के नए नरेटिव के द्वारा चाहे-अनचाहे ईसाई मिशनरी इस तरह के मसिहासिक नरेटिव को बढ़ावा देते रहे हैं (बीच में तमाम किस्म के लोग इनके टूल किट बनते रहे हैं अब इसमें अलजजीरा भी शामिल है.) ताकि ये अपने आप को मसीहा के रूप में लगातार स्थापित करते रहें और आदिवासियों को धार्मिक गुलामी की और धकेलते रहें.
ईसाई में धर्मान्तरण, ईसाई मिशनरी एक साम्राज्यवादी एजेंडा के तहत कर रहे हैं और काफी आदिवासी समुदायों की हालत 'जने दोना हुने कोना' जैसे ही है.
(विस्तृत वीडियो कमेंट बॉक्स में)
03/02/2024
Besra अनुज बेसरा ने हिन्दवी और राम लखन सिंह यादव काॅलेज राँची के सहआयोजन 'कैम्पस कविता' कार्यक्रम में अपनी जगह बनायी है. दूसरा स्थान प्राप्त करने के लिए शुभकामनाएँ.
ईश्वर को नहीं मानोगे तो नर्क में जाओगे और शैतान तुम्हें वहां पर तेल से तलेगा, आग में जलायेगा। भाई! जो शैतान कभी भी ईश्वर को नहीं माना वही शैतान ईश्वर को नहीं मानने से सजा क्यों देगा?
क्रिश्चियनिटी, जीसस, स्वर्ग, नर्क, बाईबल, कुरान एक स्कैम है. रामायण, महाभारत की कहानी हैरी पॉटर की तरह ही फेक है.
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धर्म के ठेकेदारों की ठेकेदारी
कभी ये लोग आते हैं
तो कभी वो लोग
कोई इधर खींचता है
कोई उधर
कोई जनजाति कहता है
तो कोई पुकारता है कहकर वनवासी
तैयार नहीं वे सब के सब
आदिवासी मानने को हमें
कोई कहता है तुम मेरे हो
तो कोई सिद्ध करने की कोशिश करता
बल देकर कहता तुम मेरे
सबके अपने-अपने तर्क है
अपनी-अपनी सोच
अपनी-अपनी तकनीक
सबके सब लगे हैं बोने में
अपने उर्वर मस्तिष्क में
हमारे दिलो-दिमाग की बंजर जमीन पर
अपने मन पसंद बीज
ताकि काटी जा सके एक दिन
अपनी मनचाही फसल
कोई राम-कृष्ण-शिव की
मूर्तियाँ दिखाता है
तो कोई इसा की तस्वीर
कोई गीता की बात करता
जोड़ता है उससे रिश्ता
तो कोई बाईबिल का सन्देश सुनाता
इसा की संतान बताता है हमें
कोई 'घर वापसी' की
बात करता है
तो कोई नया घर का
देता है प्रलोभन
कोई हमारी भाषा में बोलता
देता है साथ होने का भरम
तो कोई हमारे घाओं पर पट्टियाँ बांधता
माँगता है मनचाही कीमत
हम नहीं जानते किसी राम को
शिव-पार्वती की कोई कथा नहीं
सुनी कभी हमने
अपने पूर्वजों से
हमारे पुरखों ने नहीं की कभी चर्चा
किसी इसा मसीह की भी
(कवैत्री, निर्मला पुतुल की कविता संग्रह "अपने घर की तलाश में " से)
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