21/04/2025
देख भाई!,
तुम्हारी अज्ञानता की वजह से अगर बचपन में ही तुम्हें खतना कर दिया जाये तो तुम मुसलमान हो जाओगे, बाद में होश आने पर तुम भले इस्लाम को अस्वीकार कर दो लेकिन बचपन में मिले जननांग जस-के-तस वापस नहीं मिलेंगे. एक बार खतना मतलब हमेशा के लिए शारीरिक रूप से मुसलमान भले तुम्हारा इस्लाम से मन भर जाये और बाद में मन परिवर्तन हो जाये. एक ही बार में मुसलमान हमेशा के लिए बना लेने की ये साम्राज्यवादी खेल कुछ अलग ही खतरनाक स्तर पर खेला जा रहा है.
मुसलमान बनने के बाद यहूदी बनोगे तो तुम्हारे जननांग एक बार और कटेंगे --- बहुत ही खतरनाक है बाबू धर्म का खेला.
खैर! बिरसा पर आते हैं. बिरसा को जब समझ नहीं था उसी समय स्कूल में एडमिशन के समय ईसाई बना दिया गया, वो भी बाईबल स्कूल था जो ईसाई बनने के बाद ही एडमिशन के लिए स्वीकार करता था. बाद में बिरसा को समझ में आ गया कि सब चरका-चरका दिकू लोग एक ही है, तो ईसाईयत से दूरी बना ली और मिशनरियों और अंग्रेजों और जमींदारों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी. अंततः "बिरसाइत धर्म" चलाया उसके पहले आनंद पांड़ के चक्कर में वैष्णवाइट भी बना था (वैसे तुम्हारी तरह कोई आकर ये नहीं बोलता रहता कि बिरसा वैष्णव था). तुम्हारे गुरुओं की समस्या ये है कि तुम्हें उतना ही बतायेगा जिससे उनका धार्मिक धंधा/ बिजनेस कहीं ख़राब न हो जाये.
वैसे भी तुमलोगों को ज्ञान और सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है, तुमलोग एक ही किताब पढ़ते हो वो है जादू की किताब और थेथरई करना है. तुमलोगों को अगर ज्ञान की ललक होती तो अब तक पता चल गया होता कि कुंवारी लड़की बिना किसी शुक्राणु और अंडाणु के मिलन से बच्चे पैदा नहीं कर सकती, और न ही कोई व्यक्ति मरने के बाद जिन्दा हो सकता है. बाकि जैसी तुमको गुलामी करनी है करो, हमें तो ज्ञान के सागर में कूदना है कुदते रहेंगे और शायद उसका दर्द लोगों को घर में, समाज में, और देश में होते रहेगा.