भारतीय धरोहर - Bhartiya Dharohar

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भारतीय धरोहर - Bhartiya Dharohar Bhartiya Dharohar a new revolution for our heritage and culture.
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21/11/2025

"बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी" ने जिस स्तर की पुस्तकें पब्लिश की है, देश में शायद किसी प्रकाशन से वैसी पुस्तकें नहीं आई।

बिहार, संस्कृति, भाषा, बुद्ध मत, दर्शन, मूर्तिकला, हिन्दू ग्रंथ, पौराणिक कालखंड समेत न जाने कितने विषयों पर वहां से प्रकाशित पुस्तकें अनमोल हैं।

पर इस प्रकाशन की बदहाली देखनी है, तो अगले महीने पटना में होने वाले पुस्तक मेले में चले जाइए। पुस्तकें शायद दशकों पुनर्मुद्रित नहीं हुई हैं; इसलिए पांच सौ रुपए में बोरा भर किताब वहां से ले सकते हैं, क्योंकि कीमत इतनी कम होती है।

लगभग डेढ़ दशक राष्ट्रवादी लोगों के बिहार में आये हो गये, कला और संस्कृति मंत्रालय भी इनके पास रहा पर किसी ने इस प्रकाशन की सुधि नहीं ली।

उम्मीद है, कोई जीवित आत्मा अबकी बार इस प्रकाशन की सुध लेगा।

मेरा तो गुरु ऋण है, इस प्रकाशन के साथ, क्योंकि मेरे अध्ययन को पुष्ट करने में इस प्रकाशन के पुस्तकों ने बड़ी सहायता की है। इसलिए मैं पोस्ट लिख रहा हूँ।

आप धरोहर संजोने के नाते इसे आगे बढ़ाइए।

लेखक : अभिजीत सिंह

18/11/2025
18/11/2025
15/11/2025

भारत को उसके बल की पुनर्स्मृति 1875 में बंकिम उसी तरह से करा रहे थे जैसे जाम्बवान हनुमान को उसके बल की याद दिला रहे थे। ‘अबला केन मा एते बल’ के साथ ‘बहुबलधारिणीं’ भी कह रहे थे। इसलिए वे जहाँ भारत की सशक्तता की बात कर रहे थे वहीं भारत की इस शक्ति को एकायामी भी बताने से विरत रहने की सचेतनता से भी सम्पन्न थे। बाद में विवेकानंद को भी यही कहना था- केवल एक ही पाप है। वह है दुर्बलता।

यह बंकिम का यथार्थवाद था कि वे बल को रेखांकित कर रहे थे। पर बहुबलधारिणीं के माध्यम से वे यह भी कह रहे थे कि निरे भौतिक बल की ही बात नहीं है। अंग्रेज जब bully के रूप में व्यवहार कर रहे थे तो बंकिम भारत को बली बता रहे थे। वह बल जो पोटेंसी ही न था,ड्राइव भी था।

हमारे यहाँ वेदव्यास ने महाभारत के उद्योग पर्व (37/52-55) में कहा था कि :

बलं पंचविधं नित्यं पुरुषाणां निबोध मे।
यत् तु बाहुबलं नाम कनिष्ठं बलमुच्यते ।।
अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते ।
तृतीयं धनलाभं तु बलमाहुर्मनीषिणः ।।
यत् त्वस्य सहजं राजन् पितृपैतामहं बलम् ।
आभिजातबलं नाम तच्चतुर्थ बलं स्मृतम् ।।
येन त्वेतानि सर्वाणि संगृहीतानि भारत।
यद् बालानां बलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते ।।

अर्थात्, राजन! आपका कल्याण हो। मनुष्यों में सदा पाँच प्रकार का बल होता है, उसे सुनिए। जो बाहुबल नामक प्रथम बल है, वह निकृष्ट बल कहलाता है। मंत्री का मिलना दूसरा बल है। मनीषी लोग धन- लाभ को तीसरा बल बताते हैं। पिता-पितामह से प्राप्त 'अभिजात' नामक चौथा बल कहा गया है। हे भारत ! जिससे इन सभी बलों को संगृहीत किया जाता है और जो सब बलों में श्रेष्ठ बल है, वह पाँचवाँ बुद्धिबल है।

ध्यान दें कि महाभारत में यह कहते समय ‘भारत’ ही सम्बोधित है।

आश्चर्य है कि इसके हजारों वर्ष बाद समाजमनोवैज्ञानिक फ्रेंच एवं रेवन ने भी 1959 में पाँच तरह की 'पावर' वर्णित कीं- पोजीशनल या लेजिटिमेट पॉवर जो किसी एक खास पोजीशन पर पहुँचने पर मिलती है, रेफरेन्ट पॉवर जो निष्ठा विकसित करवाने और दूसरों को आकर्षित करने पर निर्मित होती है, एक्सपर्ट पॉवर जो ज्ञान या कौशल की विशेषज्ञता पर निर्भर होती है, रिवार्ड पॉवर जो व्यक्ति के दूसरों की पुरस्कृत करने की शक्ति पर निर्भर करती है और कोएसिव पॉवर जो दंडित करने नुकसान पहुँचाने की शक्ति पर मुनहसिर है।

इसलिए बंकिम जब बहुबलधारिणी की बात कर रहे थे तो वे भारत को उसकी इसी शक्ति सम्पन्नता की याद करा रहे थे।

वराहमिहिर के यहाँ भी बलों की चर्चा मिलती है। उन्होंने शब्द-बल का उल्लेख किया है जिसके अंतर्गत स्थान बल (पोजीशनल स्ट्रेंथ), दिग्बल (डायरेक्शनल स्ट्रेंथ), कालबल (टेंपोरल स्ट्रेंथ), चेष्टाबल (मोशनल स्ट्रेंथ), नैसर्गिक बल (नेचुरल स्ट्रेंथ) और दृक्बल (आस्पेक्चुअल स्ट्रेंथ) शामिल हैं। वही बहुआयामी शब्द-बल इस वंदे मातरम् में था।

यह औपनिवेशकों की एक स्थाई अदा थी कि वे औपनिवेशितों को दुर्बल बताते ही थे। जेम्स मिल का कहना था कि: हिंदुस्तान के लोग शारीरिक शक्ति में यूरोपीय लोगों से कम हैं… उनके चरित्र में पुरुषत्व की उल्लेखनीय कमी है।(The people of Hindostan are, in bodily strength, inferior to the people of Europe… Their character is marked by a striking deficiency in manliness.) चार्ल्स डिल्के का कहना था कि: “एंग्लो-सैक्सन पृथ्वी पर एकमात्र ताकतवर नस्ल है… अफ्रीका और एशिया की कमजोर नस्लें उसके सामने गायब हो रही हैं।” (The Anglo-Saxon is the only extirpating race on earth… The feeble races of Africa and Asia are disappearing before him.) सेसिल रोड्स का अफ्रीका के संदर्भ में यही कहना था कि: देशी लोग बच्चे हैं… हम ही एकमात्र संभावित स्वामी और मालिक हैं… उन्हें लेना और शिक्षित करना हमारा कर्तव्य है।” (The natives are children… We are the only possible lords and masters… It is our duty to take them and educate them.) लार्ड कर्जन का कहना था कि: भारतीय स्वभाव से कमजोर है, और सदियों के कुप्रशासन से और भी कमजोर हो गया है… वह अपनी आदतों में स्त्रैण और स्वभाव में डरपोक है।” (The Indian is by nature weak, and has been rendered weaker by centuries of misrule… He is effeminate in his habits and timid in his disposition.) अल्बर्ट सरौट फ्रेंच इंडो चाइना के संदर्भ में कहता था: देशज जनता शैशव अवस्था में रहती है… वे कमजोर हैं, और उनकी कमजोरी हमारे वर्चस्व को उचित ठहराती है।(The indigenous masses remain in a state of infancy… They are weak, and their weakness justifies our domination.) जर्मन पूर्वी अफ्रीका कंपनी का संस्थापक कार्ल पीटर्स का भी यही कहना था कि अफ्रीकी बुद्धि में बच्चा और चरित्र में कमजोर है… वह जर्मनों के दृढ़ हाथ के बिना नपुंसक है। (The African is a child in intellect and a weakling in character… He is impotent without the German’s firm hand.) कांगो बेसिन को ढूँढकर वहाँ क्रूर बेल्जियन आधिपत्य की नींव डालने वाला हेनरी मोर्टन स्टेनली इसी स्वर में बोलता था : अफ्रीकी एक निर्बल प्राणी है… वह अपनी वासनाओं का गुलाम है, और यूरोपीय ऊर्जा के बिना वह हमेशा अंधकार में रहेगा। (The African is a weak creature… He is a slave to his passions, and without European energy he would remain forever in darkness.)

तब वंदे मातरम् गीत में बंकिम भारत को बहुबलधारिणी का आत्मविश्वास दे रहे थे। बंकिम भारत की छुपी और प्रकट दोनों तरह की शक्ति-समृद्धि को जानते थे।

तब इस गीत के इस भाग को राष्ट्रगान के समय अलग करने का क्या अर्थ था?

जबकि अरस्तू ने बल को एक ऐसी क्षमता के रूप में वर्णित किया था जो परिवर्तन का स्रोत है, जो उसे क्रियाशील करने का सामर्थ्य है और जो एक ऐसी स्थिति है जिसके बिना चीजें अपने आप में जस की तस रहें।

वंदे मातरम् परिवर्तन का वही उद् घोष था। भारत की जड़ता और तमस को दूर कर उसे उद्यमशील बनाने का आह्वान।

यदि स्त्री को अबला कहते थे तब भारत का स्त्री रूप में उल्लेख कर बंकिम यही कह रहे थे कि कौन तुम्हें अबला कह सकता है? शक्ति का एक अपार अप्रयुक्त भंडार था, बंकिम उसी के प्रति देशवासियों को जागृत कर रहे थे।

जिस बंगाल से अंग्रेज घुसे थे, शक्ति के रूप की सबसे अधिक पूजा तो वहीं होती थी। बंकिम उस पूजा के व्यवहारार्थ उसे देश के रूप में समीकृत कर समझा रहे थे।

शक्ति से नहीं लड़ना था। शक्ति की अंतर्स्फूर्ति के साथ लड़ना था, लड़ना है, लड़ना होगा देश के दुश्मनों के खिलाफ।

लेखक : मनोज श्रीवास्तव

12/11/2025

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06/11/2025

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05/11/2025

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'काक्षीवान्' की कन्या 'ब्रह्मवादिनी घोषा' को उनकी तरुणावस्था में भयानक कुष्ठ रोग हो गया था। बिना निराश हुए इस अभिशाप को ...
05/11/2025

'काक्षीवान्' की कन्या 'ब्रह्मवादिनी घोषा' को उनकी तरुणावस्था में भयानक कुष्ठ रोग हो गया था। बिना निराश हुए इस अभिशाप को उन्होंने अवसर में बदल दिया और 'चिकित्साशात्र' के गहन अध्ययन में जुट गईं। उन्होंने 'वेद' और 'आयुर्वेद' के एक-एक मंत्र और सूत्र पर गहन अध्ययन किया और इस दौरान न केवल वो वेदों की विद्वान् बनीं बल्कि 'चिकित्साशात्र' में भी महारत हासिल की और अश्विनकुमारों को कुष्ठ रोग की चिकित्सा विधि सिखलाकर उनसे कहा कि इस आधार पर मेरी चिकित्सा तो करो ही और इसे सीखकर मानवजाति के ऊपर भी उपकार करो।

है न रोचक और गौरव से भरा कि 'वैदिक साहित्य' में जिन अश्विनी कुमारों को "चिकित्सा शास्त्र" का जनक और अधिपति देव माना जाता है, उनको एक स्त्री 'घोषा ' ने कुष्ठ और चर्म रोग की चिकित्सा करनी सिखाई थी।

अपने शोध के आधार पर उन्होंने अपनी चिकित्सा की और वो पूर्ण रूप से स्वस्थ्य भी हुईं और उस समय की ऐसी विभूति के रूप में शोभित हुईं जिसे आप आज की भाषा में "ब्यूटी विद ब्रेन" वाली लड़की कहते हैं। यानि प्रज्ञावान, मेघावान और अप्रतिम सौन्दर्य की देवी।

हिंदू ऐसी ही देवियों की संताने हैं।

लेखक : अभिजीत सिंह

27/10/2025

सर्दियाँ आने से पहले शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को मज़बूत बनाना बेहद ज़रूरी है ❄️
क्योंकि मौसम बदलने पर शरीर का संतुलन बिगड़ता है और पित्त-वात दोष बढ़ने लगते हैं।

🌿 आयुर्वेद के अनुसार, इस समय –
✅ हल्का और सुपाच्य आहार लें
✅ रोज़ाना अभ्यंग (तेल मालिश) करें
✅ गिलोय, च्यवनप्राश और तुलसी जैसे प्राकृतिक रसायन का सेवन करें

✨ इन छोटे-छोटे उपायों से न केवल शरीर मज़बूत होता है, बल्कि रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है।

🪔 भारतीय धरोहर वैद्यशाला —
जहाँ स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

When Krishna returned after defeating Narakasura, his sister Subhadra welcomed him with lamps, sweets, and a tilak.That ...
23/10/2025

When Krishna returned after defeating Narakasura, his sister Subhadra welcomed him with lamps, sweets, and a tilak.
That moment of love became Bhai Dooj,
a celebration of protection, reunion, and the bond between siblings.

साभार : Sanskriti

23/10/2025

✨ भाई-बहन के पवित्र स्नेह का पर्व ✨
भाई दूज की हार्दिक शुभकामनाएं 💫
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपके जीवन में सदा प्रेम, सुख और समृद्धि बनी रहे।

🌿 भारतीय धरोहर वैद्यशाला — स्वस्थ जीवन की परंपरा 🌿

#भारतीयधरोहर

22/10/2025

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