15/11/2025
भारत को उसके बल की पुनर्स्मृति 1875 में बंकिम उसी तरह से करा रहे थे जैसे जाम्बवान हनुमान को उसके बल की याद दिला रहे थे। ‘अबला केन मा एते बल’ के साथ ‘बहुबलधारिणीं’ भी कह रहे थे। इसलिए वे जहाँ भारत की सशक्तता की बात कर रहे थे वहीं भारत की इस शक्ति को एकायामी भी बताने से विरत रहने की सचेतनता से भी सम्पन्न थे। बाद में विवेकानंद को भी यही कहना था- केवल एक ही पाप है। वह है दुर्बलता।
यह बंकिम का यथार्थवाद था कि वे बल को रेखांकित कर रहे थे। पर बहुबलधारिणीं के माध्यम से वे यह भी कह रहे थे कि निरे भौतिक बल की ही बात नहीं है। अंग्रेज जब bully के रूप में व्यवहार कर रहे थे तो बंकिम भारत को बली बता रहे थे। वह बल जो पोटेंसी ही न था,ड्राइव भी था।
हमारे यहाँ वेदव्यास ने महाभारत के उद्योग पर्व (37/52-55) में कहा था कि :
बलं पंचविधं नित्यं पुरुषाणां निबोध मे।
यत् तु बाहुबलं नाम कनिष्ठं बलमुच्यते ।।
अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते ।
तृतीयं धनलाभं तु बलमाहुर्मनीषिणः ।।
यत् त्वस्य सहजं राजन् पितृपैतामहं बलम् ।
आभिजातबलं नाम तच्चतुर्थ बलं स्मृतम् ।।
येन त्वेतानि सर्वाणि संगृहीतानि भारत।
यद् बालानां बलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते ।।
अर्थात्, राजन! आपका कल्याण हो। मनुष्यों में सदा पाँच प्रकार का बल होता है, उसे सुनिए। जो बाहुबल नामक प्रथम बल है, वह निकृष्ट बल कहलाता है। मंत्री का मिलना दूसरा बल है। मनीषी लोग धन- लाभ को तीसरा बल बताते हैं। पिता-पितामह से प्राप्त 'अभिजात' नामक चौथा बल कहा गया है। हे भारत ! जिससे इन सभी बलों को संगृहीत किया जाता है और जो सब बलों में श्रेष्ठ बल है, वह पाँचवाँ बुद्धिबल है।
ध्यान दें कि महाभारत में यह कहते समय ‘भारत’ ही सम्बोधित है।
आश्चर्य है कि इसके हजारों वर्ष बाद समाजमनोवैज्ञानिक फ्रेंच एवं रेवन ने भी 1959 में पाँच तरह की 'पावर' वर्णित कीं- पोजीशनल या लेजिटिमेट पॉवर जो किसी एक खास पोजीशन पर पहुँचने पर मिलती है, रेफरेन्ट पॉवर जो निष्ठा विकसित करवाने और दूसरों को आकर्षित करने पर निर्मित होती है, एक्सपर्ट पॉवर जो ज्ञान या कौशल की विशेषज्ञता पर निर्भर होती है, रिवार्ड पॉवर जो व्यक्ति के दूसरों की पुरस्कृत करने की शक्ति पर निर्भर करती है और कोएसिव पॉवर जो दंडित करने नुकसान पहुँचाने की शक्ति पर मुनहसिर है।
इसलिए बंकिम जब बहुबलधारिणी की बात कर रहे थे तो वे भारत को उसकी इसी शक्ति सम्पन्नता की याद करा रहे थे।
वराहमिहिर के यहाँ भी बलों की चर्चा मिलती है। उन्होंने शब्द-बल का उल्लेख किया है जिसके अंतर्गत स्थान बल (पोजीशनल स्ट्रेंथ), दिग्बल (डायरेक्शनल स्ट्रेंथ), कालबल (टेंपोरल स्ट्रेंथ), चेष्टाबल (मोशनल स्ट्रेंथ), नैसर्गिक बल (नेचुरल स्ट्रेंथ) और दृक्बल (आस्पेक्चुअल स्ट्रेंथ) शामिल हैं। वही बहुआयामी शब्द-बल इस वंदे मातरम् में था।
यह औपनिवेशकों की एक स्थाई अदा थी कि वे औपनिवेशितों को दुर्बल बताते ही थे। जेम्स मिल का कहना था कि: हिंदुस्तान के लोग शारीरिक शक्ति में यूरोपीय लोगों से कम हैं… उनके चरित्र में पुरुषत्व की उल्लेखनीय कमी है।(The people of Hindostan are, in bodily strength, inferior to the people of Europe… Their character is marked by a striking deficiency in manliness.) चार्ल्स डिल्के का कहना था कि: “एंग्लो-सैक्सन पृथ्वी पर एकमात्र ताकतवर नस्ल है… अफ्रीका और एशिया की कमजोर नस्लें उसके सामने गायब हो रही हैं।” (The Anglo-Saxon is the only extirpating race on earth… The feeble races of Africa and Asia are disappearing before him.) सेसिल रोड्स का अफ्रीका के संदर्भ में यही कहना था कि: देशी लोग बच्चे हैं… हम ही एकमात्र संभावित स्वामी और मालिक हैं… उन्हें लेना और शिक्षित करना हमारा कर्तव्य है।” (The natives are children… We are the only possible lords and masters… It is our duty to take them and educate them.) लार्ड कर्जन का कहना था कि: भारतीय स्वभाव से कमजोर है, और सदियों के कुप्रशासन से और भी कमजोर हो गया है… वह अपनी आदतों में स्त्रैण और स्वभाव में डरपोक है।” (The Indian is by nature weak, and has been rendered weaker by centuries of misrule… He is effeminate in his habits and timid in his disposition.) अल्बर्ट सरौट फ्रेंच इंडो चाइना के संदर्भ में कहता था: देशज जनता शैशव अवस्था में रहती है… वे कमजोर हैं, और उनकी कमजोरी हमारे वर्चस्व को उचित ठहराती है।(The indigenous masses remain in a state of infancy… They are weak, and their weakness justifies our domination.) जर्मन पूर्वी अफ्रीका कंपनी का संस्थापक कार्ल पीटर्स का भी यही कहना था कि अफ्रीकी बुद्धि में बच्चा और चरित्र में कमजोर है… वह जर्मनों के दृढ़ हाथ के बिना नपुंसक है। (The African is a child in intellect and a weakling in character… He is impotent without the German’s firm hand.) कांगो बेसिन को ढूँढकर वहाँ क्रूर बेल्जियन आधिपत्य की नींव डालने वाला हेनरी मोर्टन स्टेनली इसी स्वर में बोलता था : अफ्रीकी एक निर्बल प्राणी है… वह अपनी वासनाओं का गुलाम है, और यूरोपीय ऊर्जा के बिना वह हमेशा अंधकार में रहेगा। (The African is a weak creature… He is a slave to his passions, and without European energy he would remain forever in darkness.)
तब वंदे मातरम् गीत में बंकिम भारत को बहुबलधारिणी का आत्मविश्वास दे रहे थे। बंकिम भारत की छुपी और प्रकट दोनों तरह की शक्ति-समृद्धि को जानते थे।
तब इस गीत के इस भाग को राष्ट्रगान के समय अलग करने का क्या अर्थ था?
जबकि अरस्तू ने बल को एक ऐसी क्षमता के रूप में वर्णित किया था जो परिवर्तन का स्रोत है, जो उसे क्रियाशील करने का सामर्थ्य है और जो एक ऐसी स्थिति है जिसके बिना चीजें अपने आप में जस की तस रहें।
वंदे मातरम् परिवर्तन का वही उद् घोष था। भारत की जड़ता और तमस को दूर कर उसे उद्यमशील बनाने का आह्वान।
यदि स्त्री को अबला कहते थे तब भारत का स्त्री रूप में उल्लेख कर बंकिम यही कह रहे थे कि कौन तुम्हें अबला कह सकता है? शक्ति का एक अपार अप्रयुक्त भंडार था, बंकिम उसी के प्रति देशवासियों को जागृत कर रहे थे।
जिस बंगाल से अंग्रेज घुसे थे, शक्ति के रूप की सबसे अधिक पूजा तो वहीं होती थी। बंकिम उस पूजा के व्यवहारार्थ उसे देश के रूप में समीकृत कर समझा रहे थे।
शक्ति से नहीं लड़ना था। शक्ति की अंतर्स्फूर्ति के साथ लड़ना था, लड़ना है, लड़ना होगा देश के दुश्मनों के खिलाफ।
लेखक : मनोज श्रीवास्तव