08/07/2025
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निर्मल सिहं से जय गुरू जी तक का सफ़र - जिनको शुक्राना गुरुजी के नाम से भी जाना जाता है
पंजाब के मलेरकोटला जिले के डूगरी गाँव में, 7 जुलाई 1954 को निर्मल सिंह का जन्म हुआ वहीं डूगरी के स्कूल और कॉलेज से अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र में स्नातक की डिग्री (डबल एम ए ) प्राप्त की।आरम्भिक दिनों में वे गुरूबानी का पाठ किया करते थे उन्हें बाद में शिव जी का अवतार कहा जाने लगा और गुरू जी के नाम से प्रख्यात हुए।उन्होंने दिल्ली में एक छोटी सी जगह से अपनी पाखंड की दुकान शुरू की और सौभाग्य फल बेचने लगे। आरम्भ में तो एक दो भूले भटके लोग ही इनके पास आया करते थे फिर कुछ वर्षों बाद “गुरू जी”का भाग्य बेचने का पाखंड व्यापार खूब चल निकला और हज़ारों की संख्या में लोग जुड़ने लगे जिसमें स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक होने लगी।
गुरू जी को बहुत से ऐसे मूर्ख चेले मिल गये जो कारें के पीछे जय गुरू जी लिखा पोस्टर चिपका कर मुफ़्त में उनका प्रचार करते। निर्मल सिहं ने छतरपुर दिल्ली में भट्टी खान इलाके में बहुत बड़ा शिव मंदिर स्थापित कर लिया , जिसे बड़ा मंदिर के रूप में जाना जाता है। निर्मल सिहं वहाँ जादूगरों की तरह की रंग बिरंगी चमकीली पोशाक डालकर बैठता और मूर्खों की भीड़ उसे घेर कर बैठ जाती। गौर करें निर्मल सिहं ने कोई शास्त्र नही पढ़ा न कोई अध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण की न कोई धार्मिक पुस्तक लिखी और न कभी कोई प्रवचन दिया फिर भी करोड़ों की संख्या में अंध भक्त उन्हें ‘गुरु जी’ मानने लगे। अगर धर्म की गिरावट का जीता जागता साबूत देखना हो तो गुरू जी के छत्तरपुर स्थित दिल्ली आश्रम में जा कर देखें।
निर्मल सिंह की मृत्यु के बाद यह स्थान उनकी समाधि स्थल बना दिया गया है।मरने के बाद भी वे गुरू जी हैं और पूजे जा रहा है।
हर चमत्कारी बाबा के साथ जो कहानियाँ जोड़ी जाती है वही कहानियाँ निर्मल सिंह गुरू जी के साथ जीते जी और मृत्यु के बाद भी जोड़ी गई और वे चमत्कारी सिद्ध पुरूष के रूप में “जय गुरू जी” के नाम से मशहूर हो गये।
जिन लोगों को धनवान बनाना हो बीमारियां ठीक करवानी, रूके हुए काम पूरे करवाने हों काम धंधे में सफलता प्राप्त करवानी हों जैसे कामों को पुरा करवाना हो वह लोग गुरू जी के छत्तरपूर मन्दिर पर धन लुटवाने लगे और गुरूडम के धंधे को बखूबी से सफल कर रहे हैं। गुरू जी के अंध भक्त अपने घरों में उनकी फोटो को कुर्सी पर रख कर निचे जूते रखेंगे और उनकी पूजा आरती कीर्तन करते हैं और मुफ्त में ढोंग अंधविश्वास का प्रचार करके निर्मल सिहं “गुरू जी “ के परिवार को माला माल कर रहे हैं। निर्मल गुरुजी का देहांत कैंसर से हुआ था और उनके चेले यह मानते है कि उनके विग्रह को रखने से घर के सदस्यों की बीमारियां ठीक होती है।
मूर्ख भक्तों के लिए किसी शास्त्र का ज्ञान होना गुरू बनने की योग्यता नहीं है बल्कि करिश्माई प्रचलित होना ही सफल गुरू की योग्यता है।सुनहरे भाग्य के सपने देखने वाले लोगों की यह भीड़ कभी किसी गुरू के पीछे भागती है कभी किसी अन्य के पीछे भागने लगेगी इनको बैठे बिठाए व्यापार में बढ़ोतरी होनी चाहिए पुरुषार्थ के बिना अपार धन सम्पत्ति मिलनी चाहिए रूके काम होने चाहिए या मनोरंजन के लिए कोई गुरू नामक स्थान मिलना चाहिए। यह लोग फ़ैशन की तरह आस्था बदल लेते हैं और नये नये गुरूओं के पीछे भागते हैं। जिसका पूरा पूरा लाभ “गुरू जी “ने जीते जी उठाया गया और मरने के बाद अब उनके परिवार के लोग और प्रबंधक उठा रहे हैं।
इस तरह के पाखंड और अंधविश्वासों में फँसे लोग अपने समय धन और धर्म की हानी कर रहे हैं। इन स्वार्थी लोगों का ईश्वर को छोड़ कर पाखंडी गुरूओं की शरण में जाना,धर्म से विमुख होना मानसिक अशांति का कारण तो बनता ही है साथ में इस तरह के गुरूओं और उनके चेलों के कारण समाज बिखर रहा है,कर्म फल के सिद्धांत को न मानने से धर्म से विमुख हो रहा है और पुरुषार्थ हीन हो रहा है।