18/09/2026
“मर्द रोता नहीं…”
पर आखिर क्यों नहीं?
हर आदमी emotionally strong नहीं होता।
हर इंसान का nature अलग होता है—फिर पुरुषों से ही हमेशा ये expectations क्यों?
“Strong रहो.”
“रोना मत.”
“कमाओ.”
“जितना ज्यादा कमाओगे, उतने successful हो.”
लेकिन एक पुरुष भी इंसान है।
उसे भी दर्द होता है।
उसे भी बातें hurt करती हैं।
उस पर भी expectations का pressure पड़ता है।
Equality की बात सिर्फ rights तक सीमित नहीं हो सकती।
Emotions को लेकर भी equality होनी चाहिए.
शायद हमें अपने बेटों को यह सिखाने की जरूरत नहीं कि “मर्द रोते नहीं”—बल्कि यह सिखाने की जरूरत है कि अपनी emotions express करना कमजोरी नहीं है।
🎙️ TyTiL Talks
आप क्या सोचते हैं—क्या आज भी society पुरुषों को उनकी income और emotional strength से judge करती है?
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